Sunday, January 15, 2017

वे चाहते तो आराम की गुजार सकते थे, फिर वे जंगलों में मारे-मारे क्यों फिरते हैं? / अपूर्वानंद

नंदिनी सुंदर और अर्चना प्रसाद अध्यापक और विदुषी हैं. विनीत लेखक और शोधार्थी हैं. ये सब अपनी नींद और चैन गंवाकर बस्तर के जंगलों में क्यों भटकते हैं?

पत्रकार ने पूछा, ‘माओवादी हिंसा का सामना करने में मुक्तिबोध की कविताएं कैसे मदद करती हैं?’ सवाल इतना अटपटा है कि आप हैरान भी नहीं हो सकते. इसमें नासमझी थी, मूर्खता या दुस्साहस? या इनका घालमेल?
यह सवाल रायपुर में पूछा गया जोकि छत्तीसगढ़ की राजधानी है. यही वह राज्य है जिसके एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के कहने पर दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू के अध्यापकों, स्वतंत्र शोधार्थियों, सांस्कृतिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर बस्तर में एक व्यक्ति की हत्या की साजिश का मुकदमा न सिर्फ दायर किया गया है, बल्कि उस अधिकारी ने यह धमकी भी दी है कि अगर उन्होंने बस्तर में कदम रखा तो जनता पत्थरों से उन्हें मार डालेगी.
न भूलिए कि राज्य के पुलिस दल ने अभी कुछ वक्त पहले ही नंदिनी सुंदर, बेला भाटिया, हिमांशु कुमार और सोनी सोरी के पुतले जलाए थे. इस पर क्षोभ का ज्वार उठना चाहिए था, लेकिन बेचैनी का कोई बुलबुला भी नहीं उठा. हमने आज तक जनता को सत्ता से जुड़े लोगों का पुतला जलाते तो देखा है, लेकिन राज्य अपने नागरिकों का पुतला जलाए, आज़ाद हिन्दुस्तान में अपनी तरह की यह पहली घटना थी. लेकिन रायपुर तो रहने दीजिए, सुरक्षित और सुसंस्कृत दिल्ली में भी कोई जुबान न हिली.
छत्तीसगढ़ की पुलिस ने इससे समझा कि वह और आगे जा सकती है. नंदिनी सुन्दर, अर्चना प्रसाद, विनीत तिवारी, संजय पराते, मंगलराम कर्मा और मंजु कवासे पर कथित रूप से माओवादियों द्वारा शामनाथ बघेल नामक व्यक्ति की हत्या की साजिश के आरोप लगाते हुए उसने जो प्रथम सूचना रिपोर्ट दायर की, वह इस ढिठाई के बढ़ने का नतीजा है.
पत्रकार के प्रश्न में आप उस दिमाग को भी देख सकते हैं जिसका पूरी तरह से राजकीयीकरण और पुलिसीकरण हो चुका है. वह राज्य के तर्क को हवा और बारिश की तरह कुदरती सच मान चुका है: मुक्तिबोध की कविताओं को माओवादी बीमारी से मुक्त करने के सरकारी अभियान का हिस्सा क्यों नहीं बनाया जा सकता? और अगर वे छत्तीसगढ़ के इस सबसे ज़रूरी काम में मदद नहीं करतीं तो फिर उनकी सामाजिक उपयोगिता ही क्या है?
पत्रकार के सवाल से इस बात का अंदाज मिलता था कि अगर अगली बार आप रायपुर जाएं और आपको माओवाद विरोधी सरकारी अभियान में मुक्तिबोध की तस्वीर या उनकी कविता की पंक्तियां टंकी दिखें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए. आखिरकार भारत सरकार ने स्वच्छता मिशन का ब्रांड अम्बैसेडर गांधी को तो बना ही दिया है!
मौक़ा गजानन माधव मुक्तिबोध की जन्मशती की शुरुआत का था. रायपुर, राजनादगांव, खैरागढ़ में एक साथ कई आयोजन हो रहे थे. मुक्तिबोध की भविष्योन्मुखी दृष्टि की अभ्यासवश चर्चा सबमें ही हुई होगी जिसके उदाहरण के तौर पर ‘अंधेरे में’ कविता को प्रायः उद्धृत किया जाता है. देश में सैनिक शासन लगने की आशंका, जिसे कई आलोचक फासिज्म कहते हैं, और उस समय सभ्य समाज की प्रतिक्रिया का वर्णन इन पंक्तियों में देखा गया है:
‘विचित्र प्रोशेसन, / गंभीर क्विक मार्च..../ कलाबत्तूवाली काली ज़रीदार ड्रेस पहने / चमकदार बैंड दल- / ..... / बैंड के लोगों के चेहरे / मिलते हैं मेरे देखे हुओं से / लगता है उनमें कई प्रतिष्ठित पत्रकार इसी नगर के.’
लेकिन ‘अंधेरे में’ कविता के आठवें अंश में गोली चलने और आग लगने और नगर से भयानक धुएं के उठने का दृश्य भी है. सड़कें सुनसान हैं और फौजी चौकसी है. ऐसी भयंकर स्थिति में शिक्षित समाज क्या कर रहा है?: ‘सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक / चिंतक, शिल्पकार, नर्तक चुप हैं; / उनके ख़याल से यह सब गप है, / मात्र किंवदंती.’
