Sunday, December 11, 2016

जलवायु परिवर्तन पर जुबानी जमाखर्च

संयुक्त राष्ट्र की बैठक में करीब दो सौ देशों ने एक स्वर में मराकेश कार्य-घोषणा पर अपनी मुहर लगाई है और यह संकल्प भी पारित किया कि ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए युद्धस्तर पर काम करना होगा। सम्मेलन ने पेरिस समझौते, इसके तेजी से क्रियान्वयन, महत्त्वाकांक्षी लक्ष्यों, समावेशी प्रकृति और समान व साझी लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों और अपनी-अपनी क्षमताओं के साथ जलवायु परिवर्तन से होने वाले जोखिम से निपटने के लिए कार्रवाई करने की रणनीति को अंतिम रूप दिया है। संयुक्त राष्ट्र की पहल पर हुए सम्मेलन ने वर्ष 2018 तक पेरिस जलवायु करार को लागू करने की कार्ययोजना को पारित कर एकजुटता दिखाने की कोशिश की है। गौरतलब है कि यह ऐतिहासिक पहल उस वक्त की गई है जब अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस करार से अमेरिका के अलग हो जाने का इरादा जताया है।  जलवायु शिखर सम्मेलन में इस जोर दिया गया कि विकसित देश क्योटो प्रोटोकाल में तय अपनी-अपनी प्रतिबद्धताओं के अनुरूप उत्सर्जन कम करने के लिए जल्द और जरूरी कदम उठाएं। क्योटो प्रोटोकाल वर्ष 2020 में समाप्त होगा। मराकेश सम्मेलन का इरादा तो निश्चित रूप से नेक है लेकिन कई अहम मुद््दों पर कामयाबी न मिलना दुखद है। मराकेश सम्मेलन में कृषि, वित्त अनुकूलन व वर्ष 2020 से पहले के सुझावों सहित कई महत्त्वपूर्ण मुद््दों पर ज्यादा चर्चा नहीं हो पाई। जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए पर्याप्त वित्तीय मदद तक पहुंच- वर्ष 2020 से पहले और वर्ष 2020 के बाद- दोनों अवधियों में विकासशील देशों के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय बन गई है। यह बात भारत को भी कुरेद रही है।
दरअसल, नई वैश्विक ऊर्जा रणनीति के बगैर, जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार कार्बन उत्सर्जन बढ़ता ही रहेगा और वैज्ञानिकों की मानें तो इसका प्रभाव दस हजार वर्षों तक रहेगा। मराकेश जलवायु सम्मेलन में शोधकर्ताओं की इस नई चेतावनी पर जरूर चर्चा हुई जिसमें कहा गया है कि बढ़ते वैश्विक ताप, बर्फ की चादरों और ग्लेशियरों का पिघलना और समुद्री जलस्तर का बढ़ना, जलवायु परिवर्तन के उन परिणामों में शामिल है जिससे कि आखिरकार समुद्रतटीय क्षेत्र जलमग्न हो जाएंगे। समुद्रतटीय क्षेत्रों में एक करोड़ तीन लाख लोग रह रहे हैं। मराकेश जलवायु सम्मेलन में ‘सोलर अलायंस’ पर हस्ताक्षर हो गए। लेकिन बड़े देशों की उदासीनता से कई सवाल भी अब खड़े हो गए हैं। सोलर अलायंस का मकसद सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना और इसका उत्पादन बढ़ा कर इसकी कीमत कम करना है। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे को देखते हुए इस गठजोड़ या करार की उपयोगिता जाहिर है। लेकिन विशेषज्ञों की बातों पर गौर किया जाए तो इस अलायंस को लेकर सबसे बड़ी चिंता धन और तकनीक को लेकर बनी हुई है। असल में सोलर अलायंस को लेकर अब तक फंड की कोई रूपरेखा भी तैयार नहीं हुई है। भारतीय विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक बड़े विकासशील देश इसका हिस्सा नहीं बनेंगे तब तक फंड की दिक्कत बनी रहेगी। यहां यह बताना भी जरूरी है कि बहुत-से गरीब देश इस अलायंस में केवल मदद की उम्मीद से शामिल हुए हैं। भारत का भी इस बारे में स्पष्ट पक्ष है कि नई तकनीक और नए अनुसंधान की जरूरत पड़ेगी और इसके लिए पर्याप्त पैसा चाहिए। यह काम अकेले भारत के लिए कतई संभव नहीं है; वह तो अपनी ही समस्याओं से जूझ रहा है। धन के अभाव में कई बड़े-बड़े संस्थान रोजाना ही अपना रोना रोते रहते हैं।
