Saturday, December 10, 2016

खुला ख़त गुलज़ार को

गुलज़ार,
यूं तो कुछ चीज़ें नवाज़िशों से ऊपर होती हैं, पर यह सच है कि जब आपको सिने दुनिया का सबसे बड़ा अवॉर्ड मिलने की ख़बर सुनते हैं तो खुशी का एक भीगा हुआ फाहा हमारे गालों को छू जाता है. दादा साहब फाल्के जहां भी होंगे, आज खुश होंगे.
नाम भी क्या ख़ूब रखा है, ‘गुलज़ार’. जो हमेशा खिला ही रहेगा. ताज़ादम बना रहेगा. उस पौराणिक और आध्यात्मिक से नजर आने वाले आले की तरह, जहां हर सुबह न जाने कौन एक ताजा फूल रख जाता है.
गुलज़ार दद्दा, इसी बहाने हम आपको अपने हिस्से की वो धूप दिखाना चाहते हैं, जो बीते बरसों में आपकी नज़्मों, नग़मों और फिल्मों से हमने चुराई है. आपके एहसासों के खजाने के इस्तेमाल से हमने ‘कभी रिप्लेस न किए जा सकने वाले’ अनगिन पल कमाए हैं. इसलिए हमारी ओर से एक शुक्राने की नमाज़ तो बनती है.
बचपन से ही शुरू करते हैं. जब हम चाय-पराठे खाकर जंगल बुक देखने बैठे थे और ‘चड्ढी पहनकर फूल खिला है’ सुनकर मस्त हो गए थे. इसे सुनकर ही हमने चड्ढी में शर्माना बंद किया था. हमें लगा था कि चड्ढी पहनकर इतराना इतनी बुरी चीज भी नहीं है. इसमें खिला भी जा सकता है.
फिर हम कुछ बड़े हो जाते हैं तो एक दिन धूल खाए स्टोर में चौथे दर्जे की एक कॉपी मिलती है. जिस पर कुछ तिरछे ढंग से लिखा हुआ हमारा एक नाम होता है. और एक खुशी होती है जो बयान नहीं की जा सकती. या कि लकड़ी की अलमारी के नीचे मिली वह पुरानी सी गेंद, जो अभी भी इस्तेमाल की जा सकती है. ठीक ऐसा ही लगता रहा, जब बरसों तक एक गीत सुनने के बाद हम किसी दिन अपने दोस्त से पूछते- ‘ये किसने लिखा है?’ तो वह कहता, ‘अफकॉर्स गुलज़ार’ और हम हर बार सुखद आश्चर्य से भर जाते कि ‘अच्छा ये भी गुलजार ने लिखा था!’
‘डोले रे डोले रे, नीला समंदर है आकाश प्याजी, डूबे न डूबे मेरा जहाजी’, सुनते हैं तो लगता है कि लिखने वाला बच्चा ही रहा होगा. गुलजार, आप सबके लिए अलग-अलग गुलजार हैं. नजर आने वाला गुलजार ऐसा है कि जैसे कवि न हो, हर रहस्य जानने वाला बुजुर्ग हो, जो कह रहा हो कि देखो बेटा कलफ लगा कुर्ता ऐसा लगता है. कभी ऐसा लगा कि पक्का ये गोलमाल वाले अमोल पालेकर का भाई है. छोटे कुर्ते का आख्यान हमने वहीं से पाया है.
थोड़े और बड़े हुए तो लगा कि गुलज़ार वो है जो संवेदनशील फिल्में बनाता है जिसे हमारे पापा जो गोविंदा छाप फिल्में नहीं देखते, भी देखने जाते हैं. माचिस, इजाजत, आंधी, मासूम, परिचय और भी ढेर सारी. फिर मिर्ज़ा ग़ालिब को पर्दे पर लाने की खुशनसीबी भी आप ही के हिस्से आई.
