Friday, March 11, 2016

इश्क़ की तालीम ग़ालिब!

मैं तुम्हें उतना ही चाहता हूँ जितना आम बसंत चाहता है, जितना पीलापन सरसों और देश की दही जनता जितनी शिद्दत से दो दफे भरपेट खाना चाहती है.
न शिद्दत से चाहा बसंत ही आता है भर के, न सरसों के फूल बच पाते हैं कीड़ों से, न दो दफे खाना मिलता है सबको... न तुम ही मुझे इतनी शिद्दत के बावजूद.
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'शोना' आज़ादी के बाद हमने 'हिंदुस्तानी' से 'उर्दू' के लफ्ज़ हटाने की कोशिश की थी, हिंदी को 'प्योर' बनाने. जो हिंदी बनी न तो हमें समझ आई और न हिंदी के ज्ञानी छात्रों को. मुझे निकाल तुम्हें 'प्योर' करने की कोशिशों में तुम कितनो को कितनी समझ आ रही होगी?
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तीसरे शहर के दुसरे किनारे पे जो तुम्हारा ठिकाना है, न सुना है वहां कभी ग़ालिब की माशूका रहा करती थी. जिससे एक दफे ग़ालिब मिलने गए और लौट के बेग़म की मार खाये. इश्क़ हमेशा चोट देता है... मिल जाये तो बीवी की मार न मिले तो दिल के दर्द.
मेरी होने वाली बेग़म तुमसे उतनी ही नफ़रत करती हैं जितना मैं तुमसे इश्क़ करता था... लेकिन उससे कहीं ज्यादा प्यार, जितना तुम मुझसे करती थीं.
इश्क़ में कितने सवाल हैं ग़ालिब... औ' इश्क़ कितनों जवाब है.
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बल्लीमारां के पते पे ख़त लिखा है... उम्मीद है जवाब आएगा. तेरे निशां बचे हैं, कुछ कुछ ठिठुर गए हैं ठण्ड से दिल्ली की... फिर भी ज़िंदा हैं कुछ कुछ...ग़ालिब
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'उफ़! तुम इश्क़ पे नहीं लिखते... तुम्हें नहीं पता की क्या है मरना जीना किसी पे और रातों को खोना यादों में किसी की? तुम लिखने से पहले इश्क़ की तालीम लो शायर! नज़्म इश्क़ पे न हों तो क्या खाक नज़्म हुई?'
'अगर मैं देश पे नहीं लिखूंगा तो देश के बारे मैं कौन सोचेगा?'
'तुम्हारा बाप. गधे!' मेरेअंदर ग़ालिब की आत्मा घुस आई. बल्लीमारान से लौटे थे कल ही. 

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