Thursday, March 23, 2017

‘जिन नौजवानों को कल देश की बागडोर संभालनी है, उन्हें अक़्ल का अंधा बनाया जा रहा है’

(जब पूरा देश ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ लड़ रहा था, कुछ नेता ऐसे भी थे जो विद्यार्थियों को राजनीति में हिस्सा न लेने की सलाह देते थे. इस सलाह के जवाब में भगत सिंह ने ‘विद्यार्थी और राजनीति’ शीर्षक से यह महत्वपूर्ण लेख लिखा था, जो जुलाई, 1928 में ‘किरती’ में छपा था.)
इस बात का बड़ा भारी शोर सुना जा रहा है कि पढ़ने वाले नौजवान (विद्यार्थी) राजनीतिक या पॉलिटिकल कामों में हिस्सा न लें. पंजाब सरकार की राय बिल्कुल ही न्यारी है. विद्यार्थी से कॉलेज में दाख़िल होने से पहले इस आशय की शर्त पर हस्ताक्षर करवाए जाते हैं कि वे पॉलिटिकल कामों में हिस्सा नहीं लेंगे. आगे हमारा दुर्भाग्य कि लोगों की ओर से चुना हुआ मनोहर, जो अब शिक्षा-मंत्री है, स्कूलों-कॉलेजों के नाम एक सर्कुलर या परिपत्र भेजता है कि कोई पढ़ने या पढ़ाने वाला पॉलिटिक्स में हिस्सा न ले. कुछ दिन हुए जब लाहौर में स्टूडेंट्स यूनियन या विद्यार्थी सभा की ओर से विद्यार्थी-सप्ताह मनाया जा रहा था, वहां भी सर अब्दुल कादर और प्रोफेसर ईश्वरचंद्र नंदा ने इस बात पर ज़ोर दिया कि विद्यार्थियों को पॉलिटिक्स में हिस्सा नहीं लेना चाहिए.
पंजाब को राजनीतिक जीवन में सबसे पिछड़ा हुआ कहा जाता है. इसका क्या कारण हैं? क्या पंजाब ने बलिदान कम किए हैं? क्या पंजाब ने मुसीबतें कम झेली हैं? फिर क्या कारण है कि हम इस मैदान में सबसे पीछे है? इसका कारण स्पष्ट है कि हमारे शिक्षा विभाग के अधिकारी लोग बिल्कुल ही बुद्धू हैं. आज पंजाब काउंसिल की कार्रवाई पढ़कर इस बात का अच्छी तरह पता चलता है कि इसका कारण यह है कि हमारी शिक्षा निकम्मी और फिज़ूल होती है, और विद्यार्थी-युवा जगत अपने देश की बातों में कोई हिस्सा नहीं लेता. उन्हें इस संबंध में कोई भी ज्ञान नहीं होता. जब वे पढ़कर निकलते हैं तब उनमें से कुछ ही आगे पढ़ते हैं, लेकिन वे ऐसी कच्ची-कच्ची बातें करते हैं कि सुनकर स्वयं ही अफ़सोस कर बैठ जाने के सिवाय कोई चारा नहीं होता.
जिन नौजवानों को कल देश की बागडोर हाथ में लेनी है, उन्हें आज अक़्ल के अंधे बनाने की कोशिश की जा रही है. इससे जो परिणाम निकलेगा वह हमें ख़ुद ही समझ लेना चाहिए. हम यह मानते हैं कि विद्यार्थियों का मुख्य काम पढ़ाई करना है, उन्हें अपना पूरा ध्यान उस ओर लगा देना चाहिए लेकिन क्या देश की परिस्थितियों का ज्ञान और उनके सुधार सोचने की योग्यता पैदा करना उस शिक्षा में शामिल नहीं? यदि नहीं तो हम उस शिक्षा को भी निकम्मी समझते हैं जो सिर्फ़ क्लर्की करने के लिए ही हासिल की जाए. ऐसी शिक्षा की ज़रूरत ही क्या है? कुछ ज़्यादा चालाक आदमी यह कहते हैं, ‘काका तुम पॉलिटिक्स के अनुसार पढ़ो और सोचो ज़रूर, लेकिन कोई व्यावहारिक हिस्सा न लो. तुम अधिक योग्य होकर देश के लिए फ़ायदेमंद साबित होगे.’
