Saturday, November 19, 2016

AI- Artificial Intelligence | अजित बालकृष्णन

तकनीक की दुनिया एक और बड़े बदलाव की ओर अग्रसर है। जैसा कि ऐसे मौकों पर होता है, पूरा माहौल नए बदलाव के एकदम खिलाफ है। बीबीसी ने ब्रिटेन के सर्वोत्तम वैज्ञानिकों में से एक प्रोफेसर स्टीफन हॉकिंस के हवाले से कहा है कि यह नया बदलाव मानव जाति के अंत की गाथा लिख सकता है। अन्य लोगों का रुख इससे उलट है और उनका दावा है कि नया बदलाव कामकाज की नीरसता खत्म करेगा, शिक्षा की पहुंच बढ़ाएगा, बुजुर्गों के जीवन को बेहतर करेगा और स्वास्थ्य सुविधाओं को सस्ता करेगा। यह नई तकनीक है कृत्रिम बौद्घिकता।
 
शायद कृत्रिम बौद्घिकता शब्द सुनकर आपको लगेगा कि यह भी शायद कोई भारी भरकम लगने वाला शब्द होगा जिसे सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के लोगों ने अपना काम निकालने के लिए तैयार किया होगा ताकि उनके काम को अहमियत मिले। वास्तव में तकनीकी कारोबार से जुड़े संगठन अपनी प्रेस विज्ञप्तियों में वर्ड प्रोसेसिंग, ई-मेल, सोशल नेटवर्किंग जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं और इस बीच वादा किया जाता है कि दुनिया जल्दी ही एक बेहतर, व्यावहारिक और कम गंदी जगह होगी जहां काम को अधिक सक्षम ढंग से पूरा किया जा सकेगा। इस बीच श्रम और श्रमिकों के समर्थन का दम भरने वाले बौद्धिक कहते रहेंगे कि ऐसा करने से समाज में रोजगार की भयंकर कमी एक साथ देखने को मिलेगी। इसका व्यापक और बुरा प्रभाव पड़ेगा। वर्ष बीतते जाते हैं और पता चलता है कि नए आविष्कार ने हमारे आसपास की दुनिया में कुछ बदलाव अवश्य किए हैं। 
 
मिसाल के तौर पर टाइपराइटर की जगह अब लैपटॉप ने ले ली। हालांकि टाइप तो यहां भी करना पड़ता है। ई-मेल भी टाइप करके भेजना होता है लेकिन उसके सामने वाले पक्ष तक पहुंचने की गति सामान्य पत्र की तुलना में बहुत तेज है। गपशप का सिलसिला अब केवल करीबी पड़ोसियों के साथ ही नहीं बल्कि ऐसे लोगों के साथ भी चल सकता है जिनका हम नाम भर जानते हों और जो दुनिया के दूसरे छोर पर रहते हों। इसके अलावा तो सबकुछ पहले जैसा ही है। हमें इन तकनीक की बदौलत कोई ऐसा बड़ा बदलाव होता नहीं दिखता जिसका दम इनके समर्थक भरते हैं। 
 
ऐसे में कृत्रिम बुद्घिमता को लेकर कही जाने वाली चामत्कारिक बातों को भी शंका की दृष्टिï से देखा गया। ऐसा इसलिए क्योंकि सन 1950 के दशक से ही इसे और इसके संभावित असर को लेकर तमाम तरह के दावे किए जाते रहे हैं। सवाल उठता है कि अगर ऐसा है तो फिर न्यूयॉर्क टाइम्स और द टेलीग्राफ जैसे बड़े समाचार पत्र इसमें अपना स्वर क्यों मिला रहे हैं? न्यूयॉर्क टाइम्स ने हाल ही में लिखा कि कृत्रिम बुद्घिमता पर नियंत्रण की होड़ शुरू हो चुकी है। उसने विशेषज्ञों के हवाले से कहा कि जो भी इस होड़ का विजेता होगा वह सूचना प्रौद्योगिकी के अगले चरण पर राज करेगा। 
 
लंदन के समाचार पत्र द टेलीग्राफ ने एक अन्य विशेषज्ञ के हवाले से कहा कि पांच साल में अधिकांश कंपनियों के पास निहायत सस्ती और ताकतवर मशीनों की सेना होगी जो क्लाउड से संचालित होगी। इनकी मदद से तमाम ऐसे कामों को पूरा किया जा सकेगा जिनको करने के लिए आज लोगों की जरूरत होती है। यानी इनकी वजह से लाखों रोजगार खत्म होंगे। आखिर कृत्रिम बौद्घिकता है क्या बला? हो सकता है आप भी किसी न किसी तरह कृत्रिम बुद्घिमता का प्रयोग कर रहे हों। जब आप किसी न्यूज वेबसाइट पर खबर पढ़ लेते हैं और उसके बाद ऐसे किसी लिंक पर क्लिक करते हैं जिस पर लिखा होता है कि यहां इससे मिलीजुली सामग्री पढ़ी जा सकती है तो आप एक नए लेख तक पहुंच जाते हैं। यह कृत्रिम बुद्घिमता का ही नमूना है। उस समाचार वेबसाइट पर पर्दे के पीछे एक कंप्यूटर प्रोग्रामर ऐसा कोड लिखकर रखता है जो उस साइट के सभी समाचार आलेखों का विश्लेषण करके उनको श्रेणीबद्घ करके रखता है। मिसाल के तौर पर हम बॉलीवुड फिल्म समीक्षा और भारत पाकिस्तान संबंध, जैसे विषय ले सकते हैं। जो पाठक फिल्म समीक्षा में रुचि दिखाते हैं उनको वैसे ही आलेख प्रस्तुत किए जाते हैं। कार चलाना ऐसा काम है जिसमें हाथ, पैर, आंख और कान का समन्वय जरूरी है ताकि तमाम यातायात के बीच कार चलाई जा सक। अमेरिका जैसे देश में यह क्षेत्र इन दिनों कृत्रिम बुद्घिमता के लिहाज से अहम बना हुआ है।
 
अमेरिका में बड़ी आबादी 70 से अधिक उम्र की है और लोग अकेले रहते हैं। उनको अपनी गाड़ी खुद चलानी होती है। ऐसे में कार का स्वचालन उनके लिए फायदेमंद हो सकता है। वाहनचालक रहित कार की अवधारणा कृत्रिम बुद्घिमता से जुड़ी है। कार को स्वचालित बनाने के लिए दशकों पुरानी रडार और जीपीएस जैसी तकनीक का प्रयोग किया जाता है जो पता लगाती है कि कार के आसपास क्या है।  इनकी मदद से मार्ग की बाधाओं, संकेतकों को समझा जाता है और सॉफ्टवेयर की मदद से इस सूचना के जरिए रास्ते तलाश किए जाते हैं। 
लेकिन ऐसे कदमों में जोखिम जुड़ा है। चालक रहित कार जो जटिल और भीड़भाड़ भरी राहों से निकलने की जुगत कर सके वह आतंकवादियों के लिए एक खतरनाक हथियार हो सकती है। वे इन वाहनों का उपयोग बम विस्फोट में कर सकते हैं। चालक रहित टैंक बन गए तो जंग की तस्वीर बदल जाएगी। दूरदराज इलाकों में चालक रहित विमान यानी ड्रोन के हमलों की खबरें हम सुनते ही हैं। जोखिम यह भी है ऐसे काम मशीन से होने लगे तो इन्हें करने वाले लोगों का क्या होगा? 
 
