Saturday, February 20, 2016

constraints faced by Indians regarding the medicine sector

The constraints faced by Indians regarding the medicine sector can be seen under the following heads –
1. Accessibility – 
(i) TN Model of Jan Aushadi Scheme has not been replicated in other parts of the country
(ii) Low health insurance coverage and leaving out certain widely used drugs(e.g. fot TB, diabetes etc.) out of price-ceiling regime
2. Affordability – 
(i) Calculation of drug prices is based on average of market-prices and not on cost-prices which has resulted in pharma companies fixing prices many times over production cost
(ii) While fixing price-ceilings, regional variability to accessibility to drugs was not factored in
3. Availability – 
(i) Issues of IPR, compulsory-licencing and export to developing countries has discouraged foreign investment
(ii) Low domestic research into drug-manufacturing due to shortage of funds, infrastructure in labs etc.
However, these constraints have also resulted in some positive development such as – 
1. A National Intellectual Property Policy is being drafted to ensure better IPR protection and improve foreign investments
2. 100% FDI in medical devices sector has been permitted which is expected to help in medicine-manufacturing
3. Impetus to traditional medicinal knowledge under the newly-formed Ministry of Ayush
4. Awareness campaigns under schemes like AMRIT etc.
Hence, we see that although there are constraints to easy drug-access, the government has been taking proactive measures to address the issue.

A Reply To Abhinav Kumar's Article



You Can Read Mr. Abhinav Kumar's Article Here-
http://indianexpress.com/article/opinion/columns/kanhaiya-kumar-delhi-policejnu-freedom-of-screech/

यकीनन बहुत कम लोग हैं जो black and white  के चश्मे के अलावा इस केस को देख पा रहे हैं. For detractors of JNU, it is a clear case of sedition. For supporters, it is about the autonomy of a university and freedom of speech. लेकिन मैं proud but fractionally unemployed Indian हूँ और मेरे पास enough time है कि अपनी सोच बस कुछ एक माध्यम से न बनाऊं और different articles और debates का भी सहारा लूँ. न तो JNU का student हूँ, और न ही BJP का supporter इसलिए यकीनन मैं कह सकता हूँ कि पुलिस ने अपनी ड्यूटी निभाई है, लेकिन क्या पूरी तरह से? ये देखना होगा.

यकीनन freedom of speech पे reasonable restrictions हैं लेकिन 'reasonable' ही हैं , जो ये कहते हैं -
in case of contempt & public disorder, it is clearly mentioned that reasonable restriction should not be arbitrary & impairment of freedom should be as little as possible (in Article 19(2)). IPC और CrPC में धाराएं भी हैं (505, 121 आदि) यकीनन सोच समझ के रखी गईं होगी और होनी भी चाहिए. जैसा आपने कहा preventive detention के भी प्रावधान हैं Indian Constitution में लेकिन unfortunately India is only democratic country where concept of preventive detention is present.

लेकिन मुद्दे ये सारे नहीं हैं, मुद्दा ये है कि FIR के बाद पुलिस ने primary enquiry के बाद जिसे पकड़ा (कन्हैया कुमार) और जिस वीडियो के आधार पे पकड़ा उसमें क्या वो ऐसे नारे लगाते दिख रहा है? या ये तो नहीं कि वो रोकने आया हो. ( जिस वीडियो के आधार पे पकड़ा गया मीडिया (ABP News and India  Today News channels) ने उसे कल ही 'doctored' बताया है. )

यकीनन पुलिस primary investigation के आधार पे पकड़ सकती है और ये उनकी ड्यूटी है औ एक दफे मान भी लूँ कि कन्हैया कुमार को पकड़ उन्होंने अपनी ड्यूटी निभाई है तो पटियाला हाउस कोर्ट में जो हुआ जिसमें violence involve  थी, नारेबाजी भी, और उसका वीडियो भी available है वहां पर तत्परता दिखाने में वो क्यों चूक गई और केस भी 'बस अज्ञात' लोगों के खिलाफ ही क्यूँ? जबकि videos, pictures में ढेर सारे चेहरे साफ़ दिख रहे हैं, JNU वाले वीडियो में तो कन्हैया कुमार का चेहरा साफ़ भी नहीं दिख रहा था. मंगलवार की इस घटना को पुलिस कमिशनर द्वारा मामूली बताना बुधवार को भी वैसे ही घटना का कारण बनता है और गुरुवार को वकीलों के बीच हुई हाथा-पाई का भी.

क्या कारण हैं कि तत्परतायें, duties सिर्फ एक ही तरफ दिखाई गई. अच्छा होता अगर duties biased न होती और दोनों बार निभाई जाती. लेकिन ऐसा अक्सर नहीं होता और जब दिल्ली में ही ऐसा नहीं होता तो देश के remote areas में तो छोड़ ही दो. जहां आज भी पुलिस colonial era के वक़्त की तरह ही behave करती है (बुन्देखण्ड में भी, जहाँ से मैं हूँ.). जहां पुलिस के आते ही लोग सहम जाते हैं.

क्यों पुलिस politically और economically strong लोगों के favour में ही ड्यूटी करती नज़र आती है? जो इस केस में भी करती नज़र आई. पुलिस हमारी रक्षा के लिए है लेकिन क्यों पुलिस के आते ही हम सुरक्षा नहीं डर महसूस करते हैं?

सर, आपके ही जैसे शब्दों में कहूँ तो आज सिर्फ ये नामजद केस न दर्ज़ करने के बारे में है, कल ये politically और economically strong लोगों के favour में लोगों को बेवजह जेल में डालने के बारे में होगा, और परसों fake encounters होंगे.
JNU के छात्रों को तो कभी मैंने अबतक आतंकियों को पनाह देते नहीं सुना लेकिन पुलिस को ऊपर लिखा सब करते ज़रूर सुना है.

यकीनन Policing a democracy was never going to be easy और लोगों को पुलिस को अपनी ड्यूटी निभाने देना चाहिए. मैं आपकी बात से पूर्णत: इत्तेफ़ाक़ रखता हूँ लेकिन अगर पुलिस अपनी ड्यूटी सही से निभा रही हो तब ही. हमारी पुलिस की छवि अच्छी नहीं है और क्यों? ये भी जगजाहिर ही है. अख़बार में आपके ऊपर के ही article ('Still Left Out' - Chistophe Jafrelot) में लिखा था कि police and judiciary need to change attitude towards SCs and STs.  यदि मैं इसे enlarge कर के कहूँ तो Police and judiciary need to change attitude towards SCs, STs, minorities and politically, economically and socially marginal sections of society.  और जब तक ऐसा नहीं होगा लोगों की उंगलियां और सवाल दोनों ही उठते रहेंगे.

Police Reforms जबतक नहीं आते, जिनकी आपको भी दरकार है और हमें भी, तब तक इतना तो किया ही जा सकता है.

--Vivek VK Jain

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