Sunday, January 15, 2017

वे चाहते तो आराम की गुजार सकते थे, फिर वे जंगलों में मारे-मारे क्यों फिरते हैं? / अपूर्वानंद

नंदिनी सुंदर और अर्चना प्रसाद अध्यापक और विदुषी हैं. विनीत लेखक और शोधार्थी हैं. ये सब अपनी नींद और चैन गंवाकर बस्तर के जंगलों में क्यों भटकते हैं?

पत्रकार ने पूछा, ‘माओवादी हिंसा का सामना करने में मुक्तिबोध की कविताएं कैसे मदद करती हैं?’ सवाल इतना अटपटा है कि आप हैरान भी नहीं हो सकते. इसमें नासमझी थी, मूर्खता या दुस्साहस? या इनका घालमेल?
यह सवाल रायपुर में पूछा गया जोकि छत्तीसगढ़ की राजधानी है. यही वह राज्य है जिसके एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के कहने पर दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू के अध्यापकों, स्वतंत्र शोधार्थियों, सांस्कृतिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर बस्तर में एक व्यक्ति की हत्या की साजिश का मुकदमा न सिर्फ दायर किया गया है, बल्कि उस अधिकारी ने यह धमकी भी दी है कि अगर उन्होंने बस्तर में कदम रखा तो जनता पत्थरों से उन्हें मार डालेगी.
न भूलिए कि राज्य के पुलिस दल ने अभी कुछ वक्त पहले ही नंदिनी सुंदर, बेला भाटिया, हिमांशु कुमार और सोनी सोरी के पुतले जलाए थे. इस पर क्षोभ का ज्वार उठना चाहिए था, लेकिन बेचैनी का कोई बुलबुला भी नहीं उठा. हमने आज तक जनता को सत्ता से जुड़े लोगों का पुतला जलाते तो देखा है, लेकिन राज्य अपने नागरिकों का पुतला जलाए, आज़ाद हिन्दुस्तान में अपनी तरह की यह पहली घटना थी. लेकिन रायपुर तो रहने दीजिए, सुरक्षित और सुसंस्कृत दिल्ली में भी कोई जुबान न हिली.
छत्तीसगढ़ की पुलिस ने इससे समझा कि वह और आगे जा सकती है. नंदिनी सुन्दर, अर्चना प्रसाद, विनीत तिवारी, संजय पराते, मंगलराम कर्मा और मंजु कवासे पर कथित रूप से माओवादियों द्वारा शामनाथ बघेल नामक व्यक्ति की हत्या की साजिश के आरोप लगाते हुए उसने जो प्रथम सूचना रिपोर्ट दायर की, वह इस ढिठाई के बढ़ने का नतीजा है.
पत्रकार के प्रश्न में आप उस दिमाग को भी देख सकते हैं जिसका पूरी तरह से राजकीयीकरण और पुलिसीकरण हो चुका है. वह राज्य के तर्क को हवा और बारिश की तरह कुदरती सच मान चुका है: मुक्तिबोध की कविताओं को माओवादी बीमारी से मुक्त करने के सरकारी अभियान का हिस्सा क्यों नहीं बनाया जा सकता? और अगर वे छत्तीसगढ़ के इस सबसे ज़रूरी काम में मदद नहीं करतीं तो फिर उनकी सामाजिक उपयोगिता ही क्या है?
पत्रकार के सवाल से इस बात का अंदाज मिलता था कि अगर अगली बार आप रायपुर जाएं और आपको माओवाद विरोधी सरकारी अभियान में मुक्तिबोध की तस्वीर या उनकी कविता की पंक्तियां टंकी दिखें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए. आखिरकार भारत सरकार ने स्वच्छता मिशन का ब्रांड अम्बैसेडर गांधी को तो बना ही दिया है!
मौक़ा गजानन माधव मुक्तिबोध की जन्मशती की शुरुआत का था. रायपुर, राजनादगांव, खैरागढ़ में एक साथ कई आयोजन हो रहे थे. मुक्तिबोध की भविष्योन्मुखी दृष्टि की अभ्यासवश चर्चा सबमें ही हुई होगी जिसके उदाहरण के तौर पर ‘अंधेरे में’ कविता को प्रायः उद्धृत किया जाता है. देश में सैनिक शासन लगने की आशंका, जिसे कई आलोचक फासिज्म कहते हैं, और उस समय सभ्य समाज की प्रतिक्रिया का वर्णन इन पंक्तियों में देखा गया है:
‘विचित्र प्रोशेसन, / गंभीर क्विक मार्च..../ कलाबत्तूवाली काली ज़रीदार ड्रेस पहने / चमकदार बैंड दल- / ..... / बैंड के लोगों के चेहरे / मिलते हैं मेरे देखे हुओं से / लगता है उनमें कई प्रतिष्ठित पत्रकार इसी नगर के.’
