Monday, March 14, 2016

Untitled

शायद जब कहा जाता है 'तुम्हें एक्सप्रेस करना नहीं आता.' तो लगता है जैसे मुझे भाषा नहीं आती.. आधी हिंदी, आधी उर्दू, चवन्नी भर अंग्रेजी और रत्ती भर कन्नड़... इसके अलावा जो मुझे आता है वो इश्क़ में लिप्त दिल है जो ख़्याल बुनता है और तुम तक पहुंचता है. सच है कि मैं लिख नहीं पाता जी भर के बस थोड़ा और थोड़ा होते-होते कुछ लाइन्स में सिमट जाता है सब... लेकिन जो बचता है अंदर शायद कोई झांक नहीं पाता. तुम भी नहीं. आदमी का रोना उद्गार हैं, उसका हंसना उद्गार हैं तो शायद चुप रहना भी उद्गार हैं... क्यूंकि जब आदमी चुप रह जाता है... बहुत कुछ अपने अंदर समेटे होता है. मैं 'वेमुला' के खत को पढता हूँ तो उसके अंदर 'विवेक' छिपा लगता है... जैसे किसी वीराने में मैं ही लिख रहा हूँ वो ख़त... कार्ल सागन बनने का वो छुपा-अधूरा ख़्याल. 'हर्ष मंदर' की बातें अपनी कही सी लगती हैं... जैसे मैंने ही लिखे हैं वो तमाम आर्टिकल. मैं लिख नहीं पाता क्यूंकि मेरा लिखा मुझे हर दिन पढ़ने मिलता रहता है... ज्यूँ का त्यूं. लगता है जैसे मेरे दिल के जिर्दे ही उखाड़ के पेपर पे रखे हों किसी ने.
तुमने मरता आदमी देखा है? कुछ लोग अभिशापित होते हैं हर मरते आदमी पे वो भी कुछ कुछ मरते रहते हैं. मैं वो अभिशापित हूँ. कई बार मुझे लगता है लोगों की नज़्मों में बसे लफ्ज़ उनकी नब्ज़ों में नहीं होते. हुनरमंद राइटर बिना जिये ही लिख देता है, बिना महसूस किये ही वो सब जो कभी कभी अमर सा हो जाता है... अफ़सोस की मेरे साथ उल्टा है... मेरी नब्ज़ में जो होता है अफ़सोस की नज़्म में नहीं होता. तुम नहीं समझ सकते इसे.
एक इश्क़ का चौराहा है जहां हर तरफ से लोग आते हैं... मैं बीच में खड़ी मूर्ति हूँ... गांधी, आंबेडकर किसी की भी कह लो... वो मूर्ति अकेली रह जाती है हर दफ़े चौराहे की भीड़ में... तमाम लोग उस तक आते हैं... पास आ के चौराहा पार कर चले जाते हैं. तुम्हें नहीं लगता हर इंसान ऐसे ही है... एक बुत जिसके पास आने वाली भीड़ अपने मतलब निकाल बगल से निकल जाने वाली है...
सिगरेट का दम भरते लोग हर कश पे मौत के पास क्यों जाना चाहते हैं? जबकि डिबिया पे कितना चौड़ा लिखा है मौत का हलफनामा. क्यूंकि जीते जीते लोग उकता जाते हैं... कई कई तो हर घंटे में दो दफ़े उकताते हैं. लोग कहते हैं ज़िन्दगी की कदर नहीं क्यूंकि वो फ्री में मिली है... फ्री की ज़िन्दगी का क़र्ज़ बहुत लोग उम्र भर चुका रहे हैं ये कोई नहीं कहता. मैं उकताया हुआ हूँ ज़िन्दगी से.... लेकिन आज तक सिगरेट को हाथ नहीं लगाया... ज़रूरत ही नहीं पड़ी शायद... शायद धुंआ पहले ही बहुत है अंदर और बस फेंफड़े नहीं खा रहा है... सिराएँ, धमनिया, दिल और सारा दिमाग ही खा रहा है. जैसे किसी दिन सब खा के बोलेगा धुंआ 'कि खोखले हो गए हो तुम, हटो कि मैं दूसरे लोग भी खा पाऊं.' वो धुंआ अंधी दौड़ है जिसपे हम बिना रुके दौड़े जा रहे हैं. 1BHK से 2BHK से 3BHK और छोटी से बड़ी से बहुत बड़ी कार तक. ये बस 10% की बात है... 60% भाग रहे हैं एक रोटी से दो रोटी और दो रोटी से दो जून की रोटी की दौड़ में. अफ़सोस की फिक्रमंद नहीं कोई. मेरे जैसे लोगों को भी नहीं क्यूंकि मेरे जैसे लोग लिखकर फेमस होना चाहते हैं और उन्हें एक बड़ी कार की दरकार है! शायद मुझे न हो लेकिन मैं भी इस जमात का हिस्सा हूँ और इस समाज का भी. और मुझे इसका खेद है.
तुम पूरा नहीं पढ़ पाओगे इसे मुझे पता है क्यूंकि ये बहुत 'डेन्स' (Dense) है. लेकिन ये समेटे हुए का बहुत थोड़ा हिस्सा है.
-विवेक

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