Sunday, November 20, 2016

बजट में बदलाव की बारी | DP Singh

सरकार बजट में बड़े बदलाव की तैयारी में जुटी है। सबसे महत्त्वपूर्ण परिवर्तन इसके समय से जुड़ा है। केंद्र सरकार फरवरी के बजाय जनवरी में बजट पेश करना चाहती है, जिसके लिए संसद का सत्र करीब एक माह पूर्व बुलाने की तैयारी की जा रही है। दूसरा बदलाव रेल बजट का आम बजट में विलय है। इस संबंध में वित्तमंत्री अरुण जेटली बाकायदा घोषणा कर चुके हैं। तीसरा बड़ा बदलाव आगामी वित्तवर्ष (2017-18) से वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू करना है। सरकार के अनुसार इन तीनों कदमों से वित्तीय अनुशासन बढ़ेगा, जिससे अर्थव्यवस्था में और प्राण फूंके जा सकेंगे।
अगले साल के शुरू में होने वाले उत्तर प्रदेश, पंजाब व गुजरात विधानसभा चुनावों की तिथि का पता चलने के बाद ही बजट की सही-सही तारीख घोषित की जाएगी। वैसे सरकार एक फरवरी को आम बजट और उससे एक दिन पहले आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट पेश करना चाहती है। इस बारे में जल्दी ही संसदीय मामलों की कैबिनेट समिति में चर्चा होगी और फिर लोकसभा अध्यक्ष से विचार-विमर्श किया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी भी सूरत में इकतीस मार्च तक बजट पारित करना चाहते हैं, ताकि नया वित्तवर्ष (एक अप्रैल) शुरू होते ही अमल शुरू हो जाए। आशा है इस बार केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) सन 2016-17 के सकल घरेलू उत्पाद से जुड़े अग्रिम अनुमानित आंकड़े सात जनवरी तक जारी कर देगा। नीति आयोग के सदस्य विवेक देबरॉय और किशोर देसाई की समिति ने आम बजट में रेल बजट के विलय की सिफारिश की थी।
वित्तवर्ष अप्रैल-मार्च के बजाय जनवरी-दिसंबर करने और बजट फरवरी की जगह जनवरी में रखने की मांग पिछले एक दशक से की जा रही है। कई राज्य सरकारें भी यह मांग कर चुकी हैं। ब्रिटिश राज में तय किया गया बजट कार्यकाल, उसे पेश करने का महीना और तारीख अब तक चली आ रही है। परंपरा के अनुसार केंद्रीय बजट फरवरी के अंतिम कार्य दिवस पर सुबह 11 बजे लोकसभा में पेश किया जाता है। वर्ष 2000 तक इसे पेश करने का समय शाम पांच बजे था, जो अंग्रेजों ने अपनी सुविधानुसार तय किया था, क्योंकि जब हिंदुस्तान में शाम के पांच बजते हैं तब ब्रिटेन में दोपहर होती है। बतौर वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा ने 2001 में पहली बार सुबह 11 बजे लोकसभा में बजट रखा था। अब अगले साल से इसका माह बदलने की तैयारी हो रही है।
फिलहाल दुनिया में बजट दो तरीके से पारित होते हैं। पहली प्रक्रिया तय वित्तवर्ष से काफी पहले शुरू हो जाती है और इसके चालू होने तक समाप्त हो जाती है। करीब पचासी फीसद विकसित देशों ने यह विधि अपना रखी है। अमेरिका में वित्तवर्ष शुरू होने से करीब आठ महीने पहले बजट पेश कर दिया जाता है जबकि जर्मनी, डेनमार्क, नार्वे में चार तथा फ्रांस, जापान, स्पेन, दक्षिण कोरिया में तीन माह पूर्व बजट पेश करना जरूरी है। वहां के संविधान में बाकायदा इसका उल्लेख है। इन देशों की संसद में बजट पर लंबी चर्चा चलती है। चर्चा