बहुत बाद में समझ आया कि गुलज़ार, आप सैकड़ों कंचों की एक पोटली की तरह हैं. जिसके पास जो कंचा आया, उसने उसी तरह समझ लिया. हमारा ख़्याल है कि आप इकलौते हैं जो हमारे बाबा से लेकर हमारे बेटे तक पसरे हुए हैं. नाना के लिए आप क़यामतख़ेज़ कहानियां फिल्माने वाले शख्स रहे होंगे. किसी के लिए गीत लिखने वाली शोख तोतली आवाज की बच्ची की तरह होंगे जो पोल्का डॉट्स वाले पायजामों में इतराती भी होगी. आप पर ऐसा यकीन बना कि गुलजार का लिखा डायनासोर होगा तो उसमें भी ‘क्यूटत्व’ खोजा जा सकेगा.
आपने अपनी बेटी का गोया आइसक्रीम-सा नाम रखा, ‘बोस्की’. बाहरी दुनिया के लिए वह मेघना हो गई हों, पर घर पर बोस्की ही रहीं. बचपन में हमने कई तरह से गणनाएं सीखी. एक, दो तीन. वन टू थ्री. प्रथमा द्वितीया, तृतीया. पर जवान हुए तो आपने हमें नई गिनती सिखाई. 116 चांद की रातें और एक तुम्हारे कांधे का तिल. रात टुकड़ों में बसर होती रही, हम नींद से कोसों दूर कुछ-कुछ कुछ-कुछ गिनते रहे.
गुलज़ार, आप ही थे जिसने बताया कि हमारे रोजमर्रा के आस-पास के लफ़्ज कितने जिंदा हैं. उन्हें सुनना कुछ ऐसा था कि जैसे घास पर देर तक पसरे हुए ख़ुद घास हो गए हों और फिर एक काला-लाल वो कीड़ा होता है गोल सा, जो छूते ही फुर्र हो जाता है. या कि हांडी में पकी उस सिंदूरी दही का स्वाद. वैसा ही जमीनी और असल एहसास आपके लफ्जों में होता रहा और बहुत कुछ पीछे छूटने से बचता रहा.
अपनी महबूबा के बारे में सोचते हुए कल्पना के कैनवस पर हमने जो पहला स्ट्रोक मारा तो एक गोरी का ही तसव्वुर बुना. धोखे से एफएम पर गाना बज गया कि मेरा गोरा रंग लइले, मोहे श्याम वर्ण दइ दे. तो हमें नहीं पता होता था कि यह आपका लिखा पहला गाना था. लेकिन इसे सुनने के साथ हम एक पवित्र चेष्टापूर्ण पुलक से भर जाते थे और सांवले होने के बावजूद इस अभिनव अपराजित मंत्र की तरह एक गोरी कन्या की मासूम आकांक्षा करते थे; जो एक दिन आएगी और हमसे हमारा सांवला रंग ले लेगी.
हम जब शोख हुए और हमने प्यार किया, तो जाना कि जिगर से बीड़ी जलाने का मतलब क्या होता है. ‘मैं चांद निकल गई दैया रे, भीतर भीतर आग जले’. इससे पहले बीड़ी को लेकर हमारे मन में जो छवि थी, उसमें काले होंठ थे, खांसी थी, झुर्रियों वाली उंगलियां थीं. लेकिन आपने सब पलट दिया. बीड़ी को मलिनता से उठाकर इश्क से रफू कर दिया. उस वक्त लगा कि बीड़ी पीने के बाद बिपाशा सी नमकीन नायिका भी आपके साथ नाच सकती है. यह वैसा ही था कि जैसे राजीव गांधी गन्ना खा लें तो गन्ना डीपीएस में भी ट्रेंड कर जाए. लफ़्ज़ों में असीम ताकत है.
