Thursday, January 5, 2017

दीपक सूरज बनने वाला है.

मैं नहीं कहता तुम
रात के मलबे से उठ
दिन के गीत गाओ,
सोते से जागो
दिन का बोझ ठोओ.
चलना सीखो,
खुद की किस्मत बदलना सीखो.
सवाल करो,
बवाल करो,
अपने भविष्य का ख़्याल करो.
 मैं नहीं कहता.

मैं बस कहना चाहता हूँ
सोने की सुविधा
जिससे बेहतर कुछ भी नहीं है,
ढलने वाली है
सुबह होने वाली है,
तुम चाहो या नहीं.

मैंने एक दीपक जलाया था
वो सूरज बनने वाला है
सबकुछ बदलने वाला है
आकाश खिलने वाला है
अँधेरा ढलने वाला है.

तुम चाहो तो मुझे मार दो,
ज़हर पिला- सुकरात सा
सलीब चढ़ा- ईशा सा
कैद और प्रताड़ना दे- गैलेलिओ
नाटक देखते- लिंकन सा
प्रार्थना सभा में गोलियों से भून- गाँधी सा
नुक्कड़ नाटक करते बीच सड़क पे -सफ़दर
या किसी चौक पे- राबिन सा.

मार दो, लेकिन सुनो!
सुबह होने वाली है
ओस और रौशनी के बीच
न चाहते हुए भी तुम्हें जागना होगा.
मैंने एक दीपक जलाया था
वो सूरज बनने वाला है
अँधेरा ढलने वाला है
आकाश खिलने वाला है
दीपक सूरज बनने वाला है.

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