Saturday, November 19, 2016

राजनीतिक हितों से ऊपर उठकर सोचें | अनूप भटनागर


यह कैसी विडम्बना है कि भारत जैसे धर्म निरपेक्ष देश के संविधान में मृतप्राय अनुच्छेद 44 के संदर्भ में विधि आयोग द्वारा नागरिक संहिता के बारे में समाज के विभिन्न वर्गों से सुझाव मांगे जाने के साथ ही देश की राजनीति में उबाल आ गया है। कांग्रेस और जनता दल (यू) जैसे सरीखे कई राजनीतिक दल इसके औचित्य पर सवाल उठाने में संकोच नहीं कर रहे हैं। दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सहित कुछ संगठनों ने इस विषय पर आसमान सिर पर उठा लिया है। समान नागरिक संहिता के सवाल पर कांग्रेस और कुछ अन्य राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया ने 1985 में बहुचर्चित शाहबानो प्रकरण में उच्चतम न्यायालय के फैसले को बदलने की तत्कालीन केन्द्र सरकार की कवायद की याद ताजा कर दी है।
संभवत: पहली बार उच्चतम न्यायालय ने इस विषय पर कोई सुझाव दिया था। अप्रैल 1985 में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश वाई. वी. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने तलाक और गुजारा भत्ता जैसे मुद्दों के परिप्रेक्ष्य में देश में समान नागरिक संहिता बनाने का सुझाव दिया था। संविधान पीठ की राय थी कि समान नागरिक संहिता देश में राष्ट्रीय एकता को बढावा देने में मददगार होगी।
इस फैसले के तुरंत बाद तत्कालीन सत्तारूढ़ दल ने आरिफ मोहम्मद खां सरीखे पढ़े-लिखे नेताओं का पहले भरपूर उपयोग किया और बाद में मुस्लिम समाज के कुछ वर्गों और संगठनों के दबाव में इस फैसले को बदलते हुए एक नया कानून ही बना दिया। समान नागरिक संहिता के बारे में विधि आयोग द्वारा मांगे गये सुझावों का विरोध करते हुए मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कुछ अन्य संगठनों ने इसका बहिष्कार करने का निश्चय किया है जबकि मुस्लिम महिला संगठनों का तर्क है कि हमें इस प्रक्रिया से तैयार होने वाले दस्तावेज का प्रारूप देखने के बाद ही कोई प्रतिक्रिया देनी चाहिए। संविधान का अनुच्छेद 44 कहता है कि शासन भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में नागरिकों के लिये एक समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करेगा।
शाहबानो प्रकरण के बाद भी देश की शीर्ष अदालत ने इस बारे में सुझाव दिये क्योंकि वह महसूस कर रही थी कि समान नागरिक संहिता के अभाव में हिन्दू विवाह कानून के तहत विवाहित पुरुषों द्वारा पहली पत्नी को तलाक दिये बगैर ही धर्म परिवर्तन करके दूसरी शादी करने की घटनायें बढ़ रही थीं।
न्यायालय ने धर्म का दुरुपयोग रोकने के इरादे से धर्म परिवर्तन कानून बनाने की संभावना तलाशने और ऐसे कानून में यह प्रावधान करने का सुझाव दिया था कि यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन करता है तो वह अपनी पहली पत्नी को विधिवत तलाक दिये बगैर दूसरी शादी नहीं कर सकेगा और यह प्रावधान प्रत्येक नागरिक पर लागू होना चाहिए। ऐसे अनेक मामलों और महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव को ध्यान में रखते हुए ही विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता के बारे में 16 बिन्दुओं पर सुझाव आमंत्रित करने का निश्चय किया।
आयोग जानना चाहता है कि क्या समान नागरिक संहिता के दायरे में विवाह, विवाह विच्छेद, दत्तक ग्रहण, भरण पोषण, उत्तराधिकार और विरासत जैसे विषयों को भी लाया जाना चाहिए। आयोग यह भी जानना चाहता है कि क्या बहुविवाह और बहुपति प्रथा पर पाबंदी लगायी जानी चाहिए या उसे विनियत करना चाहिए? आयोग ने विभिन्न संप्रदायों के पर्सनल कानूनों को संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों के अनुरूप बनाने के लिये उन्हें संहिताबद्ध करने के बारे में भी नागरिकों की राय मांगी है।
आयोग ने मैत्री करार जैसी रूढ़िवादी प्रथाओं पर पाबंदी लगाने या इसमें संशोधन करने, ईसाई समुदाय में विवाह विच्छेद को अंतिम रूप देने के लिये दो साल की प्रतीक्षा के प्रावधान और विवाहों का पंजीकरण अनिवार्य बनाने और अंतर-धार्मिक तथा अंतर-जातीय विवाह करने वाले दंपतियों को सुरक्षा प्रदान करने के उपायों पर भी सुझाव मांगे हैं।
पारसी विवाह एवं तलाक कानून, 1936 की धारा 32-बी के तहत परस्पर सहमति से तलाक लेने के लिये पति-पत्नी को कम से कम एक साल अलग रहना होता है। ईसाई समुदाय से संबंधित तलाक कानून, 1869 की धारा 10-क (1) के तहत कम से कम दो साल अलग रहने का प्रावधान है। इस मामले में यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि विशेष विवाह कानून के तहत शादी करने वाले जोड़े यदि विवाह विच्छेद करना चाहते हैं तो उन्हें इसी कानून के प्रावधानों के अनुरूप आवेदन करना होगा।
उच्चतम न्यायालय की नजर में भले ही समान नागरिक संहिता देश की एकता को बढ़ावा देने वाली हो लेकिन इस बारे में विधि आयोग की पहल ने राजनीतिक दलों को दो खेमों में बांट दिया है। कुछ दल इसका विरोध कर रहे हैं तो दूसरी ओर भाजपा और शिव सेना इसके पक्ष में हैं।

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