Friday, November 18, 2016

पुलिस की जवाबदेही | विकास नारायण राय

अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में प्रेसिडेंशिअल बहस के तीनों दौर में हिलेरी क्लिंटन और डोनाल्ड ट्रम्प ने पुलिस की सामाजिक जवाबदेही और सुप्रीम कोर्ट के जजों की सामाजिक प्रतिबद्धता पर टिप्पणी की। भारत के चुनावों में कुछ हद तक कानून-व्यवस्था को लेकर तो मुद््दा बनता है, पर कानून लागू करने के प्रति जिम्मेदार कर्मियों के सामाजिक और संवैधानिक सरोकार का मुद््दा कभी नहीं रहता। अमेरिकी समाज में वहां की पुलिस पर नस्ली भेदभाव के आरोप लगातार चर्चा में रहे हैं। जहां गोरी श्रेष्ठता के पक्षधर अमेरिकियों के चहेते ट्रम्प ने इन्हें सिरे से नकार दिया, वहीं हिलेरी ने माना कि अमेरिकी समाज में व्याप्त नस्ली पूर्वग्रह पुलिस वालों के व्यवहार में भी प्रतिबिंबित होता है और इसे समुचित प्रशिक्षण से दूर किया जाना चाहिए। भारतीय पुलिस पर भी जब-तब जातीय, सांप्रदायिक और वर्गीय पूर्वग्रहों के आरोप न सिर्फ लगते रहे हैं बल्कि अनेक जांच व शोध-रिपोर्टों में ये आरोप सही भी पाए गए हैं। कम बदनाम नहीं रही है, पुलिस की अपने राजनीतिक आकाओं के इशारे पर विरोधियों को प्रताड़ित करने और अपराध को प्रश्रय देने की छवि। राजनीतिक आकाओं के दिमाग में पुलिस की जवाबदेही की कमोबेश ऐसी ही तस्वीर मिलेगी। पुलिस ने भी इस स्थिति से संतुलन बिठा लिया है।
देश में चल रही समान नागरिक संहिता की तीखी बहस में कम लोगों के ध्यान में होगा कि एक सौ अस्सी वर्ष पूर्व मैकाले कमेटी ने 14 अक्टूबर 1837 को तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड आॅकलैंड के सामने भारतीय दंड संहिता का छपा मसविदा पेश किया था, जिससे भारत में कॉमन क्रिमिनल कोड लागू करने का आधार तैयार हुआ। भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन आने तक आपराधिक कानून भी धार्मिक कानूनों की प्रतिच्छाया ही होते थे। कंपनी ने अपने अधिकार क्षेत्र, बंगाल, बॉम्बे और मद्रास प्रेसीडेंसी के लिए क्रमश: अलग-अलग रेगुलेशन जारी किए थे, पर तो भी बॉम्बे प्रेसीडेंसी के लिखित कोड को छोड़ कर शेष स्थानों पर व्यवहार में इनका चलन पहले से चल रहे मुसलिम कानूनों से ही नत्थी रहा। अंग्रेजों को अंतत: भारतीय दंड संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम- कॉमन क्रिमिनल कोड के तीन स्तंभ, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के तुरंत बाद के तीन-चार वर्षों में लागू करने पड़े। कॉमन क्रिमिनल कोड, ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की एकीकृत प्रशासनिक मशीनरी के सफलतम औजारों में एक सिद्ध हुआ।
मैकाले ने दंड संहिता का मसविदा प्रस्तुत करते समय आमुख रिपोर्ट में दो महत्त्वपूर्ण चेतावनियां दी थीं। एक- जब तक व्यक्ति के अधिकार और सरकारी-कर्मी की शक्तियां अनिश्चित बनी रहेंगी, यह हमेशा तय नहीं हो पाएगा कि उन अधिकारों का हनन हुआ है या उन शक्तियों का दुरुपयोग। दो- विधायिका को कानून ऐसे बनाने चाहिए जो सटीक हों और आमजन के लिए ग्राह्य हों, यानी लिखित कानून से वही ध्वनित हो जो कानून बनाने वालों की मंशा है और जिन पर यह आयद होना है वे इसे आसानी से समझ सकें। मैकाले का तर्क था कि सटीक न होने से कानून बनाने का काम अदालतें हथिया लेती हैं और आसान न होने से लोगों की मुश्किलें बढ़ती हैं।  हालांकि मैकाले का प्रस्तावित ड्राफ्ट भी इन मानदंडों पर खरा नहीं उतर सकता था- उसे तो औपनिवेशिक प्रशासन की आवश्यकताओं पर खरा उतरना था। लेकिन आज तक भी स्थिति वही क्यों बनी हुई है? मोदी सरकार ने अनावश्यक कानूनों को खारिज करने और विशेषकर टैक्स कानूनों के सरलीकरण को मुद््दा जरूर बनाया है, (हालांकि इस दिशा में भी रफ्तार बेहद सुस्त है) जबकि आपराधिक कानूनों के इस्तेमाल में पुलिस और अदालती मनमानी से आम जनता का रोजाना वास्ता पड़ता है। लिहाजा, आपराधिक न्याय के क्षेत्र में भी ऐसी पहल की तुरंत आवश्यकता है।
अंग्रेजों के जमाने से ही कानून और न्याय के बीच की खाई व्यापक रही है। आम आदमी के लिए कानून वह नहीं होता जो किताबों में लिखा है या अदालती निर्णयों में बंद है। उनके लिए कानून वह है जो सड़कों पर और थानों में पुलिस द्वारा लागू किया जाता है। दुर्भाग्य से आज भी पुलिस की कार्यप्रणाली कानूनी मानदंडों और नागरिकों के प्रति उदासीन रह कर चलाई जा रही है। पुलिस की ट्रेनिंग आज भी उसे अंगरेजी शासन की तर्ज पर रेजिमेंटेशन के लिए तैयार करती है और पेशेवर जीवन उसे सत्ता-केंद्रों का पिछलग्गू बनने के लिए उकसाता है। लिहाजा, स्वतंत्र भारत में भी एक पुलिसकर्मी सामान्यत: संविधान और लोकतंत्र के प्रति सचेत न बन कर, सत्ता-अनुकूल आंकड़ों और शक्ति-केंद्रों के अनुकूल अनुशासन के प्रति उत्तरदायी होकर रह जाता है।
कानून को ‘सटीक’ बनाने में निहित है कि कानूनी प्रावधानों का कानून के घोषित लक्ष्य से मिलाप हो। यदि ऐसा होता तो दहेज, घरेलू हिंसा, भ्रूण हत्या जैसे कानूनों की व्यापक असफलता या राजद्रोह और धार्मिक वैमनस्य के कानूनों का मनमाना दुरुपयोग देखने को न मिलता। पोक्सो एक्ट (यानी प्रिवेंशन आॅफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ओफेंसेस एक्ट) में प्रिवेंशन यानी रोकथाम का एक भी प्रावधान नहीं है। यह कानून हरकत में ही तब आता है जब अपराध घट जाए, तो रोकथाम का उद््देश्य कैसे पूरा करेगा? आतंकवाद और सांप्रदायिक हिंसा जैसे जीवन-मरण के मसलों पर भी हमारा तंत्र एक सर्व-स्वीकृत कोड नहीं बना सका है। मैकाले ने एक आदर्श यह भी बघारा था कि जब तक कानूनी प्रक्रियाएं अबूझ और भटकाव वाली रहेंगी, कोई दंड संहिता स्पष्ट और सुनिश्चित हो ही नहीं सकती। यह मानदंड आज भी उसी तरह प्रश्नचिह्न बना हुआ है जैसे अंगरेजी राज में था। इसीलिए सामान्य मारपीट के मुकदमे कत्ल में तथा पीछा करने (स्टाकिंग) के मामले एसिड हमले में परिवर्तित हो जाते हैं और कानून-पुलिस-अदालत सब देखते रह जाते हैं।
दरअसल, लंबे समय से यह स्वीकार करने वालों की कमी नहीं कि पुलिस की जवाबदेही को राजनीतिक आकाओं, उच्च अधिकारियों और अदालतों के दायरे में सीमित करने से पुलिस सुधार नहीं लाया जा सकता। मीडिया और मानवाधिकार संगठनों के इस सुधार चक्र का हिस्सा बनने से भी नहीं। नागरिक और संविधान की उपेक्षा के वातावरण में सत्ताधारियों द्वारा अपनी राजनीति चमकाने में पुलिस का दुरुपयोग कोई छिपी बात नहीं रह गई है। दिल्ली पुलिस द्वारा ‘आप’ के चौदह विधायकों के विरुद्ध आपराधिक मुकदमे दर्ज हुए हैं और सभी मामलों में उनकी गिरफ्तारियां भी की गई हैं। इनमें से नौ में अदालतों ने दिल्ली पुलिस की मनमानी कार्रवाई पर विपरीत टिप्पणियां की हैं।
रेशनलिस्ट संपादकदिलीप मंडल के विरुद्ध लखनऊ में और हरियाणा के एकमात्र केंद्रीय विश्वविद्यालय के अध्यापकों के विरुद्ध रेवाड़ी में हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं भड़काने के मुकदमे हाल में दर्ज हुए हैं, जिनका कोई सिर-पैर नहीं बनता। दोनों मामलों में कोई आम धार्मिक हिंदू शिकायतकर्ता के रूप में सामने नहीं आया, मुकदमा दर्ज करने का दबाव एक संगठित समूह ने बनाया। जेएनयू ‘देशद्रोह’ प्रकरण में दिल्ली पुलिस ने कश्मीरी अलगाववादियों के पक्ष में नारे लगाने के आरोप में नामजद छात्रों को बिना जांच पूरी हुए गिरफ्तार करने में पूरी ताकत झोंक दी, लेकिन टेप को छेड़छाड़ कर प्रसारित करने और आम भावनाएं भड़काने वाले मीडियाकर्मियों को छुआ तक नहीं। अनुभव कहता है कि शासक कोई हो, इस तरह के मामले चलते ही रहते हैं। पुलिस की दैनिक कार्यशैली में यह व्यापक राजनीति-जनित दुरुपयोग इस कदर रच-बस गया है मानो वही पुलिस का मुख्य तौर-तरीका हो।
पुलिस का अपनी जवाबदेही को लेकर रवैया एक रूटीन उदाहरण से समझा जा सकता है। हाल में राजधानी से लगे फरीदाबाद के मुजेसर में एक फैक्ट्री के गेट से निकलते ट्रक ने सड़क किनारे के ढाबे में बैठे लोगों को टक्कर मार दी, जिससे दो लोगों की मौत हो गई। सामान्यत: ऐसे मामले में पुलिस को तय करना होता है कि यह घटना विशुद्ध दुर्घटना थी, या इसके पीछे ट्रक ड्राइवर की घोर लापरवाही थी। ड्राइवर के शराब के नशे में होने या बहुत तेज गाड़ी चलाने की दशा में मामला सदोष मानव वध का भी हो सकता था। लेकिन पुलिस द्वारा मामला अंतत: दर्ज किया गया साजिशन हत्या का, जिसमें ट्रक ड्राइवर के साथ हत्या की साजिश में फैक्ट्री मालिक को भी शामिल दिखाया गया।
‘साजिश’ और ‘हत्या’ पुलिस की छानबीन से निकले हुए तथ्य नहीं थे। हुआ यह कि मौतों से क्रोधित लोगों ने सड़क रोक दी और विपक्षी राजनीतिक दलों ने बहती गंगा में हाथ धोने के अंदाज में शोर मचाया। इससे पुलिस को उनके मुताबिक मामला बनाना ही श्रेयस्कर नजर आया। ट्रक ड्राइवर किसी को क्या दे सकता था, पर फैक्ट्री मालिक को शामिल करने में सभी को फायदा लगा होगा! पुलिस थानों में आए दिन ऐसे मुकदमे दर्ज होते हैं जिनका कानूनी सिर-पैर समझ से परे है। ऐसी गिरफ्तारियां होती हैं जो सरासर गैर-कानूनी हैं।
पुलिस सुधार पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आए दस वर्ष हो चुके हैं। कई राज्यों ने इसके अनुपालन में नए पुलिस अधिनियम भी बना लिए हैं। इसके बावजूद हम रोजाना पाते हैं कि कानून से बंधी पुलिस कितनी सहजता से एक गिरोह की तरह काम करने लगती है! उसकी ट्रेनिंग, अनुशासन और संवैधानिक शपथ उसका गलत बढ़ा हाथ पकड़ क्यों नहीं पाते? अनुसंधान, गिरफ्तारी, बल-प्रयोग और मानव अधिकार जैसे पक्षों पर सर्वोच्च न्यायालय के तमाम दिशा-निर्देश उसके मार्गदर्शक क्यों नहीं बन पाते हैं? सत्ताधारी कभी लोकतांत्रिक पुलिस की बात क्यों नहीं उठाते? अमेरिका की तरह पुलिसकर्मियों की संवैधानिक निर्मिति का मुद््दा हमारे चुनावों में कब उठेगा? सबसे बड़ी बात, जनता स्वयं कब आगे बढ़ कर लोकतांत्रिक पुलिस की मांग करेगी!
पुलिस की जवाबदेही