बात बड़ी सुंदर लगती है, लेकिन हम इसे भी रद्द करते हैं, क्योंकि यह भी सिर्फ़ ऊपरी बात है. इस बात से यह स्पष्ट हो जाता है कि एक दिन विद्यार्थी एक पुस्तक ‘अपील टू द यंग, प्रिंस क्रोपोटकिन’ पढ़ रहा था. एक प्रोफ़ेसर साहब कहने लगे, ‘यह कौन-सी पुस्तक है? और यह तो किसी बंगाली का नाम जान पड़ता है!’ लड़का बोल पड़ा, ‘प्रिंस क्रोपोटकिन का नाम बड़ा प्रसिद्ध है. वे अर्थशास्त्र के विद्वान थे.’ इस नाम से परिचित होना प्रत्येक प्रोफ़ेसर के लिए बड़ा ज़रूरी था. प्रोफ़ेसर की ‘योग्यता’ पर लड़का हंस भी पड़ा. और उसने फिर कहा, ‘ये रूसी सज्जन थे.’ बस! ‘रूसी!’ क़हर टूट पड़ा! प्रोफ़ेसर ने कहा, ‘तुम बोल्शेविक हो, क्योंकि तुम पॉलिटिकल पुस्तकें पढ़ते हो.’ देखिए आप प्रोफ़ेसर की योग्यता! अब उन बेचारे विद्यार्थियों को उनसे क्या सीखना है? ऐसी स्थिति में वे नौजवान क्या सीख सकते हैं?
दूसरी बात यह है कि व्यावहारिक राजनीति क्या होती है? महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस का स्वागत करना और भाषण सुनना तो हुई व्यावहारिक राजनीति, पर कमीशन या वायसराय का स्वागत करना क्या हुआ? क्या वो पॉलिटिक्स का दूसरा पहलू नहीं? सरकारों और देशों के प्रबंध से संबंधित कोई भी बात पॉलिटिक्स के मैदान में ही गिनी जाएगी, तो फिर यह भी पॉलिटिक्स हुई कि नहीं? कहा जाएगा कि इससे सरकार ख़ुश होती है और दूसरी से नाराज़? फिर सवाल तो सरकार की ख़ुशी या नाराज़गी का हुआ. क्या विद्यार्थियों को जन्मते ही ख़ुशामद का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए? हम तो समझते हैं कि जब तक हिंदुस्तान में विदेशी डाकू शासन कर रहे हैं तब तक वफ़ादारी करने वाले वफ़ादार नहीं, बल्कि ग़द्दार हैं, इंसान नहीं, पशु हैं, पेट के ग़ुलाम हैं. तो हम किस तरह कहें कि विद्यार्थी वफ़ादारी का पाठ पढ़ें?
सभी मानते हैं कि हिंदुस्तान को इस समय ऐसे देश-सेवकों की ज़रूरत है, जो तन-मन-धन देश पर अर्पित कर दें और पागलों की तरह सारी उम्र देश की आज़ादी के लिए न्योछावर कर दें. लेकिन क्या बुड्ढों में ऐसे आदमी मिल सकेंगे? क्या परिवार और दुनियादारी के झंझटों में फंसे सयाने लोगों में से ऐसे लोग निकल सकेंगे? यह तो वही नौजवान निकल सकते हैं जो किन्हीं जंजालों में न फंसे हों और जंजालों में पड़ने से पहले विद्यार्थी या नौजवान तभी सोच सकते हैं यदि उन्होंने कुछ व्यावहारिक ज्ञान भी हासिल किया हो. सिर्फ गणित और ज्योग्राफी काे ही परीक्षा के पर्चों के लिए घोंटा न लगाया हो.