फिर जब गांव और कस्बों से सामान बांध हम अपने संघर्ष पथ के लिए निकले तो आपने हमें हमारे वक्त का एंथम दिया. ‘छोटे-छोटे शहरों से, खाली बोर दुपहरों से, हम तो झोला उठाकर चले.’ यह बात भी आपको औरों से अलग बनाती रही कि आप हिंदी में नहीं लिखते, हिंदुस्तानी में लिखते हैं, और अंग्रेज़ीदां शब्दों को इज्जत बख्शने से भी गुरेज नहीं करते. किसी मुलाकात में सिगरेट की डिबिया पर बनाया गया पौधा और बाद में उस पर उग आया फूल, आपकी नज़्म का हिस्सा होता रहा. हमने जवानी का पहला कश लगाया तो याद आया कि यह खुमारी सर चढ़ी है, लब पर जो चल रही है.
गुलजार, आपने अलमारी में रखे और छज्जों पर घास से उगाए गए शब्दों को बाहर निकाला और उनका रंग हमारी रुटीन लाइफ पर हौले से छिड़क दिया. उस दौर में जब हम शहरी होने और होते चले जाने पर आमादा थे, आपने तमाम भदेस चीज़ों की लड़ाई लड़ी. आपने हमें 'हम' बनाए रखने में मदद की. हमारे कस्बाईपन को बचाए रखने का हौसला दिया. ख़ुद को ‘तत्सम’ न होने देने की सारी लड़ाई में हमें ‘तद्भव’ बने रहने में मदद की.
आपने हमारे इर्द- गिर्द फैली हुई प्रकृति को एक इंसान के भीतर ठूंस दिया और फिर उससे कहा कि अब हरकतें करो. तो हुआ ये कि चांद नंगे पांव आ गया और सूरज एक सूदखोर में तब्दील हो गया. फड़फड़ाते हुए किताबों पर दस्तक देने वाली हवाएं प्रेमिकाएं हो गईं और कुछ पुराने चेहरे कल के अखबार हो गए. यह कितना रोमांचकारी था, कॉलेज के उन लड़के-लड़कियों के लिए.
आपने हमें प्यार करना सिखाया. उससे भी जरूरी प्यार में ईमानदार रहना सिखाया. यह बेबाकी सिखाई कि हम कह सकें कि चुनरी लेकर सोती थी, तो कमाल लगती थी. सात रंग के सपने बुनना सिखाया. सोनू निगम की आवाज को सुनते हुए आप ही के लफ्जों के सहारे हमने यह उम्मीद बांधे रखी कि हया की लाली खिलेगी और जुल्फ के नीचे गर्दन पर सुबह-ओ शाम मिलती भी रहेगी. अपनी कुछ सबसे अच्छी दोस्तों को जीभ चिढ़ाते हुए हमने पीली धूप पहनकर बाग में न जाने की नसीहत दी.
कि इक खटास भी मामूली सी रिश्ते में आई कभी तो हम अधीर नहीं हुए. क्योंकि हम जानते थे कि झक सफेद कुर्ते और भारी सी आवाज वाला एक शख्स कहता है कि हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं टूटा करते. फिर एफएम पर आपका गाना डेडिकेट कर हमने माफी का इज़हार किया. कि हमको मालूम है इश्क मासूम है, इश्क़ में हो जाती हैं गलतियां. सब्र से इश्क महरूम है.
भयानक पराजय के क्षण में कमरे में फूट-फूट कर रोने के बाद हमने ईयरफोन लगाकर आप ही के नाम वाला फोल्डर खोला हमेशा. उबरने के दौरान जिंदगी से गले लगाने की दरख़्वास्त की. भयानक खुशी के क्षण में भी आपके लिखे गाने पर कुछ ज्यादा ही जोर से थिरके. सबसे सुकून वाले पलों में ‘तुझसे नाराज नहीं ऐ जिंदगी’ ही लगाया हमेशा. कभी-कभी तो हैरत होती है कि हमारे सारे जज्बातों के लिए आपके पास लफ्ज़ हैं. आप के नग़मे हम सब की भावनाओं के प्रतिनिधि हो गए हैं. कि हमारा सारा सामान आपके पास पड़ा हो जैसे.