राजनीतिः नक्सल समस्या की जड़ें | संजीव पांडेय

एक बार फिर नक्सली हमले में पुलिस के कई जवान शहीद हो गए। औरंगाबाद-गया जिलों की सीमा पर सोनदाहा के जंगल में नक्सलियों ने आइइडी से विस्फोट कर दस जवानों की जान ले ली। पुलिस की जवाबी कार्रवाई में चार नक्सली भी मारे गए। हालांकि सरकार ने दावा किया कि हर जगह मात खा रहे नक्सलियों ने बौखलाहट में यह हमला किया। लेकिन जानकार बता रहे हैं कि नक्सलियों के जाल में पुलिस फंस गई थी। पुलिस में आपसी सहयोग की कमी थी और इस कारण नुकसान ज्यादा हो गया। हमले के बाद राजनीति भी तेज हो गई और बिहार सरकार को निशाने पर लिया गया। हालांकि समस्या की जड़ क्या है, इस पर कोई बात करने को राजी नहीं है। सच्चाई तो यही है कि गांवों में जमींदारों और भूमिपतियों के खिलाफ शुरू किए गए नक्सल आंदोलन की दशा और दिशा दोनों बदल गई है और इसमें अहम भूमिका कॉरपोरेट और राजनीतिक दलों की है। क्योंकि कई साल पहले ही गांवों में जमींदारों ने या नक्सलियों के सामने घुटने टेक दिए या गांव छोड़ कर भाग गए।
खबर आई है कि आईईडी विस्फोट नक्सलियों के बाल दस्ते ने किया है। नक्सलियों द्वारा बाल दस्ता तैयार किए जाने की खबरें काफी पहले से आ रही थीं। नक्सलियों द्वारा बाल दस्ते के गठन के कई कारण हैं। पहले तो, छोटे बच्चों पर पुलिस अमूमन शक नहीं करती। वहीं इलाके में भारी गरीबी के कारण कई जगहों पर नक्सली बच्चों के माता-पिता को बरगलाने में कामयाब हो जाते हैं। यही नहीं, नक्सली जोर-जबरदस्ती कर हर परिवार से बच्चों को बाल दस्ते में शामिल करने की कोशिश करते हैं। उनकी इन जोर-जबर्दस्ती से परेशान हो बिहार-झारखंड के नक्सल प्रभावित इलाकों के बहुत-से परिवार अपने बच्चों को छोटे शहरों में मजदूरी करने के लिए भेज चुके हैं। जीटी रोड पर बनारस के बाद ही बिहार और झारखंड तक बने लाइन होटलों में छोटे-छोटे बच्चे काम करते नजर आए। इनमें से ज्यादातर जीटी रोड के दोनों तरफ प्रभावित नक्सल इलाके के गांवों के बच्चे हैं जो नक्सलियों के डर से गांव छोड़ चुके हैं। इन बच्चों को मासिक मेहनताना महज पांच सौ से एक हजार रुपए मिलता है। यही नहीं, कई गरीब परिवार तो शहरों में अपने बच्चों को इस शर्त पर किसी परिवार के पास छोड़ने को राजी हैं कि दो वक्त का खाना भर दे दें। क्योंकि उन्हें अपने बच्चे की जान की फिक्र लगी है।
इसमें कोई शक नहीं कि नक्सली इस समय कैडर की कमी से जूझ रहे हैं। इसके कई कारण हैं। लेकिन यह भी सच्चाई है कि नक्सल प्रभावित इलाके में लोगों का शोषण आज भी जारी है। इस शोषण के लिए तमाम लोग जिम्मेवार हैं। इसी मजबूरी का फायदा उठा नक्सली बाल दस्ते तैयार कर रहे हैं। उनके भय से युवा अपना इलाका छोड़ महानगर की तरफ भाग रहे हैं। क्योंकि स्थानीय स्तर पर इन्हें रोजगार नहीं है। युवाओं को बड़े शहरों में आकर मजदूरी करना मजबूरी है। लेकिन बाल दस्ते के साथ-साथ नक्सलियों के महिला दस्ते ने भी नक्सल प्रभावित इलाके में एक नई समस्या पैदा की है। नक्सलियों के डर से बड़े पैमाने पर गांव-देहात के लोग अपने घरों की महिलाओं को शहरों की तरफ भेजने लगे हैं।
इसमें सबसे ज्यादा चांदी मानव तस्करों की हुई है जो बड़े महानगरों में आदिवासी और अन्य महिलाओं को बेचने तक का काम करते हैं। क्योंकि नक्सली गांवों में जाकर लोगों को महिलाओं को भी नक्सलियों के गुरिल्ला दस्ते में भेजने का दबाव बनाते है। मजबूरी में मां-बाप अपनी बेटी को शहर की तरफ भेजना ही सुरक्षित समझते हैं। झारखंड के कई गांवों में महिलाओं के साथ इस तरह की घटना की बातें सामने आई हैं।
नक्सल आंदोलन ठहराव के दौर में है। लेकिन इसे खत्म करने के लिए सरकारों को काफी काम करना होगा। ठहराव के दौर में कैडर की कमी से जूझ रहे नक्सली कोई बड़ी वारदात करने की फिराक में रहते हैं ताकि सरकार और लोगों पर उनका खौफ बना रहा। औरंगाबाद की घटना इसी का नतीजा है। पिछले कुछ सालों में बिहार और झारखंड में सीपीआइ (माओवादी) के कई प्रमुख लोग पकड़े गए। इसमें से कुछ तो औरंगाबाद जिला जेल में ही बंद हैं। वैसे में बिहार और झारखंड में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए नक्सली वारदात करने की योजना बनाते रहते हैं। लेकिन दूसरी ओर, सरकार और पुलिस बल में भी आपसी तालमेल की कमी है। औरंगाबाद में दस जवानों की शहादत से पता चला कि पुलिस में भी आपसी तालमेल का अभाव है।
औरंगाबाद पुलिस गया और औरंगाबाद जिलों की सीमा पर कार्रवाई के लिए पहुंच गई, लेकिन गया पुलिस से उसके तालमेल का अभाव था। गया पुलिस को सूचना तब मिली जब विस्फोट हो गया और कई जवान मारे गए। दरअसल, पुलिस अधिकारियों के बीच वाहवाही लेने की होड़ के अक्सर शिकार जवान होते है। बताया जाता है कि जिस नक्सल कमांडर संदीप की खोज में औरंगाबाद पुलिस सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन के साथ कार्रवाई के लिए सोनदाहा जंगल में पहुंची उसे संदीप ने खुद अपने जाल में फंसाया था। नक्सलियों ने ही औरंगाबाद पुलिस को सूचना दी कि संदीप फिलहाल इसी इलाके में है। नक्सलियों को पता था कि पुलिस कार्रवाई के लिए आएगी इसलिए पूरे इलाके में विस्फोटक बिछा दिए थे।
दरअसल, सरकारी तंत्र और पुलिस बलों में नक्सलियों की घुसपैठ एक बड़ी समस्या है। छत्तीसगढ़ में कुछ साल पहले नक्सली हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के सत्तर से ज्यादा जवान मारे गए थे। गृह मंत्रालय ने इस घटना की जांच की थी। जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। जांच में पता चला कि नक्सलियों को जंगल में घूम रहे सीआरपीएफ के जवानों की एक-एक गतिविधि की खबर थी। क्योंकि नक्सलियों के पास सीआरपीएफ से गायब किए गए वायरलेस सेट मौजूद थे। एक गांव में जब सीआरपीएफ के जवान खाना खाने के लिए रुके तो नक्सलियों ने उनके खाने में बेहोशी की दवा मिलवा दी। खाने के बाद सीआरपीएफ के जवानों की नींद आ गई और नक्सलियों ने हमला कर दिया। हमले में सीआरपीएफ का सिर्फ एक जवान बच सका था।
नक्सली आंदोलन एक नए मोड़ पर है। नक्सल प्रभावित राज्यों में पुलिस कार्रवाई तेज हुई और इससे नक्सलियों को काफी नुकसान पहुंचा है। नक्सली कमांडरों के आर्थिक हित कई जगहों पर सरकारी योजनाओं से जुड़ चुके हैं। वे विकास परियोजनाओं पर लेवी भी लगाते हैं और विकास परियोजनाएं हासिल करने वाली कंपनियों में अप्रत्यक्ष रूप से अपना निवेश भी करते हैं। उधर सरकार इन सारी चीजों की जानकारी के बाद भी चुप बैठी रहती है। विचित्र है कि राज्य सरकारें नक्सल प्रभावित इलाकों में आम लोगों की समस्याएं दूर करने के लिए संजीदा नहीं दिखतीं। लोगों को मूलभूत सुविधाएं मुहैया नहीं करवाई गई हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और पीने कापानी तक लोगों को उपलब्ध नहीं है। बिहार-झारखंड के कई जिलों में पीने के पानी की भारी समस्या है। यही नहीं, इन इलाकों में पीने के पानी में आर्सेनिक की मात्रा काफी ज्यादा है। इससे लोगों में कई बीमारियां हो रही हैं। सोनदाहा जंगल में पुलिस की जवाबी कार्रवाई में मारे गए एक नक्सली जितेंद्र मांझी का गांव धूपनगर गया के ही आमस प्रखंड में है। उसके गांव के पानी में इतना ज्यादा आर्सेनिक था कि लोग बड़े पैमाने पर बीमार हो गए थे।
हालांकि राज्यों की मशीनरी जहां ठप है वहीं केंद्रीय पुलिस बलों द्वारा स्थानीय लोगों की समस्या दूर करने की कोशिश हो रही है। केंद्रीय पुलिस बल गांवों में स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन करवा रहा है। लोगों को जरूरत के सामान भी केंद्रीय पुलिस बल बांट रहा है। नक्सल प्रभावित इलाकों में काम कर रहे पत्रकारों का कहना है कि कुछ सरकारी अधिकारी चाहते हैं कि यह समस्या बरकरार रहे। इलाके के विकास के नाम पर आने वाले पैसे से इनकी चांदी होती है। अशांत क्षेत्र के नाम पर विकास के लिए खूब पैसा आता है। लेकिन पैसा लोगों के बीच विकास के लिए नहीं पहुंचता। इसका पहले ही बंदरबांट हो जाता है। इस बंदरबांट में नक्सली कमांडरों की भूमिका भी होती है। इस मामले में सरकारी अधिकारियों से उनकी मिलीभगत होती है। नक्सली कमांडरों को भी उनका हिस्सा पहुंच जाता है। हर विकास परियोजना में उन्हें बीस से तीस प्रतिशत तक की राशि मिलने की बात कही जा रही है।
बिहार और झारखंड में नक्सली आंदोलन एक और समस्या से जूझ रहा है। यहां मध्य स्तर पर नक्सली संगठन जाति के आधार पर बंटे है। नक्सली आंदोलन में कमांडरों की जाति महत्त्वपूर्ण है। जाति के आधार पर कमांडर बंटे हुए है। जातिगत आधार पर बंटे होने के कारण कुछ कमांडर समय-समय पर पुलिस की मदद भी कर देते है। सीपीआइ (माओवादी) में मध्यम स्तर के ज्यादातर नक्सली कमांडर यादव, पासवान या झारखंड की जनजातियों से संबंधित हैं। यादव और पासवान जाति का छतीस का आंकड़ा है। नक्सली संगठनों में भी इस टकराव की छाया दिखती है। झारखंड और बिहार में कई नक्सली कमांडर संगठन में जातिगत तनाव के कारण पुलिस कार्रवाई में मारे गए। क्योंकि पुलिस को अंदर से ही सूचना मिली। बीते कुछ सालों से बिहार और झारखंड में पासवान और जनजातियों से आए कमांडरों से ज्यादा ताकतवार यादव कमांडर हैं। इसे कई बार दूसरी जाति के कमांडर बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं।

