Monday, October 3, 2016

सिस्टम का शिकार आदिवासी समाज

 एक आंकड़े के मुताबिक आदिवासी बच्चों की मृत्यु दर राष्ट्रीय औसत से दोगुना स्तर पर पहुंच गई है। एक रिपोर्ट से उद्घाटित हुआ है कि जनजातीय बच्चों की मृत्यु दर 35.8 है जबकि राष्ट्रीय औसत दर 18.4 फीसद है। इसी तरह जनजातीय शिशु मृत्यु दर 62.1 फीसद है जबकि राष्ट्रीय शिशु मृत्यु दर 57 फीसद है। गौर करें तो यह आंकड़ा भारत की सांस्कृतिक विविधता पर मंडराते किसी खतरे से कम नहीं है। गत वर्ष पहले संयुक्त राष्ट्र संघ की ‘द स्टेट आफ द वल्र्डस् इंडीजीनस पीपुल्स’ नामक रिपोर्ट में भी कहा गया कि मूलवंशी और आदिम जनजातियां भारत समेत संपूर्ण विश्व में अपनी संपदा, संसाधन और जमीन से वंचित व विस्थापित होकर विलुप्त होने के कगार पर है। रिपोर्ट में कहा गया है कि खनन कार्य के कारण हर रोज हजारों जनजाति परिवार विस्थापित हो रहे हैं और उनकी सुध नहीं ली जा रही है। विस्थापन के कारण उनमें गरीबी, बीमारी और बेरोजगारी बढ़ रही है। गत माह पहले प्रकाशित नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे से खुलासा हुआ है कि कोलम (आंध्रप्रदेश और तेलंगाना) कोरगा (कर्नाटक) चोलानायकन (केरल) मलपहाडिय़ा (बिहार) कोटा (तमिलनाडु) बिरहोर (ओडिसा) और शोंपेन (अंडमान और निकोबार) के विशिष्ट संवेदनशील आदिवासी समूहों की तादाद घट रही है। इसका मुख्य कारण बीमारी और विस्थापन है। भारत में कुपोषण, गरीबी और सेहत को बनाए रखने के लिए जरूरी संसाधनों के अभाव और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के कारण आज आदिवासी समाज अमानवीय दशा में जीने को मजबूर हैै। गौर करें तो इसके लिए देश की सरकारें जिम्मेदार हैं। 25 अक्टूबर 1980 को वन-संरक्षण अधिनियम लागू किया गया। इस कानून की मंजूरी ने लाखों आदिवासियों को उनकी जमीन से बेदखल कर दिया। सैकड़ों वर्षों से जिस भूमि को वे अपनी मातृभूमि समझ सहेजते-संवारते रहे वह उनके हाथ से निकल गई। अपनी ही जमीन पर वे पराया हो गए। उनके बीच संदेश गया कि सरकार उनके खिलाफ है और येन-केन-प्रकारेण उनकी जमीन हड़पकर पूंजीपतियों को देना चाहती है। लिहाजा उनके मन में आक्रोश उपजने लगा। वे अपनी जमीन बचाने के लिए हिंसा पर उतर आए। सरकार भी उनपर आपराधिक मुकदमे ठोकने लगी। इस स्थिति ने जंगल का माहौल खराब कर दिया। नक्सली इसका फायदा उठाने में सफल रहे। आज स्थिति यह है कि आदिवादी समाज अपने को ठगा महसूस कर रहा है। उसके पास न तो जीविका का कोई साधन रह गया है और न ही रोजगार की संभावना। वनों की अंधाधुंध कटाई जारी है। सरकार को जनजातियों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के अलावा सामाजिक समस्याओं पर भी गौर फरमाना होगा जो परसंस्कृति ग्रहण के कारण उन्हें दोराहे पर खड़ा कर दिया है जिससे न तो वह अपनी संस्कृति बचा पा रहे हैं और न हीे आधुनिकता से लैस होकर राष्ट्र की मुख्य धारा में ही शामिल हो पा रहे हैं। बीच की स्थिति के कारण उनकी सभ्यता और संस्कृति दोनों दांव पर हैैै। 2006 में केंद्र सरकार ने वनाधिकार मान्यता कानून को पारित किया। उसका मकसद आदिवासियों को उनका हक देना था। लेकिन इस कानून के जटिल प्रावधानों ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दीं। वे सरकार से इस कानून में बदलाव की मांग कर रहे हैं।
विडंबना यह है कि जिन क्षेत्रों में आदिवासियों को उजाडक़र सरकारें उनकी आवास व खेती की जमीनों को अधिग्रहित कर रही हैं उन क्षेत्रों में विस्थापन को लेकर विकट समस्या उत्पन हो गई है। अपनी जमीन गंवाने के बाद उनके पास जीविका का कोई साधन नहीं रह गया है। कल तक वे जंगल के राजा कहे जाते थे आज वे मौत को गले लगाने को तैयार हैं। आर्थिक तंगी से परेशान होकर अपराध की दुनिया में कदम रख रहे हैं। विस्थापित किए गये आदिवासियों के लिए सरकार के पास न तो कोई पुनर्वास संबंधी नीति है और न ही उन्हें रोजी-रोजगार से जोडऩे का कोई नायाब तरीका। ऐसे में अगर कोई दाना मांझी अपनी मृत पत्नी के शव को कंधे पर ढोने को मजबूर होता है तो आश्चर्य किस बात का!

