Sunday, March 20, 2016

कुछ प्रेम कहानियाँ बेवकूफियों में ख़त्म हो जाती हैं.

तुम्हें समझ नहीं आता बिबान?
'क्या समझ नहीं आता?'
'कि... कुछ नहीं जब तुम समझोगे... खैर पता नहीं समझोगे या......'

परछाइयाँ आदमी के साथ ही रुख कर जाती हैं. वो भी चली गई, उसकी परछाई भी ज़िन्दगी से....
--

कई महीनों बाद फ़ोन बजा...
'बिबान...'
मैं आवाज़ पहचान गया.

'मेरा नाम विवान है, बिबान नहीं...'
तूने 'व' को 'व' बोलना कब सीखा?'
'तुझे याद आ गई इतने दिन बाद.... जाते वक़्त तो नया नंबर भी नहीं दिया था.'
'चाहिए था तो फेसबुक पे भी मांग सकता था.'
'तुझे देना था...?'
'पता नहीं... सुन शादी है मेरी... तू आएगा?'
'सुन मैं तब भी समझता था, अब भी समझता हूँ. तूने मुझे समझा कभी?'

'विवान, मेरे से ज्यादा किसी ने समझा तुझे? छोड़ सब, आई लव्ड यू एंड आई लव यू...अभी शादी करने दे बस....!'
'ठीक है... नहीं आऊंगा.'
'पागल आना तू... तू रहेगा तो हिम्मत रहेगी.... बाकि मुझे पता है मैं 36-24-36 नहीं थी.'  वो चुप्पी के बाद बोली.

'तू अब तक ये समझती थी..!!! एक्चुअली मैं माचो (Macho ) नहीं था... अब भी नहीं हूँ.... और जिम न तब बस का था न अब है...'
'बस इसलिए... वाह रे शायर...पहली बार किसी ने लड़की खुद की फिज़िक (Physique ) देख के छोड़ी होगी....'

कुछ प्रेम कहानियाँ बेवकूफियों में ख़त्म हो जाती हैं.

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