बरगद से सिकोया की ओर | Arvind k Sen

कारोबारी मामलों के जानकार अक्सर भारतीय कर-व्यवस्था की तुलना बरगद के पेड़ से करते हैं। ऐसी व्यवस्था, जिसका बरगद के पेड़ की भांति खूब फैलाव है, जिसके कर प्रावधान बरगद की जड़ों की माफिक आपस में उलझे हुए हैं और बरगद की तरह ही कर प्रावधानों की ऊंचाई (पहुंच) कम होने के कारण बड़े पक्षी (करवंचक) पकड़ में नहीं आते हैं। इसके विपरीत, दुनिया की सफल कर-व्यवस्थाओं को सिकोया के पेड़ की संज्ञा दी जाती है। ऐसी कर प्रणालियां, जो सिकोया के पेड़ की तर्ज पर सीधी और स्पष्ट हैं, जिनका फैलाव कम और गहराई ज्यादा है। सीधी-सपाट होने के कारण सिकोया पेड़ जैसी कर प्रणालियों में उलझाव की गुंजाइश कम होती है, लिहाजा इन्हें लागू करना और कर उगाहना आसान होता है।
वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) एक ऐसा निर्णय है जो हमारी कर-व्यवस्था को बरगद के उलझाव से निकाल कर सिकोया की स्पष्टता की ओर ले जाने वाला है। अगर कर-कानून सुपरिभाषित हों तो कर चुकाने वाले ईमानदार नागरिकों की परेशानियां कम हो जाती हैं, वहीं कानून में झोल कम होने के कारण उनका उल्लंघन करना भी आसान नहीं होता। समाज के लगभग सभी तबकों और राजनीतिक दलों ने जीएसटी के पक्ष में सहमति जताई है। ऐसे में सरकार ने अगले वित्तवर्ष से जीएसटी को लागू करने की योजना बनाई है। चूंकि यह नया कर है और कई मौजूदा कर (उत्पाद शुल्क, बिक्री कर, वैट, चुंगी व प्रवेश कर) जीएसटी में समाहित हो जाने हैं, इसलिए कर अधिकारियों को जीएसटी के क्रियान्वयन से संबंधित प्रशिक्षण भी दिया जाना है।
इन दोनों चुनौतियों (प्रस्तावित कानून को अगले वित्तवर्ष से लागू करने तथा इसके क्रियान्वयन का प्रशिक्षण) को सुलझाने के लिए जरूरी है कि नए कर (जीएसटी) की दरें निर्धारित की जाएं और संसद का अनुमोदन लिया जाए। सरकार ने पहली चुनौती को सुलझा लिया है। राज्यों से विचार-विमर्श के बाद सरकार ने प्रस्तावित जीएसटी की दरें बीते दिनों घोषित की हैं। जीएसटी परिषद ने वस्तु एवं सेवा कर ढांचे के तहत 5, 12, 18 और 28 प्रतिशत की चार स्तर की दरें तय करके प्रस्तावित कर की मोटी-मोटी संरचना पेश कर दी है। हालांकि इस नई कर-व्यवस्था के संबंध में प्रशासनिक शक्तियों को साझा करने के सवाल पर केंद्र और राज्य सरकारों के बीच अंतिम सहमति बनना बाकी है। अगर इस बिंदु पर भी बात बन जाती है तो जीएसटी की राह साफ हो जाएगी। इसके साथ ही पहली बार देश का आर्थिक एकीकरण होगा और सेवाओं एवं वस्तुओं के प्रवाह पर अंतरराज्यीय बाधाएं दूर होने से एक देशव्यापी साझा बाजार भी अस्तित्व में आएगा।
जीएसटी परिषद ने अलग-अलग वस्तुओं और सेवाओं की जुदा-जुदा दरें तय करके एक बहुस्तरीय कर-प्रणाली खड़ी करने का प्रयास किया है। हमारे देश की विविधता और लोगों की आमदनी में खासा फर्क होने के कारण प्रस्तावित बहुस्तरीय कर प्रणाली उचित ही है। मिसाल के तौर पर, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में शामिल खाद्यान्न (जैसे, चावल और गेहूं) जैसी आम उपभोग की चीजों पर शून्य प्रतिशत कर लगाया जाएगा। दूसरे लफ्जों में कहें तो फिलहाल खाद्यान्न पर जीएसटी नहीं लगाया जाएगा। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में शामिल आधी चीजों (पचास फीसद) के लिए शून्य प्रतिशत की दर तय की गई है। यह तथ्य सब जानते हैं कि कम आमदनी वाले लोगों का सबसे ज्यादा साबका उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में शामिल चीजों से ही पड़ता है। इस तरह उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में शामिल जरूरी उपभोग की चीजों पर शून्य प्रतिशत की दर रखने का फायदा जाहिर तौर पर लोगों को मिलेगा।
GST की चार दरों का ऐलान; 5, 12, 18 और 28 फीसदी पर बनी सहमति
GST की चार दरों का ऐलान; 5, 12, 18 और 28 फीसदी पर बनी सहमति
 
हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि भले ही दर शून्य प्रतिशत रखी गई हो लेकिन ये चीजें जीएसटी के दायरे में हैं। इसलिए यह फायदा लंबे समय तक कायम रहेगा या नहीं, यह फैसला आने वाली सरकारों के हाथ में रहेगा। नया कर होने के कारण क्रियान्वयन के शुरुआती दौर में लोगों को दिक्कतें उठानी पड़ सकती हैं। इसी बात का खयाल रखते हुए सरकार ने व्यापक खपत वाली चीजों पर भी कर की दरें नरम रखी हैं। मसलन, मसालों और सरसों के तेल का उपयोग देश के तकरीबन हर घर में होता है। बड़ी खपत वाली इन चीजों पर पांच फीसद की दर प्रस्तावित की गई है। नरम कर दरें यहां पर आकर समाप्त हो जाती हैं।
इसके बाद सरकार ने वस्तुओं एवं सेवाओं की प्रकृति और उनका उपभोग करने वाले लोगों की आमदनी को ध्यान में रखते हुए धीरे-धीरे नरम से कठोर दरों का रुख किया है।
जैसे, नौकरीपेशा लोगों द्वारा उपभोग किए जाने वाले डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों पर बारह फीसद की दर प्रस्तावित की गई है। इसे कठोर दर तो नहीं कहा जाएगा लेकिन इसकी दर व्यापक खपत वाली चीजों से ज्यादा रखी गई है। बढ़ते शहरीकरण के कारण तेजी से बढ़ रहे मध्यवर्ग द्वारा उपभोग की जाने वाली चीजों मसलन साबुन, तेल, टूथपेस्ट और इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों जैसे रेफ्रिजरेटर व स्मार्टफोन पर 18 फीसदी की दर प्रस्तावित की गई है। सामान्यतया नव मध्यवर्ग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों का समर्थक रहा है और यह वर्ग बेहद आक्रामकता के साथ मीडिया व इंटरनेट माध्यमों के जरिए अपनी मांगें रखता रहा है।
फिलहाल टूथपेस्ट और स्मार्टफोन जैसी आधुनिक जीवन शैली वाली चीजों की बिक्री तेजी से बढ़ रही है। कहना मुश्किल है कि 18 फीसद की टैक्स-दर के प्रति नव मध्यवर्ग का क्या रुख होगा। धनाढ्य वर्ग द्वारा उपयोग की जाने वाली महंगी वस्तुओं (जिन्हें कराधान की भाषा में सफेद वस्तुएं कहा जाता है) और कारों पर लगने वाले कर की दर 28 फीसद रखी गई है। इससे किसी को परेशानी नहीं होनी चाहिए। बल्कि भारत के समकक्ष विकासशील देशों में लक्जरी वस्तुओं पर इससे भी ज्यादा दरों पर कर वसूला जाता रहा है। अगर इसे 30 फीसद रखा जाता और मध्यवर्ग व निम्न आदमनी वाले समूह के बीच झूल रहे नव मध्यवर्ग के उपभोग वाली चीजों पर लगने वाले कर की दरों को 12 फीसद के बजाय 10 फीसद रखा जाता तो और उचित होता।
हालांकि तर्क दिया जा सकता है कि जीएसटी एक नया कर है और इसमें बेहद ऊंची दरों का नकारात्मक असर भी हो सकता है। जरूरत पड़ने पर बाद में भी दरें बढ़ाई जा सकती हैं। मगर अनुभव बताता है कि एक बार स्थापित होने के बाद कर की दरों में इजाफा करना बेहद मुश्किल होता है। खासतौर पर लोकतांत्रिक देशों में राजनीतिक दल टैक्स-दरों में बढ़ोतरी करके किसी तबके को नाराज करने का सियासी जोखिम उठाने से बचते हैं। बहरहाल, मौज-मजे और शान-शौकत के लिए खरीदी जाने वाली बेहद महंगी चीजों और मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक वस्तुओं जैसे पान मसाला, तंबाकू और शीतल पेयों (मानव शरीर और अर्थव्यवस्था पर बेहद नकारात्मक असर डालने वाली इन चीजों को आर्थिक भाषा में ‘पापमय वस्तुएं’ या ‘सिनफुल थिंग्स’ कहा जाता है) पर कर की दर 28 फीसद प्रस्तावित की गई है।
इस मोर्चे पर भी सरकार ने एक बार फिर नरमी बरती है, जिसे जायज नहीं ठहराया जा सकता। दुनिया के बाकी देशों में इस श्रेणी की चीजों पर ऊंची टैक्स-दरें लगाने की रवायत रही है, ताकि इनके उपभोग को हतोत्साहित किया जा सके। इससे दो फायदे होते हैं। एक, ऊंची कर-दरों के कारण के कारण कर-राजस्व में इजाफा होता है, और दूसरा, ऊंची कर-दरों के कारण इनके उपभोग में कमी आती है, जिसके चलते इन चीजों के उपभोग से पैदा होने वाली बीमारियों के इलाज पर खर्च होने वाली रकम बचती है। हमारे देश में भी लंबे समय से समाज का जागरूक तबका इन वस्तुओं पर ऊंची कर-दरों की मांग करता आया है। मगर इन वस्तुओं की निर्माता कंपनियां भी बराबर कर-दरें कम रखने की मांग करती रही हैं। संभव है कि सरकार इन वस्तुओं के कारोबारियों की तरफ से किए जा रहे प्रतिरोध के चलते इस श्रेणी की वस्तुओं पर ज्यादा ऊंची कर-दरें रखने का फैसला नहीं कर पाई।
बहरहाल, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि जीएसटी जैसा विशाल और शक्तिशाली कर-विधान एक झटके में लागू नहीं किया जा सकता। कदम-दर-कदम ही इतने बड़े कर-सुधार को लागू किया जा सकता है। जीएसटी की बहुस्तरीय व्यवस्था उचित है, क्योंकि एक ही दर रहने से मुद्रास्फीति बढ़ने का अंदेशा था। कर श्रेणियां बन गई हैं, अब देखने वाली बात यह है कि कौन-सी वस्तुएं किस श्रेणी में आती हैं। इसके अलावा, सेवाओं पर लगने वाले करों की दरें घोषित होना बाकी है। कयास लगाए जा रहे हैं कि अधिकतर सेवाओं पर 18 फीसद और जरूरी सेवाओं पर 12 फीसद की दर से कर लगाया जा सकता है। इस बारे में अंतिम निर्णय जीएसटी परिषद को लेना है।
खैर, सरकार को सेवाओं पर कर की दरें निर्धारित करते वक्त और वस्तुओं की श्रेणियां तय करते समय इस बात का खयाल रखना होगा कि कर-राजस्व में बढ़ोतरी हो लेकिन इसकी कीमत आम आदमी को न चुकानी पड़े। जीएसटी की बहुस्तरीय व्यवस्था में जुदा-जुदा वस्तुओं और सेवाओं का अलग-अलग श्रेणियों में आवंटन इस तरह हो कि उसमें हमारी अर्थव्यवस्था की मौजूदा खपत-प्रवृत्तियों की झलक हो। यानी जो ज्यादा आमदनी के साथ ज्यादा उपभोग करे, उस पर ज्यादा टैक्स और व्यापक उपभोग वाली जीवन की जरूरी चीजों पर कम टैक्स लगे। यही कराधान का स्वर्णिम नियम भी है।