लिहाजा, धरती को गर्म होने से रोकने की मुहिम में धन की कमी आड़े आ सकती है। पेरिस समझौते के तहत एक हरित जलवायु कोष बनना है, जिससे हर साल गरीब और विकासशील देशों को करीब सौ अरब डॉलर देने का प्रस्ताव है। सबसे बड़ी दिक्कत यह आ सकती है कि कहीं अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप किसी भी तरह का अंशदान करने से इनकार न कर दें। अमेरिका को वर्ष 2020 तक इस महत्त्वपूर्ण फंड में तीन अरब डॉलर देना है। अगर वह नहीं देता है तो इस बड़ी पहल को जोरदार झटका लग सकता है।
दो सबसे महत्त्वपूर्ण बातों पर पूरे विश्व को ध्यान देना होगा। एक तो यानों के उड़ान द्वारा होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना, और दूसरा, मांट्रियल प्रोटोकॉल में संशोधन, जिसमें शक्तिशली ग्रीनहाउस को हटाना विशेष रूप से शामिल है। अहम बात यह है कि पेरिस समझौते के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य- 1.5 डिग्री तापमान की सीमा- को दरकिनार कर दिया गया है। इसके संपूर्ण क्रियान्वयन को 2.7 डिग्री तापमान की वृद्धि से जोड़ा गया है। सवाल यह है कि अब कोई भी देश 1.5 डिग्री तापमान की सीमा के लक्ष्य से कैसे आगे बढ़ सकता है। वर्ष 2018 में जब इसकी समीक्षा होगी तब वास्तविक स्थिति का आकलन संभव है। वर्ष 2018 में ही पेरिस समझौते की भी समीक्षा होनी है। लेकिन पेरिस समझौते के क्रियान्वयन की जानकारी के लिए अब तक कोई एकल व्यवस्था नहीं बन पाई है। जबकि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को पूरी दुनिया लगातार बढ़ते तापमान, समुद्र जलस्तर में होती वृद्धि, सूखा, बाढ़, ग्लेशियरों के दूर जाने, हिमखंडों के पिघलने के रूप में देख रही है।
विकासशील देशों को उत्सर्जन कम करने व जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को क्षीण करने के प्रयासों के लिए आवश्यक धन उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। वर्ष 2009 में कोपेनहेगन सम्मेलन में कहा गया था कि अमीर देश प्रत्येक वर्ष 2020 तक दस करोड़ डॉलर इस मकसद के लिए देंगे। इसे पूरे दशक भर आर्थिक सहायता के लिए उपयोग किया जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।मराकेश सम्मलेन में भी यही बात कही गई कि अमीर देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अधिक प्रयास करने चाहिए और उन्हें गरीब देशों की मदद करनी चाहिए, क्योंकि सबसे ज्यादा ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन वे ही करते आए हैं। मराकेश जलवायु सम्मेलन के दौरान ही विश्व मौसम संगठन की रिपोर्ट भी आई, जिसमें कहा गया है कि रूस और भारत में रिकार्ड गर्मी का उदाहरण दिया गया है। राजस्थान में इस साल 19 मई को 52 डिग्री तापमान दर्ज किया गया। विश्व मौसम संगठन की रिपोर्ट में यह दर्ज भी है। बढ़ते तापमान के कई नए रिकार्ड बने हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि धरती का तापमान 1.2 डिग्री बढ़ चुका है। उनके मुताबिक 2 डिग्री तापमान से अधिक बढ़ना विनाशकारी हो सकता है। मराकेश में चर्चा के दौरान कहा गया कि भारत में प्रतिव्यक्ति बिजली उपभोग एक हजार किलोवाट हावर वार्षिक से बहुत कम है, जबकि अमेरिका व यूरोप में विद्युत उपयोग बारह हजार-तेरह हजार किलोवाट हावर है। सबसे खास बात जलवायु सम्मेलन में इस बार यह रही कि ‘कांन्फें्रस आॅफ पार्टीज’ (सीओपी-22) में भारत की ओर से जेबी पंत इंस्टीट्यूट आॅफ हिमालयन एनवायरमेंट एंड