Friday, December 30, 2016

यह एक निःशक्त कविता है

यह एक निःशक्त कविता है
जो युद्ध की बात नहीं कर सकती
स्वतंत्रता की अलख नहीं जगा सकती
क्योंकि स्वतंत्रता तो
सत्तर साल पहले दिल्ली की गलियों में
घोषित हो चुकी है.
यह एक निःशक्त कविता है
क्योंकि ये
जनता का, जनता को, जनता द्वारा
हो रहे इस शासन में
गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, अशिक्षा
से स्वतंत्रता की बात नहीं कर सकती,
सब जगह लोग देशद्रोही का ठप्पा लगाने घूम रहे हैं.
लोकतंत्र में अपनी सरकार के खिलाफ बोलना वर्जित है,
लोकतंत्र एक सबसे बड़ी दुविधा है,
यह एक निःशक्त कविता है.

मैं प्रेरणाओं की बातें नहीं कर सकता
जूनून और बदलावों की बातें नहीं कर सकता
ये कपडा इतना फट गया है की
थिंगरे लगाने से ये सुधर नहीं पायेगा,
देश सिर्फ बातों से असर नहीं पायेगा.
शोषण, पतन, गरीबी पर लिखना
और थप्पड़ खाने से परे,
प्रेमिका के केशों पर लिखना सुविधा है,
यह एक निःशक्त कविता है.

दुनिया तवायफों की नींदों जैसी है
पूँजीवाद कस्टमर सा है
उम्मीद बूचड़खाने में अपना इंतज़ार कर रही है
सीरिया आँखें नुचने तक रो रहा है.
जो जल रही है, वो आग सीने की नहीं है
किसी क्रन्तिकारी कवि की चिता है,
यह एक निःशक्त कविता है.

हर निराश में उजास भरना जरूरी है
'अंत भला, सब भला' करना जरूरी है,
इसलिए 'प्रेमिका की सांसे सागर की लहरें हैं,
प्रेमिका के गाल अमेरिका की चिकनी सड़कें हैं,
प्रेमिका की आँखों में थेम्स का साफ़ जल है,
प्रेमिका के दिल में मिसिसिपी की कलकल है,
प्रेमिका का यौवन लोकतंत्र सा नया है,
प्रेमिका का ज्ञान डिजिटल रेवोलुशन सा खरा है.
प्रेमिका का चेहरा चाँद सा है.'

रुको! चाँद तो आर्मस्ट्रॉन्ग के पैरों तले कुचला गया है!
इसीतरह प्रकृति पैरों तले कुचली गई
मानवता तकनीक तले कुचली गई है
सीरिया, लीबिया के मुंह जुबानी नहीं है,
जैसे शादी के बाद रेप की मनाही नहीं है!
सॉरी! अंत तक उजास, उम्मीद न भर सका
कवि बेचारगी लिए दुल्हन का पिता है
ये वर्ष की की आखिरी कविता है
वर्ष की तरह, यह भी एक निःशक्त कविता है.

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