अमेरिका में सन 2030 तक कृत्रिम बुद्घिमता के समाज पर पडऩे वाले असर के आकलन के लिए शीर्ष विद्वानों और औद्योगिक जगत के लोगों का एक पैनल तैयार किया गया। इसने हाल ही में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की है। आईआईटी बंबई के प्रोफेसर शिवराम कल्याणकृष्णन भी इसके सदस्य हैं। भारत में यह पूछना अहम हो सकता है कि इन तकनीक को लेकर देश के जन नीति प्रतिष्ठïानों का रुख क्या है? पहले कदम के रूप में जन सेवाओं की आपूर्ति के कुछ क्षेत्रों को चिह्निïत करना अहम हो सकता है जो कृत्रिम बुद्घिमता से लाभान्वित होने वाले हों। यह भी सुनिश्चित किया जा सकता है कि उत्पाद विकास आदि के लिए धन आसानी से मुहैया कराया जा सके। शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और राष्ट्रीय सुरक्षा ऐसे क्षेत्र हो सकते हैं। 
 
शिक्षा में प्राथमिक शिक्षकों का काम आसान बनाने, औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान और पॉलिटेक्रीक आदि में इनका प्रयोग किया जा सकता है। वहीं प्राथमिक स्वास्थ्य में बीमारियों का शीघ्र पता लगाने और उपचार करने में इनका इस्तेमाल हो सकता है। वहीं राष्ट्रीय सुरक्षा में आतंकियों के खिलाफ शीघ्र चेतावनी जारी करने के काम में भी यह नई तकनीक मददगार साबित हो सकती है। 

राजनीतिः जीडीपी बनाम भूख सूचकांक | DP Singh

ताजा विश्व भूख सूचकांक या ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआइ) के अनुसार भारत की स्थिति अपने पड़ोसी मुल्क नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और चीन से बदतर है। यह सूचकांक हर साल अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (आइएफपीआरआइ) जारी करता है, जिससे दुनिया के विभिन्न देशों में भूख और कुपोषण की स्थिति का अंदाजा लगता है। आज केवल इक्कीस देशों में हालात हमसे बुरे हैं। विकासशील देशों की बात जाने दें, हमारे देश के हालात तो अफ्रीका के घोर गरीब राष्ट्र नाइजर, चाड, सिएरा लिओन से भी गए-गुजरे हैं। पूरी दुनिया में भूख के मोर्चे पर पिछले पंद्रह बरसों के दौरान उनतीस फीसद सुधार आया है, लेकिन हंगर इंडेक्स में भारत और नीचे खिसक गया है। सन 2008 में वह तिरासीवें नंबर पर था, वर्ष 2016 आते-आते 97वें स्थान पर आ गया। तब जीएचआइ में कुल 96 देश थे, जबकि अब उनकी संख्या बढ़ कर 118 हो गई है। भूख मापने के लिए इस बार चार मापदंड अपनाए गए हैं। पहला है, देश की कुल जनसंख्या में कुपोषित आबादी की तादाद। दूसरा है, पांच साल तक के ‘वेस्टेड चाइल्ड’ यानी ऐसे बच्चे जिनकी लंबाई के अनुपात में उनका वजन कम है। इससे कुपोषण का पता चलता है। तीसरा है, पांच साल तक के ‘स्टनटेड चाइल्ड’ यानी ऐसे बच्चे जिनकी आयु की तुलना में कद कम है। चौथा और अंतिम मापदंड है, शिशु मृत्यु दर। पहली बार भूख मापने के लिए ‘वेस्टेड चाइल्ड’ और ‘स्टनटेड चाइल्ड’ का पैमाना अपनाया गया है। अनुमान है कि आजादी के सत्तर साल बाद भी भारत की पंद्रह प्रतिशत आबादी कुपोषण का शिकार है। इसका अर्थ यह है कि देश के करीब बीस करोड़ लोगों को भरपेट भोजन नहीं मिलता है, और जो मिलता है उसमें पोषक तत्त्वों का अभाव होता है। संतुलित भोजन के अभाव में आज पंद्रह फीसद बच्चे‘वेस्टेड चाइल्ड’ और उनतालीस प्रतिशत ‘स्टनटेड चाइल्ड’ की श्रेणी में आते हैं। इसी आयु वर्ग में उनकी मृत्यु दर 4.8 फीसद है।
मजे की बात है कि बच्चों के संतुलित पोषण के लिए दुनिया के दो सबसे बड़े कार्यक्रम भारत में चल रहे हैं। पहला है, छह साल तक के बच्चों के लिए समेकित बाल विकास योजना (आइसीडीएस), तथा दूसरा है, चौदह वर्ष तक के स्कूली बच्चों के लिए मिड-डे मील योजना। इसके बावजूद यदि भूख सूचकांक में भारत की स्थिति नहीं सुधरी तो निश्चय ही उक्त योजनाओं के क्रियान्वयन में गड़बड़ी है। वैसे हंगर इंडेक्स में देश की दुर्दशा के मुख्य कारण गरीबी, बेरोजगारी, पेयजल की किल्लत, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी तथा साफ-सफाई का अभाव है।
आर्थिक विकास के तमाम दावों के बावजूद आज भी देश की बाईस प्रतिशत आबादी कंगाल (गरीबी रेखा से नीचे) है। एक वक्त था जब यह समझा जाता था कि तेज आर्थिक विकास के भरोसे गरीबी और भुखमरी को समाप्त किया जा सकता है, लेकिन फिलवक्त जीडीपी को किसी देश की खुशहाली का पैमाना नहीं माना जाता। भारत को बाजार आधारित खुली अर्थव्यवस्था अपनाए चौथाई सदी बीत चुकी है। इस दौरान देश का जीडीपी अच्छा-खासा रहा है। आज भारत को दुनिया का सातवां सबसे अमीर देश गिना जाता है। हमारी प्रतिव्यक्ति औसत वार्षिक आय बढ़ कर 88,533 रुपए हो चुकी है, लेकिन अमीर और गरीब आदमी की आमदनी का अंतर भी पहले से कहीं अधिक है।
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस) की रिपोर्ट इस तथ्य की तसदीक करती है। रिपोर्ट से पता चलता है कि गरीब और अमीर के बीच की खाई और चौड़ी होती जा रही है। आम आदमी ने पिछले दो दशक के उदारीकरण राज की भारी कीमत चुकाई है। सर्वे में शहरों के सबसे संपन्न दस फीसद लोगों की औसत संपत्ति 14.6 करोड़ रुपए आंकी गई, जबकि सबसे गरीब दस प्रतिशत की महज 291 रुपए। यानी शहरी अमीरों के पास गरीबों के मुकाबले पांच लाख गुना ज्यादा धन-दौलत है। गांवों में कुबेर और कंगाल आबादी की संपत्ति का अंतर थोड़ा कम है, फिर भी यह एक और तेईस हजार के आसमानी अंतर पर है।
