Monday, May 15, 2017

मातृभाषा

विनोदकुमार शुक्ल की फटी कमीज़
जिससे बेतरतीब से निकले धागे झाँक रहे हैं
जिसे कवितायेँ सिल नहीं पाई,
वो मैं हूँ.
प्रेमचंद के चेहरे का पोपलापन
उनकी बीमारी की नुमाइश
कहानियां जिसे कह नहीं पाई
जो अस्सी बरस बाद भी
गूगल-डूडल हो जाता है
लेकिन रहता पोपला ही है,
वो मैं हूँ.
पड़ोस की बच्ची आ के पूछती है मुझसे-
'अंकल हू वाज़ प्रेमचंद?'
'बेटा प्रेमचंद बहुत बड़े हिंदी साहित्यकार थे.'
'अंकल प्लीज स्पीक इंग्लिश न. माय प्रोजेक्ट इज़ इन इंग्लिश ओनली.'
ये जो संवाद हैं न
मैं वो हूँ.
मैं भाषा हूँ
या तमाशा हूँ
मैं तुम्हारी मिटती हुई मातृभाषा हूँ.
सरकारी प्रपत्रों में
मैं तुम्हें ही समझ न आती हूँ
गानों में गालियां हो जाती हूँ.
'लड़की "चुल" कर जाती है,
इश्क "कमीना" होता है'
तो मैं खुद पे सवालिया हो जाती हूँ
मैं अंग्रेजी में उठी
हिंदी के प्रति जिज्ञासा हूँ
मैं मातृभाषा हूँ.

1 comment:

Arun Roy said...

आप बिलकुल अलग सोच रखते हैं और उसी अनुसार अभिव्यक्त भी करते हैं। शुभकामनाएं।

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