Thursday, March 30, 2017

पाश हमारे राष्ट्रकवि हैं : सुधीर सुमन


Pash
क्रान्‍ति‍कारी कवि‍ पाश के शहादत दि‍वस पर सुधीर सुमन का आलेख-
पाश का जन्म 9 सितंबर 1950 को पंजाब के जालंधर जिले के गाँव तलवंडी सलेम में हुआ था। उनका पारिवारिक नाम अवतार सिंह था। उनके पिता सेना में थे और मेजर पद से रिटायर हुए। लेकिन एक मध्यवर्गीय किसान परिवार में जन्में अवतार सिंह किशोर उम्र से ही सामाजिक-राजनीतिक बदलाव की लड़ाई से जुड़ गये और महज 38 साल की उम्र में भारतीय शासकवर्ग द्वारा पैदा किए गये खालिस्तानी पृथकतावादियों की गोलियों से शहीद हुए।
अवतार सिंह ने पंद्रह साल की उम्र में अपनी पहली कविता लिखी और उसी समय उनका जुड़ाव कम्युनिस्ट आंदोलन से हुआ और दो साल बाद जब उनकी पहली कविता प्रकाशित हुई, उसी साल ऐतिहासिक नक्सलबाड़ी विद्रोह हुआ और उसने राष्ट्र, लोकतंत्र और देशभक्ति को आम मेहनतकश जनता की नजर से परिभाषित करने पर जोर दिया। पाश एक बौद्धिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता की तरह उस आंदोलन से जुड़ गये। उन्होंने राजनीति और साहित्य ही नहीं, बल्कि विज्ञान और दर्शन का भी जमकर अध्ययन किया। नक्सलवादी आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं का उनके यहाँ जमावड़ा होने लगा। मात्र 19 साल की उम्र में उन्हें एक झूठे केस में फँसाकर जेल में डाला गया और भीषण यंत्रणाएं दी गईं। लेकिन उनके इंकलाबी विचारों को कुचलने में शासकवर्ग विफल रहा। उस लोहे को नष्ट करने में उसे सफलता नहीं मिली, बल्कि लोहा फौलाद में ढलता गया। कवितायें जेल से बाहर आती रहीं और 1970 में उनका पहला कविता संग्रह ‘लौहकथा’ प्रकाशित हुआ, जिसमें 36 कविताएं थीं, जिन्होंने हिन्‍दी की क्रान्‍ति‍कारी कविता को नई चमक और आवेग दे दी। यह जनता का लोहा था, जिस लोहे में उसकी आकांक्षा, प्रतिरोध और उसके नैतिक मानवीय मूल्यों बड़ी मजबूती से मुखरित थे- मैंने लोहा खाया है/आप लोहे की बात करते हो/लोहा जब पिघलता है/तो भाप नहीं निकलती/जब कुठाली उठानेवालों के दिलों से/भाप निकलती है/तो लोहा पिघल जाता है/पिघले हुए लोहे को/किसी भी आकार में/ढाला जा सकता है।
पाश ने ज्यादातर कवितायें पंजाबी में ही लिखीं। जिस कविता को हिन्‍दी में उपलब्ध उनकी एकमात्र कविता बताया जाता है, उसकी पंक्तियाँ देखने लायक हैं- ‘वो मेरा वर्षों को झेलने का गौरव देखा तुमने?/ इस जर्जर शरीर में लिखी/लहू की शानदार इबारत पढ़ी तुमने?’ और सचमुच हिन्‍दी ही नहीं,  दूसरी भारतीय भाषाओं के पाठकों ने भी लहू की उस शानदार इबारत को पढ़ा और लहू के रिश्ते सा ही आत्मीय महसूस किया। जिस तरह भगतसिंह हमारे राष्ट्रनायक हैं, उसी तरह पाश मुझे अपने राष्ट्रकवि लगते हैं, जनता के वास्तविक राष्ट्र के स्वप्न को आकार देने वाले और उसे हकीकत में बदलने के लिये चलने वाले संघर्षों के साथी कवि। अपनी चर्चित कविता ‘भारत’ में उन्होंने लिखा है-
भारत-
मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द
जहाँ कहीं भी प्रयोग किया जाए
बाकी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं। जाहिर है उनके लिए ‘भारत’ ऐसा शब्द नहीं है, जिसकी रक्षा के नाम पर जनता के जनवादी अधिकारों और उसके लिए चलने वाले आंदोलनों को शासकवर्ग कुचलता है। बकौल पाश-
इस शब्द के अर्थ
खेतों के उन बेटों में है
जो आज भी वृक्षों की परछाइयों से
वक्त मापते हैं
उनके पास, सिवाय पेट के, कोई समस्या नहीं….
उनके लिए जिंदगी एक पंरपरा है
और मौत के अर्थ हैं मुक्ति
अवतार सिंह साहित्य की दुनिया में पाश के नाम से मशहूर हुए। पिछले चार दशक की भारतीय कविता की दुनिया में पाश एक ऐसा नाम है, जिसे किसी भी स्थिति में नजरअंदाज करना सम्‍भव नहीं है। उनकी कवितायें क्रान्‍ति‍कारी कम्युनिस्ट आंदोलन की प्रतिनिधि आवाज तो बनी ही हुई हैं, जिस तरह शहीद-ए-आजम भगतसिंह के नारे और कई कथन भारतीय जनता के रोजमर्रा जीवन का हिस्सा बन गये, हर किस्म के परिवर्तनकामी शक्तियों ने जिस तरह इंकलाब जिंदाबाद को अपना लिया, उसी तरह पाश की कविता की पंक्तियाँ उद्धृत की जाती हैं। ‘हम लड़ेगे साथी’ और ‘सबसे खतरनाक’ जैसी कवितायें। ये दोनों कालजयी कवितायें हैं और हर किस्म की गुलामी के खिलाफ आजाद जिंदगी के लिये हर स्तर से लड़ने के लिये और बदलाव के सपनों को न मरने देने के लिए प्रेरित करती हैं- जब बंदूक न हुई, तब तलवार होगी/जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी/लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की जरूरत होगी/और हम लड़ेंगे साथी…..
आजादी के आंदोलन के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए और भविष्य में देशी और विदेशी शासकवर्ग के बीच समझौते की आशंका जताते हुए भगतसिंह ने यही तो कहा था कि शोषण के विरुद्ध जनता की लड़ाई भिन्न-भिन्न रूपों में जारी रहेगी। पाश के आदर्श भगतसिंह थे और उन्होंने लिखा था कि लेनिन की पुस्तक के उस मुड़े हुए पन्ने से पंजाब की नौजवानी को वे आगे बढ़ाना चाहते हैं, जिसे छोड़कर भगतसिंह फाँसी पर चढ़े थे। आज पाश पंजाब ही नहीं, भारत के हर उस नौजवान के प्रिय कवि हैं, जो मौजूदा व्यवस्था से असंतुष्ट और आक्रोशित है और इसमें बदलाव चाहता है।
हमारे दौर में जिस तरह जीवन के संकट और असुरक्षा के बहाने हमारे भीतर यथास्थिति के तर्क घर करते जाते हैं, पाश की कविता ‘सबसे खतरनाक’ उसी से टकराती है- ‘मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती/पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती/गद्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती/….सबसे खतरनाक होता है/मुर्दा शांति से भर जाना/न होना तड़प का सब सहन कर जाना/घर से निकलना काम पर/और काम से लौटकर घर आना/सबसे खतरनाक होता है/हमारे सपनों का मर जाना।’ अकारण नहीं है कि हमें एक यंत्र या गुलाम में तब्दील कर देने वाली राजनीतिक पार्टियों और शासकवर्ग को सपनों को इस तरह जगाए रखने की कोशिश खतरनाक लगती है, पाठ्यक्रम में पाश की कविता होना खतरनाक लगता है। एक दूसरी कविता में उन्होंने लिखा है- ‘हम अब खतरा हैं सिर्फ उनके लिये/जिन्हें दुनिया में बस खतरा ही खतरा है’। ‘युद्ध और शांति’, ‘प्रतिबद्धता’, ‘पुलिस के सिपाही से’, ‘जहाँ कविता खत्म होती है’, ‘बेदखली के लिए विनयपत्र’, ‘धर्मदीक्षा के लिए विनयपत्र’, ‘सलाम’, ‘घास’, ‘वफा’, ‘सच’, ‘जिंदगी/मौत’ जैसी उनकी कई कवितायें हैं, जो बार-बार उद्धृत की जाती हैं। वर्ग-संघर्ष को वह जनता की मुक्ति का रास्ता समझते हैं और यह कभी नहीं भूलते कि ‘यहाँ हर जगह पर एक बार्डर है/जहाँ हमारे हक खत्म होते हैं/और प्रतिष्ठित लोगों के शुरू होते हैं।’ और प्रतिष्ठित लोगों यानी शासकवर्ग हमेशा उनके निशाने पर रहता है। इस लिहाज से अपेक्षाकृत कम उद्धृत की जाने वाली कविता ‘द्रोणाचार्य के नाम’ को भी देखा जा सकता है।
नक्सलबाड़ी आंदोलन की खासियतों को रेखाँकित करते हुए प्रो. नामवर सिंह ने कहा था कि उसने साहित्य का रुख गाँवों की ओर मोड़ा, पाश की कविता और उनके रचनाकार-व्यक्तित्व दोनों पर यह बात लागू होती है। उन्होंने ‘सिआड़’, ‘हेम ज्योति’ ‘हाँक’ और ‘एंटी-47’ का सम्‍पादन करते हुए कई महत्वपूर्ण साहित्यिक-राजनीतिक लेख लिखे। 1971 में जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने अपने गाँव से ‘सिआड़’ पत्रिका निकाली। 1982-83 में उन्होंने गाँवों में हस्तलिखित पत्रिका ‘हाँक’ को लोगों के बीच वितरित करने काम भी किया। यह लोगों की वैचारिक-राजनीतिक चेतना को उन्नत बनाने की ही कोशिश थी।
पाश वामपंथ के पिछलग्गूपन को कतई पसंद नहीं करते थे। ‘हमारे समयों में’ नामक अपनी बहुचर्चित कविता में उन्होंने लिखा-
यह शर्मनाक हादसा हमारे ही साथ होना था
कि दुनिया के सबसे पवित्र शब्दों ने
बन जाना था सिंहासन की खड़ाउँ
मार्क्‍स का सिंह- जैसा सिर
दिल्ली की भूल-भुलैयों में मिमियाता फिरता
हमें ही देखना था
मेरे यारों, यह कुफ्र हमारे ही समयों में होना था।
मगर इस कुफ्र के बावजूद न वह निराश हुए न उनकी कविता। वह एकाधिकारवादी राष्ट्रवाद और पृथकतावाद दोनों से लड़ते रहे और खालिस्तानी उग्रवादियों की गोलियों से भगतसिंह की शहादत के दिन ही शहीद हुए।
अगर उन्हीं की कविता पंक्तियों से उन्हें याद किया जाए, तो ‘प्रतिबद्ध’ कविता की ये पंक्तियाँ बिल्कुल वाजिब हैं उनके लिये-
हम झूठमूठ का कुछ भी नहीं चाहते
और हम सब कुछ सचमुच का देखना चाहते हैं
जिंदगी, समाजवाद या कुछ और