डेवलपमेंट की ओर से पर्वतीय देशों के समक्ष हिमालय की अहमियत और जलवायु परिवर्तन का ब्योरा पेश किया गया। इस तरह पर्वतीय देशों के वैश्विक एजेंडे में पहली बार हिमालय को शामिल किया गया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमालय के अंतरराष्ट्रीय एजेंडे में शामिल हो जाने से जलवायु परिवर्तन को समझने व खास नीति बनाने में काफी मदद पहुंचेगी। जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक असर पहाड़ों पर पड़ रहा है। कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए पूरी दुनिया एक मंच पर आ गई है, लेकिन वायुमंडल में पहले से मौजूद कार्बन को कैसे कम किया जाए, इस समस्या का सटीक उपाय न ही पेरिस और न ही मराकेश सम्मेलन में देखने को मिला।

भाषाओं का विस्थापन

बीते चार दशकों के दौरान भारत के विभिन्न हिस्सों की करीब पांच सौ भाषाओं या बोलियों में से लगभग तीन सौ विलुप्त हो चुकी हैं और 190 से ज्यादा आखिरी सांसें ले रही हैं। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि भाषा-संपदा का इतना बड़ा नुकसान होने के बाद भी कहीं कोई हलचल नहीं है। यह शायद इसलिए कि इनमें से ज्यादातर जनजातियों की मातृभाषाएं थीं। राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, उत्तराखंड और गुजरात जैसे प्रदेश अपनी सांस्कृतिक विविधता और लोकसंपदा के कारण पहचाने जाते रहे हैं। इनका अपना भरा-पूरा लोक संसार रहा है। लेकिन अब इनमें से अधिकांश सांस्कृतिक संपदा खत्म होने के कगार पर है। कारण यह कि जिस भाषा में यह लोक संसार रचा-बसा है, वही भाषा-बोली खत्म होने जा रही है।
किसी भी समाज की भाषा उस अंचल की रीढ़ होती है। उसके खत्म होने का सवाल सिर्फ भाषाई नहीं है। भाषा सिर्फ अभिव्यक्ति का साधन नहीं होती, बल्कि उसमें इतिहास और मानव विकास-क्रम के कई रहस्य छिपे होते हैं। बोली के नष्ट होने के साथ ही जनजातीय संस्कृति, तकनीक और उसमें अर्जित बेशकीमती परंपरागत ज्ञान भी तहस-नहस हो जाता है। बाजार, रोजगार और शिक्षा जैसी वजहों से जनजातीय बोलियों में बाहर के शब्द तो प्रचलित हो रहे हैं, लेकिन उनकी अपनी मातृभाषा के स्थानिक शब्द प्रचलन से बाहर हो रहे हैं। दुखद है कि हजारों सालों से बनी एक भाषा, एक विरासत, उसके शब्द, उसकी अभिव्यक्ति, खेती, जंगल, इलाज और उनसे जुड़ी तकनीकों का समृद्ध ज्ञान, उनके मुहावरे, लोकगीत, लोक कथाएं एक झटके में ही खत्म होने लगी हैं।
यूनेस्को की ‘इंटरेक्टिव एटलस’ की रिपोर्ट बताती है कि अपनी भाषाओं को भूलने में भारत अव्वल नंबर पर है। दूसरे नंबर पर अमेरिका (192 भाषाएं) और तीसरे नंबर पर इंडोनेशिया (147 भाषाएं) है। दुनिया की कुल छह हजार भाषाओं में से ढाई हजार पर आज विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। यूनेस्को के ‘एटलस आफ द वर्ल्ड्स लैंग्वेजेस इन डेंजर’ के मुताबिक अकेले उत्तराखंड में गढ़वाली, कुमाऊंनी और रोंगपो सहित दस बोलियां खतरे में हैं। पिथौरागढ़ की दो बोलियां तोल्चा व रंग्कस तो विलुप्त भी हो चुकी हैं। वहीं उत्तरकाशी के बंगाण क्षेत्र की बंगाणी बोली को अब मात्र बारह हजार लोग बोलते हैं। पिथौरागढ़ की दारमा और ब्यांसी, उत्तरकाशी की जाड और देहरादून की जौनसारी बोलियां खत्म होने के कगार पर हैं। दारमा को 1761, ब्यांसी को 1734, जाड को 2000 और जौनसारी को 1,14,733 लोग ही बोलते-समझते हैं।