गांवों में सबसे अमीर दस प्रतिशत लोगों की औसत संपत्ति 5.7 करोड़ रुपए तथा सबसे गरीब दस फीसद की 2507 रुपए है। रिपोर्ट के अनुसार आज गांवों की एक तिहाई तथा शहरों की एक चौथाई आबादी कर्ज के बोझ तले दबी है। जहां सन 2002 में गांवों के सत्ताईस फीसद लोगों ने ऋण ले रखा था, वहीं 2012 में इकतीस प्रतिशत लोगों पर कर्ज चढ़ा था। इन दस वर्षों में ऋण की रकम भी बढ़ कर लगभग दो गुनी हो गई।
क्रेडिट सुइस ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट के अनुसार आज हिंदुस्तान के दस प्रतिशत अमीरों के पास देश की चौहत्तर प्रतिशत संपत्ति है। मतलब यह कि बचे नब्बे प्रतिशत लोगों के पास महज छब्बीस प्रतिशत धन-दौलत है। तेज आर्थिक विकास के कारण पिछले पंद्रह वर्षों में देश की संपत्ति में 15.33 लाख करोड़ रुपए का इजाफा हुआ, पर इस वृद्धि का 61 प्रतिशत (नौ लाख करोड़ रुपए) हिस्सा केवल एक फीसद अमीर तबके ने कब्जा लिया। ध्यान से देखने पर पता चलता है कि पिछले डेढ़ दशक में देश में जितनी दौलत बढ़ी उसका 81 प्रतिशत (12.41 लाख करोड़ रुपए) हिस्सा संपन्न दस फीसद वर्ग की झोली में चला गया, जबकि नब्बे प्रतिशत आम जनता को केवल 19 प्रतिशत (2.91 लाख करोड़ रुपए) संपत्ति मिली।
रोजगार के मोर्चे पर भी हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। लेबर ब्यूरो सर्वेक्षण की ताजा रिपोर्ट के अनुसार आज भारत रोजगार-रहित विकास के कुचक्र में फंस गया है। वर्ष 2015-16 में बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत आंकी गई, जो पांच वर्ष में सर्वाधिक थी। इससे पूर्व वर्ष 2013-14 में यह 4.9 फीसद, 2012-13 में 4.7 तथा 2011-12 में 3.8 फीसद थी। हां, 2009-10 में यह आंकड़ा जरूर 9.3 प्रतिशत था। रिपोर्ट के अनुसार पिछले वित्तवर्ष में शहरों में बेरोजगारी की स्थिति और बिगड़ी है। जहां 2013-14 में यह 4.7 फीसद थी, 2015-16 में बढ़ कर 5.1 फीसद हो गई। सबसे अधिक मार महिलाओं पर पड़ रही है, उनकी नौकरियां लगातार कम हो रही हैं। सन 2013-14 में बेरोजगार औरतों की संख्या 7.7 प्रतिशत थी, जो दो साल बाद बढ़ कर 8.7 प्रतिशत हो गई।
तेज औद्योगीकरण और आर्थिक सुधार के दावों के बावजूद सच यह है कि पिछले पच्चीस सालों के दौरान अच्छी और सुरक्षित नौकरियां लगातार घटी हैं। 1980 की औद्योगिक जनगणना में प्रत्येक गैर-कृषि इकाई में 3.01 कर्मचारी थे, जो 2013 आते-आते घट कर 2.39 रह गए। उदारीकरण से पूर्व 1991 में 37.11 फीसद उद्योग ऐसे थे जहां दस या अधिक कर्मचारी थे। 2013 में यह संख्या दस प्रतिशत गिर कर 21.15 रह गई। इसका अर्थ यह हुआ कि देश के अधिकांश उद्योग अब गैर-संगठित क्षेत्र में हैं। यह तथ्य किसी भी अच्छी अर्थव्यवस्था के सद्गुण के तौर पर नहीं गिना जाएगा। इस सिलसिले में श्रम ब्यूरो की रिपोर्ट का जिक्र जरूरी है। रिपोर्ट से सर्वाधिक काम देने वाले आठ सेक्टर- कपड़ा, हैंडलूम-पॉवरलूम, चमड़ा, आॅटो, रत्न-आभूषण, परिवहन, आइटी-बीपीओ, और धातु के मौजूदा हालात का जिक्र है, जहां नई नौकरी न बराबर है।
रिपोर्ट के अनुसार इन आठ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सेक्टरों में जुलाई-सितंबर, 2015 की तिमाही में केवल 1.34 लाख नई नौकरी आई। मतलब यह कि प्रतिमाह पैंतालीस हजार से भी कम लोगों को काम मिला, जबकि आंकड़े गवाह हैं कि हिंदुस्तान के रोजगार बाजार में हर महीने दस लाख नए नौजवान उतर आते हैं। इसका अर्थ यह भी है कि हर माह लाखों बेरोजगारों की नई फौज खड़ी हो रही है, जो एक साल में एक करोड़ की दिल दहला देने वाली संख्या पार कर जाती है। ऐसे में अच्छे और टिकाऊ रोजगार की बात करना मुंगेरीलाल के हसीन सपने देखने जैसा है। कुल मिलाकर रोजगार मोर्चे पर हालत बहुत बुरी है। स्थिति एक अनार, सौ बीमार जैसी है। तभी सरकारी विभाग में चपरासी के चंद पदों के लिए लाखों आवेदन आते हैं, और अर्जी देने वालों में हजारों इंजीनियरिंग, एमबीए, एमए, पीएचडी डिग्रीधारी होते हैं।
पिछले तीन साल से खाद्य सुरक्षा कानून लागू है, फिर भी हंगर इंडेक्स में हम फिसड्डी हैं। मनमोहन सिंह सरकार ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना लागू की थी, जिसका उद््देश्य भी भूख और गरीबी से लड़ना है। लगता है जन-कल्याण से जुड़े ये दोनों कार्यक्रम अपेक्षित परिणाम देने में विफल रहे हैं।
एक बात और है जो चौंकाती है। अर्थव्यवस्था के आंकड़े देख कर अनुमान लगाना कठिन है कि देश किस दिशा में जा रहा है। आज सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) सात फीसद से ऊपर है, जिससे लगता है कि अर्थव्यवस्था मजबूत है। दूसरी ओर औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आइआइपी) है जो लगातार दो माह से कमजोर चल रहा है। इसी प्रकार थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआइ) और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआइ) का अंतर है। पहले को देख कर लगता है कि महंगाई कम हो रही है, जबकि दूसरा संकेत देता है कि बढ़ रही है। सितंबर 2015 में तो इन दोनों में करीब नौ फीसद का अंतर था। तब थोक सूचकांक -4.4 था, जबकि उपभोक्ता सूचकांक +4.4 था। इतना ज्यादा अंतर देख आम आदमी को कैसे पता चलेगा कि महंगाई बढ़ रही है या घट रही है। हां, जब कोई अंतरराष्ट्रीय एजेंसी कहती है कि देश में करोड़ों लोग भूखे हैं तब सरकार के पास चुप्पी साधने के अलावा कोई चारा नहीं होता।

राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर सोचें | अनूप भटनागर


यह कैसी विडम्बना है कि भारत जैसे धर्म निरपेक्ष देश के संविधान में मृतप्राय अनुच्छेद 44 के संदर्भ में विधि आयोग द्वारा नागरिक संहिता के बारे में समाज के विभिन्न वर्गों से सुझाव मांगे जाने के साथ ही देश की राजनीति में उबाल आ गया है। कांग्रेस और जनता दल (यू) जैसे सरीखे कई राजनीतिक दल इसके औचित्य पर सवाल उठाने में संकोच नहीं कर रहे हैं। दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सहित कुछ संगठनों ने इस विषय पर आसमान सिर पर उठा लिया है। समान नागरिक संहिता के सवाल पर कांग्रेस और कुछ अन्य राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया ने 1985 में बहुचर्चित शाहबानो प्रकरण में उच्चतम न्यायालय के फैसले को बदलने की तत्कालीन केन्द्र सरकार की कवायद की याद ताजा कर दी है।
संभवत: पहली बार उच्चतम न्यायालय ने इस विषय पर कोई सुझाव दिया था। अप्रैल 1985 में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश वाई. वी. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने तलाक और गुजारा भत्ता जैसे मुद्दों के परिप्रेक्ष्य में देश में समान नागरिक संहिता बनाने का सुझाव दिया था। संविधान पीठ की राय थी कि समान नागरिक संहिता देश में राष्ट्रीय एकता को बढावा देने में मददगार होगी।
इस फैसले के तुरंत बाद तत्कालीन सत्तारूढ़ दल ने आरिफ मोहम्मद खां सरीखे पढ़े-लिखे नेताओं का पहले भरपूर उपयोग किया और बाद में मुस्लिम समाज के कुछ वर्गों और संगठनों के दबाव में इस फैसले को बदलते हुए एक नया कानून ही बना दिया। समान नागरिक संहिता के बारे में विधि आयोग द्वारा मांगे गये सुझावों का विरोध करते हुए मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कुछ अन्य संगठनों ने इसका बहिष्कार करने का निश्चय किया है जबकि मुस्लिम महिला संगठनों का तर्क है कि हमें इस प्रक्रिया से तैयार होने वाले दस्तावेज का प्रारूप देखने के बाद ही कोई प्रतिक्रिया देनी चाहिए। संविधान का अनुच्छेद 44 कहता है कि शासन भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में नागरिकों के लिये एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा।
शाहबानो प्रकरण के बाद भी देश की शीर्ष अदालत ने इस बारे में सुझाव दिये क्योंकि वह महसूस कर रही थी कि समान नागरिक संहिता के अभाव में हिन्दू विवाह कानून के तहत विवाहित पुरुषों द्वारा पहली पत्नी को तलाक दिये बगैर ही धर्म परिवर्तन करके दूसरी शादी करने की घटनायें बढ़ रही थीं।
न्यायालय ने धर्म का दुरुपयोग रोकने के इरादे से धर्म परिवर्तन कानून बनाने की संभावना तलाशने और ऐसे कानून में यह प्रावधान करने का सुझाव दिया था कि यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन करता है तो वह अपनी पहली पत्नी को विधिवत तलाक दिये बगैर दूसरी शादी नहीं कर सकेगा और यह प्रावधान प्रत्येक नागरिक पर लागू होना चाहिए। ऐसे अनेक मामलों और महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव को ध्यान में रखते हुए ही विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता के बारे में 16 बिन्दुओं पर सुझाव आमंत्रित करने का निश्चय किया।
आयोग जानना चाहता है कि क्या समान नागरिक संहिता के दायरे में विवाह, विवाह विच्छेद, दत्तक ग्रहण, भरण पोषण, उत्तराधिकार और विरासत जैसे विषयों को भी लाया जाना चाहिए। आयोग यह भी जानना चाहता है कि क्या बहुविवाह और बहुपति प्रथा पर पाबंदी लगायी जानी चाहिए या उसे विनियत करना चाहिए? आयोग ने विभिन्न संप्रदायों के पर्सनल कानूनों को संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों के अनुरूप बनाने के लिये उन्हें संहिताबद्ध करने के बारे में भी नागरिकों की राय मांगी है।
आयोग ने मैत्री करार जैसी रूढ़िवादी प्रथाओं पर पाबंदी लगाने या इसमें संशोधन करने, ईसाई समुदाय में विवाह विच्छेद को अंतिम रूप देने के लिये दो साल की प्रतीक्षा के प्रावधान और विवाहों का पंजीकरण अनिवार्य बनाने और अंतर-धार्मिक तथा अंतर-जातीय विवाह करने वाले दंपतियों को सुरक्षा प्रदान करने के उपायों पर भी सुझाव मांगे हैं।
पारसी विवाह एवं तलाक कानून, 1936 की धारा 32-बी के तहत परस्पर सहमति से तलाक लेने के लिये पति-पत्नी को कम से कम एक साल अलग रहना होता है। ईसाई समुदाय से संबंधित तलाक कानून, 1869 की धारा 10-क (1) के तहत कम से कम दो साल अलग रहने का प्रावधान है। इस मामले में यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि विशेष विवाह कानून के तहत शादी करने वाले जोड़े यदि विवाह विच्छेद करना चाहते हैं तो उन्हें इसी कानून के प्रावधानों के अनुरूप आवेदन करना होगा।
उच्चतम न्यायालय की नजर में भले ही समान नागरिक संहिता देश की एकता को बढ़ावा देने वाली हो लेकिन इस बारे में विधि आयोग की पहल ने राजनीतिक दलों को दो खेमों में बांट दिया है। कुछ दल इसका विरोध कर रहे हैं तो दूसरी ओर भाजपा और शिव सेना इसके पक्ष में हैं।