Source: http://lekhakmanch.com/

Saturday, March 25, 2017

पाश के पास बीच का कोई रास्ता नहीं था

उन्हें क्रांति का कवि माना गया. उनकी तुलना भगत सिंह और चंद्रशेखर से भी की जाती रही पर वे जिंदगी और इस दुनिया को बेपनाह प्यार करनेवाले कवि थे. अवतार सिंह संधू यानी हम सबके प्यारे कवि ‘पाश’ जिंदगी की धूल, धूप, ऊष्मा और नमी को अपनी सांसों में महसूस करने वाले और मिटटी की गंध से भी किसी प्रेमिका की देह-गंध की तरह बेपनाह इश्क करने वाले कवि थे.
पाश के लिखे में गांव की मिटटी की महक है. उनकी कविताओं में बैल, रोटियां, हुक्का, गुड़, चांदनी रात, बाल्टी में झागवाला फेनिल दूध, खेत खलिहान सब अपने पूरे वजूद में जीते-जागते मिलते हैं. उनका पूरा वजूद जिंदगी के इन्हीं बहुत छोटी-छोटी बिंदुओं से मिलकर बना था. पाश के बारे में एक सबसे खासबात यह भी है कि पंजाबी भाषा का कवि होने के बावजूद पूरी हिंदी पट्टी उन्हें अपना मानती है. अपनी भाषा का कवि. अपवाद के रूप में यदि अमृता प्रीतम की बात न की जाए तो इस भाषा के किसी और कवि को हिंदी में शायद ही इतनी प्रसिद्धि प्राप्त हुई हो.
वे अकेले कवि हैं जिनकी कविताओं में जितना ज्यादा प्यार है, उतना ही आक्रोश भी. यह आक्रोश, क्रांति या फिर वैचारिक प्रतिबद्धता उनका शौक नहीं थी. यह उनके लिए लाचारी और मजबूरी थी
पाश ने खुद भी कहा है - ‘मैं आदमी हूं / बहुत-बहुत छोटा-छोटा कुछ/ जोड़कर बना हूं.’ वे जिंदगीभर इसी छोटे–छोटे बहुत कुछ को बचाने की जिद और इस बहाने इंसान को इंसान बनाए रखने की ललक में लहूलुहान होते रहे. कभी-कभी उनमें कंटीलापन भी दिखा पर हां कड़वाहट कभी नहीं आई. वे अकेले कवि हैं जिनकी कविताओं में जितना ज्यादा प्यार है, उतना ही आक्रोश भी. यह आक्रोश, क्रांति या फिर वैचारिक प्रतिबद्धता उनका शौक नहीं थी. यह उनके लिए लाचारी और मजबूरी थी. दुनिया को जीने लायक बनाने में, उसका सपना देखने की चाह में, चुनी गई मजबूरी - ‘मैं जो सिर्फ आदमी बना रहना चाहता था, यह क्या बना दिया गया हूं.’ इसी तरह ‘अब मैं विदा लेता हूं’ शीर्षक के तहत पाश कहते हैं –‘मुझे जीने की बहुत-बहुत चाह थी / कि मैं गले-गले तक जिंदगी में डूब जाना चाहता था / मेरे हिस्से की जिंदगी भी जी लेना मेरे दोस्त.’
क्रांति ऐसा शब्द है जिसके नीरस और कठोर स्वरूप की कल्पना सबसे पहले आती है लेकिन पाश इस रूप में क्रांतिकारी कवि कतई नहीं थे. वे एक बेहद भावुक और प्रेमी हृदय व्यक्ति थे. एक ऐसे इंसान जिसका पोर-पोर संवेदनशीलता से पगा था लेकिन जिसे जिंदगी ने वैसा रहने नहीं दिया. अपनी इस मजबूरी पर उनके भीतर दुनिया को अथाह प्यार करने वाला, एक साधारण-सी खुशहाल जिंदगी के सपने देखनेवाला बहुत मामूली-सा इन्सान दुखी होता और खीजता भी बहुत था -‘बहुत ही बेस्वाद है / इस बेरंग दुनिया के नक़्शे से निबटना.’
इसे त्रासदी ही कहा जाएगा कि प्रेम और जिंदगी की दूरी पाटने के बीच जिसकी कविता पूरे जीवनभर घूमती रही, उसकी कविताएं आखिरकार उसका दोष बन गईं. विचारधारा उसका सबसे बड़ा अपराध. उनके शब्द क्रांति के किसी भी औजार से कम नहीं थे.
पाश को अपने शब्दों की इस शक्ति पर पूरा यकीन था और उनसे भी ज्यादा यकीन उनके हत्यारों को था. पाश के शब्दों में शायद यह ताकत इसलिए थी कि इन्हें सबसे पहले उन्होंने खुद ही झेला
पाश को अपने शब्दों की इस शक्ति पर पूरा यकीन था और उनसे भी ज्यादा यकीन उनके हत्यारों को था. पाश के शब्दों में शायद यह ताकत इसलिए थी कि इन्हें सबसे पहले उन्होंने खुद ही झेला. उनके तीखे नुकीले नाखूनों को पहले अपने भीतर गहरे धंसने दिया था. फिर बाहर की दुनिया में उन्हें छोड़ा था. इन शब्दों को बाहर अकेला और निहत्था लड़ने के लिए छोड़ने की इस त्रासदी पर उनका कवि हृदय खूब रोया भी था - ‘ सिर्फ अपनी सुविधा के लिए तुमने / शब्दों को तराशना सीख लिया है / तुमने उन्हें इस तरह कभी नहीं देखा / जैसे अंडे में मचल रहे चूजों को / मैंने शब्दों को झेला है / ..अपने रक्त में शरण दी है / मैं गुरु गोबिंद सिंह नहीं / अपनी कविता का कवच पहनाकर / इन्हें भेजने के बाद / बहुत-बहुत रोया हूं’.
यह संवेदनशीलता की पराकाष्ठा है जिसके अपने खतरे होते हैं. कितने ही लेखकों, कलाकारों के जीवन अनुभवों से हम सब यह जानते हैं. सबसे बड़ा खतरा तो यही होता है वे आत्महत्या कर सकते हैं. उनकी रचनाओं में कोई क्रांति या यथास्थिति में बदलाव की आग देख ले तो उनकी ह्त्या की संभावना बन जाती है. पाश के साथ तो ठीक ऐसा ही हुआ था. उनकी कविताएं हद दर्जे की संवेदनशीलता से निकली थीं. सबको यही लगता था और आज भी लगता है कि उन्होंने बिलकुल वही कहा जो हम सब महसूसते हैं पर किन्हीं अज्ञात भयों से डरकर कहते नहीं या फिर हमें उस तरह कहना नहीं आता. इसी खूबी ने उन्हें लोकप्रिय बना दिया था और कई अराजक विचारों के लिए खतरा भी.
पाश 15 वर्ष की किशोरवय उम्र से ही कविताएं लिखकर छोटे-छोटे कदमों से प्रसिद्धि की ऊंचाइयों की तरफ बढ़ने लगे थे और 20 साल की उम्र में जब उनका पहला कविता संग्रह ‘लौह कथा’ छपा उससे पहले ही वे क्रांतिकारी कवि के रूप में प्रसिद्धि पा चुके थे. पाश का कविता संग्रह ‘बीच का रास्ता नहीं होता’ पंजाबी भाषा की सबसे अधिक बिकने वाली किताब है. (हिंदी में भी इसके कई संस्करण प्रकाशित हुए हैं) पाश का इस किताब के साथ एक बुरा अनुभव भी रहा. जिस प्रकाशक ने पंजाबी में इसे छापा था, सालभर के भीतर उसने इसकी सारी प्रतियां बेच लीं पर पाश को इस बिक्री से एक पाई भी नहीं दी. पाश इस बात को लेकर बहुत क्षुब्ध रहे. वे खुलकर मानते थे कि वे पंजाबी भाषा के बड़े कवि हैं. लेकिन खुद को स्थापित करने के लिए उन्होंने कभी आलोचकों की खुशामद नहीं की. दुनिया के तमाम इंसानों की आन-बान और उनकी रीढ़ की हड्डी सधी रहे इस बात की चिंता के साथ उतने ही शदीद तरीके से उन्हें अपना स्वाभिमान भी प्यारा था.
पाश का कविता संग्रह ‘बीच का रास्ता नहीं होता’ पंजाबी भाषा की सबसे अधिक बिकने वाली किताब है लेकिन इसके बदले में उन्हें एक पाई भी नहीं मिली थी
पाश की जिंदगी का सबसे बड़ा गम था ‘उच्च शिक्षित’ नहीं होने का. हालांकि अपने बेहतर कवि होने को वे अपने विधिवत शिक्षित न होने के बहुत ऊपर रखते थे. उनके पिता फ़ौज में होने के कारण हमेशा घर से बाहर रहे. मां अशिक्षित थीं सो घर में पढ़ाई का कोई सवाल ही नहीं था. बड़े भाई को जब पढ़ाई के लिए बाहर भेजा गया तो वे अराजक लोगों की संगत का शिकार बन गए. लिहाजा पाश को कोई ऐसी टेक नहीं मिली जिसकी मदद से वे उच्च शिक्षा की सीढ़ियां चढ़ पाते. हालांकि अपने दमपर वे इसकी कोशिश करते रहे. इसी कोशिश में इंटर की परीक्षा तो पास कर गए पर बीए कर पाना उनके लिए संभव नहीं हो सका. दिलचस्प बात है कि इसकी एक वजह उनके पढ़ने की लगन ही थी. परीक्षा के बीच में भी उन्हें जो किताब सामने दिख जाती उसे शुरू से लेकर आखिर तक पढ़ने बैठ जाते. पाठ्यक्रम से इतर तमाम विषय पढ़ने की इस ललक ने उन्हें डिग्री तो नहीं दिलवाई लेकिन इसने उनकी संवेदनशीलता और समझ के दायरे को ऐसा विस्तार दिया कि वे अपने दिल की अकूत गहराइयों और उसके जरिए जनमानस की बातों को भी अभिव्यक्त कर सकने में सक्षम हो गए.
पाश अपने निजी जीवन में बहुत बेबाक थे. चाहे इश्क हो या नशा, सब उन्होंने खूब खुलकर किया. अपनी कविताओं में तो वे अपने जीवन से भी अधिक बेबाक रहे. विचारों या जीवन में उन्हें किसी तरह की मिलावट पसंद नहीं थी. घुट-घुटकर, डर-डरकर जीनेवालों में से पाश बिलकुल नहीं थे. उन्हें किसी अंतहीन समय में आनेवाले सुरक्षित दिन के इंतजार में दुबककर जीना भी मंजूर नहीं था. पाश को सिर्फ अपने लिए नहीं बल्कि सबके लिए शोषण, दमन और अत्याचारों से मुक्त समतावादी दुनिया चाहिए थी. यही उनका सपना था और इसके लिए लड़ाई मजबूरी. उनके पास कोई बीच का रास्ता नहीं था.
पाश की जिंदगी का सबसे बड़ा गम था ‘उच्च शिक्षित’ नहीं होने का. हालांकि अपने बेहतर कवि होने को वे अपने विधिवत शिक्षित न होने के बहुत ऊपर रखते थे
वे सबको आगाह कर रहे थे - ‘यह वक़्त बहुत अधिक खतरनाक है साथी.’... और यह भी कि - ‘हम सब खतरा हैं उनके लिए / जिन्हें दुनिया में बस ख़तरा-ही-खतरा है.’ और उनका यह डर भी कोई बेबुनियाद डर नहीं था. पहले उन्हें 1969 में झूठे आरोपों में फंसाकर जेल भेजा गया फिर खालिस्तानी आतंकवादियों ने 23 मार्च, 1988 को उनकी हत्या कर दी.
पर इस हत्या से पाश के शब्द नहीं मरे. उनकी कविताएं लोगों के दिल में जीती रहीं. हर गलत वक़्त में उन्हें ताकीद करती रहीं - ‘सबसे खतरनाक होता है / सपनों का मर जाना / न होना दर्द का / सब कुछ सहन कर जाना / सबसे खतरनाक वे आंखें होती हैं / जो सबकुछ देखते हुए भी जमा हुआ बर्फ होती हैं.’
नामवर सिंह ने पाश को श्रद्धांजलि देने के क्रम में उन्हें एक शापित कवि कहा था. पाश शापित कवि थे, किसी शापित यक्ष की ही तरह. जिंदगी से भरे इस कवि को कभी भी अपने मन लायक जीवन या दुनिया नहीं मिली. शायद पाश से शापित वह विचारधारा है जिसने उनकी जान ली. ये विचारधाराएं आज भी हमारे आसपास कभी-कभार प्रभावी होती दिख जाती हैं लेकिन, इनसे लड़ने के लिए अब हमारे पास पाश हैं.
Source: http://satyagrah.scroll.in/article/100240/pash-avtar-singh-sandhu-poet-tribute