लेकिन ‘अंधेरे में’ कविता के आठवें अंश में गोली चलने और आग लगने और नगर से भयानक धुएं के उठने का दृश्य भी है. सड़कें सुनसान हैं और फौजी चौकसी है. ऐसी भयंकर स्थिति में शिक्षित समाज क्या कर रहा है?: ‘सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक / चिंतक, शिल्पकार, नर्तक चुप हैं; / उनके ख़याल से यह सब गप है, / मात्र किंवदंती.’
नंदिनी और उनके मित्रों के पुतले जलाने और इन सब पर मुकदमा दायर करने की खबर को अगर ज़्यादातर ने कहानी की तरह पढ़ा हो, तो ताज्जुब नहीं. लेकिन जैसा कवि आगे कहता है, ‘यह कथा नहीं है, यह सब सच है, हां भई!!’
जो लेखक के लिए एक काव्य युक्ति थी, वह फैंटसी छत्तीसगढ़ का यथार्थ बन गई है. क्योंकर यथार्थ गल्प बन गया?
नंदिनी सुंदर, अर्चना प्रसाद, विनीत तिवारी, संजय पराते, मंगलराम कर्मा और मंजु कवासे को फिलहाल नहीं छुआ जाएगा, ऐसा आश्वासन छत्तीसगढ़ सरकार ने उच्चतम न्यायालय को दिया. न्यायालय ने कहा कि अगर कोई नया तथ्य सामने आता है तो पुलिस कार्रवाई कर सकती है, लेकिन उसके पहले उसे इन सबको एक महीने का वक्त देना होगा.
जिनके नाम आप पढ़ रहे हैं वे एक किस्म के लोग नहीं हैं, न एक विचारधारा के. लेकिन वे साधारण लोग भी नहीं हैं. नंदिनी सुंदर और अर्चना प्रसाद अध्यापक और विदुषी हैं. विनीत लेखक और शोधार्थी तो हैं ही, सांस्कृतिक और राजनीतिक कार्यकर्ता हैं. संजय सीपीएम की छत्तीसगढ़ इकाई के सदस्य हैं. मंजु कवासे सीपीआई की नेता हैं और सुकमा जिले में घुपिड़ी की सरपंच हैं. दो को छोड़कर कोई आदिवासी भी नहीं है.
नंदिनी और अर्चना प्रसाद अंग्रेज़ी के अभिजात समुदाय की सदस्य भी हैं. भारत की अर्थ व्यवस्था की सिरमौर मानी जानेवाली इनफ़ोसिस कंपनी ने समाज शास्त्र के क्षेत्र में उनके विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें पुरस्कृत किया है. फिर यह पूंजीपति वर्ग, जो उदारवादी नज़रिए पर ही टिका है, क्यों चुप है? और क्यों भारत का अभिजात वर्ग खामोश है?
क्यों मान लिया गया है कि राज्य की संस्थाओं का सच प्राथमिक होगा और बाकी सबको उसकी कसौटी या अपेक्षा पर खरा उतरना ही है?
मुक्तिबोध ने अपनी कविताओं में बार-बार ‘भावना के कर्तव्य’ और ज्ञान के दायित्व की मांग की है. ज्ञान से संवलित भावना कर्तव्यशील होने को बाध्य है. उस कर्तव्य की दिशा तय है. वह उस स्याह गुलाब और सांवली सेवंती के भाग्य से जुड़ा है, जो गृहहीन हैं और दिनभर के श्रम के बाद बरगद के वृक्ष के नीचे थककर गाढ़ी नींद सो रहे हैं.
नंदिनी का काम छत्तीसगढ़ के आदिवासियों पर है. अर्चना प्रसाद जंगलों के सवाल पर काम करती हैं. उनका जीवन शोध पत्र लिखते, किताबें छपाते और सेमिनारों में सहकर्मियों से मिलते-जुलते आराम से गुजर सकता है. वैसे ही विनीत का शोध अनुदान लेते और नीति के दस्तावेज तैयार करते. संजय, मंजु कवासे और मंगलराम कर्मा भी चुनाव-चुनाव खेलते जनतंत्र के दिन काट सकते हैं. फिर ये सब क्यों अपनी नींद भुलाकर और चैन गंवाकर, जिससे मुक्तिबोध का पात्र डरता है, बस्तर के जंगलों में भटकते हैं?