नंदिनी और उनके मित्रों के पुतले जलाने और इन सब पर मुकदमा दायर करने की खबर को अगर ज़्यादातर ने कहानी की तरह पढ़ा हो, तो ताज्जुब नहीं. लेकिन जैसा कवि आगे कहता है, ‘यह कथा नहीं है, यह सब सच है, हां भई!!’
जो लेखक के लिए एक काव्य युक्ति थी, वह फैंटसी छत्तीसगढ़ का यथार्थ बन गई है. क्योंकर यथार्थ गल्प बन गया?
नंदिनी सुंदर, अर्चना प्रसाद, विनीत तिवारी, संजय पराते, मंगलराम कर्मा और मंजु कवासे को फिलहाल नहीं छुआ जाएगा, ऐसा आश्वासन छत्तीसगढ़ सरकार ने उच्चतम न्यायालय को दिया. न्यायालय ने कहा कि अगर कोई नया तथ्य सामने आता है तो पुलिस कार्रवाई कर सकती है, लेकिन उसके पहले उसे इन सबको एक महीने का वक्त देना होगा.
जिनके नाम आप पढ़ रहे हैं वे एक किस्म के लोग नहीं हैं, न एक विचारधारा के. लेकिन वे साधारण लोग भी नहीं हैं. नंदिनी सुंदर और अर्चना प्रसाद अध्यापक और विदुषी हैं. विनीत लेखक और शोधार्थी तो हैं ही, सांस्कृतिक और राजनीतिक कार्यकर्ता हैं. संजय सीपीएम की छत्तीसगढ़ इकाई के सदस्य हैं. मंजु कवासे सीपीआई की नेता हैं और सुकमा जिले में घुपिड़ी की सरपंच हैं. दो को छोड़कर कोई आदिवासी भी नहीं है.
नंदिनी और अर्चना प्रसाद अंग्रेज़ी के अभिजात समुदाय की सदस्य भी हैं. भारत की अर्थ व्यवस्था की सिरमौर मानी जानेवाली इनफ़ोसिस कंपनी ने समाज शास्त्र के क्षेत्र में उनके विशिष्ट योगदान के लिए उन्हें पुरस्कृत किया है. फिर यह पूंजीपति वर्ग, जो उदारवादी नज़रिए पर ही टिका है, क्यों चुप है? और क्यों भारत का अभिजात वर्ग खामोश है?
क्यों मान लिया गया है कि राज्य की संस्थाओं का सच प्राथमिक होगा और बाकी सबको उसकी कसौटी या अपेक्षा पर खरा उतरना ही है?
मुक्तिबोध ने अपनी कविताओं में बार-बार ‘भावना के कर्तव्य’ और ज्ञान के दायित्व की मांग की है. ज्ञान से संवलित भावना कर्तव्यशील होने को बाध्य है. उस कर्तव्य की दिशा तय है. वह उस स्याह गुलाब और सांवली सेवंती के भाग्य से जुड़ा है, जो गृहहीन हैं और दिनभर के श्रम के बाद बरगद के वृक्ष के नीचे थककर गाढ़ी नींद सो रहे हैं.
नंदिनी का काम छत्तीसगढ़ के आदिवासियों पर है. अर्चना प्रसाद जंगलों के सवाल पर काम करती हैं. उनका जीवन शोध पत्र लिखते, किताबें छपाते और सेमिनारों में सहकर्मियों से मिलते-जुलते आराम से गुजर सकता है. वैसे ही विनीत का शोध अनुदान लेते और नीति के दस्तावेज तैयार करते. संजय, मंजु कवासे और मंगलराम कर्मा भी चुनाव-चुनाव खेलते जनतंत्र के दिन काट सकते हैं. फिर ये सब क्यों अपनी नींद भुलाकर और चैन गंवाकर, जिससे मुक्तिबोध का पात्र डरता है, बस्तर के जंगलों में भटकते हैं?
ये सभी मुक्तिबोध की कविता के उस वैज्ञानिक या कलाकार की तरह नहीं, जो ‘मुक्ति का इच्छुक तृषार्त अंतर’ है और मुक्ति के यत्नों के साथ तो निरंतर है, लेकिन है ‘कार्य क्षमता से वंचित व्यक्तित्व’ और ‘असंग अस्तित्व’. ये सब अपने विषय की नियति से जुड़ा महसूस करते हैं, उनके भले जीवन के संघर्ष में उनके साथ हैं. इसीलिए तो उनकी सत्ता से ठन जाती है. फिर वह कोई भी क्यों न हो! जो आदिवासियों को बेदखल कर एक विकसित राष्ट्र बनाने पर आमादा है. उससे भी बढ़कर जो सलवा जुडूम के नाम पर उनका सैन्यीकरण कर उनकी अस्मिता का अपहरण कर लेना चाहती है. और माओवादियों की सत्ता से भी जो आदिवासियों के आज़ाद रहने के हक का इस्तेमाल करने का स्वत्वाधिकार अपने पास रखना चाहते हैं.
मुक्तिबोध का पागल सवाल करता है: ‘बताओ तो किस-किस के लिए तुम दौड़ गये’. नंदिनी सुंदर, अर्चना प्रसाद, बेला भाटिया, मालिनी सुब्रमण्यम, ईशा खंडेलवाल, मनीष गुंजाम, हिमांशु कुमार, संजय पराते जैसे लोग खुद आदिवासी नहीं, लेकिन ये ही तो मुक्तिबोधीय मनुष्य हैं, अपनी ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञान से प्रेरित, जिनकी आत्मा दूर किसी फटे हुए मन की जेब में जा गिरती है. क्या इस रिश्ते के अधिकार की रक्षा पर बात किए बिना मुक्तिबोध का नाम लेने का अधिकार हमें है?

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