Thursday, March 23, 2017

‘जिन नौजवानों को कल देश की बागडोर संभालनी है, उन्हें अक़्ल का अंधा बनाया जा रहा है’

(जब पूरा देश ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ लड़ रहा था, कुछ नेता ऐसे भी थे जो विद्यार्थियों को राजनीति में हिस्सा न लेने की सलाह देते थे. इस सलाह के जवाब में भगत सिंह ने ‘विद्यार्थी और राजनीति’ शीर्षक से यह महत्वपूर्ण लेख लिखा था, जो जुलाई, 1928 में ‘किरती’ में छपा था.)
इस बात का बड़ा भारी शोर सुना जा रहा है कि पढ़ने वाले नौजवान (विद्यार्थी) राजनीतिक या पॉलिटिकल कामों में हिस्सा न लें. पंजाब सरकार की राय बिल्कुल ही न्यारी है. विद्यार्थी से कॉलेज में दाख़िल होने से पहले इस आशय की शर्त पर हस्ताक्षर करवाए जाते हैं कि वे पॉलिटिकल कामों में हिस्सा नहीं लेंगे. आगे हमारा दुर्भाग्य कि लोगों की ओर से चुना हुआ मनोहर, जो अब शिक्षा-मंत्री है, स्कूलों-कॉलेजों के नाम एक सर्कुलर या परिपत्र भेजता है कि कोई पढ़ने या पढ़ाने वाला पॉलिटिक्स में हिस्सा न ले. कुछ दिन हुए जब लाहौर में स्टूडेंट्स यूनियन या विद्यार्थी सभा की ओर से विद्यार्थी-सप्ताह मनाया जा रहा था, वहां भी सर अब्दुल कादर और प्रोफेसर ईश्वरचंद्र नंदा ने इस बात पर ज़ोर दिया कि विद्यार्थियों को पॉलिटिक्स में हिस्सा नहीं लेना चाहिए.
पंजाब को राजनीतिक जीवन में सबसे पिछड़ा हुआ कहा जाता है. इसका क्या कारण हैं? क्या पंजाब ने बलिदान कम किए हैं? क्या पंजाब ने मुसीबतें कम झेली हैं? फिर क्या कारण है कि हम इस मैदान में सबसे पीछे है? इसका कारण स्पष्ट है कि हमारे शिक्षा विभाग के अधिकारी लोग बिल्कुल ही बुद्धू हैं. आज पंजाब काउंसिल की कार्रवाई पढ़कर इस बात का अच्छी तरह पता चलता है कि इसका कारण यह है कि हमारी शिक्षा निकम्मी और फिज़ूल होती है, और विद्यार्थी-युवा जगत अपने देश की बातों में कोई हिस्सा नहीं लेता. उन्हें इस संबंध में कोई भी ज्ञान नहीं होता. जब वे पढ़कर निकलते हैं तब उनमें से कुछ ही आगे पढ़ते हैं, लेकिन वे ऐसी कच्ची-कच्ची बातें करते हैं कि सुनकर स्वयं ही अफ़सोस कर बैठ जाने के सिवाय कोई चारा नहीं होता.
जिन नौजवानों को कल देश की बागडोर हाथ में लेनी है, उन्हें आज अक़्ल के अंधे बनाने की कोशिश की जा रही है. इससे जो परिणाम निकलेगा वह हमें ख़ुद ही समझ लेना चाहिए. हम यह मानते हैं कि विद्यार्थियों का मुख्य काम पढ़ाई करना है, उन्हें अपना पूरा ध्यान उस ओर लगा देना चाहिए लेकिन क्या देश की परिस्थितियों का ज्ञान और उनके सुधार सोचने की योग्यता पैदा करना उस शिक्षा में शामिल नहीं? यदि नहीं तो हम उस शिक्षा को भी निकम्मी समझते हैं जो सिर्फ़ क्लर्की करने के लिए ही हासिल की जाए. ऐसी शिक्षा की ज़रूरत ही क्या है? कुछ ज़्यादा चालाक आदमी यह कहते हैं, ‘काका तुम पॉलिटिक्स के अनुसार पढ़ो और सोचो ज़रूर, लेकिन कोई व्यावहारिक हिस्सा न लो. तुम अधिक योग्य होकर देश के लिए फ़ायदेमंद साबित होगे.’
बात बड़ी सुंदर लगती है, लेकिन हम इसे भी रद्द करते हैं, क्योंकि यह भी सिर्फ़ ऊपरी बात है. इस बात से यह स्पष्ट हो जाता है कि एक दिन विद्यार्थी एक पुस्तक ‘अपील टू द यंग, प्रिंस क्रोपोटकिन’ पढ़ रहा था. एक प्रोफ़ेसर साहब कहने लगे, ‘यह कौन-सी पुस्तक है? और यह तो किसी बंगाली का नाम जान पड़ता है!’ लड़का बोल पड़ा, ‘प्रिंस क्रोपोटकिन का नाम बड़ा प्रसिद्ध है. वे अर्थशास्त्र के विद्वान थे.’ इस नाम से परिचित होना प्रत्येक प्रोफ़ेसर के लिए बड़ा ज़रूरी था. प्रोफ़ेसर की ‘योग्यता’ पर लड़का हंस भी पड़ा. और उसने फिर कहा, ‘ये रूसी सज्जन थे.’ बस! ‘रूसी!’ क़हर टूट पड़ा! प्रोफ़ेसर ने कहा, ‘तुम बोल्शेविक हो, क्योंकि तुम पॉलिटिकल पुस्तकें पढ़ते हो.’ देखिए आप प्रोफ़ेसर की योग्यता! अब उन बेचारे विद्यार्थियों को उनसे क्या सीखना है? ऐसी स्थिति में वे नौजवान क्या सीख सकते हैं?
दूसरी बात यह है कि व्यावहारिक राजनीति क्या होती है? महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस का स्वागत करना और भाषण सुनना तो हुई व्यावहारिक राजनीति, पर कमीशन या वायसराय का स्वागत करना क्या हुआ? क्या वो पॉलिटिक्स का दूसरा पहलू नहीं? सरकारों और देशों के प्रबंध से संबंधित कोई भी बात पॉलिटिक्स के मैदान में ही गिनी जाएगी, तो फिर यह भी पॉलिटिक्स हुई कि नहीं? कहा जाएगा कि इससे सरकार ख़ुश होती है और दूसरी से नाराज़? फिर सवाल तो सरकार की ख़ुशी या नाराज़गी का हुआ. क्या विद्यार्थियों को जन्मते ही ख़ुशामद का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए? हम तो समझते हैं कि जब तक हिंदुस्तान में विदेशी डाकू शासन कर रहे हैं तब तक वफ़ादारी करने वाले वफ़ादार नहीं, बल्कि ग़द्दार हैं, इंसान नहीं, पशु हैं, पेट के ग़ुलाम हैं. तो हम किस तरह कहें कि विद्यार्थी वफ़ादारी का पाठ पढ़ें?
सभी मानते हैं कि हिंदुस्तान को इस समय ऐसे देश-सेवकों की ज़रूरत है, जो तन-मन-धन देश पर अर्पित कर दें और पागलों की तरह सारी उम्र देश की आज़ादी के लिए न्योछावर कर दें. लेकिन क्या बुड्ढों में ऐसे आदमी मिल सकेंगे? क्या परिवार और दुनियादारी के झंझटों में फंसे सयाने लोगों में से ऐसे लोग निकल सकेंगे? यह तो वही नौजवान निकल सकते हैं जो किन्हीं जंजालों में न फंसे हों और जंजालों में पड़ने से पहले विद्यार्थी या नौजवान तभी सोच सकते हैं यदि उन्होंने कुछ व्यावहारिक ज्ञान भी हासिल किया हो. सिर्फ गणित और ज्योग्राफी काे ही परीक्षा के पर्चों के लिए घोंटा न लगाया हो.
क्या इंग्लैंड के सभी विद्यार्थियों का कॉलेज छोड़कर जर्मनी के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए निकल पड़ना पॉलिटिक्स नहीं थी? तब हमारे उपदेशक कहां थे जो उनसे कहते, जाओ, जाकर शिक्षा हासिल करो. आज नेशनल कॉलेज, अहमदाबाद के जो लड़के सत्याग्रह के बारदोली वालों की सहायता कर रहे हैं, क्या वे ऐसे ही मूर्ख रह जाएंगे? देखते हैं उनकी तुलना में पंजाब का विश्वविद्यालय कितने योग्य आदमी पैदा करता है?
सभी देशों को आज़ाद करवाने वाले वहां के विद्यार्थी और नौजवान ही हुआ करते हैं. क्या हिंदुस्तान के नौजवान अलग-अलग रहकर अपना और अपने देश का अस्तित्व बचा पाएंगे? नौजवान 1919 में विद्यार्थियों पर किए गए अत्याचार भूल नहीं सकते. वे यह भी समझते हैं कि उन्हें क्रांति की ज़रूरत है. वे पढ़ें. जरूर पढ़ें, साथ ही पॉलिटिक्स का भी ज्ञान हासिल करें और जब ज़रूरत हो तो मैदान में कूद पड़ें और अपने जीवन को इसी काम में लगा दें. अपने प्राणों को इसी में उत्सर्ग कर दें. वरना बचने का कोई उपाय नज़र नहीं आता.
(वेबसाइट www.marxists.org से साभार)| My Source: http://thewirehindi.com/4482/student-and-politics-by-bhagat-singh/

