Sunday, December 11, 2016

नकदीरहित : अर्थतंत्र की मरीचिका

पांच सौ और हजार रु. के नोटों के बंद किए जाने को सही ठहराने के लिए ‘काले धन’ पर अंकुश लगने का जो दावा किया जा रहा है, उसके अलावा एक और तर्क यह दिया जा रहा है कि यह देश को एक ‘नकदीरहित’ अर्थव्यवस्था की ओर ले जाएगा.
बहरहाल, ‘काले धन’ के संबंध में इस बहुत ही भोली समझ की ही तरह कि ऐसा धन नोटों के बंडलों की ही शक्ल में जमा कर के रखा जाता है, यह दूसरी दलील भी हैरान करने वाले तरीके से भोलेपन पर आधारित है.
सारा का सारा पैसा बैंकिंग प्रणाली की देनदारी के रूप में हम अपने पास रखते हैं. बैंकों पर हमारे दावे दो तरीके से निर्मित होते हैं. पहला, जब हम बैंक में नकदी या अपने पक्ष में किसी और का जारी किया हुआ चैक जमा कराते हैं. दूसरा, जब हमारे कुछ भी जमा किए बिना ही बैंक हमें ‘ऋण’ देता है, या अपने ऊपर देनदारी का हमारा दावा स्वीकार कर लेता है, जैसा कि मिसाल के तौर पर केडिट कार्ड के मामले में होता है. बैंक किसी को भी ऋण तभी देता है जब ऋण हासिल करने वाले में ‘ऋण पात्रता’ हो यानी वह बैंक की नजरों में ऋण देने के लायक हो. दुर्भाग्य से करोड़ों भारतीय बैंकों की नजरों में ‘ऋण पात्र’ नहीं हैं. शहरी मध्य वर्ग के लिए, जिसके बीच से ज्यादातर आर्थिक नीति निर्माता आते हैं, क्रेडिट कार्ड हासिल करना आसान होता है. लेकिन देश की आबादी के अधिकांश हिस्से के मामले में ऐसा बिल्कुल नहीं है. इसलिए यह मानकर चलना कि आम जनता भी, पहले ही नकदी या चैक के माध्यम से उतना ही पैसा जमा कराए बिना ही, बैंकों पर भुगतान के दावे निर्मित कर सकती है, पूरी तरह से निराधार है.
वास्तव में इस तरह की बात सोचा जाना ही अपने आप में आश्चर्यजनक है क्योंकि यह एक जाना-माना तथ्य है कि हमारे देश के बैंक, जिन पर बैंक राष्ट्रीयकरण के बाद, खेती के लिए ‘प्राथमिकता क्षेत्र’ के तौर पर ऋण देने की शर्त लगाई गई थी, देश में नवउदारवादी व्यवस्था के आने के बाद से सुव्यवस्थित तरीके से अपनी उक्त जिम्मेदारी से हाथ खींचते आ रहे हैं. और बैंकों के इस तरह हाथ खींचे जाने को एक के बाद केंद्र में आई सरकारों द्वारा ‘प्राथमिकता क्षेत्र ऋण’ की परिभाषा को ही फैलाने के जरिए वैधता प्रदान की जाती रही है. इस परिभाषा को इतना ज्यादा फैला दिया गया है कि अब तो ग्रामीण क्षेत्र में किसी कृषि उत्पाद का उपयोग करने वाला कारखाना लगाने के लिए, किसी बहुराष्ट्रीय निगम को दिया जाने वाला ऋण भी ‘प्राथमिकता क्षेत्र ऋण’ में गिन लिया जाएगा.
इसके अलावा, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ही हैं जिन्हें अपनी इस तरह की कोताही को ढांपने की जरूरत पड़ती है. निजी बैंकों को और खास तौर पर विदेशी बैंकों को तो ऐेसे किसी आवरण की कोई जरूरत तक नहीं होती है. कुछ बैंकों ने तो साफ तौर पर यह बता भी दिया है कि उनसे लाखों किसानों से सीधे राब्ता रखने की उम्मीद नहीं की जाना चाहिए और इसके बजाए वे इस काम के लिए ‘सुगमता कारकों’ (बिचौलियों का जो व्यावहारिक मायनों में बैंक द्वारा वित्त पोषित निजी महाजनों की तरह काम करते हैं) का ही सहारा लेना चाहेंगे.