संकट में वन्य जीव | रीता सिंह

वर्ल्ड वाइल्ड फंड एवं लंदन की जूओलॉजिकल सोसायटी की हालिया रिपोर्ट चिंतित करने वाली है कि 2020 तक धरती से दो तिहाई वन्य जीव खत्म हो जाएंगे। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में हो रही जंगलों की अंधाधुंध कटाई, बढ़ते प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के कारण पिछले चार दशकों में वन्य जीवों की संख्या में भारी कमी आई है। रिपोर्ट के मुताबिक 1970 से 2012 तक वन्य जीवों की संख्या में 58 फीसद की कमी आई है। हाथी और गोरिल्ला जैसे लुप्तप्राय जीवों के साथ-साथ गिद्ध और रेंगने वाले जीव तेजी से खत्म हुए हैं। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2020 तक 67 फीसद वन्य जीवों की संख्या में कमी आ सकती है।
गौरतलब है कि खत्म हो रहे जीवों में जंगली जीव ही नहीं बल्कि पहाड़ों, नदियों व महासागरों में रहने वाले जीव भी शामिल हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 1970 से अब तक इन जीवों की संख्या में तकरीबन 81 फीसद की कमी आई है। जलीय जीवों के अवैध शिकार के कारण तीन सौ प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं। जलीय जीवों के नष्ट होने का एक अन्य कारण फफूंद संक्रमण और औद्योगिक इकाइयों का प्रदूषण भी है। इसके अलावा प्राकृतिक आपदाएं, विभिन्न प्रकार के रोग, जीवों की प्रजनन क्षमता में कमी भी प्रमुख कारण हैं। इन्हीं कारणों की वजह से यूरोप के समुद्र में ह्वेल और डॉल्फिन जैसे भारी-भरकम जीव तेजी से खत्म हो रहे हैं। एक आंकड़े के मुताबिक भीड़-बकरियों जैसे जानवरों के उपचार में दी जा रही खतरनाक दवाओं के कारण भी पिछले बीस सालों में दक्षिण-पूर्व एशिया में गिद्धों की संख्या में कमी आई है। भारत में ही पिछले एक दशक में पर्यावरण को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गिद्धों की संख्या में 97 फीसद की गिरावट दर्ज की गई है। गिद्धों की कमी से मृत पशुओं की सफाई, बीजों का प्रकीर्णन और परागण कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा है और किस्म-किस्म की बीमारियां तेजी से पनप रही हैं। गिद्धों की तरह अन्य प्रजातियां भी तेजी से विलुप्त हो रही हैं।
वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि पेड़ों की अंधाधुध कटाई और जलवायु में हो रहे बदलाव के कारण कई जीव जातियां धीरे-धीरे ध्रुवीय दिशा या उच्च पर्वतों की ओर विस्थापित हो सकती हैं। अगर ऐसा हुआ तो फिर विविधता और पारिस्थितिकी अभिक्रियाओं पर उसका नकारात्मक असर पड़ना तय है। यह आशंका इसलिए अकारण नहीं है कि पृथ्वी पर करीब बारह करोड़ वर्षों तक राज करने वाले डायनासोर नामक दैत्याकार जीव के समाप्त होने का कारण मूलत: जलवायु परिवर्तन ही था। अगर जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से नहीं लिया गया तो आने वाले वर्षों में धरती से जीवों का अस्तित्व मिटना तय है।
धरती के साथ मानव का निष्ठुर व्यवहार बढ़ता जा रहा है जो कि जीवों के अस्तित्व के प्रतिकूल है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बारह हजार वर्ष पहले हिमयुग के खत्म होने के बाद होलोसीन युग शुरू हुआ था। इस युग में धरती पर मानव सभ्यता ने जन्म लिया। इसमें मौसम चक्र स्थिर था, इसलिए स्थलीय और जलीय जीव पनप सके। लेकिन बीसवीं सदी के मध्य से जिस तरह परमाणु ऊर्जा के प्रयोग का दौर शुरू हुआ है और बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई हो रही है उससे होलोसीन युग की समाप्ति का अंदेशा बढ़ गया है। उसी का असर है कि आज वन्य जीव अस्तित्व के संकट से गुजर रहे है।
वन्य जीवों के वैश्विक परिदृश्य पर नजर डालें तो पृथ्वी के समस्त जीवधारियों में से ज्ञात तथा वर्णित जातियों की संख्या लगभग अठारह लाख है। लेकिन यह संख्या वास्तविक संख्या के तकरीबन पंद्रह फीसद से कम है। उसका कारण लाखों जीवों के बारे में जानकारी उपलब्ध न होना है। ऐसा माना जाता है कि पृथ्वी पर विद्यमान कुल जातियों की संख्या पचास लाख से पांच करोड़ के बीच है। इनमें अधिकांश का वर्णन व नामकरण अब भी नहीं हो सका है। जबकि जीव जातियों की पहचान व इनके नामकरण का क्रमबद्ध कार्य पिछले ढाई सौ वर्षों से जारी है।
जहां तक भारत का सवाल है, तो यहां विभिन्न प्रकार के जीव बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। जीवों की लगभग पचहत्तर हजार प्रजातियां यहां पाई जाती हैं। इनमें तकरीबन 350 स्तरनधारी, 1250 पक्षी, 150 उभयचर, 2100 मछलियां, 60 हजार कीट व चार हजार से अधिक मोलस्क व रीढ़ वाले जीव हैं। भारत में जीवों के संरक्षण के लिए कानून बने हैं। इसके बावजूद जीवों का संहार जारी है। जैव विविधता को बचाने के लिए आवश्यक है कि जीवों को बचाया जाए। जैव विविधता एक ऐसा प्राकृतिक संसाधन है जो यदि एक बार समाप्त हो गया तो उसे दोबारा नहीं बनाया जा सकता। अर्थात इसका विलुप्तिकरण सदैव के लिए हो जाता है।
गौर करें तो जीवों पर बढ़ते संकट का मुख्य कारण वायुमंडल के तापमान का बढ़ना, प्रदूषण का बढ़ता स्तर, जंगलों तथा भूमि का व्यापक कटाव, मनुष्यों की अदूरदर्शिता, क्लोनिंग व जैव तकनीक का बढ़ता प्रयोग तथा उच्च स्तरीय और कीट-प्रतिरोधी बीजों का विकास आदि हैं। अस्तिव के संकट में फंसे जीवों को बचाने के लिए जरूरी है कि धरती के बढ़ते तापमान और प्रदूषण की रोकथाम की ठोस पहल हो। जिस गति से धरती का तापमान बढ़ रहा है उससे आने वाले दिनों में वन्य जीवों का संकट गहरा सकता है। लिहाजा, उनके संरक्षण के लिए विशिष्ट परियोजनाएं बनाई जाएं तथा वनों की अंधाधुंध कटाई पर रोक लगे। इसके अलावा, वन क्षेत्र को कम करके कृषि विस्तार की योजनाआेंं पर भी रोक लगनी चाहिए। ‘स्थानांतरण खेती’ को नियंत्रित किया जाए तथा यदि संभव हो तो उसे समाप्त ही कर दिया जाए। नगरों के विकास के लिए भी वनों की कटाई पर रोक लगनी चाहिए।
लेकिन त्रासदी है कि संपूर्ण विश्व में बड़े पैमाने पर वनों की कटाई जारी है। इस तरह हम देखते हैं कि जलवायु बदलाव के संकट के मूल में विकास का प्रचलित मॉडल है जो संसाधनों के अंधाधुंध दोहन पर आश्रित है। ‘ग्लोबल फॉरेस्ट रिसोर्स एसेसमेंट’ (जीएफआरए) की ताजा रिपोर्ट बताती है कि 1990 से 2015 के बीच कुल वन क्षेत्र तीन फीसद घटा है और 102,000 लाख एकड़ से अधिक का क्षेत्र 98,810 लाख एकड़ तक सिमट ढाई सौ वर्षों से चल रहा है। यानी 3,190 लाख एकड़ वनक्षेत्र में कमी आई है। गौर करें तो यह क्षेत्र दक्षिण अफ्रीका के आकार के बराबर है। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्राकृतिक वनक्षेत्र में छह फीसद की कमी आई है। उष्ण कटिबंधीय वन क्षेत्रों की स्थिति और भी दयनीय है। यहां सबसे अधिक दस फीसद की दर से वन क्षेत्र का नुकसान हुआ है। ये हालात तब हैं जब एक दशक से पर्यावरणीय सुरक्षा को लेकर सतत प्रयास जारी है।
एक अनुमान के मुताबिक वैश्विक समुदाय विकास के नाम पर प्रत्येक वर्ष सात करोड़ हेक्टेयर वनक्षेत्र का विनाश कर रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि वनों के विनाश से वातावरण जहरीला होता जा रहा है और प्रतिवर्ष दो अरब टन अतिरिक्त कार्बन-डाइआक्साइड वायुमंडल में घुल-मिल रहा है। इससे जीवन का सुरक्षा कवच मानी जाने वाली ओजोन परत को नुकसान पहुंच रहा है। ‘नेचर जिओसाइंस’ का कहना है कि ओजोन परत को होने वाले नुकसान से कुछ खास किस्म के अत्यंत अल्पजीवी तत्त्वों (वीएसएलएस) की संख्या में वृद्धि हुई है जो वन्य जीवों व मानव जाति के अस्तित्व के लिए बेहद खतरनाक है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन खास किस्म के अत्यंत अल्पजीवी तत्त्वों (वीएसएलएस) की ओजोन को नुकसान पहुंचाने में भागीदारी नब्बे फीसद है। विडंबना यह कि एक ओर प्राकृतिक आपदाओं से जीव-जंतुओं की प्रजातियां नष्ट हो रही हैं, वहीं रही-सही कसर इंसानी लालच और उसका शिकार का शौक पूरा कर दे रहा है। अभी पिछले दिनों ही इंटरनेशनल फंड फॉर एनिमल वेलफयर ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पिछले एक दशक में प्रतीक के लिए दुनिया भर में सत्रह लाख वन्य जीवों का शिकार (ट्राफी हंटिंग) किया गया। इनमें दो लाख विलुप्तप्राय जीव हैं।
दरअसल, इन वन्य जीवों के शिकारी जीवों के अंगों को महंगी कीमतों पर बेचते हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इनकी मुंहमांगी कीमत मिलती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक हाथी मारने की कीमत पच्चीस से साठ हजार डॉलर है। इसी तरह एक बाघ साढ़े आठ हजार से पचास हजार और तेंदुआ पंद्रह से पैंतीस हजार डॉलर तक है। दुर्भाग्यपूर्ण यह कि शौक के लिए शिकार यानी ट्राफी हंटिंग को अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों ने मान्यता दे रखी है। ट्राफी हंटिंग में अमेरिकी शिकारी सबसे आगे हैं। एक आंकड़े के मुताबिक पिछले एक दशक में दुनिया भर में ग्यारह हजार बाघों का शिकार किया गया जिनमें पचास फीसद बाघों को अमेरिकी शिकारियों ने मारा है। आश्चर्य की बात यह है कि इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन यह तर्क दे रहा है कि अगर कानूनी दायरे में ट्राफी हंटिंग हो तो वन्य जीवों के संरक्षण में मदद मिलेगी और जीवों की आबादी नियंत्रित होगी। साथ ही स्थानीय लोगों को आर्थिक फायदा भी पहुंचेगा। लेकिन यह दलील सही नहीं है। सच यह है कि इससे वन्य जीवों की संख्या में कमी आएगी और पहले से ही लुप्त हो रहे जीवों का अस्तित्व मिट जाएगा।