Apoorvanand on Bhagat Singh

‘गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है, तो हमें उससे खतरा है…’ क्या पाश आज फिर यह कह पाते! | अनुराग अन्वेषी

सड़ांध मारती राजनीति के इस दौर में अवतार सिंह संधू ‘पाश’ की कविताएं दर्दनाशक मरहम की तरह काम करती हैं. उन्हें पढ़ते हुए एक सवाल मन में घुमड़ता है कि गर आज पाश जिंदा होते तो इस व्यवस्था पर उनकी प्रतिक्रिया क्या होती? जेल में बंद उम्मीदवारों की जीत पर, या जहर भरने वालों को मुख्यमंत्री पद पर पहुंचता देखकर या इरोम शर्मिला चानू की शर्मनाक हार पर पाश क्या कहते? क्या उनकी कविताओं का सुर बदल जाता या इस वक्त भी वह अपना रोष जताने के लिए बोल देते कि ‘जा पहले तू इस काबिल होकर आ, अभी तो मेरी हर शिकायत से तेरा कद बहुत छोटा है…’
पाश की कविताएं बार-बार यकीन दिलाती हैं कि वे छद्म व्यक्तित्व वाले शख्स नहीं थे. नतीजतन, उनकी कविता आज और ज्यादा मारक होती. उनके शब्दों में और पैनापन होता, उनकी अभिव्यक्ति और तीखी होती. पाश की पहली कविता 1967 में छपी थी. इसी वक़्त वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े और बाद में नागा रेड्डी गुट से भी. पर खुद को हिंसा से हमेशा दूर रखा. पाश की राजनीतिक गतिविधियां काफी तेज रही हैं. विभिन्न पार्टियों से जुड़कर आमजन के लिए लड़ना उनका धर्म रहा है. पर उनकी मुख्य पहचान किसी राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में नहीं बनी, बल्कि एक क्रांतिकारी और जुझारू कवि के रूप में बनी. उस वक्त भी पार्टियों के बदलते स्टैंड और वहां पैठी अवसरवादिता पाश को कचोटती थी. यह पाश की खीज ही थी जो हमारे समय में पूरे चरम पर दिखती है : ‘यह शर्मनाक हादसा हमारे साथ ही होना था / कि दुनिया के सबसे पवित्र शब्द ने / बन जाना था सिंहासन की खड़ाऊं / मार्क्स का सिंह जैसा सिर / दिल्ली के भूलभुलैयों में मिमियाता फिरता / हमें ही देखना था / मेरे यारो, यह कुफ्र हमारे समयों में होना था...’
सुदामा पांडेय धूमिल ने अपनी लंबी कविता ‘पटकथा’ में तार-तार होते भारत की तस्वीर खींची है. उन्होंने बताया है कि इस तार-तार होने में भी हाथ हमारा ही है. क्योंकि अक्सर हमारे विरोध की भाषा चुक जा रही है. हम चुप होते जा रहे हैं. इतना ही नहीं, अपनी चुप्पी को हम अपनी बेबसी के रूप में पेश कर उसे सही और तार्किक बता रहे हैं. कुछ इस तरह : यद्यपि यह सही है कि मैं / कोई ठंडा आदमी नहीं हूं / मुझमें भी आग है / मगर वह / भभक कर बाहर नहीं आती / क्योंकि उसके चारों तरफ चक्कर काटता / एक पूंजीवादी दिमाग है / जो परिवर्तन तो चाहता है / आहिस्ता-आहिस्ता/ कुछ इस तरह कि चीजों की शालीनता बनी रहे / कुछ इस तरह कि कांख भी ढंकी रहे / और विरोध में उठे हुए हाथ की / मुट्ठी भी तनी रहे/ और यही वजह है कि बात / फैलने की हद तक आते-आते रुक जाती है / क्योंकि हर बार / चंद टुच्ची सुविधाओं के लालच के सामने / अभियोग की भाषा चुक जाती है…
पर पाश की कविताएं बीच का रास्ता नहीं जानतीं, न बताती हैं. वे तो प्रेरित करती हैं विद्रोह करने के लिए, सच को सच की तरह देखने के लिए, उससे आंखें मूंद कर समझौता करने के लिए नहीं :
‘हाथ अगर हों तो / जोड़ने के लिए ही नहीं होते / न दुश्मन के सामने खड़े करने के लिए ही होते हैं / यह गर्दनें मरोड़ने के लिए भी होते हैं / हाथ अगर हों तो / ‘हीर’ के हाथों से ‘चूरी’पकड़ने के लिए ही नहीं होते / ‘सैदे’ की बारात रोकने के लिए भी होते हैं / ‘कैदो’ की कमर तोड़ने के लिए भी होते हैं / हाथ श्रम करने के लिए ही नहीं होते / लुटेरे हाथों को तोड़ने के लिए भी होते हैं.’
सोचना चाहता हूं कि आज जब गला फाड़कर ‘भारत माता की जै’ चिल्लाना ही ‘राष्ट्रभक्ति’ का पर्याय बनता जा रहा है, जब लाठी के बल पर राष्ट्रगीत का ‘सम्मान’ स्थापित करवाया जा रहा है, ऐसे समय में पाश की इस कविता को कैसे लिया जाता : ‘मैंने उम्रभर उसके खिलाफ सोचा और लिखा है / अगर उसके अफसोस में पूरा देश ही शामिल है / तो इस देश से मेरा नाम खारिज कर दें .../ ... इसका जो भी नाम है - गुंडों की सल्तनत का / मैं इसका नागरिक होने पर थूकता हूं / मैं उस पायलट की चालाक आंखों में / चुभता हुआ भारत हूं / हां, मैं भारत हूं चुभता हुआ उसकी आंखों में / अगर उसका अपना कोई खानदानी भारत है / तो मेरा नाम उसमें से अभी खारिज कर दो.’
क्या ‘भारत का नागरिक होने पर थूकने’ या ‘गुंडों की सल्तनत’ की अभिव्यक्ति पाश को राष्ट्रद्रोहियों की कतार में खड़ा करवा देती? या यह समझने का धैर्य ‘राष्ट्रभक्तों’ में होता कि यह कविता नवंबर 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों के खिलाफ सात्विक क्रोध में भरकर पाश ने रची थी. इस कविता में मारे गये निर्दोष सिखों के प्रति गहरी सहानुभूति थी, तो दूसरी तरफ सत्ता की गलत नीतियों के प्रति विद्रोह भी.
या कि पाश की यह कविता पढ़कर पाश के नाम के जयकारे लगाए जाते : ‘भारत / मेरे सम्मान का सबसे महान शब्द / जहां कहीं भी इस्तेमाल होता है / बाकी सभी शब्द अर्थहीन हो जाते हैं...’ या ‘राष्ट्रभक्त’ पाश की इस बात से सहमत होते कि भारत किसी सामंत पुत्र का नहीं. पाश की तरह वे भी मानने लग जाते कि भारत वंचक पुत्रों का देश है. भारत को अपने लिए सम्मान मानने वाले पाश के शब्दों में : ‘इस शब्द के अर्थ / किसी दुष्यंत से संबंधित नहीं / वरन खेतों में दायर है / जहां अनाज उगता है / जहां सेंध लगती है...’
पाश वाकई खतरनाक कवि थे. इतने खतरनाक कि खालिस्तान समर्थक आतंकवादी उनकी कविताओं से डरते रहे. और आखिरकार जब पाश महज 36 बरस के रहे थे आंतकवादियों ने उनकी उम्र रोक दी, पर वे उनकी आवाज नहीं रोक पाए. तभी तो जहर घुली इस हवा में भी पाश की आवाज गूंजती है. जब विरोध के स्वर को देशद्रोही बताया जा रहा हो, जब समस्याओं को सुलझाने की जगह राष्ट्रभक्ति की आड़ लेकर दबाया जा रहा हो, जब आपकी हर गतिविधि को राष्ट्र सुरक्षा के नाम पर संदिग्ध करार दिया जा रहा हो तो पाश की यह आवाज फिर गूंजने लगती है :
‘यदि देश की सुरक्षा यही होती है / कि बिना जमीर होना जिंदगी के लिए शर्त बन जाये / आंख की पुतली में हां के सिवाय कोई भी शब्द / अश्लील हो / और मन / बदकार पलों के सामने दंडवत झुका रहे / तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है. हम तो देश को समझे थे घर जैसी पवित्र सी चीज/ जिसमें उमस नहीं होती / आदमी बरसते मेंह की गूंज की तरह गलियों में बहता है / गेहूं की बालियों की तरह खेतों में झूमता है/ और आसमान की विशालता को अर्थ देता है / हम तो देश को समझे थे आलिंगन जैसे एक एहसास का नाम / हम तो देश को समझते थे काम जैसा कोई नशा/ हम तो देश को समझते थे कुरबानीसी वफा / लेकिन गर देश / आत्मा की बेगार का कोई कारखाना है / गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है / तो हमें उससे खतरा है / गर देश का अमन ऐसा होता है / कि कर्ज के पहाड़ों से फिसलते पत्थरों की तरह / टूटता रहे अस्तित्व हमारा / और तनख्वाहों के मुंह पर थूकती रहे / कीमतों की बेशर्म हंसी / कि अपने रक्त में नहाना ही तीर्थ का पुण्य हो / तो हमें अमन से खतरा है / गर देश की सुरक्षा को कुचल कर अमन को रंग चढ़ेगा / कि वीरता बस सरहदों पर मर कर परवान चढ़ेगी / कला का फूल बस राजा की खिड़की में ही खिलेगा/ अक्ल, हुक्म के कुएं पर रहट की तरह ही धरती सींचेगी / तो हमें देश की सुरक्षा से खतरा है.’
मुमकिन है कि सुरक्षा के ऐसे खतरों से आगाह करती हुई कविता से फिर कोई अतिवादी डर जाता और गर पाश जिंदा होते तो फिर मार दिए जाते. पर इतना तो तय है कि जितनी बार वे मारे जाते उतनी बार उनकी कविताओं की आवाज ऊंचे सुर में जन-जन तक पहुंचती रहती.
source: https://satyagrah.scroll.in/article/105673/could-pash-have-said-these-lines-today