ये सभी मुक्तिबोध की कविता के उस वैज्ञानिक या कलाकार की तरह नहीं, जो ‘मुक्ति का इच्छुक तृषार्त अंतर’ है और मुक्ति के यत्नों के साथ तो निरंतर है, लेकिन है ‘कार्य क्षमता से वंचित व्यक्तित्व’ और ‘असंग अस्तित्व’. ये सब अपने विषय की नियति से जुड़ा महसूस करते हैं, उनके भले जीवन के संघर्ष में उनके साथ हैं. इसीलिए तो उनकी सत्ता से ठन जाती है. फिर वह कोई भी क्यों न हो! जो आदिवासियों को बेदखल कर एक विकसित राष्ट्र बनाने पर आमादा है. उससे भी बढ़कर जो सलवा जुडूम के नाम पर उनका सैन्यीकरण कर उनकी अस्मिता का अपहरण कर लेना चाहती है. और माओवादियों की सत्ता से भी जो आदिवासियों के आज़ाद रहने के हक का इस्तेमाल करने का स्वत्वाधिकार अपने पास रखना चाहते हैं.
मुक्तिबोध का पागल सवाल करता है: ‘बताओ तो किस-किस के लिए तुम दौड़ गये’. नंदिनी सुंदर, अर्चना प्रसाद, बेला भाटिया, मालिनी सुब्रमण्यम, ईशा खंडेलवाल, मनीष गुंजाम, हिमांशु कुमार, संजय पराते जैसे लोग खुद आदिवासी नहीं, लेकिन ये ही तो मुक्तिबोधीय मनुष्य हैं, अपनी ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञान से प्रेरित, जिनकी आत्मा दूर किसी फटे हुए मन की जेब में जा गिरती है. क्या इस रिश्ते के अधिकार की रक्षा पर बात किए बिना मुक्तिबोध का नाम लेने का अधिकार हमें है?

हॉलीवुड अभिनेत्री मेरिल स्ट्रीप का यह वक्तव्य समूची दुनिया के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है? / अपूर्वानंद

अक्सर भारतीय संस्कृति का गुणगान करते हुए उसकी पाश्चात्य संस्कृति से तुलना की जाती है और पाश्चात्य संस्कृति को अपसंस्कृति का पर्याय बताया जाता है. अमरीकी संस्कृति को भी पाश्चात्य संस्कृति का ही अंग माना जाता है. लेकिन पिछले दिनों एक घटना ऐसी हुई है जो इस सामान्य धारणा पर पुनर्विचार के लिए विवश करती हैं.
संस्कृति के साथ कुछ शब्द जुड़े हुए हैं. उनमें एक है शिष्टता और दूसरा शालीनता. खुद से अलग या भिन्न का सम्मान और उसे ठेस न पहुंचाना इसमें शामिल है. दूसरों के प्रति सद्भाव को इनके साथ जोड़ लिया जाना चाहिए. इसके साथ ही दूसरों की ज़रूरत का खयाल या उसकी चिंता सुसंस्कृत व्यक्ति का गुण माना जाता है.
वह व्यक्ति जो अपने ग्लास में पानी नहीं छोड़ता या अपनी प्लेट में खाना, उनके मुकाबले अधिक सुसंस्कृत है जो इन दोनों की लापरवाह फिजूलखर्ची करते हैं. जाहिर है, इसमें सावधानी की और निरंतर सचेत रहने की आवश्यकता होती है. यानी आप खुद पर लगातार नज़र रखते हैं.
दूसरे से हुई गलती को नज़रअंदाज करना और उसे दुरुस्त कर देना लेकिन इस तरह कि उसे बुरा न लगे, यह स्वभाव कठिन है और अभ्यास करने से ही आ सकता है, लेकिन है वांछनीय अगर हम परिष्कृति के आकांक्षी हैं.
दूसरे को हीन न दिखाना और किसी भी तरह उसका अपमान न करना भी सुसंस्कृति का ही अंग है. इससे एक दर्जा आगे वे लोग हैं जो दूसरों का अपमान होते देख खामोश नहीं रहते. वे निश्चय ही बाकी के मुकाबले कहीं अधिक सुसंस्कृत हैं जो अन्याय देखकर मुंह नहीं मोड़ते और उससे संघर्ष को अपना दायित्व मानते हैं.
संस्कृत व्यक्ति वह निश्चय ही है जो, काव्य शास्त्र और कला-विनोद में प्रवीण है लेकिन उतना होना पर्याप्त नहीं है. चाहें तो कह सकते हैं कि काव्य और कला उन गुणों की शिक्षा देती हैं जिनकी चर्चा पहले की गई है. लेकिन हम यह भी जानते हैं यह रिश्ता इतना सीधा नहीं है.
हॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री मेरील स्ट्रीप ने पिछले इतवार को गोल्डन ग्लोब्स पुरस्कार समारोह में फिल्मों में अपने काम, यानी अभिनय के लिए पुरस्कार ग्रहण करते समय लगभग पांच मिनट का जो वक्तव्य दिया, वह इसी वजह से सामाजिक और राजनीतिक व्यवहार में शालीनता की बहाली की एक शानदार अपील बन गया है. वह भी ऐसी जिसे सुनकर सिर्फ़ अमरीका के नहीं, पूरी दुनिया के लोग उसमें अपने लिए भी कुछ सुन पा रहे हैं.
