Saturday, April 22, 2017

इकबाल : वो आलातरीन शायर जिसने मुल्क ही नहीं, हमारी गंगा-जमुनी तहज़ीब के भी टुकड़े कर डाले

अल्लामा इकबाल के बारे में हिंदुस्तान में राय अलग-अलग हो सकती है. एक तबका यह कहता है कि वे अपने दौर के सबसे महान शायर थे और दूसरा यह कि हिंदुस्तान की तकसीम उन्हीं की देन है. हर एक की अपनी-अपनी कैफ़ियत है. सही या ग़लत कहने वाले हम कौन होते हैं?
इकबाल के पूर्वज सप्रू गोत्र के कश्मीरी ब्राहमण थे, जिन्होंने लगभग ढाई सौ साल पहले इस्लाम क़ुबूल कर लिया था. उनके पूर्वज कारोबार के सिलसिले में जम्मू से पंजाब के सियालकोट में आकर बस गए थे. इकबाल पढने-लिखने में तेज़ थे. उन्हें स्कूल में वज़ीफ़ा मिलता था. सियालकोट से मैट्रिक पास करके लाहौर आये और वहां सरकारी कॉलेज में दाखिला ले लिया. यहां आकर उनकी मुलाकात अंग्रेज़ प्रोफेसर अर्नाल्ड से हुई जो अरबी-फ़ारसी के विद्वान थे. अर्नाल्ड ने उनके ज़हन पर काफी असर डाला और इकबाल का उनसे जिंदगी भर राब्ता रहा.
शायरी का जुनून और राष्ट्रवाद
लाहौर उन दिनों इल्म औ अदब का गढ़ था. यहां मुशायरों की धूम होती थी. आहिस्ता-आहिस्ता इकबाल ने उन मुशायरों में शिरकत शुरू कर दी. उनके हुनर से मुतास्सिर होकर ‘ऑबसर्वर’ रिसाला (पत्रिका) के पहले मुदिर (एडिटर) शेख अब्दुल कादिर ने लिखा - ‘मैंने उन्हें पहली मर्तबा लाहौर के एक मुशायरे में उन्हें देखा. इस बज़्म में उन्हें उनके चंद हम-जमाअत (सहपाठी) खींच लाये थे और उन्होंने कह-सुनकर एक ग़ज़ल भी उनसे पढ़वाई. उस वक़्त लाहौर में लोग इकबाल के नाम से वाबस्ता (परिचित) नहीं थे. छोटी सी ग़ज़ल थी. सादा से अलफ़ाज़, ज़मीन भी मुश्किल न थी. मगर कलाम में शोखी और बेसाख्तापन (नयापन) मौजूद था. बहुत पसंद की गयी. इसके बाद दो-तीन मर्तबा इसी मुशायरे में उन्होंने ग़ज़ल पढ़ी और लोगों को इल्म हुआ कि एक होनहार शायर मैदान में आया है. मगर यह शोहरत पहले-पहल बाज़ ऐसे लोगों तक महदूद रही जो तालीमी मशागिल (पेशे) से ताल्लुक रखते थे. इतने में एक अदबी (साहित्यिक) मजलिस (बैठक) कायम हुई जिसमें महाशीर (उस तरह के लोग) शरीक होने लगे और नज़्म व नस्र (ख्याल) के मज़ामीन (विषय) की इसमें मांग हुई. शेख मुहम्मद इकबाल ने उसके एक जलसे में अपनी वह नज़्म जिसमें ‘कोह हिमाला’ से खिताब है पढ़कर सुनाई. उसमें अंग्रेजी ख़यालात थे और फ़ारसी बंदिशे. इस पर ख़ूबी ये कि वतनपरस्ती की चाशनी उसमें मौजूद थी. मजाके-ज़माना और ज़रुरियाते वक्त के मवाकिफ (मुताबिक) होने के सबाब बहुत मकबूल हुई...’