मुक्तव्यापार समझौते का मुखर विरोध

अंतर प्रशांत साझेदारी समझौता (ट्रांस पेसिफिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट या टी पी पी ए) पर इसी वर्ष फरवरी में 12 देशों ने हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते पर पहुंचने में पांच वर्ष का समय लगा था। साथ ही यह उम्मीद थी कि प्रत्येक देश द्वारा स्वीकृति प्रदान किए जाने के दो वर्ष के भीतर यह लागू हो जाएगा। परंतु अब इस विवादास्पद समझौते पर संकट के बादल छा गए हैं। त्रासदी यह है कि अमेरिका जिसने इस समझौते की प्रक्रिया प्रारंभ की थी वही इसे समाप्त करने पर तुला हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति  चुनाव में टी पी पी ए सर्वाधिक प्रमुखता वाला मुद्दा बन गया है। वैसे डोनाल्ड ट्रम्प के चुनाव अभियान का केंद्र बिंदु टी पी पी ए का विरोध ही है। पूर्व उम्मीदवार बर्नी सेंडर्स, जो कि टी पी पी ए विरोध के अगुआ हैं, का कहना है, ‘‘हमें टी पी पी पर पुन: बातचीत नहीं करना चाहिए। इस उन्मुक्त, मुक्त व्यापार समझौते (एफ टी ए) को नष्ट कर देना चाहिए क्योंकि इससे हमारे यहां के पांच लाख रोजगार नष्ट हो जाएंगे। हिलेरी क्ंिलटन भी अपने विदेशमंत्री पद के दौरान के अभिमत के विपरीत जाकर अब टी पी पी ए के खिलाफ  हो गई हैं। परंतु उनके इस हृदय परिवर्तन को लेकर संदेह किया जा रहा है कि राष्ट्रपति बनते ही वह अपना रुख पुन: बदल लेंगी। परंतु क्ंिलटन का कहना है,’’ मैं टी पी पी ए खिलाफ  हूं। इसका अर्थ है चुनाव के पहले भी और बाद में भी।’’
इस बात की पूरी संभावना है कि दोनों उम्मीदवार इस प्रचलित धारणा को लेकर चिंतित हो रहे हैं, जिसके अनुसार मुक्त व्यापार समझौतों से लाखों रोजगार समाप्त होते हैं, मजदूरी में ठहराव आता है और अमेरिका समाज में लाभों  का अनुचित वितरण होता है। राष्ट्रपति पद के इन दो उम्मीदवारों के अलावा दो अन्य खिलाड़ी और भी हैं जो कि टी पी पी ए की निर्यात के बारे में तय करेंगे। यह हैं राष्ट्रपति बराक ओबामा और अमेरिकी कांग्रेस। ओबामा टी पी पी ए के मुख्य पैरोकार रहे हैं। उन्होंने अत्यन्त उत्कटता से यह कहते हुए इसके पक्ष में तर्क दिए हैं कि इससे आर्थिक लाभ होंगे,पर्यावरण एवं श्रम मानकों में सुधार होगा और एशियाई भौगोलिक राजनीति में अमेरिका चीन से आगे निकल जाएगा। लेकिन अभी तक उन्हें सफलता नहीं मिली है। यह आवश्यक है कि अपना कार्यकाल खत्म होने से पहले ओबामा से 8 नवंबर से होने वाले कांग्रेस की सुस्ती भरी कांग्रेस में और जनवरी 2017 के मध्य तक इसे अवश्य ही पारित करवा लें। वैसे अभी तक यह अस्पष्ट है कि इस मरे-मराए से टी पी पी विधेयक को अगर सदन के पटल पर रखा जाता है तो इसे पारित करवाने जितना सहयोग उन्हें मिल भी पाएगा कि नहीं। पिछले वर्ष इससे संबंधित एक फास्टट्रेक व्यापार अधिकारिता विधेयक बहुत कम बहुमत से पारित हो पाया था। अब जबकि यह ठोस टी पी पी ए सदन के सामने आने वाला है तो कई सदस्यों के मत में परिवर्तन आ रहा है। ऐसे कुछ सांसद जिन्होंने फास्टट्रेक विधेयक के पक्ष में मत दिया था उन्होंने संकेत दिया है कि वे टी पी पी ए के पक्ष में मतदान नहीं करेंगे।
अधिकांश ड्रेमोक्रेट सांसदों ने संकेत दिया है कि वे टी पी पी ए के खिलाफ  हैं इसमें क्ंिलटन के साथ उपराष्ट्रपति चुनाव लड़ रहे सीनेटर टिम कैनी भी शामिल है, जिन्होंने फास्ट ट्रेक के पक्ष में मत दिया था। कार्यकारी समिति के सदस्य सेन्डी लेविन का कहना है, अब यह स्पष्ट होता जा रहा है कि सदन में इस वर्ष टी पी पी ए को मत नहीं मिलेंगे। यदि प्रस्तावित ढीले-ढाले सत्र में इसे प्रस्तुत कर भी दिया जाता है तो यह गिर जाएगा। सदन के रिपब्लिकन नेताओं ने भी अपना विरोध जताया है। सीनेट में बहुमत के नेता मिच मॅक्कोमेल का कहना है राष्ट्रपति पद के अभियान ने एक ऐसा राजनीतिक वातावरण बना दिया है कि इस सत्र में टी पी पी को पारित कराना वस्तुत: असंभव हो गया है। सदन के स्पीकर और रिपब्लिकन नेता पॉल डी रियान, जिन्होंने फास्ट ट्रेक विधेयक तैयार करने में मदद की थी, का कहना है कि इस बात का कोई कारण नजर नहीं आता कि इस सुस्ती भरे सत्र में टी पी पी को मतदान के लिए प्रस्तुत किया जाए, क्योंकि हमारे पास इसे पारित जितने लिए मत नहीं हैं। इस बीच सदन में छ: रिपब्लिकन सीनेटरों ने अगस्त के प्रारंभ में ओबामा को पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि इस सत्र में वह  टी पी पी विधेयक लाने का प्रयास न करें।
हालांकि ओबामा के लिए तस्वीर धुंधली नजर आ रही है, परंतु उन्हें कमतर नहीं समझना चाहिए। उन्होंने कहा है कि चुनाव सम्पन्न हो जाने के बाद वह कांग्रेस को टी पी पी के पक्ष में मतदान करने के लिए मनवा लेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि बहुत से लोग सोचते थे कि वे सदन से फास्ट ट्रेक विधेयक पारित नहीं करवा पाएंगे, परंतु वे गलत साबित हुए। कांग्रेस को अपने पक्ष में लेने के लिए ओबामा को दक्षिण व वाम दोनों पक्षों को भरोसा में लेना पड़ेगा जो कि टी पी पी ए में कुछ विशिष्ट मुद्दों जैसे जैविक औषधियों पर एकाधिकार तथा आई एस डी एस (निवेशक-राष्ट्र विवाद निपटारा) को शामिल करवाना चाहते हैं। उन्हें संतुष्ट करने के लिए ओबामा को उन्हें भरोसा दिलवाना होगा जो वह चाहते हैं उसे किसी न किसी तरह से प्राप्त किया जा सकता है, भले ही वह टी पी पी ए का वैधानिक हिस्सा न भी हो। वह इसे द्विपक्षीय समझौतों के माध्यम से पाने का प्रयास करेंगे या इस बात पर जोर देंगे कि कुछ देश टी पी पी ए के प्रावधानों से इतर जाकर कर कुछ अतिरिक्त करें। वैसे भी टी पी पी ए के दायित्वों को पूरा कर पाने के लिए अमेरिका का प्रमाणन एक जरुरी शर्त है। कांग्रेस को खुश करने के लिए ओबामा टी पी पी ए की कुछ विशिष्ट धाराओं पर सैद्धान्तिक रूप से पुन: बातचीत भी कर सकते है। लेकिन अन्य टी पी पी देशों को यह विकल्प अस्वीकार्य हो सकता है।
इसी वर्ष जून में मलेशिया ने टी पी पी ए की किसी भी धारणा पर पुन: समझौते से इंकार कर दिया था। तत्कालीन अंतर्राष्ट्रीय व्यापार एवं उद्योग मंत्रालय की महासचिव डॉ. रेबेका फातिमा स्टामारिया का कहना है-  अमेरिकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों ने भले ही इस तरह के संकेत दिए हों लेकिन टी पी पी ए पर पुन: वार्ता का प्रश्न ही नहीं उठता। सिंगापुर के प्रधानमंत्री ली ह्सिन लूंग ने अपनी हालिया वाशिंगटन यात्रा के दौरान टी पी पी ए के किसी भी हिस्से पर पुनर्विचार की संभावना को सिरे से नकारते हुए कहा कि भले ही कुछ सांसद ऐसा चाहते हों यह संभव नहीं है। जनवरी में कनाडा के व्यापार मंत्री क्रिस्टिया फ्रीलेंड ने कहा था  टी पी पी पर पुर्नवार्ता संभव नहीं है। जापान ने भी पुर्नवार्ता की संभावना को नकार दिया है। 12 देशों ने इसी वर्ष फरवरी में समझौते पर हस्तक्षर कर दिए हैं और इसे लागू करने के लिए दो वर्षों का समय दिया है। सैद्धांतिक तौर पर देखें तो यदि इस वर्ष टी पी पी लागू नहीं हो पाता है तो अमेरिकी राष्ट्रपति अगले वर्ष इसे संसद से पारित करवा सकते हैं। लेकिन ऐसा हो पाने की संभावना अत्यन्त क्षीण है। अतएव टी पी पी ए को इसी अलसाए सत्र में ही पारित करवाना होगा। अन्यथा यह हमेशा के लिए चर्चा से बाहर हो जाएगा। गौरतलब है कि नाटकीय ढंग से मुक्त व्यापार समझौतों के खिलाफ कम से कम उस अमेरिका में जनमत बना है। जिसने व्यापार मुक्त व्यापार समझौतों की शुरुआत की थी।        
(लेखक जेनेवा स्थित साउथ सेन्टर के कार्यकारी निदेशक हैं।) | http://www.deshbandhu.co.in/article/6188/10/330#.WC_dwvl97IW