एक गलत ढंग से मान लिया गया है कि अभिनय या फिल्म कला की अपील विचार करने लायक नहीं होती है और इसलिए फ़िल्मी दुनिया से जुड़े लोगों को अपने काम से काम रखना चाहिए
संस्कृति का एक गुण या लक्षण यह भी है - सार्वकालिकता और सार्वभौमिकता. मेरील स्ट्रीप अंग्रेज़ी में बोल रही थीं और अमरीकी संदर्भ में बात कर रही थीं लेकिन वे जिस मानवीय आकांक्षा को अभिव्यक्त कर रही थीं, वह भाषा और राष्ट्रीयता की सीमा को लांघ जाती है और सार्वदेशिक बन जाती है.
गोल्डन ग्लोब्स पुरस्कार की आकांक्षा प्रत्येक सिनेकर्मी को होती है. यह पुरस्कार हॉलीवुड फौरेन प्रेस की और से दिया जाता है. माना जाता है सिनेमा से जुड़े लोग अपने प्रशंसकों को नाराज़ नहीं करना चाहते. एक गलत ढंग से मान लिया गया है कि अभिनय या फिल्म कला की अपील विचारातीत (विचार के अयोग्य) होती है और इसलिए फ़िल्मी दुनिया से जुड़े लोगों को अपने काम से काम रखना चाहिए. इसलिए ऐसे मौकों पर उन्हें अपने प्रशंसकों, सहयोगियों का शुक्रिया अदा करना चाहिए, और बस!
सामाजिक मुद्दों पर उनका हस्तक्षेप तो फिर भी स्वीकार्य है, जैसे साक्षरता के लिए या एड्स अथवा कैंसर के विरुद्ध अभियान में हिस्सेदारी, लेकिन जैसे ही वे उस क्षेत्र में प्रवेश करते हैं जिसे राजनीतिक कहा जाता है, अक्सर उन्हें मुंह बंद रखने की सलाह दी जाती है. मेरील स्ट्रीप ने पिछले इतवार की रात जो कहा उसे संकीर्ण रूप से ही राजनीतिक कहा जा सकता है, वह एक व्यापक अर्थ में सामाजिक व्यवहार में परिष्कार की दुहाई थी.
मेरील ने अपनी बात शुरू करते हुए कहा, ‘इस हॉल में अमरीकी समाज के सबसे ज्यादा बदमान तबके के लोग बैठे हैं: हॉलीवुड, विदेशी और प्रेस.’ आगे वे बोलीं,
‘लेकिन हम हैं कौन? और हॉलीवुड ही क्या है, आखिरकार? हॉलीवुड अलग-अलग जगहों का जमावड़ा है...हॉलीवुड बाहरी लोगों और विदेशियों से पटा हुआ है और अगर आप उन्हें निकाल दें तो फुटबाल और मार्शल आर्ट्स के अलावा यहां और कुछ देखने को बचेगा नहीं, जो वास्तविक रूप में कला नहीं है.
मेरील स्ट्रीप डोनाल्ड ट्रंप के उस भाषण के हवाले से अपनी तकलीफ जाहिर कर रही थीं जिसमें डेली न्यूज़ के रिपोर्टर सर्ज कोवाल्स्की के लाचार हाथों की नक़ल उतारते हुए उनकी खिल्ली उड़ाई गई थी
कलाकार का एकमात्र काम उन लोगों के जीवन में प्रवेश करना है जो हमसे अलग हैं और आपको वह महसूस कराना है जो वे महसूस करते हैं और ऐसी शानदार अदाकारी के काफी उदाहरण थे इस साल,...लेकिन एक अभिनय ऐसा था जिसने मुझे स्तब्ध कर दिया, वह मेरे दिल में धंस गया, लकिन इसलिए नहीं कि वह अच्छा था. उसमें कुछ भी अच्छा नहीं था. लेकिन वह असरदार था और उसने अपना काम किया: उसने अपने दर्शकों को हंसाया...यह वह क्षण था जब इस देश के सबसे सम्मानित आसन पर बैठने जा रहे व्यक्ति ने एक विकलांग रिपोर्टर की नक़ल उतारी, जिससे वह पद और प्रतिष्ठा और मुकाबला करने की क्षमता में कहीं आगे है.