एटलस के मुताबिक 20,79,500 लोग गढ़वाली, 20,03,783 लोग कुमाऊंनी और 8000 लोग रोंगपो बोली के क्षेत्र में रहते हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि यहां रहने वाले सभी लोग ये बोलियां जानते ही हों। मध्यप्रदेश में भी करीब दर्जन भर बोलियां विलुप्ति के मुहाने पर पहुंच चुकी हैं। प्रदेश की कुल आबादी का 35.94 फीसद अब भी आंचलिक बोलियों पर ही निर्भर है, लेकिन इन आदिवासी बोलियों पर बड़ा संकट मंडरा रहा है। भीली, भिलाली, बारेली, पटेलिया, कोरकू, मवासी निहाली, बैगानी, भटियारी, सहरिया, कोलिहारी, गौंडी और ओझियानी जैसी जनजातीय बोलियां यहां सदियों से बोली जाती रही हैं, लेकिन अब ये बीते दिनों की कहानी बनने के कगार पर हैं। प्रदेश के एक बड़े हिस्से में- करीब बारह जिलों में- बोली जाने वाली मालवी भी अब दम तोड़ने लगी है। मध्यप्रदेश के 8.58 फीसद (51,75,793) लोगों की मातृभाषा मालवी है।
इसी तरह राजस्थान में आधा दर्जन बोलियां यूनेस्को की लुप्तप्राय बोलियों की सूची में शामिल हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार देश के सवा अरब लोग 1652 मातृभाषाओं में बात करते हैं। इसमें सबसे ज्यादा 42,20,48,642 लोग (41.03 फीसद) हिंदी भाषी हैं, राजस्थानी बोलने वाले 1,83,55,613 (1.78 फीसद) लोग हैं। मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र के 28,672 वर्ग मील के बड़े क्षेत्र में भील रहते हैं, पर भीली बोलने वाले 95,82,957 लोग (0.93 फीसद) और संथाली बोलने वाले तो मात्र 64,69,600 (0..63 फीसदी) हैं। देश में लगभग साढ़े पांच सौ जनजातियां निवास करती हैं जिनकी अपनी-अपनी बोलियां भी हैं। लेकिन इनमें से कई बोलियों को बोलने वालों की तादाद अब घट कर हजारों में सिमट चुकी है। जनजातीय बोलियों को लिपिबद्ध किए जाने की अब तक कहीं कोई गंभीर कोशिश नहीं हुई है। इन्होंने अपने वाचिक स्वरूप में ही हजारों सालों का सफर तय किया है।
कई जानकारों का मानना है कि जब तक इन बोलियों या भाषाओं को छात्रों के पाठ्यक्रम से नहीं जोड़ा जाता, तब तक इन्हें आगे बढ़ाने की बात बेमानी साबित होगी। खासतौर पर प्राथमिक शिक्षा में यह बहुत जरूरी है। प्राथमिक शिक्षा हिंदी और अंग्रेजी तक सिमट गई है। इस कारण बच्चे अपनी स्थानीय बोलियों से लगातार कटते जा रहे हैं और अपनी बोलियों को लेकर उनके मन में हीनभावना भी आने लगी है। यदि समय रहते इन बोलियों के संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जाते तो जल्द ही ये पूरी तरह से विलुप्त हो जाएंगी।
यह सिर्फ एक बोली या भाषा की नहीं, मानव समाज की कई अमूल्य विरासतों की भी विलुप्ति होगी। बीते तीस-चालीस सालों में एक बड़ी आबादी की मातृभाषा गुम हो चुकी है।
भूमंडलीकरण के कारण दुनिया भर में इस वक्त जिंदा रहने वाली भाषाओं में चीनी, अंग्रेजी, स्पेनिश, जापानी, रूसी, बांग्ला और हिंदी सहित कुल सात भाषाओं का राज है। दो अरब पचास करोड़ से ज्यादा लोग ये भाषाएं बोलते हैं। इनमें से अंगरेजी का प्रभुत्व सर्वाधिक है और वह वैश्विक भाषा के रूप में स्वीकार कर ली गई है। हालांकि भाषाविज्ञानी इसे खतरनाक रुझान मानते हैं। क्योंकि चीन और अर्जेंटीना ऐसे देश हैं जहां भाषा की विविधता खत्म हो चुकी है। इसकी वजह वहां सरकारी स्तर पर एक ही भाषा का चुनाव रहा। यह हर्ष की बात है कि हिंदी भी जिंदा भाषाओं में शामिल है। हिंदी ढेरों चुनौतियों से निपटती, आज इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक में पहुंची है। वह इस समय भले यूनेस्को की सुरक्षित भाषाओं वाली श्रेणी में आती हो, लेकिन महत्त्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या इस सदी के अंत तक हिंदी की यही हैसियत बनी रहेगी? या वह भी इक्कीसवीं सदी के आखिरी चरण में यूनेस्को द्वारा लुप्त भाषा की श्रेणी में रखी जाएगी?