फिर आंदोलन की राह पर असम | दिनकर कुमार

केंद्र सरकार ने हिंदू बांग्लादेशियों को भारत की नागरिकता देने का जो फैसला किया है, उसके विरोध में असम के छात्र और नागरिक संगठन सड़क पर उतर कर विरोध जता रहे हैं और इस फैसले को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। पिछले साल आठ सितंबर को मोदी सरकार ने एक अध्यादेश जारी कर अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से भारत आने वाले हिंदुओं, सिखों, ईसाइयों, जैनियों, पारसियों और बौद्धों को भारतीय नागरिकता देने का फैसला किया। इसके लिए पासपोर्ट अधिनियम-1920, विदेशी अधिनियम-1946 और विदेशी आर्डर-1948 को संशोधित करने की बात कही गई। इस अध्यादेश के जरिए बताया गया कि जो धार्मिक अल्पसंख्यक पासपोर्ट या अन्य यात्रा दस्तावेज के बगैर भारत आते हैं या जिनके पासपोर्ट और यात्रा दस्तावेज की मियाद खत्म हो चुकी है, उनको भारतीय नागरिक के रूप में स्वीकार किया जाएगा। यह अध्यादेश जहां संविधान के अनुच्छेद 14,15,19,21 और 29 का उल्लंघन बताया जा रहा है वहीं 1985 के असम समझौते का भी। इस अध्यादेश को चुनौती देते हुए असम सम्मिलित महा संघ, अखिल असम आहोम सभा, असम आंदोलनर शहीद निर्जाजित परियाल व असम के आठ गणमान्य व्यक्तियों ने उच्चतम न्यायालय में चार जनहित याचिकाएं दायर कीं। इस मामले को विचार करने के लिए संवैधानिक पीठ के पास भेजा गया।
असम समझौते में प्रावधान किया गया था कि 25 मार्च 1971 के बाद असम में आए किसी भी धर्म के विदेशी को रहने का अधिकार नहीं होगा। असम के जन संगठन इसी बात पर खफा हैं कि असम समझौते के प्रावधान से परिचित होने के बावजूद मोदी सरकार ने लोकसभा में नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016 पेश कर दिया। इस विधेयक को कानून का दर्जा देकर मोदी सरकार बांग्लादेशी हिंदुओं को असम में बसाना चाहती है। असम के लोग आशंकित हैं कि ऐसा होने पर वे अपने ही राज्य में अल्पसंख्यक बन कर जीने के लिए मजबूर हो जाएंगे। उनकी भाषा-संस्कृति खतरे में पड़ जाएगी। एक अनुमान के मुताबिक ऐसे हिंदू बांग्लादेशियों की तादाद बीस लाख है। वर्ष 1971 से पहले आकर असम में बसे बांग्लादेशी हिंदुओं की तादाद के साथ जब बीस लाख की तादाद और जुड़ जाएगी तो भाषाई तौर पर बांग्लाभाषी हिंदू असम में बहुसंख्यक बन जाएंगे।
असम के मूल को भय सता रहा है कि जिस तरह त्रिपुरा के मूल निवासी अपने ही राज्य में अल्पसंख्यक बन कर जीने के लिए विवश हो गए, उसी तरह वे भी अपने ही राज्य में अल्पसंख्यक बन सकते हैं। फिर असमिया भाषा का सरकारी भाषा होने और शिक्षा का माध्यम होने का दर्जा खत्म हो सकता है और राज्य की जनजातियों की भाषा-संस्कृति नष्ट हो सकती है। भाजपा ने विधानसभा चुनाव से पहले राज्य के लोगों से वादा किया था कि अगर वह सत्ता में आएगी तो असम समझौते की धारा 6 के तहत किए गए प्रावधान को लागू करेगी और असम के लोगों के संवैधानिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगी। असम के लोगों को लग रहा है कि सत्ता में आने के बाद भारतीय जनता पार्टी अब उनके साथ विश्वासघात करने पर उतारू हो गई है ।
असम के मूल निवासियों के हितों को नजरअंदाज करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने नागरिकता कानून में संशोधन संबंधी अध्यादेश को कानूनी मान्यता दिलवाने के लिए विधेयक लोकसभा में पेश कर दिया। जैसे ही यह विधेयक संसद में पारित हो जाएगा- पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले सभी गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता मिल जाएगी। भले ही इस कानून का कोई विपरीत प्रभाव देश के दूसरे राज्यों पर नहीं पड़ेगा, लेकिन इस कानून की वजह से असम की जनसंख्या का ताना-बाना बिखर कर रह जाएगा। अब तक असम की भारतीय जनता पार्टी की अगुआई वाली राज्य सरकार ने इस विधेयक का विरोध करने की जगह समर्थन करने का ही संकेत दिया है। इस तरह राज्य की सरकार पर अपने ही लोगों की आशाओं -आकांक्षाओं के खिलाफ रुख अपनाने का आरोप लग रहा है।
संसद में कुछ विपक्षी सांसदों ने जब इस विधेयक का कड़ा विरोध किया तो सरकार ने इस विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति के पास विचार करने के लिए भेज दिया। इस समिति के अध्यक्ष डॉ सत्यपाल सिंह हैं। समिति में बीस सांसद लोकसभा के और दस सांसद राज्यसभा के हैं। समिति में असम के भाजपा के दो और कांग्रेस के एक सांसद को जगह दी गई है। असम के दोनों भाजपा सांसदों ने विधेयक का समर्थन किया है, जबकि राज्य से कांग्रस के अकेले सांसद ने कहा है कि संयुक्त संसदीय समिति को असम में अलग से एक बैठक आयोजित कर विभिन्न जन संगठनों, राजनीतिक दलों,बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और गण्यमान्य व्यक्तियों की राय लेनी चाहिए, जो लगातार इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं।
असम के लोगों का तर्क है कि पहले से ही राज्य में सत्तर लाख बांग्लादेशी बसे हुए हैं और नए सिरे से असम बांग्लादेशियों का बोझ उठाने की स्थिति में नहीं है। उनका कहना है कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हिंदू बांग्लादेशियों से इतना ही ज्यादा लगाव है तो उनको अपने गृहराज्य गुजरात में बसाने की व्यवस्था करें। असम पर नाहक यह बोझ क्यों डालना चाहते हैं!मीडिया रिपोर्टों से पता चलता है कि इस विधेयक को पारित करवाने में मोदी सरकार को कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ रहा है। इसे पारित करने का अर्थ असम समझौते का उल्लंघन करना होगा। इसके अलावा उच्चतम न्यायालय के कई फैसलों की मूल भावना का भी उल्लंघन होगा। बीते तीन अक्तूबर को संयुक्त संसदीय समिति की बैठक हुई, जिसमें दो संवैधानिक मामलों के जानकारों- टी के विश्वनाथन और सुभाष कश्यप- की राय ली गई। जानकारों ने समिति के सामने तीन बिंदु रखे। एक, इससे असम समझौते का उल्लंघन होगा। दो, विधेयक को ढीले-ढाले अंदाज में तैयार किया गया है और अगर यह पारित होता है तो इसे असम समझौते में संशोधन समझा जाएगा। तीन, अगर यह विधेयक पारित होता है तो इससे उच्चतम न्यायालय के विभिन्न फैसलों का उल्लंघन होगा, जिनमें कहा जा चुका है कि संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 25 के अनुसार धर्म के आधार पर किसी व्यक्ति को नागरिकता नहीं दी जा सकती। इस तरह विधेयक को अगर पारित किया गया तो यह चुनौती दिए जाने पर न्यायिक समीक्षा में नहीं टिक पाएगा और हो सकता है उच्चतम न्यायालय इसे निरस्त कर दे।
बीते तेरह अक्तूबर को संयुक्त संसदीय समिति की तीसरे स्तर की सुनवाई दिल्ली में हुई। इसमें देश के सत्ताईस संगठनों को अपना पक्ष रखने के लिए आमंत्रित किया गया। इनमें असम से भी पांच संगठनों को बुलाया गया, जो मूल असमिया लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन नहीं हैं, बल्कि हिंदू बांग्लादेशियों के प्रतिनिधि संगठन हैं। स्वाभाविक रूप से इन संगठनों ने हिंदू बांग्लादेशियों को भारत की नागरिकता देने का ही समर्थन किया। माना जा रहा है कि अखिल असम छात्र संघ, कृषक मुक्ति संग्राम समिति, असम जातीयतावादी युवक छात्र परिषद आदि संगठनों को सुनवाई में न बुला कर समिति ने महज खानापूर्ति करने की कोशिश की है और असम के मूल निवासियों की शिकायत को समझने में तनिक रुचि नहीं ली है। संसद का शीतकालीन सत्र कब शुरू होगा इसकी घोषणा हो चुकी है। शीतकालीन सत्र शुरू होने से पहले संयुक्त संसदीय समिति अपनी रिपोर्ट पेश करेगी और उसी सत्र में सरकार इस विधेयक को पारित कराने की कोशिश करेगी।
असम के जन संगठनों का आरोप है कि बीस लाख हिंदू बांग्लादेशियों को असम में बसा कर भारतीय जनता पार्टी अपना वोट बैंक और पुख्ता करना चाहती है। विडंबना यह है कि यह उस पार्टी का रुख है जो हमेशा वोट बैंक की राजनीति को कोसती आई है और इसका दोष दूसरे राजनीतिक दलों पर मढ़ती रही है। भारतीय जनता पार्टी इन बांग्लादेशियों को बराक घाटी और निचले असम के कुछ खास विधानसभा क्षेत्रों में बसाने की योजना बना चुकी है। भाजपा को उम्मीद है कि भारत की नागरिकता मिल जाने पर हिंदू बांग्लादेशी उसका अहसान मानेंगे और चुनाव में उसे ही वोट देंगे। असम की बराक घाटी और धुबुरी जिले में हिंदू बांग्लादेशियों की तादाद सबसे ज्यादा है। भाजपा उनको अलग-अलग जिलों में बसाने की तैयारी कर चुकी है। ऐसा करते हुए इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखा जाएगा कि प्रत्येक जिले में मतदाता के रूप में हिंदू बांग्लादेशी किस तरह निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
बराक घाटी के तीन जिले कछार, हैलाकांदी और करीमगंज के पंद्रह विधानसभा क्षेत्रों में से बारह विधानसभा क्षेत्रों में हिंदू बंगाली बहुसंख्यक हैं। फिर, ऐसे कई विधानसभा क्षेत्र हैं जहां पहले से ही हिंदू बंगाली मौजूद हैं। अगर उन क्षेत्रों में नए सिरे से हिंदू बांग्लादेशियों को बसा दिया जाएगा तो वे चुनाव में आसानी से निर्णायक भूमिका निभा पाएंगे। असम के जन संगठनों का आरोप है कि अब तक मुसलिम बांग्लादेशियों का इस्तेमाल कांग्रेस वोट बैंक के तौर पर करती रही थी; अब सत्ता में आने के बाद भारतीय जनता पार्टी भी कांग्रेस का अनुसरण करते हुए हिंदू बांग्लादेशियों का इस्तेमाल वोट बैंक के तौर पर करना चाहती है। स्वाभाविक रूप से आम लोगों में इस बात को लेकर आक्रोश बढ़ता जा रहा है और इसका इजहार भी हो रहा है।