इसने मेरा दिल तोड़ दिया और मैं अभी भी इसे अपने ख्याल से निकाल नहीं पा रही क्योंकि यह सिनेमा में नहीं असली ज़िंदगी में किया गया था. दूसरे को अपमानित करने की इच्छा जब सार्वजनिक जीवन के किसी व्यक्ति के माध्यम से व्यक्त होती है तो वह हर किसी की ज़िंदगी में चली जाती है क्योंकि वह सबको ऐसा करने की इजाजत या छूट देती है. अपमान का जवाब अपमान से मिलता है, हिंसा, हिंसा को जन्म देती है. जब ताकतवर लोग अपनी जगह का इस्तेमाल दूसरों पर धौंस जमाने के लिए करते हैं तो हम सबकी हार होती है.’
मेरील स्ट्रीप ने अपने संक्षिप्त वक्तव्य में कहीं अमरीका के भावी राष्ट्रपति का नाम नहीं लिया लेकिन वे डोनाल्ड ट्रंप के उस भाषण के हवाले से अपनी तकलीफ जाहिर कर रही थीं जिसमें डेली न्यूज़ के रिपोर्टर सर्ज कोवाल्स्की के लाचार हाथों की नक़ल उतारते हुए उनकी खिल्ली उड़ाई गई थी.
सार्वजनिक आचरण में फूहड़पन के हम आदी हैं और अकसर वह एक विकृत आनंद भी देता है. किसी की शारीरिक अक्षमता या उसके रूप-रंग, मोटापे, उच्चारण के सहारे किसी को नीचा दिखाना, या उसका मज़ाक बनाना हिंदी फिल्मों में आम है. लेकिन वह एक हिंसक इच्छा के साथ भी जुड़ा है - जिसकी खिल्ली उड़ाई जा रही है, उसे इससे क्षति पहुंचेगी, यह ख्याल ही खुशी देता है. मेरील स्ट्रीप ने इस हिंसक प्रवृत्ति का विरोध किया.
यह हिंसक चतुराई पिछले कुछ वर्षों में हमारे देश में बढ़ती जा रही है और उसे सार्वजनिक स्वीकृति भी मिलती जाती है.
सार्वजनिक आचार में परिष्कार का यह आग्रह अमरीका से हम तक पहुंचे तो उसे सुनने में हर्ज नहीं. जैसे मेरील के मन में ट्रंप की हिंसक अदाकारी धंस गई, हममें से कुछ लोगों के मन में आज भारत के सबसे ताकतवर शख्स के हिंसक अभिनय के कई उदाहरणों के पंजे धंसे हुए हो सकते हैं. कुछ बरस पहले शशि थरूर और उनकी प्रेमिका सुनंदा के बीच रिश्ते का जिक्र करते हुए कहा गया कि शशि थरूर की प्रेमिका पचपन करोड़ की है तो हममें से कम लोगों ने ही उसकी आलोचना की होगी, बल्कि उस वक्तव्य ने हमारे भीतर की हिंसक प्रवृत्ति को सहलाकर उत्तेजित किया.
सोनिया गांधी या चुनाव आयुक्त जेम्स लिंग्दोह के पूरे नामों का धीरे-धीरे पूरा उच्चारण करके उनके हिंदूतर होने की ओर एक हिंसक इशारे पर भी हम आहत नहीं हुए. जैसे अपने विरोधी के साथ यह व्यवहार तो उसे चित्त करने का एक चतुर दांव हो!
यह हिंसक चतुराई पिछले कुछ वर्षों में हमारे देश में बढ़ती जा रही है और उसे सार्वजनिक स्वीकृति भी मिलती जाती है. हमारे अभिनेताओं में जो सबसे ताकतवर हैं और हमारे खिलाड़ियों में भी, जो इस देश के सबसे संपन्न लोगों में भी हैं, इस हिंसा को नाम देने की हिम्मत नहीं है, उसे चुनौती देने की बात तो छोड़ दीजिए.
समाज धीरे-धीरे इस तरह की हिंसा का आदी होता जाता है. यह सब कुछ देखकर दिल सचमच टूटता है. लेकिन जैसा मेरील स्ट्रीप ने अपने वक्तव्य के अंत में कहा, अपनी एक गुजर चुकी मित्र प्रिंसेस लिया को याद करते हुए, जिन्होंने कहा था, ‘अपने टूटे हुए दिल को कला में बदल दो!’
कला आखिरकार सचाई का बयान या खोज है, और जैसा चंगेज़ आइत्मातोव के नाटक ‘फूज़ियामा’ की एक पात्र कहती है, सचाई ही सबसे बड़ा शिष्टाचार है. यह तो लेकिन हमें पता है कि इस शिष्टाचार का अभ्यास करना इतना सरल नहीं है.