राजनीतिः गांधी के सपनों का स्वराज | श्रीभगवान सिंह


महात्मा गांधी अपनी ‘स्वराज’ या ‘स्वराज्य’ संबंधी अवधारणा को जीवनपर्यंत परिभाषित करते रहे। हिंदुस्तान के संदर्भ में उन्होंने जिस स्वराज की परिकल्पना की थी, उसके केंद्र में थी गांवों की स्वायत्त, स्वावलंबी अर्थ एवं प्रबंधन सत्ता। उनकी दृष्टि में गांवों की संपन्नता में ही देश की संपन्नता तथा गांवों की स्वायत्त पंचायती व्यवस्था में ही देश की सच्ची प्रजातांत्रिक छवि अभिव्यक्ति पा सकती थी। उनका मानना था कि भारत चंद शहरों में नहीं, बल्कि सात लाख गांवों में बसा हुआ है और इस सोच के अनुरूप उन्होंने किसानों को राष्ट्रीय आंदोलन में व्यापक पैमाने पर शामिल किया।गांधी ने 1920 से स्वाधीनता संग्राम का नेतृत्व संभाला, तो उनके लिए भारत के शहरों का नहीं, बल्कि सात लाख गांवों के पुनर्निर्माण का मुद््दा अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा। यही कारण था कि उन्होंने देश की राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ ग्रामोद्योग, ग्राम-स्वराज्य जैसी योजनाओं की परिकल्पना का भी अपने रचनात्मक कार्यक्रमों में समावेश किया। हिंद स्वराज्य की परिकल्पना को उन्होंने ग्राम-स्वराज्य का पर्याय बना दिया।
गांधीजी अपने कई भाषणों एवं लेखों में ग्राम-स्वराज्य के संबंध में अपनी योजनाओं की रूपरेखा प्रस्तुत करते रहे, जिसका सिलसिला 1909 में लिखी उनकी पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ से लेकर जीवनपर्यंत चलता रहा। मसलन, ‘हरिजन सेवक’ नामक पत्र के 2 अगस्त, 1942 के अंक में उन्होंने ‘ग्राम-स्वराज्य’ की चर्चा करते हुए लिखा- ‘‘ग्राम-स्वराज्य की मेरी कल्पना यह है कि वह एक ऐसा पूर्ण प्रजातंत्र होगा, जो अपनी अहम जरूरतों के लिए अपने पड़ोसी पर भी निर्भर नहीं करेगा; और फिर भी बहुतेरी दूसरी जरूरतों के लिए- जिनमें दूसरों का सहयोग अनिवार्य होगा- वह परस्पर सहयोग से काम लेगा। इस तरह हर एक गांव का पहला काम यह होगा कि वह अपनी जरूरत का तमाम अनाज और कपड़े के लिए कपास खुद पैदा कर ले। उसके पास इतनी सुरक्षित जमीन होनी चाहिए जिसमें ढोर चर सकें और गांव के बड़ों व बच्चों के लिए मनबहलाव के साधन और खेल-कूद के मैदान वगैरा का बंदोबस्त हो सके। हर एक गांव में गांव की अपनी एक नाटकशाला, पाठशाला और सभा-भवन रहेगा। पानी के लिए उसका अपना इंतजाम होगा- वाटर वर्क्स होंगे- जिससे गांव के सभी लोगों को शुद्ध पानी मिला करेगा। कुओं और तालाबों पर गांव का पूरा नियंत्रण रख कर यह काम किया जा सकता है। बुनियादी तालीम के आखिरी दरजे तक शिक्षा सबके लिए लाजिमी होगी। जहां तक हो सकेगा, गांव के सारे काम सहयोग के आधार पर किए जाएंगे। जात-पांत और क्रमागत अस्पृश्यता के जैसे भेद आज हमारे समाज में पाए जाते हैं, वैसे इस ग्राम-समाज में बिल्कुल नहीं रहेंगे।’’