असल में यह सब भूमंडलीकरण का असर है। वर्तमान पीढ़ी के पास कोई एक समृद्ध भाषा नहीं है। बहुत सारी मातृभाषाएं व्यवहार में नहीं बची हैं। साढ़े छह लाख गांवों के देश का विकास अंग्रेजी थोपने से संभव नहीं है। कितनी अजीब बात है कि विश्वगुरु बनने का अभिलाषी यह देश संयुक्त राष्ट्र में तो हिंदी का परचम फहराना चाहता है लेकिन अपनी ही धरती पर उसे राजकाज की भाषा के रूप में नहीं अपनाना चाहता, न ही उसे आम जनता की रोजी-रोटी की भाषा बनने देना चाहता है। जबकि सबसे ज्यादा बोली जाने वाली बीस में से छह भाषाएं हमारे देश में हैं। ये हैं- हिंदी, बांग्ला, तेलुगू, मराठी, तमिल और पंजाबी। वर्तमान समय में देश में अपनी भाषाओं की जो भी स्थिति है, उसका कारण ये मानसिक गुलामी से ग्रसित लोग हैं। मानसिक गुलामी को अवश्यंभावी बता कर लोगों को दिग्भ्रमित कर रहे हैं। पूरी दुनिया में चीनी भाषा का जितना सम्मान है, उतना किसी भी भारतीय भाषा का नहीं है। उसकी वजह सिर्फ हम हैं। भलें हम ग्लोबल युग में रहते हैं। लेकिन भाषाओं का इतिहास तो सत्तर हजार साल पुराना है जबकि भाषाएं लिखने का इतिहास सिर्फ चार हजार साल पुराना है। इसलिए ऐसी भाषाओं के लिए यह संस्कृति का ह्रास है। खासकर जो भाषाएं लिखी ही नहीं गर्इं, जब वे नष्ट होती हैं तो यह बहुत बड़ा नुकसान होता है।
यह सांस्कृतिक नुकसान तो है ही, आर्थिक नुकसान भी है। भाषा आर्थिक पूंजी भी होती है, क्योंकि आज की सभी तकनीक भाषा पर आधारित तकनीक हैं। चाहे पहले की रसायन विज्ञान, भौतिक विज्ञान या इंजीनियरिंग से जुड़ी तकनीक हो या आज के दौर का यूनिवर्सल अनुवाद, मोबाइल तकनीक, सभी भाषा से जुड़ी हैं। ऐसे में भाषाओं का लुप्त होना एक आर्थिक नुकसान भी है। यही वजह है कि भाषाविद भाषाओं के लुप्त होने को मनुष्य की मृत्यु के समान मानते हैं। भाषाशास्त्री डेविड क्रिस्टल अपनी पुस्तक ‘लैंग्वेज डेथ’ में कहते हैं, भाषा की मृत्यु और मनुष्य की मृत्यु एक-सी घटना है, क्योंकि दोनों का ही अस्तित्व एक-दूसरे के बिना असंभव है।
एक भाषा की मौत का अर्थ है उसके साथ एक खास संस्कृति का खत्म होना, एक विशिष्ट पहचान का गुम हो जाना। तो क्या दुनिया से विविधता समाप्त हो जाएगी और पूरा संसार एक रंग में रंग जाएगा? बहुत सारी भाषाओं के निरंतर कमजोर पड़ने के साथ यह सवाल गहराता जा रहा है। पहनावे के बाद अब भाषाओं पर आया संकट अधिक खतरनाक सिद्ध हो सकता है। कहा जाता है कि भाषा अपनी संस्कृति भी साथ लाती है। वास्तव में भाषा को बचाने का मतलब है, भाषा बोलने वाले समुदाय को बचाना। सागरतटीय, घुमंतू, पहाड़ी, मैदानी और शहरी, सभी समुदायों के लोगों के लिए अलग योजना की जरूरत है। बहुत-से लोग शहरीकरण को भाषाओं के लुप्त होने का कारण मानते हैं, लेकिन शहरीकरण भाषाओं के लिए खराब नहीं है। शहरों में इन भाषाओं की अपनी एक जगह होनी चाहिए। बड़े शहरों का भी बहुभाषी होकर उभरना जरूरी है।
http://www.jansatta.com/politics/jansatta-article-about-language-3/189220/

नकदीरहित : अर्थतंत्र की मरीचिका

पांच सौ और हजार रु. के नोटों के बंद किए जाने को सही ठहराने के लिए ‘काले धन’ पर अंकुश लगने का जो दावा किया जा रहा है, उसके अलावा एक और तर्क यह दिया जा रहा है कि यह देश को एक ‘नकदीरहित’ अर्थव्यवस्था की ओर ले जाएगा.