क्या प्रधानमंत्री संस्थाओं सवालों से ऊपर हैं? / रवीश कुमार


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केंद्रीय सूचना आयोग आख़िरी मुक़ाम है जहाँ आप सूचना के अधिकार के तहत इंसाफ़ पाते हैं। इसी में काम करते हैं सूचना आयुक्त एम श्रीधर आचार्यलु। इन्होंने दिल्ली विश्विद्यालय को आदेश दिया कि 1978 में स्नातक करने वाले सभी छात्रों के रिकार्ड की छानबीन की जाए। इसी साल प्रधानमंत्री मोदी ने यहाँ से स्नातक किया है,जिसकी सत्यता को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। इस आदेश के कारण आचार्यलु से मानव संसाधन मंत्रालयों से जुड़ी सूचना की मांग पर फैसले का अधिकार ले लिया गया है। जिस आयोग का काम आपके अधिकारों का संरक्षण करना है,उसके ही आयुक्त को अपना काम करने की सज़ा दी जाती है।क्या सही दस्तावेज़ रखकर हमेशा के लिए इस विवाद को ख़त्म नहीं कर देना चाहिए। आपने डिग्री ली है तो डरने की क्या बात।नहीं भी ली हो तो कोई बात नहीं। सवाल करने वाला यही जानना चाहता है कि आपने डिग्री ली या नहीं। प्रधानमंत्री बनने के लिए डिग्री नहीं चाहिए मगर सवाल उठा है तो विश्वविद्यालय प्रश्नकर्ता को तो दिखा ही सकता है। आयोग को भी दिखा सकता है ताकि शक की गुज़ाइश न रहे।यह ख़बर सब जगह छपी है मगर सब जगह चुप्पी है।
क्या प्रधानमंत्री कानून और तथ्यों से ऊपर हैं? क्या वही अपने आप में तथ्य हैं,सत्य हैं।तमाम संस्थाएँ अब ये बात जनता को भी अपनी इन हरकतों से बताने लगी हैं।आज के इंडियन एक्सप्रेस में ऋतु सरीन की ख़बर छपी है।इसे पढ़ियेगा और खुले दिमाग़ से सोचियेगा।सहारा बिड़ला पेपर्स विवाद के बारे में आप जानते ही होंगे।इन पेपर्स में कई नेताओं के नाम थे मगर इसे प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ मुद्दा बनाया गया क्योंकि उनके भी नाम थे।सुप्रीम कोर्ट ने इन काग़ज़ात की जाँच कराने से इंकार कर दिया है।
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सुप्रीम कोर्ट से पहले इसी मामले की सुनवाई आयकर विवादों के निपटारे के लिए ट्राइब्यूनल में चल रही थी। इसे इंकम टैक्स सेटलमेंट कमिशन (ITSC) कहते हैं । इस संस्था को नब्बे दिनों के भीतर विवादों का निपटाना होता है। पाँच साल में इस संस्था ने एक भी केस नब्बे दिनों के भीतर नहीं निपटाया है। आयोग ने इस मामले की सुनवाई करते हुए आयकर विभाग से किसी जांच की मांग नहीं की। वरिष्ठ पत्रकार ऋतु सरीन को आयोग ने लिखित रूप से जवाब दिया है कि सहारा पेपर्स मामले की सुनवाई सबसे जल्दी पूरी गई है। पाँच साल में एक भी मामले की इतनी जल्दी सुनवाई नहीं हुई है। पाँच सितंबर 2016 को यह मामला आया और 11 नवंबर को फैसला। आयोग ने भी बिना काग़ज़ात की मांग किये फैसला दे दिया। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में जाँच की ज़रूरत नहीं समझी।
प्रधानमंत्री शुचिता और पारदर्शिता की बात करते हैं । लोग उनकी बातों पर यक़ीन भी करते हैं। क्या लोगों के विश्वास को बनाए रखने के लिए प्रधानमंत्री को ख़ुद इन आदेशों पर नहीं बोलना चाहिए। हो सकता है कि ये आरोप बेबुनियाद हो,फालतू हों मगर दूसरों का इम्तहान लेने वाले प्रधानमंत्री को कहना चाहिए था कि जल्दी जाँच कीजिये और सारे दस्तावेज़ पब्लिक को दे दीजिये। मैं किसी बात से ऊपर नहीं हूँ। लगता है उनकी सारी बातें विरोधियों के लिए हैं। उनके समर्थकों को भी इन सब बातों से फर्क नहीं पड़ता।