भारत में नया बाजार तलाशता ब्रिटेन | दीपक रस्तोगी

इसमें न तो कोई आश्चर्य है और न ही भारत के लिए आनंद मनाने जैसी बात कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री जब यूरोप के बाहर पहली बार किसी देश की यात्रा पर निकलीं तो उन्होंने भारत को चुना। ब्रेक्जिट के बाद से ही इस यात्रा का अनुमान लगाया जाने लगा था। भारत का तेजी से बढ़ता हुआ बाजार उन सभी यूरोपीय देशों को लुभा रहा है, जो आज की तारीख में आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। यूरोपीय संघ से निकलने की तैयारी में जुटे ब्रिटेन का पहला चयन जाहिर तौर पर भारत को होना था।  अभी ब्रिटेन के सामने चुनौती अपनी अर्थव्यवस्था का ढांचा तैयार करने की है। ब्रेक्जिट के बाद ब्रिटेन की स्थिति आर्थिक महाशक्ति वाली नहीं रह गई है। ब्रिटिश कंपनियां पूंजी की तलाश में जुट गई हैं। वहां के लोगों को रोजगार दिलाने के लिए सरकार को नए रास्ते तलाशने पड़ रहे हैं। ऐसे में ब्रिटेन को अभी तय करना होगा कि उसकी अर्थव्यवस्था पुराने अंदाज वाली रहेगी, औद्योगिक उत्पादन वाली अर्थव्यवस्था या फिर चीन की तरह वह उत्पादन और विपणन केंद्रित अर्थव्यवस्था बनना चाहेगा।
ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा मे के पहले भारत दौरे को लेकर राजनयिक शब्दावलियों का जामा पहनाया गया है। उनके आने के पहले कहा गया था कि भारत के साथ ब्रिटेन के ‘विशेष और पुराने संबंध’ रहे हैं। उन संबंधों को पुनर्जीवित करने की जरूरत है। अपनी यात्रा के पहले थेरेसा मे ने लंदन के अखबार ‘संडे टेलीग्राफ’ में लेख लिख कर बताया कि ‘बेहद जरूरी और सबसे करीबी’ देश भारत का उनका दौरा कितना जरूरी है और इस लेख के जरिए उन्होंने अपने देश के लोगों को बताने की कोशिश की कि वे भारत से बहुत कुछ ले आएंगी। तेजी से महत्त्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभर रहे भारत को ब्रिटेन ने पुराने संबंधों और मूल्यों की याद दिलाने में कोई कसर नहीं उठा रखी।
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अतीत के अनुभवों को देखते हुए ब्रिटेन की इस तरह की उम्मीदें गैर-वाजिब नहीं कही जाएंगी। ब्रिटिश उपनिवेश रहे देशों का संगठन कॉमनवेल्थ और इसके सदस्य देश हमेशा से ब्रिटेन के प्रति नरम रवैया रखते रहे हैं। इन देशों में अहम जगह बना चुके भारत ने ब्रिटिश कंपनियों के लिए अपने बाजार के दरवाजे खोले ही हैं। थेरेसा मे की यात्रा में तिरासी हजार करोड़ रुपए के कारोबार को लेकर जो समझौते हुए हैं, उनसे स्पष्ट है कि उनका भारत दौरा ब्रिटिश अर्थव्यवस्था में कुछ जान जरूर फूंकेगा। यूरोपीय बाजारों से ब्रिटेन को तगड़ा नुकसान हो रहा था। यूरोपीय समुदाय के साथ अपनी करेंसी के मूल्यांयन को लेकर ब्रिटेन असहज स्थिति में आ गया था। ऐसे में वहां के लोगों और कारोबारी जगत से ब्रिटिश सरकार पर नए बाजार की तलाश का बेहद दबाव था भी।
थेरेसा मे के नेतृत्व में वहां से तैंतीस उद्योगपतियों का प्रतिनिधिमंडल भारत आया था, जिसने निर्माण, प्रौद्योगिकी, सूचना-प्रौद्योगिकी, रक्षा, खाद्य प्रसंस्करण, एफएमसीजी, फैशन, इस्पात, ऊर्जा आदि क्षेत्रों में संभावनाओं की तलाश की। यहां आने के पहले थेरेसा मे अपने देश में वादा करके आई थीं कि ‘मेरी यात्रा हमारे घर के लोगों के लिए सुरक्षित रोजगार के सृजन की तलाश’ में हो रही है। ब्रिटेन में भारतीयों के लिए वीजा के ताजा प्रावधानों को घरेलू मोर्चे पर दबाव का ही नतीजा माना जा रहा है। भारत में दोनों प्रधानमंत्रियों की बातचीत में यह मुद्दा उठना ही था। थेरेसा मे ने विकल्प के तौर पर व्यापार केंद्रित दो वीजा कार्यक्रमों- ‘रजिस्टर्ड ट्रेवलर स्कीम’ और ‘ग्रेट क्लब’ की घोषणा की। लेकिन भारत इन्हें अपर्याप्त मान रहा है और मोदी ने उनका ध्यान अपने छात्रों और कामकाजी पेशेवरों पर ब्रिटेन के सख्त वीजा प्रावधानों के पड़ने वाले प्रभावों की ओर आकृष्ट किया। आधिकारिक ब्रिटिश आंकड़ों के अनुसार भारतीय नागरिकों को जारी किए गए स्टडी वीजा की संख्या घट कर 11,864 रह गई, जो 2010 में 68,238 थी।
उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले दिनों में वीजा व्यवस्था सरल हो जाएगी। भारतीय सूचना प्रोद्यौगिकी कंपनियों की ओर से इसके लिए दोनों देशों के राजनीतिक नेतृत्व पर दबाव है। अब ब्रिटिश सरकार को रास्ता निकालना है। तभी व्यापार को बढ़ावा देने की आपसी प्रतिश्रुति पर हकीकत में अमल हो पाएगा। दोनों नेताओं ने व्यापार को बढ़ावा देने और वीजा व्यवस्था को सरल बनाने के अलावा सुरक्षा और रक्षा सहयोग सहित विभिन्न द्विपक्षीय मुद्दों पर विचार विमर्श किया। दोनों नेताओं ने साझा हितों वाले क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी चर्चा की। उन्होंने दक्षिण एशिया को स्थिर, खुशहाल और आतंकवाद से मुक्त होने की आवश्यकता पर भी बल दिया तथा सभी देशों से इस लक्ष्य की दिशा में काम करने का आह्वान किया।  ब्रिटिश नेतृत्व को उम्मीद है कि भारत के बाजार में दखल से वहां की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था ताकत पाएगी। ब्रिटेन के सेक्रेटरी आॅफ स्टेट (अंतरराष्ट्रीय व्यापार) लियाम फॉक्स इस यात्रा को लेकर खासे सक्रिय रहे। खासकर दिल्ली में भारत के वाणिज्यिक संगठनों के साथ अपने प्रतिनिधिमंडल की बैठकें कराने में और फिर बंगलुरु जाकर सूचना प्रौद्योगिकी में नामी भारतीय कंपनियों के सीईओ और आला अधिकारियों के साथ बैठकें करने में।
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ थेरेसा मे की शिखर वार्ता के बाद संयुक्त घोषणा पत्र जारी किया गया। राजनयिक परिभाषा में इस कवायद का मतलब यही होता है कि जिन विषयों का जिक्र सामने आ रहा है, उन पर दोनों देश एक राय हैं। भारत में इन दिनों रक्षा खरीद सौदों पर सरकार का जोर है। सेना, वायुसेना और नौसेना की जरूरतें अरसे से लंबित हैं। ऐसे में नए सैन्य साजो-सामान के लिए उन्नत तकनीक और प्रभावी आयुधों की तलाश में भारत है। भारत ने रक्षा जैसे अहम क्षेत्र के लिए भी ब्रिटिश कंपनियों के दरवाजे खोलने का भरोसा दिया है। रक्षा उपकरणों के लिए निर्माण, तकनीकी हस्तांतरण और सह विकास के लिए भारतीय एजेंसियों के साथ सरकार की नीति के अनुसार ही सहभागिता की शर्त भी रखी गई है। लेकिन ऐसे वक्त में जब अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर सौदा और युद्धक विमान खरीद में रॉल्स रॉयस द्वारा घूस देने का विवाद जांच एजेंसियों के गले की हड्डी बना हुआ है, रक्षा सौदों में भागीदारी का वचन कितना धरातल पर आ सकेगा- इस पर सवाल बना हुआ है। अगस्ता वेस्टलैंड विवाद में कमीशनखोरी का आरोपी क्रिस्टीन मिशेल और रॉल्स रॉयस मामले में सुधीर चौधरी- दोनों ही भारत में वांछित हैं और लंदन में रह रहे हैं। भारत ने दोनों के प्रर्त्यपण की मांग की है। जाहिर है, प्रत्यर्पण वाली शर्त ब्रिटेन पर भारी पड़ने वाली है। क्योंकि दोनों ही वहां अच्छा राजनीतिक रसूख रखते हैं।
दोनों देशों के संयुक्त बयान में आतंकवाद, उग्रवाद, समुद्री सुरक्षा और समुद्री कानून व्यवस्था को लेकर अहम बातें कही गई हैं, जो भारत के लिए आगामी दिनों में मुफीद हो सकती हैं। दोनों प्रधानमंत्रियों ने स्वीकार किया है कि आतंकवाद और हिंसक उग्रवाद अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए सबसे गंभीर खतरों में से एक हैं। इस संबंध में समन्वित वैश्विक कार्रवाई होनी चाहिए। दोनों देशों ने समुद्र संबंधी कानून से जुड़ी 1982 की संयुक्त राष्ट्र संधि (यूएनसीएलओएस) के आधार पर समुद्रों और सागरों में कानूनी व्यवस्था कायम रखने के महत्त्व को रेखांकित किया। दक्षिणी चीन सागर के संदर्भ में यह कवायद अहम है। चीन ने संयुक्त राष्ट्र के उस आदेश को मानने से इंकार करते हुए उसकी आलोचना की है।
अंतरराष्ट्रीय राजनय को लेकर संयुक्त घोषणापत्र में जो बातें कही गई हैं, उनका मूल आर्थिक आधार ही है। आपसी कारोबार बढ़ाने पर भारत और ब्रिटेन में जोर दिया जा रहा है। वित्तीय पटरी पर रफ्तार तेज करने के लिए दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार की बात की जा रही है। मगर यह तभी होगा, जब ब्रिटेन की यूरोपीय संघ से बाहर आने की औपचारिकता पूरी हो जाए। ब्रिटेन को जी-20 देशों में भारत में निवेश करने वाला सबसे बड़ा देश माना जाता रहा है। लेकिन अब भारतीय कंपनियां ब्रिटेन में हाई-प्रोफाइल खरीद कर रही हैं। वहां टाटा स्टील और टाटा मोटर्स, इंफोसिस, टेक महिंद्रा, समेत कई कंपनियों का निवेश बढ़ा है। लेकिन भारत और ब्रिटेन का आपसी कारोबार दो फीसद से ज्यादा कभी नहीं रहा। इसमें भी भारत को ब्रिटिश निर्यात ज्यादा है। ब्रिटेन इस भागीदारी को बढ़ाना चाहता है। लेकिन बाजार में उसे कोरियाई, अमेरिकी, जर्मन और चीनी उत्पादों से कड़ी होड़ करनी होगी।
सबसे जरूरी बात यह कि अगर यूरोप के बाहर ब्रिटेन खुद को अटलांटिक सिंगापुर के तौर पर स्थापित करना चाहता है, तो उसे पहले सिंगापुर बनना होगा। हर तरह के विचारों के लिए खुला, मुक्त कारोबार क्षेत्र और आव्रजकों के लिए भी मुक्त। उसे भारतीय आव्रजकों और भारतीय सेवा प्रदाताओं के लिए अपने दरवाजे खोलने होंगे। उसे याद करना होगा कि वीजा नियमों और वहां की अर्थव्यवस्था के चलते ब्रिटेन में भारतीय विद्यार्थियों की संख्या में बीस फीसद की गिरावट आई है। अभी ब्रिटेन दोराहे पर खड़ा है। उसे तय करना होगा कि वह यूरोप की छाया से खुद को मुक्त करेगा या खुद को कॉमनवेल्थ का सिरमौर मानता रहेगा।