यूं तो इकबाल ने ग़ज़ल कहना स्कूल के ज़माने से ही शुरू कर दिया था और शुरू में वे अपनी ग़ज़लें दुरुस्त करवाने के लिए डाक से उस्ताद दाग़ देहलवी के पास भेजते थे. हज़रत दाग़ को जल्द ही इकबाल के हुनर का अंदाज़ा हो गया और दो-चार ग़ज़लें देखने के बाद ही लिख दिया कि इनमे सुधार की गुंजाइश नहीं है. सोचिये, दाग़ देहलवी जैसा नामचीन उस्ताद एक नए शायर के बारे में यह कहे तो कितनी बड़ी बात होगी.
लाहौर के माहौल में उनकी सोच पुख्ता होती है और अब वे देश-दुनिया, मजदूर क्रांति और समाजवाद की बातें करने लग जाते हैं. वे ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा...’ लिखते हैं. वे मज़हबी पाबंदियों और रूढ़ियों को पसंद नहीं करते और वतनपरस्ती को उनसे ऊपर रखते हुए लिखते हैं:
सच कह दूं ऐ बरहमन! गर तू बुरा न माने,
तेरे सनमकदे के बुत हो गए पुराने,
पत्थर की मूरतों में समझा है तू ख़ुदा है
ख़ाके वतन का मुझको हर ज़र्रा देवता है.’
यहां तक तो सब ठीक ही नज़र आता है पर जब वे विलायत पढ़ने जाते हैं तो किस्सा बदल जाता है.
विलायत में पढाई और ज़हनी तलातुम (उथल-पुथल)
इकबाल 1905 में आगे पढने के लिए यूरोप चले गए. उन्होंने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से बीए और जर्मनी की लुडविग मैक्सिमिलन यूनिवर्सिटी से दर्शन में डॉक्टरेट हासिल की. इंग्लैंड में उन्हें फिर प्रोफ़ेसर अर्नाल्ड का साथ मिला. विलायत में पढ़ने के दौरान उनमें एक ख़ास परिवर्तन आया - वहां के माहौल ने ज़ेहन पर इस कदर असर डाला कि जिस राष्ट्रवाद को वे अपना सबसे बड़ा मज़हब मानते थे, उस पर से उनका यकीन उठ गया. उन्हें लगा कि साम्राज्यवाद के हितों को साधने के लिए ‘राष्ट्रवाद’ का चोला पहना दिया जाता है. अवाम को धोखे में रखने के लिए ‘वतन का नया बुत’, नया देवता खड़ा किया गया है. अब वे लिखते हैं:
‘इन ताज़ा खुदाओं में, बड़ा सबसे वतन है,
जो पैराहन(कपडा) है उसका, वह मज़हब का कफ़न है’
और जहां ‘तराना-ए-हिंद’ में वे हिंदुस्तान को सारे जहां से अच्छा बताते हैं, ‘तराना-ऐ-मिल्ली’ में लिखते हैं:
‘चीन-औ-अरब हमारा, हिंदोस्तां हमारा,
मुस्लिम हैं हम वतन हैं, सारा जहां हमारा.’
यहां तक आते-आते मुस्लिम लीग को एक ऐसा अदबी शख्स मिल जाता है जो पार्टी की रूपरेखा बदल देता है.
इकबाल और द्विराष्ट्र का सिद्धांत
बात थोड़ी फ़ास्ट-फॉरवर्ड तरीके से आगे बढ़ाते हैं. इलाहाबाद में 29 दिसंबर, 1930 के दिन इकबाल मुस्लिम लीग के अध्यक्ष के तौर पर भाषण में ‘द्विराष्ट्र के सिद्धांत’ का मसला हवा में उछाल देते हैं. इकबाल के भाषण का यह अंश कुछ इस तरह हैं - ‘मैं चाहता हूं पंजाब, उत्तर-पश्चिम सीमांत, सिंध, बलूचिस्तान को मिलाकर एक राज्य बनाया जाए. स्वायत्य शासन की सरकार बने चाहे हुकूमते बर्तानिया के झंडे के नीचे या अलग. उत्तर-पश्चिम में मुसलमान राज्य की स्थापना मुझे अब आख़िरी मंज़िल आती है...’