बहरहाल, ‘काले धन’ के संबंध में इस बहुत ही भोली समझ की ही तरह कि ऐसा धन नोटों के बंडलों की ही शक्ल में जमा कर के रखा जाता है, यह दूसरी दलील भी हैरान करने वाले तरीके से भोलेपन पर आधारित है.
सारा का सारा पैसा बैंकिंग प्रणाली की देनदारी के रूप में हम अपने पास रखते हैं. बैंकों पर हमारे दावे दो तरीके से निर्मित होते हैं. पहला, जब हम बैंक में नकदी या अपने पक्ष में किसी और का जारी किया हुआ चैक जमा कराते हैं. दूसरा, जब हमारे कुछ भी जमा किए बिना ही बैंक हमें ‘ऋण’ देता है, या अपने ऊपर देनदारी का हमारा दावा स्वीकार कर लेता है, जैसा कि मिसाल के तौर पर केडिट कार्ड के मामले में होता है. बैंक किसी को भी ऋण तभी देता है जब ऋण हासिल करने वाले में ‘ऋण पात्रता’ हो यानी वह बैंक की नजरों में ऋण देने के लायक हो. दुर्भाग्य से करोड़ों भारतीय बैंकों की नजरों में ‘ऋण पात्र’ नहीं हैं. शहरी मध्य वर्ग के लिए, जिसके बीच से ज्यादातर आर्थिक नीति निर्माता आते हैं, क्रेडिट कार्ड हासिल करना आसान होता है. लेकिन देश की आबादी के अधिकांश हिस्से के मामले में ऐसा बिल्कुल नहीं है. इसलिए यह मानकर चलना कि आम जनता भी, पहले ही नकदी या चैक के माध्यम से उतना ही पैसा जमा कराए बिना ही, बैंकों पर भुगतान के दावे निर्मित कर सकती है, पूरी तरह से निराधार है.
वास्तव में इस तरह की बात सोचा जाना ही अपने आप में आश्चर्यजनक है क्योंकि यह एक जाना-माना तथ्य है कि हमारे देश के बैंक, जिन पर बैंक राष्ट्रीयकरण के बाद, खेती के लिए ‘प्राथमिकता क्षेत्र’ के तौर पर ऋण देने की शर्त लगाई गई थी, देश में नवउदारवादी व्यवस्था के आने के बाद से सुव्यवस्थित तरीके से अपनी उक्त जिम्मेदारी से हाथ खींचते आ रहे हैं. और बैंकों के इस तरह हाथ खींचे जाने को एक के बाद केंद्र में आई सरकारों द्वारा ‘प्राथमिकता क्षेत्र ऋण’ की परिभाषा को ही फैलाने के जरिए वैधता प्रदान की जाती रही है. इस परिभाषा को इतना ज्यादा फैला दिया गया है कि अब तो ग्रामीण क्षेत्र में किसी कृषि उत्पाद का उपयोग करने वाला कारखाना लगाने के लिए, किसी बहुराष्ट्रीय निगम को दिया जाने वाला ऋण भी ‘प्राथमिकता क्षेत्र ऋण’ में गिन लिया जाएगा.
इसके अलावा, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ही हैं जिन्हें अपनी इस तरह की कोताही को ढांपने की जरूरत पड़ती है. निजी बैंकों को और खास तौर पर विदेशी बैंकों को तो ऐेसे किसी आवरण की कोई जरूरत तक नहीं होती है. कुछ बैंकों ने तो साफ तौर पर यह बता भी दिया है कि उनसे लाखों किसानों से सीधे राब्ता रखने की उम्मीद नहीं की जाना चाहिए और इसके बजाए वे इस काम के लिए ‘सुगमता कारकों’ (बिचौलियों का जो व्यावहारिक मायनों में बैंक द्वारा वित्त पोषित निजी महाजनों की तरह काम करते हैं) का ही सहारा लेना चाहेंगे.