क्या इंग्लैंड के सभी विद्यार्थियों का कॉलेज छोड़कर जर्मनी के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए निकल पड़ना पॉलिटिक्स नहीं थी? तब हमारे उपदेशक कहां थे जो उनसे कहते, जाओ, जाकर शिक्षा हासिल करो. आज नेशनल कॉलेज, अहमदाबाद के जो लड़के सत्याग्रह के बारदोली वालों की सहायता कर रहे हैं, क्या वे ऐसे ही मूर्ख रह जाएंगे? देखते हैं उनकी तुलना में पंजाब का विश्वविद्यालय कितने योग्य आदमी पैदा करता है?
सभी देशों को आज़ाद करवाने वाले वहां के विद्यार्थी और नौजवान ही हुआ करते हैं. क्या हिंदुस्तान के नौजवान अलग-अलग रहकर अपना और अपने देश का अस्तित्व बचा पाएंगे? नौजवान 1919 में विद्यार्थियों पर किए गए अत्याचार भूल नहीं सकते. वे यह भी समझते हैं कि उन्हें क्रांति की ज़रूरत है. वे पढ़ें. जरूर पढ़ें, साथ ही पॉलिटिक्स का भी ज्ञान हासिल करें और जब ज़रूरत हो तो मैदान में कूद पड़ें और अपने जीवन को इसी काम में लगा दें. अपने प्राणों को इसी में उत्सर्ग कर दें. वरना बचने का कोई उपाय नज़र नहीं आता.
(वेबसाइट www.marxists.org से साभार)| My Source: http://thewirehindi.com/4482/student-and-politics-by-bhagat-singh/

Apoorvanand on Bhagat Singh

‘गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है, तो हमें उससे खतरा है…’ क्या पाश आज फिर यह कह पाते! | अनुराग अन्वेषी

सड़ांध मारती राजनीति के इस दौर में अवतार सिंह संधू ‘पाश’ की कविताएं दर्दनाशक मरहम की तरह काम करती हैं. उन्हें पढ़ते हुए एक सवाल मन में घुमड़ता है कि गर आज पाश जिंदा होते तो इस व्यवस्था पर उनकी प्रतिक्रिया क्या होती? जेल में बंद उम्मीदवारों की जीत पर, या जहर भरने वालों को मुख्यमंत्री पद पर पहुंचता देखकर या इरोम शर्मिला चानू की शर्मनाक हार पर पाश क्या कहते? क्या उनकी कविताओं का सुर बदल जाता या इस वक्त भी वह अपना रोष जताने के लिए बोल देते कि ‘जा पहले तू इस काबिल होकर आ, अभी तो मेरी हर शिकायत से तेरा कद बहुत छोटा है…’
पाश की कविताएं बार-बार यकीन दिलाती हैं कि वे छद्म व्यक्तित्व वाले शख्स नहीं थे. नतीजतन, उनकी कविता आज और ज्यादा मारक होती. उनके शब्दों में और पैनापन होता, उनकी अभिव्यक्ति और तीखी होती. पाश की पहली कविता 1967 में छपी थी. इसी वक़्त वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े और बाद में नागा रेड्डी गुट से भी. पर खुद को हिंसा से हमेशा दूर रखा. पाश की राजनीतिक गतिविधियां काफी तेज रही हैं. विभिन्न पार्टियों से जुड़कर आमजन के लिए लड़ना उनका धर्म रहा है. पर उनकी मुख्य पहचान किसी राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में नहीं बनी, बल्कि एक क्रांतिकारी और जुझारू कवि के रूप में बनी. उस वक्त भी पार्टियों के बदलते स्टैंड और वहां पैठी अवसरवादिता पाश को कचोटती थी. यह पाश की खीज ही थी जो हमारे समय में पूरे चरम पर दिखती है : ‘यह शर्मनाक हादसा हमारे साथ ही होना था / कि दुनिया के सबसे पवित्र शब्द ने / बन जाना था सिंहासन की खड़ाऊं / मार्क्स का सिंह जैसा सिर / दिल्ली के भूलभुलैयों में मिमियाता फिरता / हमें ही देखना था / मेरे यारो, यह कुफ्र हमारे समयों में होना था...’