विकास भी चाहिए और रोजगार भी | एन के सिंह

पिछला एक वर्ष भारत के लिए उथल-पुथल भरा रहा है। अपनी संप्रभुता, सीमाओं की सुरक्षा के साथ-साथ राष्ट्रवाद की आक्रामक अभिव्यक्तियों से उसे जूझना पड़ा है। वहीं, इस क्षेत्र की भू-राजनीति अब भी अनिश्चित और अस्थिर बनी हुई है। चीन की विकास दर घट रही है, लिहाजा अपने आर्थिक रसूख को कायम रखने के लिए वह नए-नए तरीके अपना रहा है। दक्षिण चीन सागर विवाद पर ट्रिब्यूनल के फैसले को न मानना, ‘वन बेल्ट वन रोड’ (सिल्क रोड आर्थिक गलियारा और 21वीं सदी के समुद्री सिल्क रोड) पर तेजी से आगे बढ़ना और तिब्बत से निकलने वाली नदियों के पानी के रुख में तब्दीली से जुड़ी खबरें उसकी इन्हीं कोशिशों के चंद उदाहरण हैं।
वह पारंपरिक रूप से भारत का सहयोगी माने जाने वाले रूस के साथ भी दोस्ती की नई पींगे बढ़ा रहा है, और पाकिस्तान के साथ उसकी कदमताल जारी है ही। इससे निश्चय ही इस क्षेत्र की भू-राजनीति और जटिल बनने वाली है। उधर अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे को लेकर तस्वीर भले ही साफ दिखती हो, मगर नए अमेरिकी मुखिया के साथ चीन की विदेश नीति की दिशा क्या होगी, इस पर अब तक भ्रम की चादर पड़ी है। मगर हां, इस तस्वीर के बीच भी भारत ने कई मोर्चों पर उल्लेखनीय प्रगति की है।
हमारी पहली प्रगति विदेश नीति के मोर्चे पर हुई है। हाल के वर्षों में रणनीतिक तौर पर हम अमेरिका से इतने करीब कभी नहीं रहे, जितने अभी हैं। साथ ही, अफ्रीका, लातीन अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड तक भी हमारी पहुंच मजबूत हुई है। देश-दुनिया में मोदी के नेतृत्व को व्यापक रूप से मान्यता मिली है। दूसरी सफलता आर्थिक मोर्चे पर है। मामूली मुद्रास्फीति के साथ हमारी अर्थव्यवस्था 7.4 फीसदी की दर से कुलांचे भर रही है। चालू खाते का घाटा स्थिर है और अधिक उदार मौद्रिक नीति की ओर भी हमने कदम बढ़ाया है। विश्व में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हमारा एक सकारात्मक पक्ष है ही।
मगर भारत में निजी निवेश की रफ्तार अब भी सुस्त है। हालांकि बैंकों के संचित कोष पर पाबंदियों को हटाकर और इन्फ्रास्ट्रक्चर में बड़े पैमाने पर निवेश करके निजी निवेश को गति देने की कोशिश की जा रही है, मगर इन कोशिशों का लाभ मिलने में वक्त लगेगा। हमने राजनीतिक मोर्चे पर भी खूब प्रगति की है। भाजपा इससे पहले इतनी मजबूत कभी नहीं रही, जितनी कि पिछले एक वर्ष में रही है। इसके खाते में कई राज्य सरकारें आई हैं और कई क्षेत्रीय पार्टियों ने भी इसका दामन थामा है। हालांकि इससे ऐतराज नहीं कि अब भी काफी कुछ उत्तर प्रदेश, पंजाब और गुजरात के विधानसभा चुनावों पर निर्भर करेगा।
इन तमाम क्षेत्रों के अलावा मैं यहां दो अन्य संदर्भों की चर्चा करना चाहूंगा, जिसमें पहला विश्व बैंक से जुड़ा है। विश्व बैंक हर वर्ष ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ यानी कारोबारी माहौल को लेकर दुनिया के तमाम देशों की रैंकिंग जारी करता है। यह सूची एक तरह से निवेश के माहौल और संभावित विकास के अनुमान का खाका होती है। हालिया सूची में हमारी स्थिति में पिछले वर्ष के मुकाबले बहुत मामूली सुधर हुआ है और महज एक पायदान ऊपर चढ़कर हम 130वें स्थान पर पहुंचे हैं। यह मोदी सरकार के उन वादों से कोसों दूर है, जिसमें भारत को शीर्ष 50 देशों में शुमार किए जाने की बात कही गई थी।
बेशक इस सूची के गुणा-भाग के तरीके पर सवाल उठाया जा सकता है, मगर कुछ मामलों में हमारी गति वाकई निराशाजनक है। कारोबार को शुरू करने, निर्माण-कार्यों की अनुमति लेने, कर्ज मिलने और दिवालियेपन का समाधान निकालने में हम उम्मीद के मुताबिक काम नहीं कर सके हैं। जाहिर है, इस संदर्भ में छोटे से छोटे फैसले लेने और केंद्र और राज्यों के बीच नीतिगत मामलों में सामंजस्य बनाने की दरकार है। हमें अपनी गति दोगुनी करनी होगी, तभी इस सूची में हम अपना प्रदर्शन बेहतर कर सकते हैं। मेरा मानना है कि नीति आयोग के उपाध्यक्ष के नेतृत्व में नीति आयोग, औद्योगिक नीति व संवर्धन विभाग (डीआईपीपी) और वित्त मंत्रालय का एक संयुक्त कार्य समूह बनाया जा सकता है, जो इस दिशा में काम करे।
मेरा मानना है कि मोदी सरकार द्वारा उठाए गए कदमों से मिले फायदे को हमें यूं ही जाया नहीं होने देना चाहिए। दूसरा संदर्भ नई नौकरियों के सृजन से जुड़ा है। मैं हाल ही में एक टीवी-डिबेट में शामिल हुआ था, जहां सभी की यही राय थी कि अगर हर महीने दस लाख नौकरियां पैदा करनी हैं, तो हमें नई रणनीति अपनानी ही होगी। रणनीति की इसलिए भी दरकार है, क्योंकि प्रौद्योगिकी में बदलाव, डिजिटल प्लेटफॉर्म, इंटरनेट के विस्तार और चौथी औद्योगिक क्रांति की वजह से नौकरियां जितनी तेजी से खत्म हो रही हैं, उतनी तेजी से पैदा नहीं हो रहीं। विश्व बैंक का अनुमान है कि विध्वंसकारी तकनीकी बदलाव के कारण करीब 68 फीसदी भारतीयों की नौकरियां खतरे में हैं।
बेशक तकनीकी समावेशन को रोककर हम खुद को स्पर्धा से बाहर नहीं कर सकते। मगर जिन तकनीकों का चरित्र श्रमिकों का विस्थापन है, उसे लेकर नए दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। चीन का उदाहरण हमारे सामने है, जहां मजदूरी की दरों में उल्लेखनीय इजाफा होने के कारण श्रम-प्रधान उद्योग विकल्प के रूप में देखे जाने लगे हैं। भारत में भी कपड़ा, रत्न व आभूषण, चमड़ा, हार्डवेयर, इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे श्रम-प्रधान उद्योगों को लेकर काम किए जाने की जरूरत है। नीति आयोग ने कुछ कदम जरूर उठाए हैं, मगर श्रम कानूनों (जो अब राज्य के अधिकार-क्षेत्र में है), भूमि अधिग्रहण की मंजूरी और अन्य नीतिगत बदलावों पर जल्दी से जल्दी काम नहीं किया गया, तो हम यह अवसर गंवा सकते हैं।
महज यह मान लेना कि हमारी पहल ही पर्याप्त नौकरियां पैदा करने के लिए काफी होगी, इस मामले को सतही तौर पर देखना होगा। स्किल इंडिया कार्यक्रम को अगर अत्याधुनिक बनाना है, तो हमें 21वीं सदी के अनुकूल शिक्षा और कौशल को बढ़ावा देना होगा। इससे जुड़े कार्यक्रमों में सुधार करने होंगे। इसके साथ, सामाजिक क्षेत्रों की नीतियों को भी इसके अनुकूल बनाना होगा। अगर हम ऐसा करने में सफल रहे, तो यकीन मानिए कि नौकरी के हिसाब से यह न सिर्फ ग्रामीण भारत के लिए, बल्कि तकनीक में बदलाव के कारण ‘बेरोजगार’ होने वाले भारत के लिए भी काफी सुखद रहेगा। यह दौर सचमुच खत्म होना चाहिए, जिसमें विकास तो हो रहा है, मगर बेरोजगारी भी है। यह तभी संभव है, जब रोजगार का लगातार सृजन हो और विकास-दर सतत गति से आगे बढ़े। जाहिर है, भारत अभी बदलाव के चौराहे पर है।