इन परिस्थितियों में यह अचरज की बात नहीं है कि किसान जनता अपनी ऋण संबंधी जरूरतों के लिए बढ़ते पैमाने पर महाजनों के एक नये वर्ग पर निर्भर होती गई है. महाजनों के इस नये वर्ग में बैंकों के ऋण का उपयोग करने वाले बिचौलिए, मुख्यत: स्वतंत्र स्त्रोतों का प्रयोग करने वाले निजी ऑपरेटर, कृषि-बिजनेस फर्मो के एजेंट तथा अन्य शामिल हैं. जो बात किसानों के बारे में सच है, वही लघु उत्पादन के अन्य क्षेत्रों के बारे में भी सच है. इसलिए जब तक अर्थव्यवस्था में एक ऐसा हिस्सा रहेगा जिसे वित्तीय संस्थाएं ‘ऋण पात्र’ नहीं मानती हैं, और इस हिस्से को ऋण के गैर-संस्थागत स्त्रोतों पर निर्भर रहना पड़ेगा (हमारे मामले में इस हिस्से में देश की आधी से ज्यादा कामकाजी आबादी आ जाती है), इसी कारण से नकदीरहित अर्थव्यवस्था की सारी बातें कोरी बतकही ही रह जाएंगी. अब अगर हम यह भी मान लें कि असंगठित क्षेत्र तक में ऐसा हरेक शख्स जिसे नकदी या चैक से कोई भी रकम मिलती है, उसे सीधे-सीधे बैंक में जमा करा देगा और इससे बनने वाले बैंक पर दावों का ही भुगतान करने के लिए या आगे लेन-देन के लिए इस्तेमाल करेगा. तब भी इसके लिए यह जरूरी होगा कि ऐसे शख्स को जिस किसी भी व्यक्ति को भुगतान करना हो, उसका अपना बैंक खाता हो.
संक्षेप में इसके लिए पूरी आबादी के करीब-करीब सार्वभौम बैंक कवरेज की जरूरत होगी, जबकि हमारे देश में अब तक बैंक कवरेज का आंकड़ा करीब 30 फीसद ही है. ऐसा इसलिए है कि ऐसी अर्थव्यवस्था में जिसमें सबसे बड़ी संख्या गरीबों की है जो तरह-तरह की ‘अनौपचारिक’ गतिविधियों से किसी तरह से अपना गुजारा चला लेते हैं, बैंकों को आबादी को सार्वभौम कवरेज मुहैया कराना फायदे नहीं नजर आता है. इतना ही नहीं अगर खुद जनता की नजर से भी देखा जाए तो जब तक उसे बैंकों से ऋण हासिल नहीं होता है, जो उन्हें लुटेरे महजानों के चंगुल से आजादी दिलाए, अपने हाथ में आने वाली सारी नकदी बैंक खाते में जमा कराना और आगे भुगतान करने के लिए, इस तरह बैंकों पर बनने वाली देनदारियों का उपयोग करना, उसके लिए पूरी तरह से निर्थक, अनावयक  तथा अनुपयोगी कसरत ही साबित होगा. इसके बजाए वे अपने हाथ में नकदी रखना तथा नकदी में भुगतान करना ही पसंद करेंगे क्योंकि इसमें यह फायदा भी है कि वे जिसे भी चाहें तथा जितना भी चाहें भुगतान कर सकते हैं, और इस पर रत्तीभर लागत नहीं आएगी. इसी वजह से वे यह भी चाहेंगे कि उनका भुगतान ‘नकदी’ में ही किया जाए.
इसके अलावा, अगर सरकार अर्थव्यवस्था को नकदीरहित बनाना चाहती है तब भी उसका मुद्रा के अमौद्रीकरण के जरिए जनता को ऐसा करने के लिए मजबूर करना शुद्ध तानाशाही का काम है. यह वाकई विडंबनापूर्ण है कि वही सरकार जो विदेशी पूंंजी को इसका भरोसा दिलाने में लगी हुई है कि भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की सबसे ‘उदार अर्थव्यवस्था’ है यानी विदेशी पूंजीपतियों को भारत में अपनी आर्थिक गतिविधियां चलाने की पूरी ‘स्वतंत्रता’ हासिल होगी, दूसरी ओर करोड़ों दरिद्र देशवासियों को हफ्तों के लिए ‘नकदीरहित’ रहने के लिए मजबूर कर रही है. इस सरकार को विदेशी पूंजीपतियों की स्वतंत्रता की तो परवाह है, लेकिन उसे खुद अपने नागरिकों की स्वतंत्रता की, जिस माध्यम से चाहें उसमें अपना लेन-देन करने की अपने देश के नागरिकों की स्वतंत्रता की, उसे कोई परवाह ही नहीं है.

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