इन परिस्थितियों में यह अचरज की बात नहीं है कि किसान जनता अपनी ऋण संबंधी जरूरतों के लिए बढ़ते पैमाने पर महाजनों के एक नये वर्ग पर निर्भर होती गई है. महाजनों के इस नये वर्ग में बैंकों के ऋण का उपयोग करने वाले बिचौलिए, मुख्यत: स्वतंत्र स्त्रोतों का प्रयोग करने वाले निजी ऑपरेटर, कृषि-बिजनेस फर्मो के एजेंट तथा अन्य शामिल हैं. जो बात किसानों के बारे में सच है, वही लघु उत्पादन के अन्य क्षेत्रों के बारे में भी सच है. इसलिए जब तक अर्थव्यवस्था में एक ऐसा हिस्सा रहेगा जिसे वित्तीय संस्थाएं ‘ऋण पात्र’ नहीं मानती हैं, और इस हिस्से को ऋण के गैर-संस्थागत स्त्रोतों पर निर्भर रहना पड़ेगा (हमारे मामले में इस हिस्से में देश की आधी से ज्यादा कामकाजी आबादी आ जाती है), इसी कारण से नकदीरहित अर्थव्यवस्था की सारी बातें कोरी बतकही ही रह जाएंगी. अब अगर हम यह भी मान लें कि असंगठित क्षेत्र तक में ऐसा हरेक शख्स जिसे नकदी या चैक से कोई भी रकम मिलती है, उसे सीधे-सीधे बैंक में जमा करा देगा और इससे बनने वाले बैंक पर दावों का ही भुगतान करने के लिए या आगे लेन-देन के लिए इस्तेमाल करेगा. तब भी इसके लिए यह जरूरी होगा कि ऐसे शख्स को जिस किसी भी व्यक्ति को भुगतान करना हो, उसका अपना बैंक खाता हो.
संक्षेप में इसके लिए पूरी आबादी के करीब-करीब सार्वभौम बैंक कवरेज की जरूरत होगी, जबकि हमारे देश में अब तक बैंक कवरेज का आंकड़ा करीब 30 फीसद ही है. ऐसा इसलिए है कि ऐसी अर्थव्यवस्था में जिसमें सबसे बड़ी संख्या गरीबों की है जो तरह-तरह की ‘अनौपचारिक’ गतिविधियों से किसी तरह से अपना गुजारा चला लेते हैं, बैंकों को आबादी को सार्वभौम कवरेज मुहैया कराना फायदे नहीं नजर आता है. इतना ही नहीं अगर खुद जनता की नजर से भी देखा जाए तो जब तक उसे बैंकों से ऋण हासिल नहीं होता है, जो उन्हें लुटेरे महजानों के चंगुल से आजादी दिलाए, अपने हाथ में आने वाली सारी नकदी बैंक खाते में जमा कराना और आगे भुगतान करने के लिए, इस तरह बैंकों पर बनने वाली देनदारियों का उपयोग करना, उसके लिए पूरी तरह से निर्थक, अनावयक  तथा अनुपयोगी कसरत ही साबित होगा. इसके बजाए वे अपने हाथ में नकदी रखना तथा नकदी में भुगतान करना ही पसंद करेंगे क्योंकि इसमें यह फायदा भी है कि वे जिसे भी चाहें तथा जितना भी चाहें भुगतान कर सकते हैं, और इस पर रत्तीभर लागत नहीं आएगी. इसी वजह से वे यह भी चाहेंगे कि उनका भुगतान ‘नकदी’ में ही किया जाए.
इसके अलावा, अगर सरकार अर्थव्यवस्था को नकदीरहित बनाना चाहती है तब भी उसका मुद्रा के अमौद्रीकरण के जरिए जनता को ऐसा करने के लिए मजबूर करना शुद्ध तानाशाही का काम है. यह वाकई विडंबनापूर्ण है कि वही सरकार जो विदेशी पूंंजी को इसका भरोसा दिलाने में लगी हुई है कि भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे ‘उदार अर्थव्यवस्था’ है यानी विदेशी पूंजीपतियों को भारत में अपनी आर्थिक गतिविधियां चलाने की पूरी ‘स्वतंत्रता’ हासिल होगी, दूसरी ओर करोड़ों दरिद्र देशवासियों को हफ्तों के लिए ‘नकदीरहित’ रहने के लिए मजबूर कर रही है. इस सरकार को विदेशी पूंजीपतियों की स्वतंत्रता की तो परवाह है, लेकिन उसे खुद अपने नागरिकों की स्वतंत्रता की, जिस माध्यम से चाहें उसमें अपना लेन-देन करने की अपने देश के नागरिकों की स्वतंत्रता की, उसे कोई परवाह ही नहीं है.

