Saturday, April 16, 2016

दोराहा | जावेद अख़्तर

अपनी बेटी ज़ोया के नाम
 
ये जीवन इक राह नहीं
इक दोराहा है

पहला रस्ता बहुत सरल है
इसमें कोई मोड़ नहीं है
ये रस्ता इस दुनिया से बेजोड़ नहीं है
इस रस्ते पर मिलते हैं रिश्तों के बंधन
इस रस्ते पर चलनेवाले 
कहने को सब सुख पाते हैं
लेकिन
टुकड़े टुकड़े होकर 
सब रिश्तों में बँट जाते हैं
अपने पल्ले कुछ नहीं बचता
बचती है बेनाम सी उलझन
बचता है साँसों का ईंधन
जिसमें उनकी अपनी हर पहचान
और उनके सारे सपने
जल बुझते हैं
इस रस्ते पर चलनेवाले
ख़ुद को खोकर जग पाते हैं
ऊपर-ऊपर तो जीते हैं
अंदर-अंदर मर जाते हैं
 
दूसरा रस्ता बहुत कठिन है
इस रस्ते में कोई किसी के साथ नहीं है
कोई सहारा देनेवाला हाथ नहीं है
इस रस्ते में धूप है 
कोई छाँव नहीं है
जहाँ तस्सली भीख में देदे कोई किसी को
इस रस्ते में ऐसा कोई गाँव नहीं है
ये उन लोगों का रस्ता है
जो ख़ुद अपने तक जाते हैं
अपने आपको जो पाते हैं
तुम इस रस्ते पर ही चलना
 
मुझे पता है 
ये रस्ता आसान नहीं है
लेकिन मुझको ये ग़म भी है
तुमको अब तक 
क्यूँ अपनी पहचान नहीं है

वक़्त | जावेद अख़्तर

ये वक़्त क्या है?
ये क्या है आख़िर
कि जो मुसलसल[1] गुज़र रहा है
ये जब न गुज़रा था, तब कहाँ था
कहीं तो होगा
गुज़र गया है तो अब कहाँ है
कहीं तो होगा
कहाँ से आया किधर गया है
ये कब से कब तक का सिलसिला है
ये वक़्त क्या है

ये वाक़ये [2]
हादसे [3]
तसादुम[4]
हर एक ग़म और हर इक मसर्रत[5]
हर इक अज़ीयत[6] हरेक लज़्ज़त[7]
हर इक तबस्सुम[8] हर एक आँसू
हरेक नग़मा हरेक ख़ुशबू
वो ज़ख़्म का दर्द हो
कि वो लम्स[9] का हो ज़ादू
ख़ुद अपनी आवाज हो
कि माहौल की सदाएँ[10]
ये ज़हन में बनती
और बिगड़ती हुई फ़िज़ाएँ[11]
वो फ़िक्र में आए ज़लज़ले [12] हों
कि दिल की हलचल
तमाम एहसास सारे जज़्बे
ये जैसे पत्ते हैं
बहते पानी की सतह पर जैसे तैरते हैं
अभी यहाँ हैं अभी वहाँ है
और अब हैं ओझल
दिखाई देता नहीं है लेकिन
ये कुछ तो है जो बह रहा है
ये कैसा दरिया है
किन पहाड़ों से आ रहा है
ये किस समन्दर को जा रहा है
ये वक़्त क्या है

कभी-कभी मैं ये सोचता हूँ
कि चलती गाड़ी से पेड़ देखो
तो ऐसा लगता है दूसरी सम्त[13]जा रहे हैं
मगर हक़ीक़त में पेड़ अपनी जगह खड़े हैं
तो क्या ये मुमकिन है
सारी सदियाँ क़तार अंदर क़तार[14]
अपनी जगह खड़ी हों
ये वक़्त साकित[15] हो और हम हीं गुज़र रहे हों
इस एक लम्हें में सारे लम्हें
तमाम सदियाँ छुपी हुई हों
न कोई आइन्दा [16] न गुज़िश्ता [17]
जो हो चुका है वो हो रहा है
जो होने वाला है हो रहा है
मैं सोचता हूँ कि क्या ये मुमकिन है
सच ये हो कि सफ़र में हम हैं
गुज़रते हम हैं
जिसे समझते हैं हम गुज़रता है
वो थमा है
गुज़रता है या थमा हुआ है
इकाई है या बंटा हुआ है
है मुंज़मिद[18] या पिघल रहा है
किसे ख़बर है किसे पता है
ये वक़्त क्या है


शब्दार्थ:
  1. ऊपर जायें लगातार
  2. ऊपर जायें घटनाएँ
  3. ऊपर जायें दुर्घटनाएँ
  4. ऊपर जायें संघर्ष,टकराव
  5. ऊपर जायें हर्ष, आनंद, ख़ुशी
  6. ऊपर जायें तकलीफ़
  7. ऊपर जायें आनंद
  8. ऊपर जायें मुस्कराहट
  9. ऊपर जायें स्पर्श
  10. ऊपर जायें आवाज़ें
  11. ऊपर जायें वातावरण
  12. ऊपर जायें भूचाल
  13. ऊपर जायें दिशा, ओर
  14. ऊपर जायें पंक्ति दर पंक्ति
  15. ऊपर जायें ठहरा हुआ
  16. ऊपर जायें भविष्य
  17. ऊपर जायें भूतकाल
  18. ऊपर जायें जमा हुआ

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