Tuesday, March 21, 2017

फासीवाद से मुकाबला ज्यादा जरूरी है या राष्ट्रवादी होना | Apoorvanand

अज्ञेय का जन्मदिन था और मैं भूल ही चुका था. वर्तमान का आधिक्य यदि पूर्व की स्मृति को ढक ले तो इसमें दोष किसका माना जाए? एक ऐसा वर्तमान जो ज़रा भी राहत नहीं देता, समस्या की तरह आपके गले में पड़ा रहता है कि आप इधर-उधर देख भी नहीं सकते. पीछे देखने की बात तो अलग.
अज्ञेय को कैसे याद करें आज? क्रांतिकारी अज्ञेय को जो उन्नीस सौ बयालीस के भारत छोड़ो आंदोलन में न थे, अंगेज़ सेना में शामिल हुए जो तब भारतीय सेना ही थी. रघुवीर सहाय को उन्होंने अपने इस निर्णय के बारे में बताया कि बयालीस में इधर-उधर की उलझन में वे नहीं पड़े. भारत की सीमा पर संकट था और उनके लिए यह सोचना संभव न था कि उसकी रक्षा कोई और करे. अंगरेज़ सेना में शामिल होने का निर्णय लोकप्रिय नहीं होना था और उसे लेकर सवाल अब तक हैं.
अज्ञेय के उपन्यास ‘नदी के द्वीप’ में अज्ञेय के उस फैसले का तर्क और स्पष्ट होता है. भुवन द्वारा गौरा को लिखे पत्र में. ज़रा लंबा है, लेकिन बात समझ में आए इसलिए धीरज से पढ़ना ही पड़ेगा: ‘खबर तुमने सुनी? बड़े धड़ल्ले के साथ जापान युद्ध में कूद आया...देश में बहुत होंगे, जो इस पर खुश हो रहे होंगे...’
भुवन चालीस साल पहले के छोटे से एशियाई देश जापान के उदय से द्वितीय विश्वयुद्ध के समय के जापान की तुलना करते हुए कहता है, ‘अब जापान भी एक उत्पीड़क शक्ति है, साम्राज्य भी और साम्राज्यवादी भी – और आज उसको बढ़ावा देना, एक नई दासता का अभिनंदन इस आधार पर करना है कि वह दासता यूरोपीय नहीं, एशियायी प्रभु की होगी. कितना घातक हो सकता है यह तर्क! परदेशी गुलामी से स्वदेशी अत्याचार अच्छा है, यह एक बात है, पर क्या एशियाई नाम जापान को यूरोप की अपेक्षा भारत के अधिक निकट ले आता है...?’
भुवन अपनी बात और स्पष्ट करता है, ‘जाति की भावना गलत है, श्रेष्ठत्व-भावना हो तो और भी गलत - हिटलर का आर्यत्व का दावा दंभ ही नहीं, मानवता के साथ विश्वासघात है; पर अपनापे या संपर्क की बात कहनी हो तो मानना होगा कि यूरोप ही हमारे अधिक निकट है, आर्यत्व के कारण नहीं, सांस्कृतिक परंपरा और विनिमय के कारण, आचार-विचार, आदर्श साधना और जीवन परिपाटी की आधारभूत एकता के कारण...’
भुवन, (और क्या यह सिर्फ भुवन है,अज्ञेय नहीं?) आगे कहता है, ‘...भारत के एक स्थानीय प्रश्न (विश्व की भूमिका में हिंदू-मुस्लिम प्रश्न को स्थानीय ही मानना होगा) से उत्पन्न कटुता के कारण ही हम नहीं देख सकते कि न केवल यूरोप के, बल्कि निकटतर मुस्लिम देशों – ‘मध्यपूर्व’ - के साथ हमारा कितना घनिष्ठ सांस्कृतिक संबंध न केवल रहा है, बल्कि आज भी है...’
‘...एशियाई नाम को लेकर जापानी साम्राज्य सत्ता का अनुमोदन करना या उसके प्रसार को उदासीन भाव से देखना, खंड के नाम पर संपूर्ण को डुबा देना है...मानवता के साथ उतना ही बड़ा विश्वासघात करना है, जितना उन्होंने किया था, जो मुसोलिनी द्वारा अबीसीनिया (इथियोपिया) या हिटलर द्वारा चेकोस्लावाकिया के ग्रास के प्रति उदासीन थे...’
जो मुक्तिबोध की इसलिए आलोचना करते हैं कि वे अपनी कविता या कहानी में लंबे-लंबे विचारात्मक अंश ले आते है उन्हें दो स्नेहियों के बीच के पत्राचार में इस विश्व चिंता पर गौर करना चाहिए. जाहिर है, भुवन जापान की आक्रामकता से अत्यंत विचलित है और अपना कर्तव्य निर्धारण कर रहा है.
दूसरे पत्र में भुवन गौरा को सूचित करता है कि भारतीय भूमि पर जापानी बम पड़ने के बाद वह अपना कर्तव्य स्पष्ट देख रहा है - ‘इस संकट से भारत की रक्षा करना देश-भक्ति से बड़े कर्तव्य की मांग है - वह मानवता की बर्बरता से मानव के विवेक की रक्षा की मांग है...
अज्ञेय ने रघुवीर सहाय को अपने सेना में भर्ती होने का कारण बताया था - देश पर आए खतरे से उसे बचाने का कर्तव्य, वह देशभक्ति की सीमा में बंध जाता है, लेकिन भुवन का तर्क अधिक व्यापक है, वह वस्तुतः मानव के विवेक की रक्षा का प्रश्न है.
इस पत्राचार से एक और बात की ओर ध्यान जाता है, वह है अज्ञेय की राजनीतिक सजगता. हिंदी में प्रायः यही माना जाता रहा है कि राजनीतिक चेतनासंपन्न लेखक तो प्रायः वे ही हैं जो मार्क्सवादी हैं, लेकिन अज्ञेय यहां निर्भ्रांत हैं. उनका पक्ष स्पष्ट है. और यह परोक्ष आलोचना भी है सुभाष बाबू के राष्ट्रवाद की, वह राष्ट्रवाद जो उन्हें यूरोप-विरोधी जापान की ओर ले गया.
अज्ञेय और उनका पात्र भुवन उसी जापान के खिलाफ मोर्चे पर हैं जिसकी सेना के साथ भारत में प्रवेश करने की हिकमत सुभाष चंद्र बोस लगा रहे थे. क्या यह आश्चर्य की बात है कि यह सब लिखे जाने के बहुत पहले क्रांतिकारी दल में अज्ञेय के साथी भगत सिंह ने सुभाष बाबू के भावुकतावादी, बल्कि जुनूनी राष्ट्रवाद की जगह नेहरू के वैज्ञानिक चेतना संपन्न अंतर्राष्ट्रीयतावाद को वरेण्य माना था.
अज्ञेय और भुवन के अंग्रेज़ फौज में शामिल होने की वजह थी फासिज़्म के खतरे की उनकी पहचान. नेहरू भी इस दौर में दो प्रकार की आक्रामकताओं के बारे में लिख रहे थे - एक साम्राज्यवादी और दूसरी, फासीवादी. कांग्रेस का रुख साफ़ था, वह फासीवादी खतरे की गंभीरता को समझती थी और भारत के कर्तव्य को भी जो उस खतरे का सामना करने का था लेकिन ऐसा वह आज़ाद मुल्क के तौर पर करना चाहती थी. भुवन का निर्णय कांग्रेस के फैसले से अलग है लेकिन उससे भी ज्यादा वह सुभाष बाबू के फैसले के खिलाफ है.
फासिज़्म की अज्ञेय की समझ का एक सशक्त उदाहरण उनकी यूरोप यात्रा के संस्मरण, ‘एक बूंद सहसा उछली’ का दूसरा ही अध्याय है, जिसका शीर्षक है ‘विद्रोह की परंपरा में’. यह इटली के कवि, जिसके बारे में हम अब भी बहुत कम जानते हैं, लाउरो ड बोसिस के बारे में है. वह मुसोलिनी के वक्त की इटली है. अध्याय की शुरुआत नाटकीय है: एक छोटा हवाई जहाज रोम के ऊपर चक्कर लगा रहा है, पहले वह एक मकान के ऊपर मंडलाकार घूमता है, जो एक कवि का है, फिर पियात्सा दी स्पान्या के चौक के ऊपर जिसके कोने के छोटे मकान में रहते हुए शेली ने मानव मात्र की स्वतंत्रता का स्वप्न देखा था. आधे घंटे तक वह जहाज रोम के ऊपर चक्कर लगाता रहता है. जो उसे कहना है रोम वासियों को, वह एक पर्चे की शक्ल में है जो जहाज से बरसाया जा रहा है.
चार लाख पर्चियां आसमान से नीचे इटली के राजा और प्रजा दोनों का आह्वान करती हैं, अभिनव दासता की श्रृंखला में जकड़ी जनता को स्वाधीनता का संदेश देते हुए. क्या यह सुना जाएगा, क्या वह विद्रोह का बीजारोपण कर पाएगा या एक नाटकीय आह्वान भर रह जाएगा? इससे उस अनासक्त व्यक्ति (लाउरो ड बोसिस) को कोई मतलब नहीं जिसने इस संदेश को लिखा, छपाया और अब विमान उड़ाते हुए रोम भर की जनता को बांट रहा है. यह तो उसका मानवीय कर्तव्य है. जो वह कर रहा है, वह फलीभूत होगा भी कि नहीं इसकी आकांक्षा से परे है वह जैसे सूर्य की ओर उड़ते हर इकारस होते हैं.
अज्ञेय लाउरो के इस दुस्साहसी अभियान से अभिभूत हैं, यह तो वर्णन की भाषा से ही समझा जा सकता है. वे अपने पत्रकार मित्र को लिए उसके अंतिम पत्र, ‘मेरी मृत्यु का इतिहास’ का जिक्र करते हैं और उसी से लेख समाप्त करते हैं. वह अंश लिखे जाने और अज्ञेय के द्वारा उसे उद्धृत किए जाने के इतने वर्षों बाद भी कितना ताज़ा लगता है, मानो हमारे लिए ही हो, हमें सावधान करने के लिए: ‘मेरी पक्की धारणा है कि फासिज़्म तब तक परास्त नहीं होगा जब तक कि बीसियों युवक इटालीय जनता की मनःशुद्धि के लिए अपने प्राणों का बलिदान नहीं करेंगे... किंतु आज ऐसे व्यक्ति बहुत कम हैं. क्यों? ऐसा नहीं है कि उनमें अपने पुरखों की अपेक्षा कम साहस हो या कम विश्वास हो, कारण यह है कि अभी तक किसी ने फासिज्म को गंभीर महत्व नहीं दिया है. क्या नेता और क्या साधारण युवक, सभी समझते हैं कि फासिज्म अधिक दिन नहीं चल सकता और उन्हें ऐसा लगता है कि जो अपने आप मिट जाने वाला है. उसके लिए प्राण देना व्यर्थ है. लेकिन यह भूल है. हमें बलिदान देना ही होगा.’
यह यूरोप यात्रा फासिज़्म की पराजय के बाद के यूरोप की है. बड़ी कीमत मानवता ने चुकाई, फासिज्म को गंभीर महत्व न देकर. आज सत्तर साल बाद दुनिया के कई देश फिर उसी मोड़ पर आ खड़े हुए हैं. भारत भी, जो तब यूरोप को सावधान कर रहा था. अज्ञेय की वर्षगांठ के इस हफ्ते उनकी चेतावनी को फिर सुनें और अपना कर्तव्य भी तय करें.