सुदामा पांडेय धूमिल ने अपनी लंबी कविता ‘पटकथा’ में तार-तार होते भारत की तस्वीर खींची है. उन्होंने बताया है कि इस तार-तार होने में भी हाथ हमारा ही है. क्योंकि अक्सर हमारे विरोध की भाषा चुक जा रही है. हम चुप होते जा रहे हैं. इतना ही नहीं, अपनी चुप्पी को हम अपनी बेबसी के रूप में पेश कर उसे सही और तार्किक बता रहे हैं. कुछ इस तरह : यद्यपि यह सही है कि मैं / कोई ठंडा आदमी नहीं हूं / मुझमें भी आग है / मगर वह / भभक कर बाहर नहीं आती / क्योंकि उसके चारों तरफ चक्कर काटता / एक पूंजीवादी दिमाग है / जो परिवर्तन तो चाहता है / आहिस्ता-आहिस्ता/ कुछ इस तरह कि चीजों की शालीनता बनी रहे / कुछ इस तरह कि कांख भी ढंकी रहे / और विरोध में उठे हुए हाथ की / मुट्ठी भी तनी रहे/ और यही वजह है कि बात / फैलने की हद तक आते-आते रुक जाती है / क्योंकि हर बार / चंद टुच्ची सुविधाओं के लालच के सामने / अभियोग की भाषा चुक जाती है…
पर पाश की कविताएं बीच का रास्ता नहीं जानतीं, न बताती हैं. वे तो प्रेरित करती हैं विद्रोह करने के लिए, सच को सच की तरह देखने के लिए, उससे आंखें मूंद कर समझौता करने के लिए नहीं :
‘हाथ अगर हों तो / जोड़ने के लिए ही नहीं होते / न दुश्मन के सामने खड़े करने के लिए ही होते हैं / यह गर्दनें मरोड़ने के लिए भी होते हैं / हाथ अगर हों तो / ‘हीर’ के हाथों से ‘चूरी’पकड़ने के लिए ही नहीं होते / ‘सैदे’ की बारात रोकने के लिए भी होते हैं / ‘कैदो’ की कमर तोड़ने के लिए भी होते हैं / हाथ श्रम करने के लिए ही नहीं होते / लुटेरे हाथों को तोड़ने के लिए भी होते हैं.’
सोचना चाहता हूं कि आज जब गला फाड़कर ‘भारत माता की जै’ चिल्लाना ही ‘राष्ट्रभक्ति’ का पर्याय बनता जा रहा है, जब लाठी के बल पर राष्ट्रगीत का ‘सम्मान’ स्थापित करवाया जा रहा है, ऐसे समय में पाश की इस कविता को कैसे लिया जाता : ‘मैंने उम्रभर उसके खिलाफ सोचा और लिखा है / अगर उसके अफसोस में पूरा देश ही शामिल है / तो इस देश से मेरा नाम खारिज कर दें .../ ... इसका जो भी नाम है - गुंडों की सल्तनत का / मैं इसका नागरिक होने पर थूकता हूं / मैं उस पायलट की चालाक आंखों में / चुभता हुआ भारत हूं / हां, मैं भारत हूं चुभता हुआ उसकी आंखों में / अगर उसका अपना कोई खानदानी भारत है / तो मेरा नाम उसमें से अभी खारिज कर दो.’
क्या ‘भारत का नागरिक होने पर थूकने’ या ‘गुंडों की सल्तनत’ की अभिव्यक्ति पाश को राष्ट्रद्रोहियों की कतार में खड़ा करवा देती? या यह समझने का धैर्य ‘राष्ट्रभक्तों’ में होता कि यह कविता नवंबर 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों के खिलाफ सात्विक क्रोध में भरकर पाश ने रची थी. इस कविता में मारे गये निर्दोष सिखों के प्रति गहरी सहानुभूति थी, तो दूसरी तरफ सत्ता की गलत नीतियों के प्रति विद्रोह भी.
