Friday, January 15, 2016

"हर दोस्ती या प्रेम एक अहसास का नाम है. यह अहसास मुझमें और अमृता में, दोनों में था, इसलिए हमारे बीच 'आई लव यू' जैसा जुमला कभी नहीं आया- न मैंने अमृता से प्यार का इज़हार किया और न अमृता ने कभी मुझसे!
- इमरोज़

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जब धरती अलग होने का फैसला करती है
तो खा इ यां बनती हैं
और जब मिलने का
तब बनते हैं पहाड़
बिना किसी से मिले 
यों ही इतना ऊँचा नहीं उठ सकता कोई....
~Shirish Kumar Mourya
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नक़्शे में न माल्टा दीखता है न मालदीव
न टेबल पे गढ़ी आँख.
थोड़ी बहुत सफाई संडे हम भी कर लेते हैं,
बुदबुदा लेते हैं कुछ सवाल खुद ही.
दीवार के कुर्गवाले बुद्धा थोड़े उदास से हैं,
बस्तर आर्ट फीकी हुई थोड़ी.
दीवारें यहां वहीं, कमरा वही,
थोड़ा अनमना सा है बस.
और कहो! तुम्हारे क्या हाल हैं 'गिल्लू'!
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जिस्म में अक्ल के पौधे उगाये थे
टेबल पे रख दी थी कुछ बेवकूफी
फिर फोन घुमाया था तुमको.
बातों में तुम्हारे चमकते दांत दिख रहे हैं.
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तुम मेरे शहर का रुख बदल दो
पगड़ी में दूधवाले, खिड़कियां, हवाएँ सब
तुम्हारे शहर का रुख किए हैं.
आज फिर बारिशें सागर में गिर गिर खो गईं,
मोहब्बत सी.
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