Saturday, November 19, 2016

AI- Artificial Intelligence | अजित बालकृष्णन

तकनीक की दुनिया एक और बड़े बदलाव की ओर अग्रसर है। जैसा कि ऐसे मौकों पर होता है, पूरा माहौल नए बदलाव के एकदम खिलाफ है। बीबीसी ने ब्रिटेन के सर्वोत्तम वैज्ञानिकों में से एक प्रोफेसर स्टीफन हॉकिंस के हवाले से कहा है कि यह नया बदलाव मानव जाति के अंत की गाथा लिख सकता है। अन्य लोगों का रुख इससे उलट है और उनका दावा है कि नया बदलाव कामकाज की नीरसता खत्म करेगा, शिक्षा की पहुंच बढ़ाएगा, बुजुर्गों के जीवन को बेहतर करेगा और स्वास्थ्य सुविधाओं को सस्ता करेगा। यह नई तकनीक है कृत्रिम बौद्घिकता।
 
शायद कृत्रिम बौद्घिकता शब्द सुनकर आपको लगेगा कि यह भी शायद कोई भारी भरकम लगने वाला शब्द होगा जिसे सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र के लोगों ने अपना काम निकालने के लिए तैयार किया होगा ताकि उनके काम को अहमियत मिले। वास्तव में तकनीकी कारोबार से जुड़े संगठन अपनी प्रेस विज्ञप्तियों में वर्ड प्रोसेसिंग, ई-मेल, सोशल नेटवर्किंग जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं और इस बीच वादा किया जाता है कि दुनिया जल्दी ही एक बेहतर, व्यावहारिक और कम गंदी जगह होगी जहां काम को अधिक सक्षम ढंग से पूरा किया जा सकेगा। इस बीच श्रम और श्रमिकों के समर्थन का दम भरने वाले बौद्धिक कहते रहेंगे कि ऐसा करने से समाज में रोजगार की भयंकर कमी एक साथ देखने को मिलेगी। इसका व्यापक और बुरा प्रभाव पड़ेगा। वर्ष बीतते जाते हैं और पता चलता है कि नए आविष्कार ने हमारे आसपास की दुनिया में कुछ बदलाव अवश्य किए हैं। 
 
मिसाल के तौर पर टाइपराइटर की जगह अब लैपटॉप ने ले ली। हालांकि टाइप तो यहां भी करना पड़ता है। ई-मेल भी टाइप करके भेजना होता है लेकिन उसके सामने वाले पक्ष तक पहुंचने की गति सामान्य पत्र की तुलना में बहुत तेज है। गपशप का सिलसिला अब केवल करीबी पड़ोसियों के साथ ही नहीं बल्कि ऐसे लोगों के साथ भी चल सकता है जिनका हम नाम भर जानते हों और जो दुनिया के दूसरे छोर पर रहते हों। इसके अलावा तो सबकुछ पहले जैसा ही है। हमें इन तकनीक की बदौलत कोई ऐसा बड़ा बदलाव होता नहीं दिखता जिसका दम इनके समर्थक भरते हैं। 
 
ऐसे में कृत्रिम बुद्घिमता को लेकर कही जाने वाली चामत्कारिक बातों को भी शंका की दृष्टिï से देखा गया। ऐसा इसलिए क्योंकि सन 1950 के दशक से ही इसे और इसके संभावित असर को लेकर तमाम तरह के दावे किए जाते रहे हैं। सवाल उठता है कि अगर ऐसा है तो फिर न्यूयॉर्क टाइम्स और द टेलीग्राफ जैसे बड़े समाचार पत्र इसमें अपना स्वर क्यों मिला रहे हैं? न्यूयॉर्क टाइम्स ने हाल ही में लिखा कि कृत्रिम बुद्घिमता पर नियंत्रण की होड़ शुरू हो चुकी है। उसने विशेषज्ञों के हवाले से कहा कि जो भी इस होड़ का विजेता होगा वह सूचना प्रौद्योगिकी के अगले चरण पर राज करेगा। 
 