या कि पाश की यह कविता पढ़कर पाश के नाम के जयकारे लगाए जाते : ‘भारत / मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द / जहां कहीं भी इस्तेमाल होता है / बाकी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं...’ या ‘राष्ट्रभक्त’ पाश की इस बात से सहमत होते कि भारत किसी सामंत पुत्र का नहीं. पाश की तरह वे भी मानने लग जाते कि भारत वंचक पुत्रों का देश है. भारत को अपने लिए सम्मान मानने वाले पाश के शब्दों में : ‘इस शब्द के अर्थ / किसी दुष्यंत से संबंधित नहीं / वरन खेतों में दायर है / जहां अनाज उगता है / जहां सेंध लगती है...’
पाश वाकई खतरनाक कवि थे. इतने खतरनाक कि खालिस्तान समर्थक आतंकवादी उनकी कविताओं से डरते रहे. और आखिरकार जब पाश महज 36 बरस के रहे थे आंतकवादियों ने उनकी उम्र रोक दी, पर वे उनकी आवाज नहीं रोक पाए. तभी तो जहर घुली इस हवा में भी पाश की आवाज गूंजती है. जब विरोध के स्वर को देशद्रोही बताया जा रहा हो, जब समस्याओं को सुलझाने की जगह राष्ट्रभक्ति की आड़ लेकर दबाया जा रहा हो, जब आपकी हर गतिविधि को राष्ट्र सुरक्षा के नाम पर संदिग्ध करार दिया जा रहा हो तो पाश की यह आवाज फिर गूंजने लगती है :
‘यदि देश की सुरक्षा यही होती है / कि बिना जमीर होना जिंदगी के लिए शर्त बन जाये / आंख की पुतली में हां के सिवाय कोई भी शब्द / अश्लील हो / और मन / बदकार पलों के सामने दंडवत झुका रहे / तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है. हम तो देश को समझे थे घर जैसी पवित्र सी चीज/ जिसमें उमस नहीं होती / आदमी बरसते मेंह की गूंज की तरह गलियों में बहता है / गेहूं की बालियों की तरह खेतों में झूमता है/ और आसमान की विशालता को अर्थ देता है / हम तो देश को समझे थे आलिंगन जैसे एक एहसास का नाम / हम तो देश को समझते थे काम जैसा कोई नशा/ हम तो देश को समझते थे कुरबानीसी वफा / लेकिन गर देश / आत्मा की बेगार का कोई कारखाना है / गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है / तो हमें उससे खतरा है / गर देश का अमन ऐसा होता है / कि कर्ज के पहाड़ों से फिसलते पत्थरों की तरह / टूटता रहे अस्तित्व हमारा / और तनख्वाहों के मुंह पर थूकती रहे / कीमतों की बेशर्म हंसी / कि अपने रक्त में नहाना ही तीर्थ का पुण्य हो / तो हमें अमन से खतरा है / गर देश की सुरक्षा को कुचल कर अमन को रंग चढ़ेगा / कि वीरता बस सरहदों पर मर कर परवान चढ़ेगी / कला का फूल बस राजा की खिड़की में ही खिलेगा/ अक्ल, हुक्म के कुएं पर रहट की तरह ही धरती सींचेगी / तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है.’
मुमकिन है कि सुरक्षा के ऐसे खतरों से आगाह करती हुई कविता से फिर कोई अतिवादी डर जाता और गर पाश जिंदा होते तो फिर मार दिए जाते. पर इतना तो तय है कि जितनी बार वे मारे जाते उतनी बार उनकी कविताओं की आवाज ऊंचे सुर में जन-जन तक पहुंचती रहती.
source: https://satyagrah.scroll.in/article/105673/could-pash-have-said-these-lines-today

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