आवारा / मजाज़ लखनवी

शहर की रात और मैं, नाशाद-ओ-नाकारा फिरूँ 
जगमगाती जागती, सड़कों पे आवारा फिरूँ 
ग़ैर की बस्ती है, कब तक दर-ब-दर मारा फिरूँ 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 
झिलमिलाते कुमकुमों की, राह में ज़ंजीर सी 
रात के हाथों में, दिन की मोहिनी तस्वीर सी 
मेरे सीने पर मगर, चलती हुई शमशीर सी 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 
ये रुपहली छाँव, ये आकाश पर तारों का जाल 
जैसे सूफ़ी का तसव्वुर, जैसे आशिक़ का ख़याल 
आह लेकिन कौन समझे, कौन जाने जी का हाल 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 
फिर वो टूटा एक सितारा, फिर वो छूटी फुलझड़ी 
जाने किसकी गोद में, आई ये मोती की लड़ी 
हूक सी सीने में उठी, चोट सी दिल पर पड़ी 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 
रात हँस – हँस कर ये कहती है, कि मयखाने में चल 
फिर किसी शहनाज़-ए-लालारुख के, काशाने में चल 
ये नहीं मुमकिन तो फिर, ऐ दोस्त वीराने में चल 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 
हर तरफ़ बिखरी हुई, रंगीनियाँ रानाइयाँ 
हर क़दम पर इशरतें, लेती हुई अंगड़ाइयां 
बढ़ रही हैं गोद फैलाये हुये रुस्वाइयाँ 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 
रास्ते में रुक के दम लूँ, ये मेरी आदत नहीं 
लौट कर वापस चला जाऊँ, मेरी फ़ितरत नहीं 
और कोई हमनवा मिल जाये, ये क़िस्मत नहीं 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 
मुंतज़िर है एक, तूफ़ान-ए-बला मेरे लिये 
अब भी जाने कितने, दरवाज़े है वहां मेरे लिये 
पर मुसीबत है मेरा, अहद-ए-वफ़ा मेरे लिए 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 
जी में आता है कि अब, अहद-ए-वफ़ा भी तोड़ दूँ 
उनको पा सकता हूँ मैं ये, आसरा भी छोड़ दूँ 
हाँ मुनासिब है ये, ज़ंजीर-ए-हवा भी तोड़ दूँ 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 
एक महल की आड़ से, निकला वो पीला माहताब 
जैसे मुल्ला का अमामा, जैसे बनिये की किताब 
जैसे मुफलिस की जवानी, जैसे बेवा का शबाब 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 
दिल में एक शोला भड़क उठा है, आख़िर क्या करूँ 
मेरा पैमाना छलक उठा है, आख़िर क्या करूँ 
ज़ख्म सीने का महक उठा है, आख़िर क्या करूँ 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 
मुफ़लिसी और ये मज़ाहिर, हैं नज़र के सामने 
सैकड़ों चंगेज़-ओ-नादिर, हैं नज़र के सामने 
सैकड़ों सुल्तान-ओ-ज़बर, हैं नज़र के सामने 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 
ले के एक चंगेज़ के, हाथों से खंज़र तोड़ दूँ 
ताज पर उसके दमकता, है जो पत्थर तोड़ दूँ 
कोई तोड़े या न तोड़े, मैं ही बढ़कर तोड़ दूँ 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 
बढ़ के इस इंदर-सभा का, साज़-ओ-सामाँ फूँक दूँ 
इस का गुलशन फूँक दूँ, उस का शबिस्ताँ फूँक दूँ 
तख्त-ए-सुल्ताँ क्या, मैं सारा क़स्र-ए-सुल्ताँ फूँक दूँ 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 
जी में आता है, ये मुर्दा चाँद-तारे नोंच लूँ 
इस किनारे नोंच लूँ, और उस किनारे नोंच लूँ 
एक दो का ज़िक्र क्या, सारे के सारे नोंच लूँ 
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ, ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ 

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