इसकी तक़रीर में उन्होंने सदियों के हिंदू-मुसलमान भाईचारे को इतर रखकर कहा कि ’ न हमारे ख़यालात एक हैं, न रिवाज़, तारीख में दर्ज जो लोग हमारे आदर्श हैं वो हिंदुओं के नहीं और जो उनके हैं, वो हमारे नहीं.’ कुछ ऐसी ही बात हिंदू संगठन भी कह रह थे. मुल्क अब बस कुछ ही साल दूर था आज़ादी से. हवाएं तेज़ हो चली थीं. कौमी रंग हर चेहरे पर नुमायां हो रहा था. सरमायेदार बनने के लिए हर कोई बेचैन था. सबको अपना-अपना हिस्सा चाहिए था. मुल्क किसी को नहीं. रह गए थे तो बस मोहनदास करमचंद गांधी ‘खान’ और अब्दुल गफ्फार खान ‘गांधी’ सरीखे चंद लोग.
इसी दौर में इकबाल के दो ख़ास कलाम ‘ज़र्बे-कलीम’ और ‘बाल-ऐ-जिब्रील’ शाया हुए (छपे). पहले में उन्होंने आधुनिक व्यवस्था के ख़िलाफ़ जंग के ऐलान की आवाज़ उठाई और दूसरे में वे ‘उम्माह’ में यकीन करने का आवाहन करते हैं. दरअसल, इकबाल ने इस्लाम ही को अपना मुल्क मान लिया था. ओटोमन राज्य के बिखरने से आज़ाद हुए बाल्कन राज्यों पर ख़ुश होने के बजाय वे अफ़सोस ज़ाहिर करते हैं और ख़ुदा से ‘शिकवा’ करते हैं कि जो मुसलमान एकेश्वरवाद के लिए खड़े हुए थे आज इस तरह क्यूं हार रहे हैं? क्यूं वो पिछड़े हुए हैं और अगर ये हाल रहा तो कोई उनका नाम लेने वाला न रहेगा. बाद में उन्होंने ‘जवाब-ऐ-शिकवा’ लिखा जिसमें इस्लाम को मानने वालों को अपने डर, ग़ुरबत, पिछड़ेपन से लड़ने के लिए हौसला दिया.
बात अब खत्म करते हैं. इकबाल की शायरी और विचारों में मतभेद हो सकता है. पर इसमें कोई शक नहीं है कि वे उस दौर के सबसे आलातरीन शायर थे. उन्होंने गर इस्लाम की आजादी के लिये लिखा है तो राम, स्वामी रामतीर्थ और गुरुनानक पर भी लिखा. हो सकता है आप ‘सारे जहां से अच्छा...’ न गाएं पर ‘लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी...’ गाये बिना नहीं रह पायेंगे. मैं भी नहीं रह सकता
लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी
ज़िन्दगी शमा की सूरत हो ख़ुदाया मेरी
दूर दुनिया का मेरे दम अंधेरा हो जाये
हर जगह मेरे चमकने से उजाला हो जाये
हो मेरे दम से यूं ही मेरे वतन की ज़ीनत
जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत
जिंदगी हो मेरी परवाने की सूरत या रब
इल्म की शमा से हो मुझको मोहब्बत या रब
हो मेरा काम ग़रीबों की हिमायत करना
दर्दमंदों से ज़इफ़ों से मुहब्बत करना
मेरे अल्लाह बुराई से बचाना मुझको
नेक जो राह हो उस राह पे चलाना मुझको
1938 में आज ही का दिन उनका आख़िरी दिन था.
चलते-चलते
इकबाल ने कुछ समय के लिए उर्दू में लिखना छोड़ दिया था. यह उस दौर की बात है जब उन्हें महसूस हुआ कि अगर अपनी बात इस्लाम को मानने वालों तक पहुचाना है तो फ़ारसी में लिखना होगा. 1930 के बाद फिर दुबारा वे उर्दू में लिखने लग जाते हैं. दरअस्ल, उर्दू सिर्फ हिंदुस्तान में ही बोली जाती है. उन्होंने इसे मुसलमानों की ज़बान मानने से इंकार कर दिया था. सही भी है. उर्दू इस मुल्क की जुबां है. हमें यह सोचना होगा कि क्या 9 नवंबर को जब इकबाल पैदा हुए थे, हमें ‘उर्दू दिवस’ के रूप में मानना चाहिए?
Source: Satyagrah (https://satyagrah.scroll.in/article/106356/iqbal-was-great-shayar-who-is-responsible-for-breaking-indias-cultural-unity)

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