क्या हो पुलिस सुधार की दिशा | विकास नारायण राय

दिल्ली हाइकोर्ट ने केंद्र सरकार को दिल्लीवासियों की सुरक्षा को लेकर चेताया है। दिल्ली पुलिस के लिए गृह मंत्रालय की स्वीकृति के बावजूद चौदह हजार अतिरिक्त भर्तियां नहीं हो सकीं और चार सौ पचास करोड़ रुपए के सीसीटीवी कैमरे लगाने के लिए धनराशि मुहैया नहीं कराई गई। हाइकोर्ट के सामने लंबित दिल्ली पुलिस, राज्य सरकार और केंद्र सरकार के शपथपत्रों के आलोक में पुलिस की क्षमता-वृद्धि और आधुनिकीकरण की इन जरूरतों का देर-सबेर पूरा किया जाना अनुमानित होगा ही। इस बीच महाराष्ट्र एटीएस के सामुदायिक रुझान का एक बिरला उदाहरण भी सामने आया- उन्होंने आइएस के प्रचार के प्रभाव में सीरिया जाने पर उतारू कई नौजवानों की काउंसलिंग कर उनकी घर वापसी कराई है। इसके बरक्स आतंकी मामलों में मुसलिम युवकों के झूठे चालान और असीमानंद की जमानत में मिलीभगत जैसे आरोप भी जांच एजेंसियों पर लगते रहे हैं, जिनका लाभ युवकों को बरगलाने वाले उठाते हैं। पुलिसिया कायदे जहां छोटे-मोटे अपराधी को शातिर बना देने की कुव्वत रखते हैं, व्यवस्था की अंधी चपेट की मार में आने वालों को असामाजिक रास्तों पर जाने का उकसावा तक सिद्ध होते रहे हैं। हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में दलित छात्र रोहित का आत्महत्या-प्रकरण छात्रों के दो संगठनों में तनाव से उपजा। इसकी जड़ में इनमें से एक संगठन (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) की दिल्ली विश्वविद्यालय में वह ताकत है जिसके चलते वहां ‘मुजफ्फरनगर बाकी है’ नामक सांप्रदायिकता-विरोधी फिल्म का प्रदर्शन नहीं हो सका था। एक लोकतांत्रिक डीएनए वाली पुलिस ने संविधान-प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इस सरासर अपमान को शिद्दत से लिया होता, न कि इस पर लीपापोती हुई होती। तब शायद हैदराबाद परिसर के उबलने की नौबत भी न आती। भारतीय लोकतंत्र में पुलिस की इस परिचालन-विसंगति को कैसे समझें, जो किताबों में लिखे कानून को गली-कूचों में ठोस न्याय की शक्ल नहीं लेने दे रही? एफआइआइटी और यूजीसी परिसरों में लाठीचार्ज का तांडव करने वाली एजेंसी मालदा में मूकदर्शक बनी रह जाती है! पेशेवर-अकादमिक तबकों से निकले विरोधी स्वरों पर दमन की गर्मी, जबकि घोर असामाजिक तत्त्वों की सांप्रदायिक आड़ में बलवे और आगजनी की खुली नुमाइश पर भी ठंड! गोया कि राजधानी के थानों से लेकर सुदूर माओवादी मैदान तक एक जैसे समीकरण का बोलबाला है- भारत का संविधान लोकतांत्रिक है; उसे देशवासियों के दैनिक जीवन में लागू करने वाले न्याय-व्यवस्था के उपकरण नहीं! दरअसल, पुलिस के सामाजिक उत्पाद, ‘कानून का शासन’ की आधारभूत लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर ही करते आए हैं। पुलिस को प्राय: अपराध-अपराधी, यातायात, बंदोबस्त या सुरक्षा और आतंक जैसे संदर्भों में देखने के आदी समाज में उसकी क्षमता को आंकड़ों में देखने-परखने का चलन है- उसके पेशेवर प्रतिफलों का सामाजिक उत्पाद के रूप में आकलन नहीं होता। इस घातक चूक से जुड़ा परिणाम है पुलिस की क्षमता-वृद्धि और आधुनिकीकरण की दौड़ में उसके लोकतंत्रीकरण के महत्त्वपूर्ण आयामों का पीछे छूट जाना। न तो पुलिसकर्मी, न पुलिस की पद्धतियां और न ही पुलिस के काम के सामाजिक उत्पाद- लोकतंत्र के मान्य पैमाने इनमें से किसी की भी अनिवार्य कसौटी नहीं बनाए जाते! पुलिस की आए दिन की कार्यप्रणाली में अवैधानिक विरोधाभास वैसे ही नहीं समाए हुए हैं- उसकी लोक-छवि का मानो एक लगभग अपरिवर्तनीय-सा (अ)समाजशास्त्र बन गया है- एफआइआइटी और यूजीसी जैसी सक्रियता मालदा की निष्क्रियता की भरपाई कर देती है! हरियाणा के राम रहीम एक धार्मिक दर्जा देकर उनके अनुयायियों की ‘धार्मिक’ भावनाओं को ठेस पहुंचाने के अपराध में टीवी कॉमेडियन कीकू शारदा को एक नहीं दो-दो बार आनन-फानन में गिरफ्तार कर लिया जाता है! जबकि हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में आत्महत्या करने पर विवश किए गए शोध छात्र को आतंकी और देशद्रोही बताने वाले केंद्रीय मंत्री और तदनुसार उसे छात्रावास से निष्कासित करने वाले कुलपति के विरुद्ध मुकदमा भी देशव्यापी आक्रोश के बाद ही दर्ज हो सका। इस मामले में किसी की गिरफ्तारी या सजा की तो दूर-दूर तक कोई बात ही नहीं- ऊपर से दिल्ली में पुलिस ने विरोध जताते छात्रों पर कड़कती ठंड में पानी की बौछार की और डंडे फटकारे। जाहिर है, ‘कानून का शासन’, पुलिस के सामाजिक उत्पाद के दायरे में एक तकनीकी अवधारणा भर रहा है, न कि लोकतांत्रिक शर्त। क्या हम सड़क पर खाकी वर्दी और सुरक्षात्मक कवच में लाठी भांजती पुलिस पर लदे हुए कानून के गुरुतर भार को समझते हैं? कमांडर ने किसी एक अचानक क्षण में नागरिकों के समूह पर लाठीचार्ज का फैसला लिया- तो यह उनके लिए लाठी कौशल का ही नहीं, लोकतंत्र की समझ का भी संवेदी इम्तहान बन जाना चाहिए। इसकी पालना में जब सिपाही लाठी चलाता है तो ज्यादातर उसके पास उत्तेजित अवस्था में संतुलित