गुलज़ार आप पर इल्ज़ाम भी लगे. कुछ लोग कहते हैं कि कुछ फिल्में प्रेरित होकर बनाई गईं. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के ‘इब्ने-बतूता’ का इस्तेमाल आपने किया. लेकिन क्या है दद्दा, कि हम भावुक लोग हैं और अपनी भावना में हम बड़े ईमानदार होते हैं. इल्जाम लगता है तो लगता है कि यह गलती हमने की है. रेशम के कुछ धागों को अपने जादुई चरखे में कातकर आपने धन्य कर दिया, पर वे धागे किसी और के ही रहे होंगे. और आपके पास तो अपना बाग है. बचा जा सकता था न.
पर आपको जितनी बार पढ़ते हैं, ताज़ा लगता है. यह अऩिवार्य रूप से रहस्यमयी है. अरण्य को कितनी बार भी देख लो, कौतुक बना रहता है. हो सकता है कि पोखर देख लिया हो पर उन नाजुक कमलडंडियों पर नजर न गई हो. किसी दरख्त पर बुलबुल का कोई खूबसूरत घोंसला देखने से छूट गया हो. पढ़कर सोचता रहता हूं देर तलक. रात पश्मीने की होती तो कैसा होता.
और वह बात जो साहिर लुधियानवी के बारे में हम फख्र से कहते हैं कि उनके लिखे हुए में एक राजनीतिक-सामाजिक पहलू भी है. कुछ लोग असहमत होंगे शायद, पर हमें लगता है कि आपने उसे भी एक जरूरी हिस्से की तरह बनाए रखा. ‘आंखों को वीजा नहीं लगता, सपनो की सरहद होती नहीं’ जैसी कालजयी पंक्ति इस दौर को आपका बेशकीमती तोहफा है. फिर उस नज्म को कौन भूल सकता है, जिसमें ख्वाब की दस्तक पर सरहद पार से कुछ मेहमान आते हैं और फिर गोलियों के चलने के साथ ऐसे हसीन ख्वाबों का खून हो जाता है. या अपनी त्रिवेणी में जब आप कहते हैं कि ‘चूड़ी के टुकड़े थे, पैर में चुभते ही खूं बह निकला/ नंगे पांव खेल रहा था लड़का अपने आंगन में/ बाप ने कल दारू पी के मां की बांह मरोड़ी थी.’ या जब ईश्वर से मासूम सवाल दागते हैं कि इक जरा छींक ही दो तुम तो यकीं आए कि सब देख रहे हो. आप हर बार मुझे ख़ालिस इंसान लगे हैं, दद्दा.
अपने आप में यही बात हमें रोमांचित कर देती है कि 76 साल की उम्र में आप ‘दिल तो बच्चा है जी’ लिख रहे थे, और वो भी पूरी ठसक के साथ, यह बताते हुए कि उम्र के सुफैद हो जाने के बाद भी जवानी की कारी बदरी कई बार नहीं छंटती है. शुक्रिया गुलज़ार. तहे-दिल किधर होता है मालूम नहीं. पर शुक्रिया. ये ऊपर वाली तस्वीर में जो कांच का यूनिवर्सल गिलास दिख रहा है न, उसी में आपके साथ इक अदरक वाली चाय पीने का मन है दद्दा. क्या करूं, खुशी से उपजी ख्वाहिश है.
बेलग़ाम उड़ती हैं कुछ ख़्वाहिशें ऐसे दिल में
‘मैक्सिकन’ फिल्मों में कुछ दौड़ते घोड़े जैसे
थान पर बांधी नहीं जाती सब ख़्वाहिशें मुझसे। :)
लेखक -कुलदीप मिश्र, Source: http://aajtak.intoday.in/story/an-open-letter-to-gulzar-1-760970.html

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