लंदन के समाचार पत्र द टेलीग्राफ ने एक अन्य विशेषज्ञ के हवाले से कहा कि पांच साल में अधिकांश कंपनियों के पास निहायत सस्ती और ताकतवर मशीनों की सेना होगी जो क्लाउड से संचालित होगी। इनकी मदद से तमाम ऐसे कामों को पूरा किया जा सकेगा जिनको करने के लिए आज लोगों की जरूरत होती है। यानी इनकी वजह से लाखों रोजगार खत्म होंगे। आखिर कृत्रिम बौद्घिकता है क्या बला? हो सकता है आप भी किसी न किसी तरह कृत्रिम बुद्घिमता का प्रयोग कर रहे हों। जब आप किसी न्यूज वेबसाइट पर खबर पढ़ लेते हैं और उसके बाद ऐसे किसी लिंक पर क्लिक करते हैं जिस पर लिखा होता है कि यहां इससे मिलीजुली सामग्री पढ़ी जा सकती है तो आप एक नए लेख तक पहुंच जाते हैं। यह कृत्रिम बुद्घिमता का ही नमूना है। उस समाचार वेबसाइट पर पर्दे के पीछे एक कंप्यूटर प्रोग्रामर ऐसा कोड लिखकर रखता है जो उस साइट के सभी समाचार आलेखों का विश्लेषण करके उनको श्रेणीबद्घ करके रखता है। मिसाल के तौर पर हम बॉलीवुड फिल्म समीक्षा और भारत पाकिस्तान संबंध, जैसे विषय ले सकते हैं। जो पाठक फिल्म समीक्षा में रुचि दिखाते हैं उनको वैसे ही आलेख प्रस्तुत किए जाते हैं। कार चलाना ऐसा काम है जिसमें हाथ, पैर, आंख और कान का समन्वय जरूरी है ताकि तमाम यातायात के बीच कार चलाई जा सक। अमेरिका जैसे देश में यह क्षेत्र इन दिनों कृत्रिम बुद्घिमता के लिहाज से अहम बना हुआ है।
 
अमेरिका में बड़ी आबादी 70 से अधिक उम्र की है और लोग अकेले रहते हैं। उनको अपनी गाड़ी खुद चलानी होती है। ऐसे में कार का स्वचालन उनके लिए फायदेमंद हो सकता है। वाहनचालक रहित कार की अवधारणा कृत्रिम बुद्घिमता से जुड़ी है। कार को स्वचालित बनाने के लिए दशकों पुरानी रडार और जीपीएस जैसी तकनीक का प्रयोग किया जाता है जो पता लगाती है कि कार के आसपास क्या है।  इनकी मदद से मार्ग की बाधाओं, संकेतकों को समझा जाता है और सॉफ्टवेयर की मदद से इस सूचना के जरिए रास्ते तलाश किए जाते हैं। 
लेकिन ऐसे कदमों में जोखिम जुड़ा है। चालक रहित कार जो जटिल और भीड़भाड़ भरी राहों से निकलने की जुगत कर सके वह आतंकवादियों के लिए एक खतरनाक हथियार हो सकती है। वे इन वाहनों का उपयोग बम विस्फोट में कर सकते हैं। चालक रहित टैंक बन गए तो जंग की तस्वीर बदल जाएगी। दूरदराज इलाकों में चालक रहित विमान यानी ड्रोन के हमलों की खबरें हम सुनते ही हैं। जोखिम यह भी है ऐसे काम मशीन से होने लगे तो इन्हें करने वाले लोगों का क्या होगा? 
 
अमेरिका में सन 2030 तक कृत्रिम बुद्घिमता के समाज पर पडऩे वाले असर के आकलन के लिए शीर्ष विद्वानों और औद्योगिक जगत के लोगों का एक पैनल तैयार किया गया। इसने हाल ही में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की है। आईआईटी बंबई के प्रोफेसर शिवराम कल्याणकृष्णन भी इसके सदस्य हैं। भारत में यह पूछना अहम हो सकता है कि इन तकनीक को लेकर देश के जन नीति प्रतिष्ठïानों का रुख क्या है? पहले कदम के रूप में जन सेवाओं की आपूर्ति के कुछ क्षेत्रों को चिह्निïत करना अहम हो सकता है जो कृत्रिम बुद्घिमता से लाभान्वित होने वाले हों। यह भी सुनिश्चित किया जा सकता है कि उत्पाद विकास आदि के लिए धन आसानी से मुहैया कराया जा सके। शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और राष्ट्रीय सुरक्षा ऐसे क्षेत्र हो सकते हैं। 
 
शिक्षा में प्राथमिक शिक्षकों का काम आसान बनाने, औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान और पॉलिटेक्रीक आदि में इनका प्रयोग किया जा सकता है। वहीं प्राथमिक स्वास्थ्य में बीमारियों का शीघ्र पता लगाने और उपचार करने में इनका इस्तेमाल हो सकता है। वहीं राष्ट्रीय सुरक्षा में आतंकियों के खिलाफ शीघ्र चेतावनी जारी करने के काम में भी यह नई तकनीक मददगार साबित हो सकती है। 

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