Wednesday, March 8, 2017

देश में एचआईवी प्रभावित बच्चों की जीवन-रक्षक दवा का टोटा

देश में एचआईवी पीड़ित बच्चों की जीवनरक्षक दवा लोपैनेविर सिरप के इकलौते निर्माता सिप्ला ने इसका उत्पादन बंद कर दिया है. द हिंदू की ख़बर के अनुसार सरकार द्वारा बकाया न चुकाए जाने के कारण सिप्ला ने ये कदम उठाया है.
एचआईवी दवाओं के उत्पादन में सिप्ला एक बड़ा नाम है. 2015 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एड्स, टीबी जैसी कई बीमारियों के लिए काम करने वाली संस्था ग्लोबल फंड ने सिप्ला को एचआईवी/एड्स के इलाज में काम आने वाली एंटी रेट्रो वायरल (एआरवी) दवाओं के लिए 18.9 करोड़ डॉलर (करीब 1,170 करोड़ रुपये) से अधिक का आॅर्डर दिया था.
स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा 2014 में भेजे गए माल के एवज में भुगतान न मिलने के बाद भी सिप्ला ने सरकारी टेंडरों में भाग लेना बंद नहीं किया था. अब इस स्थिति में स्वास्थ्य मंत्रालय ने सभी स्टेट एड्स कंट्रोल सोसाइटी को स्थानीय बाज़ार से दवा खरीदने के निर्देश दिए हैं. स्वास्थ्य मंत्रालय के अपर सचिव अरुण पांडा बताते हैं, ‘हमने एक इमरजेंसी टेंडर निकाला है, साथ ही स्टेट एड्स कंट्रोल सोसाइटियों और राज्य सरकारों से स्थानीय बाज़ार से दवा खरीदने को भी कहा है.’ हालांकि सिरप का निर्माण न होने की स्थिति में खुदरा विक्रेताओं के पास भी दवा उपलब्ध नहीं है.
एड्स के इलाज के लिए काम कर रही संस्था डीएनपी प्लस के पॉल का कहना है, ‘पूरे देश के किसी भी राज्य में ऐसा कोई नहीं जो यह दवा बनाता हो. जब इसका इकलौता निर्माता ही इसे नहीं बना रहा है तो फिर कैसे यह दवा स्थानीय बाज़ार में मिल सकती है?
सिप्ला ने द हिंदू को कोई बयान देने से मना कर दिया पर उन्होंने सिप्ला के सीईओ उमंग वोहरा और एड्स के इलाज के लिए काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता लून गंगते के बीच हुए ईमेल को सार्वजनिक किया है, जिसमें सिप्ला ने साफ किया है कि वो हमेशा न सिर्फ देश के बल्कि दुनिया भर के मरीज़ों के साथ है, पर भुगतान से संबंधी मसलों को भी अविलंब सुलझाया जाना ज़रूरी है. गंगते द्वारा इसके जवाब में यह स्पष्ट कर दिया गया कि वो भुगतान की ज़िम्मेदारी नहीं ले सकते, न वे सरकार पर दबाव बना सकते हैं न ग्लोबल फंड जैसे दानदाताओं पर. पर इस स्थिति की सबसे ज़्यादा मार उन्हीं पर पड़ रही है.
Umang VohraJPG
सिप्ला द्वारा उनके सीईओ उमंग वोहरा और एड्स के इलाज के लिए काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता लून गंगते के बीच हुए ईमेल को सार्वजनिक किया गया है, जिसमें सिप्ला ने कहा है कि वे न सिर्फ देश के बल्कि दुनिया भर के मरीज़ों के साथ है, पर भुगतान से संबंधी मसलों को भी अविलंब सुलझाया जाना ज़रूरी है. (साभार : द हिंदू)
जानकारों का भी कहना है कि देश में इस तरह दवाओं की कमी होना दुखद तो है ही साथ ही शर्मिंदगी भरा भी है. लायर्स कलेक्टिव की एचआईवी यूनिट के वरिष्ठ सलाहकार आनंद ग्रोवर के अनुसार सरकार एचआईवी पीड़ितों के इलाज की अपनी ज़िम्मेदारी से भाग रही है. एचआईवी मरीजों को जीवनरक्षक दवाइयां मुहैया करवाना उनकी संवैधानिक ज़िम्मेदारी है. वहीं दुनिया भर में दवाइयां मुहैया करवाने के लिए मशहूर सिप्ला भी सबको दवा पहुंचाने के अपने वादे से हट रहा है.
वहीं दूसरी ओर 4 मार्च को 3 से 19 साल की उम्र तक के 637 बच्चों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, वित्त मंत्री अरुण जेटली और स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को एक पत्र लिखकर अपनी इस परेशानी से अवगत करवाया है. उन्होंने लिखा है कि दवा कंपनी सिप्ला द्वारा कई जगह यह बात दोहराई गई है कि सरकार के एचआईवी कार्यक्रम को दवा पहुंचाने के कई मामलों में भुगतान में देरी हुई, साथ ही कई जगह तो अब तक भुगतान नहीं किया गया. बच्चों के लिए आने वाली एचआईवी दवाओं में बहुत कम लाभ होता है और भुगतान में इस तरह की देरी से नेशनल एड्स कंट्रोल आॅर्गनाइजेशन (नाको) के कार्यक्रम बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं.
बच्चों ने पत्र में लिखा है, ‘हम आपसे निवेदन करते हैं कि एचआईवी दवाइयों के स्टॉक की इस कमी के मामले पर संज्ञान लें, खासकर इस बात पर भी ध्यान दिया जाए कि एचआईवी पीड़ित बच्चों की यह दवाएं न केवल आयात हों, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया जाए कि हर ज़रूरतमंद बच्चे तक इन्हें पहुंचाया जा सके.’
source: http://thewirehindi.com/3015/india-runs-out-of-hiv-medicine-for-kids/

