Thursday, February 11, 2016

वो शोख शोख नज़र सांवली सी एक लड़की / निदा फ़ाज़ली

वो शोख शोख नज़र सांवली सी एक लड़की
जो रोज़ मेरी गली से गुज़र के जाती है
सुना है
वो किसी लड़के से प्यार करती है
बहार हो के, तलाश-ए-बहार करती है
न कोई मेल न कोई लगाव है लेकिन न जाने क्यूँ
बस उसी वक़्त जब वो आती है
कुछ इंतिज़ार की आदत सी हो गई है
मुझे
एक अजनबी की ज़रूरत हो गई है मुझे
मेरे बरांडे के आगे यह फूस का छप्पर
गली के मोड पे खडा हुआ सा
एक पत्थर
वो एक झुकती हुई बदनुमा सी नीम की शाख
और उस पे जंगली कबूतर के घोंसले का निशाँ
यह सारी चीजें कि जैसे मुझी में शामिल हैं
मेरे दुखों में मेरी हर खुशी में शामिल हैं
मैं चाहता हूँ कि वो भी यूं ही गुज़रती रहे
अदा-ओ-नाज़ से लड़के को प्यार करती रहे

खट्टी चटनी जैसी माँ / निदा फ़ाज़ली

बेसन की सोंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ ,
याद आता है चौका-बासन, चिमटा फुँकनी जैसी माँ ।

बाँस की खुर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे ,
आधी सोई आधी जागी थकी दुपहरी जैसी माँ ।

चिड़ियों के चहकार में गूँजे राधा-मोहन अली-अली ,
मुर्गे की आवाज़ से खुलती, घर की कुंड़ी जैसी माँ ।

बीवी, बेटी, बहन, पड़ोसन थोड़ी-थोड़ी सी सब में ,
दिन भर इक रस्सी के ऊपर चलती नटनी जैसी मां ।

बाँट के अपना चेहरा, माथा, आँखें जाने कहाँ गई ,
फटे पुराने इक अलबम में चंचल लड़की जैसी माँ ।

लिखते लिखते

जब मैं कानून के पास जाता हूँ तो बकरी को कानून चर जाता है
जब वो कानून के पास जाते हैं तो कानून को बकरी चर जाती है.

वो कहते हैं, मुल्क़ में सब बराबर हैं, क्यूंकि दोनों वाक्यों में 'कानून' और 'बकरी' सामान रूप से उपस्थित हैं. आप भी आईएएस की प्रिपरेशन कीजिये जम्हूरियत के कोनों से लिखी किताबें डिप्लोमेट बना देंगी और आप चाशनी लगा के झूठ को ढाँपना सीख जायेंगे.

----

तुम्हें किताबों में लिखता अगर तो
सबकी हो जाती तुम
डायरी में लिखा इसलिए,
और वो डायरी खो गई घर बदलते.

खो गई तुम!
किताब बनाना बेहतर था,
फिर तो खरीद पाते.

--

एक शेर था,
दूसरा शेर था,
बाकि जंगल  था
'न किसी पे ज़ुल्म, न किसी पे किसी का हक़' वाला.

कुछ दिन एक शेर जंगल पे राज करता
कुछ दिन अगला.
कुछ दिन एक शेर छुपे चुपके जानवर खाता
कुछ दिन अगला.

जंगल का मोटो था-
राजा प्रजा है,
प्रजा राजा है.
न कोई मरेगा, न कोई मारेगा.


लेकिन
न एक शेर दूसरे को जानवर खाने से रोकता
न दूसरा शेर पहले को जानवर खाने से रोकता.

इस तरह राज चलता रहा
जंगल में सौहार्द बना रहा.
प्रजा राजा की रही
राजा प्रजा का रहा.

मरे जानवर
कुछ खुद को दांत गढ़ा मर गए,
कुछ सांप्रदायिक दंगो में मर गए.
घोषित किये जाते रहे.
लोकतंत्र बचा रहा.

डेमोक्रेसी शेरों द्वारा
'मेनिपुलेटिंग पीपल फॉर  आउन बेनिफिट'
के अलावा क्या है?

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...