Wednesday, December 21, 2016

प्रलय का शिलालेख /अनुपम मिश्र


                        उत्तराखंड में हिमालय और उसकी नदियों के तांडव का
                        आकार प्रकार अब धीरेधीरे दिखने लगा है.
                        लेकिन मौसमी बाढ़ इस इलाके में नई नहीं है.
                        अनुपम मिश्र का सन 1977 में लिखा एक यात्रा वृतांत


सन् 1977 की जुलाई का तीसरा हफ्ता. उत्तरप्रदेश के चमोली जिले की बिरही घाटी में आज एक अजीबसी खामोशी है. यों तीन दिन से लगातार पानी बरस रहा है और इस कारण अलकनंदा की सहायक नदी बिरही का जल स्तर बढ़ता जा रहा है. उफनती पहाड़ी नदी की तेज आवाज पूरी घाटी में टकरा कर गूंज भी रही है. फिर भी चमोलीबदरीनाथ मोटर सड़क से बाईं तरफ लगभग 22 किलोमीटर दूर 6,500 फुट की ऊंचाई पर बनी इस घाटी के 13 गांवों के लोगों को आज सब कुछ शांतसा लग रहा है.

आज से सिर्फ सात बरस पहले ये लोग प्रलय की गर्जना सुन चुके थेदेख चुके थे. इनके घरखेत व ढोर उस प्रलय में बह चुके थे. उस प्रलय की तुलना में आज बिरही नदी का शोर इन्हें डरा नहीं रहा था. कोई एक मील चौड़ी और पांच मील लंबी इस घाटी में चारों तरफ बड़ीबड़ी शिलाएंपत्थररेत और मलबा भरा हुआ हैइस सब के बीच से किसी तरह रास्ता बना कर बह रही बिरही नदी सचमुच बड़ी गहरी लगती है.

लेकिन सन् 1970 की जुलाई का तीसरा हफ्ता ऐसा नहीं था. तब यहां यह घाटी नहीं थी,इसी जगह पर पांच मील लंबाएक मील चौड़ा और कोई तीन सौ फुट गहरा एक विशाल ताल थाः गौना ताल. ताल के एक कोने पर गौना था और दूसरे कोने पर दुरमी गांवइसलिए कुछ लोग इसे दुरमी ताल भी कहते थे. पर बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिए यह बिरही ताल थाक्योंकि चमोलीबदरीनाथ मोटर मार्ग पर बने बिरही गांव से ही इस ताल तक आने का पैदल रास्ता शुरू होता था.

ताल के ऊपरी हिस्से में त्रिशूल पर्वत की शाखा कुंवारी पर्वत से निकलने वाली बिरही समेत अन्य छोटीबड़ी चार नदियों के पानी से ताल में पानी भरता रहता था. ताल के मुंह से निकलने वाले अतिरिक्त पानी की धारा फिर से बिरही नदी कहलाती थी. जो लगभग 18 किलोमीटर के बाद अलकनंदा में मिल जाती थी. सन् 1970 की जुलाई के तीसरे हफ्ते ने इस सारे दृश्य को एक ही क्षण में बदल कर रख दिया.

दुरमी गांव के प्रधानजी उस दिन को याद करते हैं – “तीन दिन से लगातार पानी बरस रहा था. पानी तो इन दिनों हमेशा गिरता हैपर उस दिन की हवा कुछ और थी. ताल के पिछले हिस्से से बड़ेबड़े पेड़ बहबह कर ताल के चारों ओर चक्कर काटने लगे थे. ताल में उठ रही लहरें उन्हें तिनकों की तरह यहां से वहांवहां से यहां फेंक रही थीं. देखतेदेखते सारा ताल पेड़ों से ढंक गया. अंधेरा हो चुका थाहम लोग अपनेअपने घरों में बंद हो गए. घबरा रहे थे कि आज कुछ अनहोनी हो कर रहेगी.” खबर भी करते तो किसे करतेजिला प्रशासन उनसे 22 किलोमीटर दूर था. घने अंधेरे ने इन गांव वाले को उस अनहोनी का चश्मदीद गवाह न बनने दिया. पर इनके कान तो सब सुन रहे थे.

प्रधानजी बताते हैं – “रात भर भयानक आवाजें आती रहीं फिर एक जोरदार गड़गड़ाहट हुई और फिर सब कुछ ठंढ़ा पड़ गया.” ताल के किनार की ऊंची चोटियों पर बसने वाले इन लोगों ने सुबह के उजाले में पाया कि गौना ताल फूट चुका हैचारों तरफ बड़ीबड़ी चट्टानों और हजारों पेड़ों का मलबाऔर रेतहीरेत पड़ी है.

ताल की पिछली तरफ से आने वाली नदियों के ऊपरी हिस्सों में जगहजगह भूस्खलन हुआ थाउसके साथ सैकड़ो पेड़ उखड़उखड़ कर नीचे चले आए थे. इस सारे मलबे को,टूट कर आने वाली बड़ीबड़ी चट्टानों को गौना ताल अपनी 300 फुट की गहराई में समाता गयासतह ऊंची होती गईऔर फिर लगातार ऊपर उठ रहे पानी ने ताल के मुंह पर रखी एक विशाल चट्टान को उखाड़ फेंका और देखते ही देखते सारा ताल खाली हो गया. घटना स्थल से केवल तीन सौ किलोमीटर नीचे हरिद्वार तक इसका असर पड़ा था.