इसी लेख में वह यह भी कहते हैं ‘‘सत्याग्रह और असहयोग के शस्त्र के साथ अहिंसा की सत्ता ही ग्रामीण समाज का शासन बल होगी।… गांव का शासन चलाने के लिए नियमानुसार एक खास निर्धारित योग्यता वाले गांव के बालिग स्त्री-पुरुषों को अधिकार होगा कि वे अपने पंच चुन लें। इन पंचायतों को सब प्रकार की आवश्यक सत्ता और अधिकार रहेंगे। चूंकि इस ग्राम स्वराज में आज के प्रचलित अर्थों में सजा या दंड का कोई रिवाज नहीं रहेगा, इसलिए यह पंचायत अपने एक साल के कार्यकाल में स्वयं ही धारा सभा, न्याय सभा और कार्यकारिणी सभा का सारा काम संयुक्त रूप से करेगी।… इस ग्राम शासन में व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर आधार रखने वाला संपूर्ण प्रजातंत्र काम करेगा। व्यक्ति ही इस सरकार का निर्माता भी होगा। उसकी सरकार और वह दोनों अहिंसा के वश होकर चलेंगे। अपने गांव के साथ वह सारी दुनिया की शक्ति का मुकाबला कर सकेगा।’’
ग्राम-स्वराज्य के लिए और वांछनीय चीजों की चर्चा करते हुए गांधी जी ने ‘हरिजन सेवक’ के दस नवंबर 1946 के अंक में लिखा- ‘‘देहात वालों में ऐसी कला और कारीगरी का विकास होना चाहिए, जिससे बाहर उनकी पैदा की हुई चीजों की कीमत की जा सके। जब गांवों का पूरा-पूरा विकास हो जाएगा, तो देहातियों की बुद्धि और आत्मा को संतुष्ट करने वाली कला-कारीगरी के धनी स्त्री-पुरुषों की गांवों में कमी नहीं रहेगी। गांव में कवि होंगे, चित्रकार होंगे, शिल्पी होंगे, भाषा के पंडित और शोध करने वाले लोग भी होंगे। थोड़े में, जिंदगी की ऐसी कोई चीज न होगी जो गांव में न मिले। आज हमारे गांव उजड़े हुए और कूड़े-कचरे के ढेर बने हुए हैं। कल वहीं सुंदर बगीचे होंगे और ग्रामवासियों को ठगना या उनका शोषण करना असंभव हो जाएगा।’’
संक्षेप में यही थी गांधी की ग्राम-स्वराज्य संबंधी परिकल्पना, जिसे मूर्त करते हुए वे गांवों की पुनर्रचना करने का सपना संजोए हुए थे और इसी में वे हिंद स्वराज को मूर्त होते हुए देखना चाहते थे। लेकिन हम सबको मालूम है कि आजादी मिलने के बाद अपनी परिकल्पना के अनुरूप गांवों की पुनर्रचना करने का अवसर गांधी को सुलभ नहीं हुआ। अवसर सुलभ हुआ उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी प्रधानमंत्री बने जवाहरलाल नेहरू को, जिन्होंने पश्चिमी उद्योग-शिल्प-मशीनीकरण को प्रमुखता देने में ही कृषि-प्रधान देश रहे भारत की उन्नति देखी। स्वातंत्र्योत्तर भारत में मशीनीकरण की जो हवा चली उसने न केवल गांधी परिकल्पित ग्राम-स्वराज्य को, बल्कि गांवों में सदियों से चले आ रहे हस्त-उद्योगों को भी तहस-नहस करके रख दिया। आज की तारीख में गांवों में कुम्हार, बढ़ई, लोहार, बुनकर, ठठेरा (बर्तन बनाने वाले), मोची आदि सभी के हस्त-उद्योग समाप्तप्राय हो चुके हैं और इनकी जगहों पर बड़ी-बड़ी कंपनियों, फैक्टरियों के उत्पादित माल ने कब्जा कर लिया है।
सच तो यह है कि गांवों के आर्थिक स्वावलंबन के आधार रहे ग्रामोद्योग का जितना विनाश ब्रिटिश शासन ने नहीं किया, उससे कई गुना अधिक विनाश हमारे देशी शासन-तंत्र ने किया है विगत सात दशकों में। ग्रामोद्योगों के विनाश का भयावह दुष्परिणाम यह हुआ कि गांव उद्योग-विहीन हो गए और वहां के युवक रोजगार के अभाव में शहरों की ओर या फिर खाड़ी देशों की ओर रोजगार के लिए पलायन करने लगे हैं। आज का यह परिदृश्य तुलसीदास की इस व्यथा का स्मरण करा देता है- ‘जीविका विहीन लोग सीद्यमान सोच बस, कहैं एक एकन सों, कहा जाई का करी?’