राजनीतिः जोखिम में बच्चों की जिंदगी | अरविंद कुमार सिंह

बच्चे राष्ट्र की थाती हैं। भविष्य हैं। पर दुर्भाग्य है कि आज उनका जीवन संकट में है। वे विभिन्न प्रकार के गंभीर रोगों का सामना कर रहे हैं और उचित इलाज के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। चंद रोज पहले यूनिसेफ की सालाना रिपोर्ट ‘स्टेट आॅफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रेन’ से खुलासा हुआ है कि अगर समय रहते दुनिया के देश बच्चों के स्वास्थ्य और स्वच्छता को लेकर जागरूक नहीं हुए तो आने वाले वर्षों में उनकी मृत्यु दर में भारी इजाफा होगा। भारत दुनिया के उन देशों में शुमार हो जाएगा जो बच्चों की मौत के मामले में शीर्ष पर हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015 में भारत में कुल बारह लाख बच्चों की मौत हुई और अगर भारत संजीदगी नहीं दिखाता है तो वर्ष 2030 तक दुनिया भर में अपने पांचवें जन्मदिन से पहले दम तोड़ने वाले सबसे अधिक बच्चों की तादाद भारत में होगी।
गौरतलब है कि पिछले साल दुनिया भर में पांच साल से कम उम्र के तकरीबन 59 लाख बच्चों की मौत स्वच्छता और सेहत के प्रति उदासीनता के कारण हुई जिनमें सर्वाधिक संख्या भारतीय बच्चों की रही। रिपोर्ट में अनुमान व्यक्त किया गया है कि आगामी पंद्रह वर्षों में तकरीबन 16 करोड़ 70 लाख लोग गरीबी के चक्रव्यूह में होंगे, जिनमें छह करोड़ नब्बे लाख ऐसे बच्चे होंगे जिनकी सेहत पर ध्यान नहीं दिया गया तो वे काल के गाल में समा जाएंगे। रिपोर्ट में आशंका व्यक्त की गई है कि मरने वाले बच्चों में ज्यादातर गरीब परिवारों के होंगे और इन मौतों का प्रमुख कारण गरीबी व कुपोषण होगा। भारत के लिए चिंता की बात यह है कि ढेर सारे आर्थिक व सामाजिक कार्यक्रमों के बाद भी कुपोषण को मिटाया नहीं जा सका है। यह सही है कि इस मामले में देश में पिछले दो दशक में कुछ प्रगति हुई है जिससे पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर में कमी आई है। लेकिन चिंता की बात यह है कि विकसित देशों के मुकाबले भारत में अब भी शिशु मृत्यु दर में अपेक्षित कमी दर्ज नहीं हुई है।
आंकड़ों के मुताबिक फिलहाल भारत में प्रति एक हजार शिशुओं पर शिशु मृत्यु दर 48 है जबकि विकसित देशों में यह दर 5 है। विशेषज्ञों की मानें तो भारत में बच्चों की उच्च मृत्यु दर का मूल कारण समय-पूर्व जन्म व प्रसव संबंधी जटिलताओं के अलावा बच्चों में पनपने वाली बीमारियों के प्रति उपेक्षात्मक रवैया है। यह तथ्य है कि निमोनिया, डायरिया व सेप्सिस जैसी घातक बीमारियों से बच्चों की मौत हो रही है लेकिन इससे निपटने के लिए ठोस रणनीति का अभाव है। ‘स्टेट आॅफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रेन’ रिपोर्ट में कहा गया है कि पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका तथा दक्षिण व पश्चिम एशियाई क्षेत्रों में पांच साल से कम आयु के शिशुओं की मौत का मुख्य कारण निमोनिया तथा पेचिश जैसी बीमारियां हैं और इनमें सर्वाधिक बच्चे गरीब तबके के थे।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दक्षिण एशिया में, शिशु मृत्यु दर ही नहीं बल्कि नवजातों की मृत्यु दर के मामले में भी, दुनिया के अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा स्थिति गंभीर है, और शिशु मृत्यु दर के मामले एक क्षेत्र-विशेष में केंद्रित होते जा रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक साल 2015 में जहां अस्सी फीसद ऐसे मामले दक्षिण एशिया और उप-सहारा अफ्रीकी क्षेत्र में हुए वहीं इनमें से आधे डेमोक्रेटिक रिपब्लिकन आॅफ कांगो, इथोपिया, भारत, नाइजीरिया और पाकिस्तान में देखने को मिले। रिपोर्ट में ताजा आंकड़ों के हवाले से कहा गया है कि गरीबी के कारण दुनिया में इस समय 15 करोड़ बाल मजदूर हैं और करीब 5 करोड़ 60 लाख बच्चे 2014 में स्कूल छोड़ गए हैं। अशिक्षा और गरीबी के कारण हर साल अठारह वर्ष से कम आयु की डेढ़ करोड़ बच्चियों का जबरन विवाह किया जा रहा है। यही नहीं, शारीरिक रूप से अक्षम लाखों बच्चे अपनी इस स्थिति के कारण हाशिए पर धकेले जा रहे हैं या फिर शिक्षा से वंचित हो रहे हैं।
अशिक्षा व गरीबी के कारण बच्चों तथा उनके परिवारीजनों में जागरूकता की कमी है और वे आसानी से किस्म-किस्म की गंभीर बीमारियों के शिकार बन रहे हैं। सच तो यह है कि बच्चों के जन्म लेने के बाद उनके बचने और एक बेहतर जीवन जीने की संभावनाएं बहुत हद तक उनके परिवार की सामाजिक व आर्थिक स्थिति तथा जन्म के हालात पर निर्भर करती है। तथ्य यह भी है कि आज की तारीख में कुपोषण और बीमारी की वजह से दुनिया में सबसे ज्यादा कमजोर और अविकसित बच्चे भारत में हैं। उनकी संख्या तकरीबन 4.8 करोड़ है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रिपोर्ट से उद््घाटित हो चुका है कि अफ्रीका की तुलना में भारत में दोगुने बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। सरकार के आंकड़ों पर गौर करें तो देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में जन्म लेने वाले कुपोषित बच्चों की संख्या पचास फीसद से अधिक है। दरअसल, कुपोषण का मुख्य कारण गरीबी तो है ही, साफ-सफाई की खराब हालत, शौचालयों की गंदगी व स्वच्छ पानी की कमी भी इसके लिए जिम्मेवार है। पिछले दिनों अंतरराष्ट्रीय विकास दानदाता संस्था ‘वॉटर एड’ की रिपोर्ट के मुताबिक पांच साल से कम उम्र के हर पांच में से दो बच्चे अविकसित हैं जिससे उनका शारीरिक, संज्ञात्मक और भावनात्मक विकास प्रभावित हो रहा है। उल्लेखनीय है कि 1.03 करोड़ अविकसित बच्चों के साथ नाइजीरिया और 98 लाख ऐसे बच्चों के साथ पाकिस्तान दूसरे व तीसरे स्थान पर हैं। दुनिया के सबसे नए देशों में से एक दक्षिण पूर्वी एशिया का पूर्वी तिमोर इस सूची में पहले स्थान पर है। यहां की आबादी के अनुपात में अविकसित बच्चों का प्रतिशत सबसे ज्यादा, 58 फीसद है।
यहां ध्यान देना होगा कि जीवन के पहले दो साल में बच्चे के कुपोषित होने के कारण कम विकास और कमजोरी की समस्या उत्पन होती है, और यह पूरे जीवन को प्रभावित करती है। यहां चिंता की बात यह है कि उस उम्र के बाद इसे सुधारा नहीं जा सकता। इस रिपोर्ट में भारत के संदर्भ में कहा गया है कि बड़ी संख्या में लोगों के पास शौचालयों की पर्याप्त सुविधा नहीं है, इसलिए यहां खुले में शौच करने वाले लोगों की संख्या भी ज्यादा है। शोध से यह उद्घाटित हुआ है कि खुले में शौच और कमजोर बच्चों की बढ़ती संख्या में गहरा संबंध है। पर्यावरण में मौजूद मल हाथों और आसपास के इलाकों को प्रदूषित कर देता है और उससे रोग व संक्रमण तेजी से फैलते हैं। शोध में कहा गया है कि कुपोषण के पचास फीसद मामलों की वजह संक्रमण खासकर लंबे समय तक चलने वाला अतिसार है। यह साफ पानी की कमी और साबुन से हाथ न धोने जैसे कारणों से होता है।
एक आंकड़े के मुताबिक भारत में पांच साल से कम उम्र के तकरीबन 1 लाख 40 हजार बच्चे हर साल मूलभूत सुविधाओं की कमी के कारण होने वाले डायरिया संबंधी रोगों के चलते मौत के मुंह में चले जाते हैं। गौर करें तो भारत समेत दुनिया भर में करीब साढ़े छह करोड़ लोगों के पास साफ पेयजल की सुविधा नहीं है। इसी तरह तेईस लाख लोग सफाई की मूलभूत सुविधा से वंचित हैं। नतीजतन, गंभीर रोगों का संकट बढ़ता जा रहा है। विडंबना यह भी कि परिवार बच्चों के खानपान और सेहत को लेकर भी गंभीर नहीं हंै। जंक फूड और बैठे-बैठे गेम्स खेलने की आदत के कारण बच्चों में मोटापा बढ़ता जा रहा है जो कि कई बीमारियों का कारण है।
कुछ दिन पहले जारी किए गए एक शोध से खुलासा हुआ है कि 2025 तक पांच से सत्रह साल के 2.68 करोड़ बच्चों के मोटापे से प्रभावित होने का अनुमान है। बढ़ती जनसंख्या के संदर्भ में हुए शोध के मुताबिक 2010 में जहां मोटे बच्चों की संख्या 2.19 करोड़ थी, वह 2025 में बढ़ कर 2.68 करोड़ हो जाएगी। शोधपत्र के सह लेखक ‘वर्ल्ड ओबेसिटी फेडरेशन’ (लंदन) के टिम लेबेस्टीन की मानें तो यह अनुमान चिकित्सा क्षेत्र के मैनेजरों और पेशेवरों के लिए खतरे की घंटी होना चाहिए और उन्हें मोटापे के कारण बढ़ती बीमारियों की रोकथाम के प्रयास करने होंगे। अच्छी बात यह है कि बाल अधिकार के लिए काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ ने पांच बीमारियों के संयुक्त टीके के लिए चार भारतीय समेत छह कंपनियों से करार किया है, जिससे हर वर्ष सत्तावन लाख बच्चों की जान बचाई जा सकेगी।
यूनिसेफ के मुताबिक इस करार के फलस्वरूप यह टीका मौजूदा दाम से आधे दाम पर मिलेगा। यानी इसे प्रति खुराक एक डॉलर से भी कम की दर पर खरीदा जा सकेगा। विशेषज्ञों की मानें तो वर्ष 2017 से 2020 के दौरान तकरीबन अस्सी देशों में इस टीके की पैंतालीस करोड़ खुराक भेजी जा सकेगी, जिससे हर वर्ष पांच साल से कम उम्र के लाखों बच्चों की जिंदगी बचेगी। गौरतलब है कि यह टीका एक साथ डिफ्थेरियम, टिटनेस, पर्टूटिस, हेपेटाइटिस बी तथा टाइप-बी हीमोफिलस इंफ्लुएंजा (हिब) से बच्चों को बचाएगा। उल्लेखनीय है कि हिब एक जीवाणु है जिसके संक्रमण से मेनिनजाइटिस, निमोनिया तथा ओटिटिस जैसी घातक बीमारियां होती हैं। लेकिन इस टीके के जरिए इन बीमारियों से छुटकारा मिलेगा और बच्चों की मृत्यु दर कम होगी।

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