गौना ताल ने एक बहुत बड़े प्रलय को अपनी गहराई में समो कर उसका छोटा सा अंश ही बाहर फेंका था. उसने सन् 1970 में अपने आप को मिटा कर उत्तराखंडतराई और दूर मैदान तक एक बड़े हिस्से को बचा लिया था. वह सारा मलबा उसके विशाल विस्तार और गहराई में न समाया होता तो सन् 70 की बाढ़ की तबाही के आकड़े कुछ और ही होते. लगता है गौना ताल का जन्म बीसवीं सदी के सभ्यों की मूर्खताओं से आने वाले विनाश को थाम लेने के लिए ही हुआ था.

ठीक आज की तरह ही सन् 1893 तक यहां गौना ताल नहीं था. उन दिनों भी यहां एक विशाल घाटी ही थी . सन् 1893 में घाटी के संकरे मुंह पर ऊपर से एक विशाल चट्टान गिर कर अड़ गई थी. घाटी की पिछली तरफ से आने वाली बिरही और उसकी सहायक नदियों का पानी मुंह पर अड़ी चट्टान के कारण धीरेधीरे गहरी घाटी में फैलने लगा. अंग्रेजों का जमाना थाप्रशासनिक क्षमता में वे सन् 1970 के प्रशासन से ज्यादा कुशल साबित हुए. उस समय जन्म से रहे गौना ताल के ऊपर बसे एक गांव में तारघर स्थापित किया और उसके माध्यम से ताल के जल स्तर की प्रगति पर नजर रखे रहे.

एक साल तक वे नदियां ताल में भरती रहीं. जलस्तर लगभग 100 गज ऊंचा उठ गया. तारघर ने खतरे का तार नीचे भेज दिया. बिरही और अलकनंदा के किनारे नीचे दूर तक खतरे की घंटी बज गई. ताल सन् 1894 में फूट पड़ापर सन् 1970 की तरह एकाएक नहीं. किनारे के गांव खाली करवा लिए गए थेप्रलय को झेलने की तैयारी थी. फूटने के बाद 400 गज का जल स्तर 300 फुट मात्र रह गया था. ताल सिर्फ फूटा थापर मिटा नहीं था. गोरे साहबों का संपर्क न सिर्फ ताल से बल्कि उसके आसपास की चोटियों पर बसे गांवों से भी बना रहा. उन दिनों एक अंग्रेज अधिकारी महीने में एक बार इस दुर्गम इलाके में आकर स्थानीय समस्याओं और झगड़ों को निपटाने के लिए एक कोर्ट लगाता था. विशाल ताल साहसी पर्यचकों को भी न्यौता देता था. ताल में नावें चलती थीं.

आजादी के बाद भी नावें चलती रहीं. सन् 1960 के बाद ताल से 22 किलोमीटर की दूरी में गुजरने वाली हरिद्वार बदरीनाथ मोटरसड़क बन जाने से पर्यटकों की संख्या भी बढ़ गई. ताल में नाव की जगह मोटर बोट ने ले ली. ताल में पानी भरने वाली नदियों के जलागम क्षेत्र कुंआरी पर्वत के जंगल भी सन् 1960 से 1970 के बीच में कटते रहे. ताल से प्रशासन का संपर्क सिर्फ पर्यटन के विकास के नाम पर कायम रहा. वह ताल के ईर्दगिर्द बसे 13 गांवों को धीरधीरे भूलता गया.

मुख्य मोटर सड़क से ताल तक पहुंचने के लिए (गांवों तक नहीं) 22 किलोमीटर लम्बी एक सड़क भी बनाई जाने लगी. सड़क अभी 12 किलोमीटर ही बन पाई थी कि सन् 1970 की जुलाई का वह तीसरा हफ्ता आ गया. ताल फूट जाने के बाद सड़क पूरी करने की जरूरत ही नहीं समझी गई. सन् 1894 में गौना ताल के फटने की चेतावनी तार से भेजी थीपर सन् 1970 में ताल फटने की ही खबर लग गई.

बहरहालअब यहां गौनाताल नहीं है. पर उसमें पड़ी बड़ीबड़ी चट्टानों पर पर्यावरण का एक स्थायी लेकिन अदृश्य शिलालेख खुदा हुआ है. इस क्षेत्र में चारों तरफ बिखरी ये चट्टानें हमें बताना चाहती हैं कि हिमालय मेंखासकर नदियों के पनढ़ालों में खड़े जंगलों का हमारे पर्यावरण पर क्या असर पड़ता है. ऐसे हिमालय मेंदेवभूमि में हम कितना धर्म करें,कितना अधर्म होने देंकितना विकास करेंकितनी बिजली बनाएं– यह सब इन बड़ीबड़ी चट्टानोंशिलाओं पर लिखा हुआ हैखुदा हुआ है.


क्या हम इस शिलालेख को पढ़ने के लिए तैयार हैं ?

माँ / गुलज़ार

तुझे पहचानूंगा कैसे?
तुझे देखा ही नहीं
ढूँढा करता हूं तुम्हें
अपने चेहरे में ही कहीं
लोग कहते हैं
मेरी आँखें मेरी माँ सी हैं
यूं तो लबरेज़ हैं पानी से
मगर प्यासी हैं
कान में छेद है
पैदायशी आया होगा
तूने मन्नत के लिये
कान छिदाया होगा
सामने दाँतों का वक़्फा है
तेरे भी होगा
एक चक्कर
तेरे पाँव के तले भी होगा
जाने किस जल्दी में थी
जन्म दिया, दौड़ गयी
क्या खुदा देख लिया था
कि मुझे छोड़ गयी
मेल के देखता हूं
मिल ही जाए तुझसी कहीं
तेरे बिन ओपरी लगती है
मुझे सारी जमीं
तुझे पहचानूंगा कैसे?
तुझे देखा ही नहीं

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...