के दौरान सरकार को अपने हर खर्चे और कर-प्रस्ताव पर स्पष्टीकरण देना पड़ता है। इन मुल्कों के जीवंत लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रमाण यह बजट प्रक्रिया है। वैसे भी माना जाता है कि जहां संसद पर सरकार हावी होती है वहां किसी भी मुद््दे पर बहस के लिए कम वक्त दिया जाता है, और जहां संसद मजबूत होती है वहां जन-प्रतिनिधि सरकार के प्रत्येक प्रस्ताव की लंबी और कड़ी पड़ताल करते हैं।
दूसरी प्रक्रिया में वित्तवर्ष के दौरान ही बजट पारित किया जाता है। ब्रिटेन, कनाडा, भारत और न्यूजीलैंड इस श्रेणी में आते हैं। भले ही भारत में वित्तवर्ष शुरू होने से करीब एक महीना पहले, फरवरी माह में बजट लोकसभा में पेश कर दिया जाता है, पर पारित तो मई के मध्य तक ही होता है। नियमानुसार पेश करने के पचहत्तर दिनों के भीतर बजट पर संसद की मोहर लगना जरूरी है। सरकार अप्रैल से मई के बीच लेखानुदान के जरिये अपना खर्च चलाती है। यह रकम उसकी कुल व्यय-राशि का लगभग सत्रह फीसद होती है। बजट पास होते-होते वित्तवर्ष के दो महीने निकल जाते हैं। फिर विभिन्न मंत्रालय नई योजनाओं पर अमल की रूपरेखा बनाते हैं, जिनकी मंजूरी और पैसा आने में करीब तीन महीने और लग जाते हैं। इसके बाद ही कायदे से धन मिलना शुरू होता है। तब तक बरसात का मौसम शुरू हो जाता है, जिससे इन्फ्रास्ट्रक्चर योजनाओं पर खर्च दो-तीन महीने और टल जाता है। अनावश्यक देरी के कारण अधिकांश योजनागत व्यय वित्तवर्ष की अंतिम छमाही (अक्तूबर-मार्च) में हो पाते हैं, जिस कारण कई बार मंजूर राशि खर्च नहीं हो पाती है। इस कमजोरी का असर विकास और जन-कल्याण से जुड़े कार्यक्रमों पर पड़ता है।
भारत में बजट व्यवस्था पहली बार 7 अप्रैल, 1860 को अंग्रेजों ने लागू की थी। आजाद हिंदुस्तान का पहला बजट आरके षन्मुखम चेट्टी ने 26 नवंबर, 1947 को पेश किया। उसके बाद अस्सी से ज्यादा बजट आ चुके हैं, पर समय शाम पांच से बदल कर सुबह ग्यारह बजे करने के अलावा उसमें कोई अन्य उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं हुआ है। संविधान का अनुच्छेद-112 बजट से जुड़ा है, जिसमें बजट शब्द की जगह इसे सरकार की अनुमानित वार्षिक आय और व्यय का लेखा-जोखा कहा गया है। बजट के समय और वर्ष के विषय में संविधान मौन है, इसलिए उन्हें बदलने के लिए सरकार को संसद की मंजूरी की आवश्यकता नहीं है। हां, जब से बदलाव की बात निकली है तब से कुछ पार्टियों ने सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग जरूर जड़ दी है। वैसे कांग्रेस सहित अनेक पार्टियां बजट जनवरी में पेश करने के सुझाव से सहमत हैं। सरकार ने साफ कर दिया है कि फिलहाल वित्तवर्ष बदलने का उसका कोई इरादा नहीं है। इसके लिए पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार शंकर आचार्य के नेतृत्व में एक समिति गठित की जा चुकी है, जिसकी रिपोर्ट इकतीस दिसंबर तक आने की उम्मीद है। सरकार उसके बाद ही कोई फैसला लेगी। उधर केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) भी जल्द बजट पारित करने के पक्ष में है। उसके अनुसार इससे वित्तवर्ष शुरू होते ही बजट के मुताबिक पैसा खर्च होगा और सरकार को लेखानुदान की जरूरत नहीं पड़ेगी।