इसमें दो मत नहीं कि कृषि-यंत्रों के चलन ने खेती को सुविधाजनक बनाया, पर इसका अनिष्टकारी पक्ष इस रूप में प्रकट हुआ कि इसके कारण खेतिहर मजदूरों के लिए रोजगार के अवसर कम हो गए। यही नहीं, इससे पशु-धन के समाप्त होने जाने का भी संकट आ खड़ा हुआ। ट्रैक्टर, थे्रसर, बोरिंग मशीन आदि ने हल, दवनी, रहट आदि के काम आने वाले बैलों की उपयोगिता खत्म कर दी। गाय-भैंस जैसे दुधारू मवेशियों की भी संख्या कम होती जा रही है, क्योंकि इन मवेशियों को पालने-पोसने में सिर्फ नौकरी के लिए आकुल-व्याकुल पीढ़ी की दिलचस्पी कम होती जा रही है। जो पंचायत-व्यवस्था गांवों में सौहार्द कायम रखने की भूमिका निभाती आई थी, उसमें भी चुनावी राजनीति के कीटाणु घुसपैठ करते जा रहे हैं। आज आलम यह है कि मुखिया, सरपंच, प्रमुख आदि के चुनाव में वोट खरीदे जा रहे हैं, मारपीट से लेकर हत्याएं तक हो रही हैं।

यह सब देखते हुए मानना पड़ता है कि स्वतंत्र भारत में जिस ग्राम-स्वराज्य के रास्ते गांधी हिंद स्वराज्य का सपना साकार होते देखना चाहते थे और जिस पंचायती राज के निमित्त हमारे संविधान में नीति-निदेशक तत्त्वों का सन्निवेश किया गया, उससे हमारे आज के गांव कोसों दूर होते जा रहे हैं। वास्तव में विकास के नाम पर शहरीकरण, मशीनीकरण दैत्याकार रूप में फैलते जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ गांवों की रौनक कूच करती जा रही है। कृषि व कुटीर उद्योगों वाली आधारभूत संरचना के नष्ट होते जाने से गांव वीरानगी के शिकार होते जा रहे हैं। गांवों से युवा-शक्ति का पलायन रोकना एक बहुत बड़ी चुनौती है हमारे सामने।
अब सवाल यह है कि इन गांवों में युवकों को रोजगार कैसे उपलब्ध कराए जाएं? इस समस्या का समाधान हम अंधाधुंध मशीनीकरण के कंधे पर सवार होकर हरगिज नहीं कर सकते। इसके लिए हमें वाई-फाई-कम्प्यूटर, लैपटॉप, ओटोमेशन का मार्ग छोड़ कर गांवों के पुराने पारंपरिक उद्योगों, जो शारीरिक श्रम पर आधारित थे, का पुनरुद्धार करना पडेÞगा। जैसे गांधीजी ने मिल के कपड़ों के विकल्प के रूप में चरखे का पुनरुद्धार किया, वैसे ही आज हमें फिर से सिंचाई के लिए बैल से चलने वाले रहट, बैल से चलने वाले गन्ना पेरने वाले कोल्हू, हाथ-करघा, हाथ के सहारे ढलने वाले बर्तन, लोहा-उद्योग आदि को सामने लाना होगा। मिट््टी की खुदाई-कटाई करने के लिए जेसीबी जैसी दैत्याकार मशीन की जगह हाथ की शोभा बढ़ाने वाले फावड़े को आगे करना होगा। मशीनों के अवैध प्रवेश पर अंकुश लगाना होगा। साथ ही शिक्षा-पद्धति के चरित्र में सुधार करते हुए उसमें शारीरिक श्रम के महत्त्व और गरिमा को प्रतिष्ठित करना होगा।

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