व्यवहार के लिए बमुश्किल चंद सेकेंड ही होते हैं। लाठी किस पर पड़नी है, कहां पड़नी है- पैर पर, हाथ पर, पीठ पर या कभी जब जान पर ही बन आए तो आत्मरक्षा में सिर पर? बड़े से बड़े मानवतावादी के लिए भी यह लोकतांत्रिक अनुकूलन की गहनतम परीक्षा का क्षण होगा। पर पुलिसकर्मी के लिए यह अपरिचित संवेदनाओं का क्षेत्र सिद्ध होता है क्योंकि उसका सारा अभ्यास लाठी भांजने के तकनीकी कौशल पर केंद्रित रहा है। यही नहीं, इन पुलिसकर्मियों में से अधिकतर या शायद सभी पूर्व ड्यूटी की थकान उतरे बगैर, और बिना वस्तुस्थिति की समुचित जानकारी के, मौके पर भेजे गए होते हैं, क्योंकि अकस्मात आई घड़ी में न इतनी बेशी नफरी ही उपलब्ध होती है और न उतना समय किसी के पास होता है, और जहां समय और नफरी दोनों हों भी, वहां भी पुलिस की कार्यपद्धति में सामयिक अनुकूलन का असर ही हावी मिलेगा, न कि संवैधानिक अनुकूलन का। दरअसल, पुलिस के प्रशिक्षण, संगठन और कार्य-संस्कृति में बस कौशलतंत्र की दक्षता रची-बसी होती है, जबकि लोकतंत्र का समीकरण सिरे से नदारद मिलेगा। पुलिसकर्मी को एक लोकाचारी कानूनदां के रूप में नहीं, अधिकारी व्यवस्था के उत्तरदायी एजेंट के रूप में देखा जाता है! उदाहरण के लिए, एफआइआइटी (पुणे) और यूजीसी (दिल्ली) पर धरना दे रहे छात्रों पर काबू पाने के लिए हुए पुलिस के लाठीचार्ज पर लौटें। दोनों ही जगहों पर केंद्र सरकार के निर्णयों के प्रति छात्रों के दीर्घकालिक विरोध के स्वर लोकतांत्रिक रहे हैं। एफआइआइटी में एक स्वर से छात्र एक ‘अपात्र’ को संस्था का अध्यक्ष नियुक्त किए जाने पर आंदोलनरत हुए, जबकि यूजीसी के विरुद्ध देश भर से शोधरत छात्र इसलिए लामबंद हुए क्योंकि मानव संसाधन विकास मंत्रालय के आदेश ने उन्हें अरसे से चले आ रहे वजीफों से वंचित कर दिया था। दोनों दृष्टांतों में पुलिस की लाठी कारगर भूमिका में रही, जबकि लोकतांत्रिक रणनीति नदारद मिली। लाठीचार्ज के इन प्रदर्शनों से ठीक उलट मामला है मालदा का, जहां अराजक तत्त्वों से भरी विशाल सांप्रदायिक भीड़ को घंटों बेखौफ हिंसक उपद्रव करने दिया गया, यहां तक कि इस दौरान पुलिस थाना तक उनका निशाना बना। उन्हें काबू करने में पुलिस निष्क्रिय बनी रही। उसके सैन्यीकरण और आधुनिकीकरण का इस्तेमाल नहीं हुआ। दरअसल, ऐसी स्थितियां भी पुलिस की पेशेवर प्रणाली में लोकतांत्रिक तत्परता के अभाव का ही नतीजा हैं। शासनतंत्र की नीतिगत बेरुखी के चलते मालदा प्रकरण का विश्लेषण भी राजनीतिक दोषारोपण के दायरे में रहा और इसमें निहित सामाजिक संदेश की अनदेखी हुई। एक रोडरोलर को स्कूटर की तरह नहीं चलाया जा सकता। भारत के संविधान का गठन बेशक लोकतंत्र के पक्ष में रोडरोलर सरीखा हो, पर उसे व्यावहारिक जीवन में खींचने वाले कानूनी इंजनों और पुलिसिया पहियों में स्कूटर का दम-खम भी नहीं। यह पेशेवर कौशल का ही नहीं, लोकतांत्रिक क्षमता का प्रश्न भी है। न्याय-व्यवस्था के कौशल-संपन्न उपकरणों में लोकतांत्रिक क्षमता भरने का! ऐसी क्षमता के अभाव में इन उपकरणों के हश्र की एक झलक अमेरिकी समाज के विकसित प्रयोगों में देखी जा सकती है जहां पुलिस की नागरिकों पर होने वाली हिंसा में वृद्धि एक अनवरत राष्ट्रीय बहस का रूप ले चुकी है। यह माना जा रहा है कि पुलिस को नई तरह से प्रशिक्षित किए जाने की जरूरत है। अलाबामा में फरवरी 2015 में अट्ठावन वर्षीय निहत्थे भारतीय नागरिक सुरेश भाई पटेल का मामला अमेरिका और भारत दोनों देशों में चर्चित रहा था। उनको अपने बेटे के अपार्टमेंट के पास टहलते हुए अमेरिकी पुलिसकर्मी पार्कर ने जमीन पर गिरा कर बेबस कर दिया, जिससे वे आंशिक रूप से लकवे का शिकार हो गए। अंग्रेजी न समझने वाले पटेल पर किसी अपराध का शक नहीं था और पुलिसकर्मी को बस इतना लगना काफी था कि वे उसके आदेश का पालन नहीं कर रहे हैं। अब अदालत ने भी पार्कर के कृत्य को अपराध न मानते हुए उसे बरी कर दिया है। कई पुलिसकर्मियों ने इस मुकदमे में गवाही दी कि इस तरह पटेल को जमीन पर गिराना राज्य की नीति के अंतर्गत पुलिसकर्मी के प्रशिक्षण के अनुरूप था। पुलिस के आदेशों की अवमानना में हिंसा के मामलों में जो कानूनी स्थिति अमेरिका में है,कमोबेश वही भारत में भी। इन कृत्यों को जान-बूझ कर किया गया अपराध सिद्ध करना लगभग असंभव हो जाता है, चाहे पीड़ित कितना भी शांतिपूर्ण या बेदाग क्यों न हो। लेकिन इससे समाज में अपनी ही पुलिस और न्याय-व्यवस्था के प्रति अविश्वास और आक्रोश पैदा होता है। इसी तरह दंगे-फसाद में पुलिस की निष्क्रियता समाज में असुरक्षा और खौफ की आवृत्ति का निमंत्रण जैसा है। न्याय के नजरिए से दोनों तरह का सामाजिक उत्पाद पूर्णतया अमान्य होना चाहिए। इसके लिए पुलिस-प्रशिक्षण और व्यवहार में हिंसा के अनिवार्य इस्तेमाल को संविधान की अवमानना से नत्थी करने की जरूरत है। - See more at: http://www.jansatta.com/politics/way-of-police-reforms-delhi-high-court-centre-govt/64117/#sthash.eBIOI2sG.dpuf

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