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कटनी,मध्यप्रदेश के एसपी गौरव तिवारी के तबादले की ख़बर जब शहर में पहुँची तो गौरव तिवारी के समर्थन में लोग सड़कों पर उतर आए।सोशल मीडिया पर समर्थन जताने लगे।गौरव ने कटनी में पाँच सौ करोड़ के हवाला नेटवर्क का भांडाभोड़ किया है। जाँच चल रही थी कि तबादला हो गया। कांग्रेस विधायक का आरोप है कि बीजेपी के मंत्री का नाम है।ऐसे मामलों की ठीक से जाँच हो जाए तो क्या पता कांग्रेस नेताओं के भी नाम आ जाएँ। सलाम कटनी की जनता का जिसने एक ईमानदार और साहसी अधिकारी को अकेला नहीं छोड़ा। मंगलवार को कटनी के लोगों ने नगर बंद का आयोजन कर न सिर्फ सरकार को चुनौती दी बल्कि गौरव जैसे अधिकारियों को संदेश दिया कि उनकी मेहनत पानी में नहीं गई है। जनता ऐसे लोगों का समर्थन करती है। महानगरों से अच्छी है कटनी की जनता जिसने एक अफसर के लिए वक्त निकाला। अब आपको पाँच सौ करोड़ के हवाला नेटवर्क के बारे में कुछ नहीं पता चलेगा। आप अभिशप्त हैं नेताओं की बातों पर ही यक़ीन करने के लिए कि भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ वही लड़ रहे हैं। बाकी सब लड़ने को क़ाबिल ही नहीं।
क्या भ्रष्टाचार से लड़ने का दावा करने वाले नेताओं के लिए, नैतिकता के लिए ही सही,यह ज़रूरी नहीं कि आईपीएस गौरव तिवारी के समर्थन में बोलें। हर बात पर प्रधानमंत्री का बोलना ज़रूरी नहीं लेकिन ऐसे मौकों पर बोल कर भ्रष्टाचार के नेटवर्क से लड़ने वाले जवानों और अफ़सरों का हौसला नहीं बढ़ा सकते थे। सब कुछ सत्ता पर बैठे लोगों के हिसाब से हो रहा है, उनका समर्थन करने वाले लोगों के लिए जो भी हो रहा है सही हो रहा है।

मेरिल स्ट्रीप का भाषण / रवीश कुमार


गोल्डेन ग्लोब्स में सेसिल बी डिमेले सम्मान को स्वीकारते हुए प्रसिद्ध अभिनेत्री मेरिल स्ट्रीप का भाषण। इसके बाद इस भाषण की प्रतिक्रिया में लिखा दो लेख पढ़ सकते हैं। अपूर्वानंद ने Satyagrah.scroll.in पर हिन्दी में लिखा है और प्रकाश के रे ने Bargad.org पर मेरिल को अंग्रेज़ी में एक पत्र लिखा है।
आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद. धन्यवाद. कृपया बैठ जाएं. कृपया बैठ जाएं. धन्यवाद. मैं आप सभी को बहुत प्यार करती हैं. आपको मुझे माफ करना होगा. मैंने इस सप्ताहांत चिल्लाने और अफसोस जाहिर करने में अपनी आवाज खो दी है. और इस साल के शुरू में कभी मैंने अपना दिमाग भी खो दिया है. इसलिए मुझे पढ़ कर बोलना होगा. शुक्रिया, हॉलीवुड विदेशी प्रेस. ह्यूग लौरी की बात से शुरू करती हूं. आप और इस कक्ष में मौजूद हम सभी, सचमुच, अभी अमेरिकी समाज के सबसे तिरस्कृत लोग हैं. इस बारे में सोचें. हॉलीवुड, विदेशी, और प्रेस. लेकिन हमलोग हैं कौन? और, आप जानते ही हैं कि हॉलीवुड क्या है. दूसरी जगहों से आये हुए लोगों का एक समूह.
मैं न्यू जर्सी में पली-बढ़ी और वहां के पब्लिक स्कूलों में मेरी रचना हुई. वायोला डेविस साउथ कैरोलाइना में बटाई पर खेती करनेवाले घर में पैदा हुई थीं, और वे लॉन्ग आइलैंड के सेंट्रल फाल्स में बड़ी हुईं. सारा पॉलसन को अकेली मां ने ब्रूकलिन में पाला-पोसा. ओहायो की सारा जेसिका पार्कर सात-आठ संतानों में एक थीं. एमी एडम्स इटली में पैदा हुई थीं. नताली पोर्टमैन जेरूसलम में जन्मी थीं. उनके जन्म प्रमाण पत्र कहां हैं? और सुंदर रुथ नेग्गा इथियोपिया में पैदा हुईं और शायद उनका लालन-पालन आयरलैंड में हुआ. और इस पुरस्कार समारोह में उन्हें वर्जीनिया की एक छोटे शहर की लड़की की भूमिका के लिए नामित किया गया है. सभी भले लोगों की तरह ही रेयान गॉस्लिंग कनाडा से हैं. और देव पटेल केन्या में पैदा हुए, लंदन में पले-बढ़े, और इस समारोह में तस्मानिया में बड़े हुए एक भारतीय की भूमिका निभाने के लिए मौजूद हैं.