दावा किया जा रहा है कि केंद्र का भावी बजट हमारे संघीय स्व
रूप का दर्पण होगा। राज्यों को खर्च के मामले में अधिक स्वायत्तता और स्वंत्रता मिलेगी। वैसे चौदहवें वित्त आयोग की सिफारिश के अनुसार केंद्र सरकार के करों में राज्यों की हिस्सेदारी दस फीसद बढ़ा दी गई है। आयोग की सिफारिशों पर वित्तवर्ष 2015-16 से अमल भी चालू हो गया, पर केंद्र की होशियारी से अधिकतर राज्यों को फायदे के बजाय नुकसान ही हुआ है।
केंद्र ने राज्यों की कर-हिस्सेदारी जरूर दस प्रतिशत बढ़ा दी, लेकिन बदले में केंद्र प्रायोजित योजनाओं (सीएसएस) के मद में कटौती कर दी। उसका तर्क है कि वित्त आयोग ने करों में राज्यों की हिस्सेदारी बढ़ाने की बात जरूर की, लेकिन राज्यों को केंद्र से मिलने वाली वित्तीय मदद में विशुद्ध इजाफे की सिफारिश नहीं की है। केंद्र सरकार ने इसी कमजोरी का लाभ उठाया। हालत यह बनी कि वित्तवर्ष 2015-16 में सात सूबों को केंद्र से एक साल पहले के मुकाबले कम रकम मिली। विशुद्ध प्राप्ति की प्रगति तो लगभग हर राज्य में थम-सी गई है। ऐसे में यदि वे अपने ग्रामीण विकास बजट में कटौती करते हैं, तो उन्हें अकेला दोषी कैसे ठहराया जा सकता है? यदि केंद्र ने सच्ची नीयत का परिचय नहीं दिया तब उसके लिए जीएसटी लागू करना भी आसान नहीं होगा।
आज भारत के जीडीपी के मुकाबले कुल कर-संग्रह का अनुपात सत्रह फीसद है। इसमें केंद्र सरकार की हिस्सेदारी लगभग दस प्रतिशत है। घरेलू बचत लगभग 7.6 फीसद है। ऊपर से घाटे को तयशुदा सीमा (3.5 प्रतिशत) में रखने का दबाव भी है। बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती। सरकार की आय का करीब चालीस फीसद पैसा उधार पर ब्याज चुकाने में चला जाता है। ऊपर से कर-आय का करीब 5.8 लाख करोड़ रुपया मुकदमों के कारण फंसा पड़ा है, जिसे उगाहने के लिए वित्तमंत्री ने छूट दी है। कॉरपोरेट टैक्स घटा कर भी एक कमी की गई है। सरकार किसानों के कल्याण के बड़े-बड़े दावे जरूर करती है, पर दावों और हकीकत में भारी अंतर है।
अब बजट के समय ही नहीं, स्वभाव में भी परिवर्तन का प्रयास हो रहा है। भविष्य में योजनागत और गैर-योजनागत खर्च के स्थान पर ‘कैपिटल ऐंड रिवेन्यू एक्सपेंडिचर’ शीर्षक के तहत समस्त व्यय का बंटवारा होगा। आय के बजाय व्यय पर ज्यादा जोर रहेगा। जीएसटी लागू हो जाने से सेवा कर, उत्पाद कर और उप-कर (सेस) जैसे सभी करों का विलय हो जाएगा। इससे बजट में अप्रत्यक्ष कर का विवरण घट जाएगा, बजट सरल होगा और राज्यों को उनके हिस्से की रकम समय पर मिल जाएगी। बजट तैयार करने में कम से कम चार-पांच माह लग जाते हैं। यदि मोदी सरकार अगले वर्ष जनवरी माह में बजट पेश करना चाहती है, तो उसे इसकी तैयारी तुरंत शुरू करनी पड़ेगी। बजट सत्र फरवरी के बजाय जनवरी के तीसरे हफ्ते में बुलाने के लिए संसद को विश्वास में लेना पड़ेगा। साथ ही शीतकालीन सत्र की तारीख भी पहले सरकानी होगी। ये सारे निर्णय लंबे समय तक लटका कर रखने की गुंजाइश नहीं बची है।

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