Saturday, March 4, 2017

‘ऐ बाबू! लिख देना कि बुनकर बर्बाद हो चुके हैं’



अब्दुल रहमान अपना फलों का ठेला खड़ा करके छांव में बैठे दम ले रहे थे. कुर्ते की जेब से कुछ सिक्के निकाले और उन्हें गिनने लगे. दस से पंद्रह रुपये रहे होंगे. यह शायद फल बिक्री के दौरान मिले हुए फुटकर पैसे होंगे. यह पैसे जितने कम थे, ठेले पर फल भी उतने ही कम थे. करीब दो तीन किलो अनार और इतने ही सेब. उन्होंने पैसा गिनकर कुर्ते की जेब में फिर से डाल दिया और सामने की तरफ़ देखा. मैं सामने खड़ा था लेकिन उन्होंने नज़रअंदाज़ किया और दूर पता नहीं क्या देखने लगे.
उनके चेहरे पर कुछ उदासी और गुस्से का मिलाजुला भाव था. मैं कुछ देर तक तय नहीं कर पाया कि उनसे बात करनी चाहिए या नहीं. अंतत: हिम्मत करके मैं और नज़दीक गया और उनसे पूछा- दादा, यहां पर बुनकरों की बस्ती कहां है? उन्होंने जिज्ञासा भरी निगाहों से मुझे देखा और बोले- क्या जानना है. सामने देखो, वो ठेला खड़ा है. हम यहां बैठे हैं. फल बेच रहे हैं. यही हाल है बुनकरों का. क्या करोगे बुनकरों के बारे में जानकर? मैंने कहा- उनके बारे में लिखना चाहता हूं. वे बोले- ‘ऐ बाबू! लिख देना कि बुनकर बर्बाद हो चुके हैं.’
यह गोरखपुर में गुरु गोरखनाथ मंदिर के मुख्य द्वार के सामने से लगा हुआ पुराना गोरखपुर मोहल्ला है. इस विशाल मंदिर परिसर के गेट के दोनों तरफ क़रीब दो तीन किलोमीटर के इलाक़े में बुनकरों की बस्ती है. अब्दुल रहमान के मुताबिक, किसी ज़माने में इस मोहल्ले में करीब छह हज़ार कारखाने थे. अब 25-30 बचे हैं. अब्दुल रहमान के पास पांच करघा मशीनें थीं. वे काफ़ी पैसे कमा लेते थे. उनके मुताबिक, ‘फल बेचकर बस बच्चों का पेट पालते हैं. वह अपना काम था. चार-छह लोगों को रोज़गार भी दे रहे थे. फल बेचना तो मज़बूरी है. ज़िंदा रहना है तो कुछ तो करना पड़ेगा.’ इतना कहकर वे उठे और अपना ठेला खींचते हुए बस्ती की तरफ चल पड़े.
हम आगे बढ़े तो एक मदरसा था जिससे लगा हुआ एक छोटा क़ब्रिस्तान था. उसकी दीवारें काफ़ी ऊंची थीं. उनमें प्लास्टर भी करवाया गया था और दीवार पर एक बड़े आकार का बोर्ड टंगा था. एक उजड़ते हुए समाज की ज़िंदगी को सुरक्षित करने की जगह उसे पक्की दीवारों वाले क़ब्रिस्तान देने में किसकी दिलचस्पी है?
सालों पहले हथकरघा बंद करके फल ठेला लगा रहे हैं अब्दुल
सालों पहले हथकरघा बंद करके फल ठेला लगा रहे हैं अब्दुल रहमान.
इसी मोहल्ले के रहने वाले मन्नान को इंजीनियर की नौकरी मिली थी. नौकरी करके उन्हें महसूस हुआ कि इस नौकरी से ज़्यादा पैसा उनके पुश्तैनी धंधे में है. वे इंजीनियरिंग छोड़कर वापस आ गए. दस पावरलूम लगाया और परिवार समेत कपड़े के काम में लग गए. यह 80 का दशक था. क़रीब 15 साल बाद बुनकरों पर खुले बाज़ार और उदारीकरण की सुनामी आई तो उसमें मन्नान को पांव टिकाने के लिए ज़मीन नहीं मिली. उनके दसों करघे अंतरराष्ट्रीय समुद्र में बह कर कहां गए, कोई नहीं जानता. मन्नान संपन्न परिवार से थे. उनके पास क़रीब 50 बीघे ज़मीन थी. अब सब बिक चुकी है. मन्नान ने बच्चों को कमाने के लिए शहर भेज दिया है और ख़ुद घर पर रहते हैं. वे पछताते हुए कहते हैं, ‘इंजीनियरिंग नहीं छोड़ा होता तो कम से कम ज़िदगी मुहाल नहीं होती. बुढ़ापे में पेंशन तो मिलती!’
मदरसे के बगल से होते हुए हम आगे बड़े तो पावरलूम की आवाज़ सुनाई पड़ी. एक छप्परनुमा मकान में एक पावरलूम पर एक युवक चादर बुन रहा था. उसने बताया कि ‘हम लोगों ने नेपाल से जुगाड़ कर लिया है. नेपाल में टोपी और गमछे आदि में इस्तेमाल होने वाला कपड़ा बुनते हैं और फिर ले जाकर नेपाल में ही बेच देते हैं. कुछ लोग सूत भी वहीं से ले आते हैं. हमारी अच्छी कमाई हो जाती है.’
घर-घर में चलने वाला बुनकर उद्योग बंद क्यों हो गया, इसके जवाब में पावरलूम और हथकरघा दोनों चलाने वाले शमशाद कहते हैं, ‘सूत हमारी औकात से ज़्यादा महंगा हो गया. सरकार का सूत की महंगाई पर कोई नियंत्रण नहीं रहा. यहां की स्थानीय सूती मिलें खड़ी-खड़ी सड़ गईं. अब दक्षिण भारत से सूत आता है, वह काफ़ी महंगा पड़ता है. सूत का जो बंडल हमें पांच सौ में मिलता था, नई सरकार आने के बाद अब सात सौ का मिलने लगा. सूत महंगा है लेकिन तैयार कपड़ा महंगे दाम में कोई ख़रीदने को तैयार नहीं है. महंगाई के हिसाब से ख़रीद नहीं हो पाती. लिहाजा हम घाटे में चले जाते हैं.’
हथकरघा और पावरलूम उद्योग को क़रीब से जानने वाले वसीम अकरम ने बताया, ‘तीन तरह के बुनकर हैं. एक खादी बुनकर हैं जो हथकरघे से बुनाई करते हैं. दूसरे बनारसी साड़ी बुनकर हैं, वे हथकरघे से बुनाई करते हैं. तीसरे टेक्सराइज मसराइज की साड़ी और दूसरे कपड़ों के बुनकर हैं, जो बिजली से चलने वाले पावरलूम से बुनाई करते हैं.’ शमशाद के मुताबिक, ‘पुराना गोरखपुर में करीब चार लाख बुनकर हुआ करते थे. 1995 के बाद संकट शुरू हुआ. चीन के लिए बाज़ार खोल दिया गया और उसने हमारे बाज़ार में घुसकर होजरी के सस्ते सामान ठूंस दिए. अब जो कपड़ा हम सौ रुपये की लागत से तैयार करते हैं, वही कपड़ा चीन 80 रुपये में बेच रहा है. हमारी लागत ज़्यादा है. सरकार ने हमें मरने के लिए छोड़ दिया.’
पुराना गोरखपुर के एक घर में बंद पड़े पावरलूम और हथकरघे.
पुराना गोरखपुर के एक घर में बंद पड़े पावरलूम और हथकरघे.
बीती 25 फरवरी को बसपा प्रमुख मायावती ने एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आई तो वे पूर्वांचल को अलग राज्य बनाएंगी और बुनकरों की समस्या का समाधान करेंगी. लेकिन बुनकरों की समस्या के समाधान का वादा करने वाली मायावती अकेली नहीं हैं. प्रधानमंत्री बनने के पहले नरेंद्र मोदी भारतीय बुनकरों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाज़ार उपलब्ध करने का वादा कर चुके हैं, लेकिन तीन साल की सरकार में ऐसा कुछ नहीं हुआ है. उनके कार्यकाल में ही सूत महंगा हो गया है.’
पुराना गोरखपुर में ही पावरलूम चलाने वाले यूसुफ़ ने कहा, ‘जो कुछ लोग अब भी पावरलूम या बुनकरी के काम से जुड़े हैं, वे अपनी इज़्ज़त बचाने के लिए इससे चिपके हैं. हमारे लिए यह सम्मान की बात थी कि घर में कारखाना होता था. दो, चार, छह, दस मशीनें लगाकर काम करते थे और दूसरे लोगों को भी रोज़गार देते थे. अब ख़ुद ही मालिक हैं, ख़ुद ही मज़दूर हैं. जो पैसा मज़दूर को देना है, वह बच जाता है. वही अपनी कमाई है.’
शमशाद मुझे एक बीस पावरलूम मशीनों वाले बड़े से हॉल में ले गए. सब मशीनों में जंग लग गई थीं. वे सालों से चली नहीं थीं. उन मशीनों को देखकर लाखों की संख्या में बेरोज़गार हुए लोगों की हालत का अंदाज़ा लग रहा था. मोहल्ले में कुछ-कुछ दूर चलने पर पावरलूम की आवाज़ सुनाई पड़ जाती थी. कुछ घरों में अब भी बुनाई हो रही है. बुनकरों की बस्ती के युवा और जवान रिक्शा चलाने, ठेला लगाने, या मज़दूरी करने के लिए शहर जा चुके हैं.
बुनकर उद्योग क्यों बर्बाद हुआ? इसके जवाब में वसीम अकरम ने बताया, ‘तमाम वजहे हैं, जैसे-बिजली कटौती, नेत‍ृत्वविहीन बुनकर समाज को कोई सरकारी मदद न मिलना, समय-समय पर सांप्रदायिक दंगों की वजह से व्यापारियों द्वारा माल न ख़रीदना, कम मज़दूरी और हाड़तोड़ मेहनत, आर्थिक नीतियों में बुनकरों के लिए कोई जगह न होना, बुनी हुई साड़ियों के निर्यात में तमाम अड़चनों के चलते गोदामों में कपड़ों का बर्बाद हो जाना. ऐसे अनेक मसले हैं, जिनसे पूरा बुनाई उद्योग जूझता चला आ रहा है. अगर इन सबसे जूझकर भी बुनकर कपड़ा बुनने में कामयाब हो भी जाते हैं, तो भी उन्हें उनकी क़ीमती साड़ियों के मुक़ाबले अहमदाबाद की सस्ती साड़ियां मार देती हैं.’
पुराना गोरखपुर में रहने वाले अध्यापक रामसेवक ने बताया, ‘आम तौर पर इस पेशे में हिंदू नहीं होते, लेकिन मैं अध्यापन के साथ बुनकरी से जुड़ा हुआ था. क्योंकि यह फ़ायदे का कारोबार था. लेकिन अब सब ख़तम हो चुका है. अब बुनकरों की गुलज़ार दुनिया उजड़ चुकी है.’
from THE WIRE HINDI