हॉलीवुड बाहरी और विदेशी लोगों से भरा पड़ा है. अगर आप उन सभी को बाहर फेंक देंगे, तो आपके पास फुटबॉल और मार्शल आर्ट्स (जिनमें कोई कला नहीं है) के खेल देखने के अलावा कुछ और नहीं बचेगा. उन्होंने यह कहने के लिए मुझे तीन सेकेंड का समय दिया था. अपने से भिन्न लोगों के जीवन में प्रवेश करना और आप तक उसके अनुभव को पहुंचाना ही किसी अभिनेता या अभिनेत्री का एकमात्र काम है. और इस साल के अनेक, ढेर सारे अभिनेताओ-अभिनेत्रियों ने अपने प्रभावपूर्ण और गंभीर काम से यही किया है.
इस साल एक ऐसा अभिनय प्रदर्शन रहा है जिसने मुझे हैरान कर दिया. इसके कांटे मेरे दिल में धंस गये. ऐसा इसलिए नहीं कि यह अच्छा था. उसमें कुछ भी अच्छा नहीं था. लेकिन यह असरदार था और इसने अपना काम किया. इसने अपने लक्षित दर्शकों को हंसाने और अपनी दांत दिखाने का उद्देश्य पूरा किया. यह वह क्षण था जब हमारे देश के सबसे सम्मानित पद पर बैठने के आकांक्षी एक व्यक्ति ने एक विकलांग संवाददाता की नकल की जिससे उस व्यक्ति के धन, संपदा, ताकत और उलटवार करने की क्षमता से कोई तुलना नहीं की जा सकती है. जब मैंने यह देखा, तो मेरा दिल टूट गया. मैं अब भी इसे अपने दिमाग से हटा नहीं पा रही हूं क्योंकि ऐसा किसी फिल्म में नहीं हुआ था. यह वास्तविक जीवन था.
और, किसी सार्वजनिक मंच से, किसी ताकतवर द्वारा किसी को अपमानित करने की यह भावना सभी के जीवन पर असर डालती है क्योंकि इससे दूसरों को भी ऐसा ही करने की एक तरह अनुमति मिल जाती है. अनादर से अनादर पैदा होता है. हिंसा हिंसा को भड़काती है. जब ताकतवर अपनी स्थिति का इस्तेमाल दूसरों को दबाने के लिए करता है, तब हम सभी पराजित होते हैं.
इस बात से मैं प्रेस पर आती हूं. हमें एक सिद्धांतवादी प्रेस की जरूरत होती है जो सत्ता को जवाबदेह बना सके, जो उनकी हर गलती पर अंगुली उठा सके. इसी वजह से हमारे संस्थापकों ने प्रेस और उसकी आजादी को हमारे संविधान में उल्लिखित किया है. इसलिए मैं अपनी पहुंच के लिए प्रसिद्ध हॉलीवुड विदेशी प्रेस और हमारे तबके के सभी से यह निवेदन करती हूं कि पत्रकारों की सुरक्षा के लिए बनी समिति को समर्थन देने के लिए आगे आयें. क्योंकि हमें आगे बढ़ने के लिए उनके साथ की जरूरत है. और, उन्हें सच की सुरक्षा के लिए हमारी जरूरत है.
एक बात और. एक दफा मैं फिल्म सेट पर खड़ी शिकायत कर रही थी कि क्या हम खाने के समय पर भी काम करते रहेंगे या घंटों शूटिंग चलती रहेगी आदि आदि. इस पर टॉमी ली जोंस ने मुझसे कहा, मेरिल, क्या यह बड़ी बात नहीं है कि हम कलाकार हैं. हां, यह बड़ी बात है. और हमें एक-दूसरे को इस हैसियत तथा सहानुभूति के उत्तरदायित्व की याद दिलाते रहना होगा. हम सभी को उन उपलब्धियों पर गर्व होगा जिन्हें आज हॉलीवुड पुरस्कृत कर रहा है.
जैसा कि मेरी प्यारी दोस्त दिवंगत प्रिंसेस लीआ ने एक बार मुझसे कहा था, अपने टूटे हुए दिल को कला में बदल दो. धन्यवाद.

तीनों बन्दर बापू के / नागार्जुन

मूंड रहे दुनिया-जहान को तीनों बन्दर बापू के!
चिढ़ा रहे हैं आसमान को तीनों बन्दर बापू के!
करें रात-दिन टूर हवाई तीनों बन्दर बापू के!
बदल-बदल कर चखें मलाई तीनों बन्दर बापू के!
गाँधी-छाप झूल डाले हैं तीनों बन्दर बापू के!
असली हैं, सर्कस वाले हैं तीनों बन्दर बापू के!
बापू को ही बना रहे हैं तीनों बन्दर बापू के!
- नागार्जुन

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