Delhi Media Is Hurting Brand India With Distortions / Mohandas Pai

There has been a worrisome tendency over the last two years of Delhi-based media using highly local events, mostly in Delhi, to broad-brush the entire country as religiously intolerant; increasingly intolerant; as Freedom of Expression (FOE) and our rights being under attack; becoming increasingly communal; becoming fascist, etc. The good citizens of India are perplexed, hurt and angry at being so branded. The same media also brands citizens who do not agree with their India view as communal, intolerant, Bhakts, internet Hindus and the like, reducing the space for a genuine debate on multiple issues. Local incidents are blown up as All-India issues. Known and unknown political leaders who hold strong extreme views have often had mics thrust into their faces and their views blown out of all proportion as indications of an All-India view. To buttress their arguments they pick on abusive extreme views from Twitter, of which there are plenty.

Delhi is not India, and what happens in localised areas of Delhi is far distant from what India thinks and what India is all about.

West Bengal, Tamil Nadu, Karnataka, Kerala, Andhra, Rajasthan, Madhya Pradesh, Maharashtra ...all states in the Union of India think very differently and have their own view, but none of them step out to brand India in their view except the Delhi Media. They are least concerned with localised Delhi events. To them, Delhi even looks like an alien, distant land and yet they get branded. This continued biased tirade by the Delhi Media on purely local issues is tarnishing the image of India globally and hurting the rest of us who are 99.99% of the population and have  nothing to do with this. We are 130 crore across India, and the Delhi where this happens is a small part of India.

At the time of the Delhi election, the media there took 7-8 incidents of vandalism on churches and blew it up as acts of growing religious intolerance in India. Bishops and Archbishops came on TV, driven by the media, to express concern. Candle-lit marches were held, led by the clergy, and the whole country stood accused of religious intolerance. The police later gave details of the vandalism and sheepishly the media outcry was buried as the elections got over. Around the same time, an elderly nun was sadly raped in rural West Bengal by criminals. This was again blown up as indicative of growing intolerance, marches were held, the papal representative criticised the government and spoke of increasing communalism. The police soon arrested the culprits, reportedly from a neighbouring country, but India's reputation was again tarnished globally, and India was branded as religiously intolerant. Of course, many NGOs overseas and in India used these incidents to cover up their activities. Global business was questioned about the impact on investments and Delhi Media expressed deep concern about impact on inward investments.

Citizens are free in our democratic polity to raise their concerns, march in protest, criticise at any time the government of their choice l, but should the whole country and its citizens be wrongly branded? No country has 200 million people of a faith qualified as a minority  and given special protection and privileges in the Constitution. Yet, India was branded as religiously intolerant. Lest I am attacked by the same folks, I need to state that I too am a minority under Article 29/30 of our Constitution, and enjoy this protection! Of course if I am attacked, I expect the Delhi Media to denounce those who attacked me as Minority Bashers!


Soon the Bihar election took place and the orchestra started again. There was the sad criminal lynching of a citizen, in a town in UP, which most had never heard of. A crime blown up as evidence of growing intolerance. A "philosopher" said India should be ashamed of this lynching. A crime became a handle to beat us up.

Around the same time, similar crimes took place in a few places across India, but they did not fit the theory espoused by the Delhi Media. There was also the sad criminal killing of three rationalists in Karnataka and Maharashtra. Again, the Delhi Media blew it up as proof of increasing intolerance and attacks on FOE! Many literary award-winners returned their awards in protest, some artists said their freedom was under attack, and the Media ran riot. A forgotten elderly writer was resurrected out of retirement from the hills to lead the charge, expressing deep concern about FOE and openly expressing a personal dislike for a national leader who occupied the chair formerly held by a relative! Again, India was branded as a country where FOE was under attack, with increasing intolerance. The Bihar election got over and the orchestra shut down! India became tolerant again and our FOE remained.

During the entire media campaign, anchors and critics lambasted the government, accused it of many issues, branded India wrongly, all in a free, open manner. Some political leaders in Delhi abused the PM in terms which were shocking with no impact on them. The rest of the country watched the drama, perplexed as to what right of theirs was diminished. India has an over-active high strung media, a huge number of news channels, an activist judiciary, many political parties freely voicing their opinions as before, but still the Delhi Media branded India and all of us wrongly.

Then came the events in JNU, the bastion of Leftist ideology, with closed minds and extreme views. JNU is intolerant of alternative views, captured by the extreme Left, with Leftist activists of the CPI ML who stand for violence and openly display admiration and support  for the Maoists, being showcased as champions of freedom and human rights! The fight for power between two student unions for domination of the university was suddenly blown up by the Delhi Media as another example of an assault on FOE and academic freedom in India. A student leader who was studying for his Phd forever at public cost suddenly was catapulted as a champion of freedom and later dumped. The sad suicide of a student elsewhere became another example of the oppression of students for expressing their ideological views! In a Delhi studio in the debates following this, I was told by a JNU student that students all over India were protesting the lack of FOE. I reminded the student that there were nearly 800 universities, 50,000+ colleges and 3.4 crore students, and this ideological fight was essentially in three Leftist universities for political reasons, and not a student issue! Yet, it was blown up as if all students were protesting.


Then came the issue of hoisting the Indian flag in universities. Then the debate about patriotism and nationalism, etc. All being used to brand India and Indians as intolerant because the Delhi Media thought it fit to do so damaging India's brand and image globally.

Now the latest incident about two student unions of differing ideology, fighting it out for power and domination in a few colleges of Delhi. A small local fight taking prime time for no reason, save it is  in Delhi. Again, attempts being made to blow it up as evidence of assaults on FOE and academic freedom. A Nobel Laureate who makes occasional visits expressing deep concern at the lack of academic freedom and "fear" in campuses. An activist idealist ideological student being made the centre of this fight just because she fits the narrative sought to be made. Students of opposing groups who were assaulted being ignored and condemned as goondas. Physical assault by Leftist students forgiven, and a national newspaper  publishing a photograph of Leftists  assaulting students as evidence of the opposing camp assaulting the Leftists! Big evidence of fake manufactured news.

Again, anchors writing blogs to buttress their views, forgetting anchors need to be objective and not take sides. Again, the UP election going on at the same time. Sadly the great Media Seer and Champion of the Truth from Mumbai absent from the furore, letting down the Nation Which Needs To Know.  

It is obvious that India is in the midst of a deep ideological fight between the Left and left of centre activists and the Delhi Media against the right of centre government. The right again fighting back, branding everybody opposed to them as unpatriotic and anti-national. So, charges of communalism, fascism, intolerance against charges of anti-nationalism and lack of patriotism. All fine for the course except why brand India and Indians with the same charges for a fight between two small groups with 99.99% of Indians - and in all this, India getting a bad name.

I could have, as a citizen, ignored all this as a normal event, except that I witnessed its impact on Indians and the India brand overseas. At a business event, an elderly 80 years + titled peer told me she had signed a petition with 200 others protesting the visit of the Indian PM to London because India was becoming religiously intolerant, saw growing intolerance and there was a big assault on FOE. I said everything was fine, our rights were intact just 24 hours earlier when I had left India. She said she was an Indophile and concerned. I replied that if she was so concerned, she should visit India and find out for herself before she signed the letter and not defame india and Indians.

Sadly, the Delhi Media has damaged the India brand and the fair name of Indians globally by their exaggeration and ideological campaigns to force their ideology on others, forgetting their duty to be more objective. No citizen objects to the vibrant, loud, violent ideological debates on TV, but please, please, please stop pretending that you represent India and what happens in Delhi is an All India issue. Stop branding the rest of us in your India view!

Delhi is not India, what happens in Delhi is not representative of India, nor Indians outside Delhi.

(Mohandas Pai was the CFO and then the head of HR at Infosys. He is now Chairman, Aarin Capital Partners.)


Source: http://www.ndtv.com/opinion/delhi-media-is-hurting-brand-india-with-distortions-1665169

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...