Saturday, October 10, 2015

बेरोज़गार की किताब से


रोटियों के पैसे किसने चुकाए तुम्हारे
कॉफ़ी की ये आदत
दिन में दो दफे चाहिए तुम्हें.
पांच रूपये की पड़ती है घर बनाओ तो,
पचास की बाहर.
शुक्र है सिगरेट नहीं पीते.

तुम्हारे कपडे हैं न, ठाठ वाले,
अठरह सौ की वो शर्ट
अच्छे घर में जन्मने का फल है.
साठ प्रतिशत आबादी नहीं तो
रोटी जुगाड़ रही है,
सुबह से शाम.


तुम्हें अपने बाप से शिकायतें हैं,
जिसकी नौकरी से
बिल भरे जाते हैं तुम्हारे.
टाटा तो वो भी पैदा नहीं हुआ था.
उसने मत्था फोड़ा, हाथ-पांव-दिमाग खपाये
तब तुम पढ़ पाये.

रोटियों की दूकान पे उधारी नहीं चलती,
दोस्त बस भरम हैं,
फ़ोन कर लें एक दफ़े महीने में,
बस बहुत है.

देह वाली भी कुछ कमाती तो है.

सड़क पे पड़े पत्थर तुम,
हटो!!!

भोंदू जी की सर्दियाँ / वीरेन डंगवाल

आ गई हरी सब्जियों की बहार 
पराठे मूली के, मिर्च, नीबू का अचार 

मुलायम आवाज में गाने लगे मुंह-अंधेरे 
कउए सुबह का राग शीतल कठोर 
धूल और ओस से लथपथ बेर के बूढ़े पेड़ में 
पक रहे चुपके से विचित्र सुगन्‍धवाले फल 
फेरे लगाने लगी गिलहरी चोर 

बहुत दिनों बाद कटा कोहरा खिला घाम 
कलियुग में ऐसे ही आते हैं सियाराम 

नया सूट पहन बाबू साहब ने 
नई घरवाली को दिखलाया बांका ठाठ 
अचार से परांठे खाये सर पर हेल्‍मेट पहना 
फिर दहेज की मोटर साइकिल पर इतराते 
ठिठुरते हुए दफ्तर को चले 

भोंदू की तरह 

आएँगे, उजले दिन ज़रूर आएँगे / वीरेन डंगवाल

आतंक सरीखी बिछी हुई हर ओर बर्फ़
है हवा कठिन, हड्डी-हड्डी को ठिठुराती
आकाश उगलता अन्धकार फिर एक बार
संशय विदीर्ण आत्मा राम की अकुलाती

होगा वह समर, अभी होगा कुछ और बार
तब कहीं मेघ ये छिन्न -भिन्न हो पाएँगे

तहखानों से निकले मोटे-मोटे चूहे
जो लाशों की बदबू फैलाते घूम रहे
हैं कुतर रहे पुरखों की सारी तस्वीरें
चीं-चीं, चिक-चिक की धूम मचाते घूम रहे

पर डरो नहीं, चूहे आखिर चूहे ही हैं
जीवन की महिमा नष्ट नहीं कर पाएँगे

यह रक्तपात यह मारकाट जो मची हुई
लोगों के दिल भरमा देने का ज़रिया है
जो अड़ा हुआ है हमें डराता रस्ते पर
लपटें लेता घनघोर आग का दरिया है

सूखे चेहरे बच्चों के उनकी तरल हँसी
हम याद रखेंगे, पार उसे कर जाएँगे

मैं नहीं तसल्ली झूठ-मूठ की देता हूँ
हर सपने के पीछे सच्चाई होती है
हर दौर कभी तो ख़त्म हुआ ही करता है
हर कठिनाई कुछ राह दिखा ही देती है

आए हैं जब चलकर इतने लाख बरस
इसके आगे भी चलते ही जाएँगे

आएँगे उजले दिन ज़रूर आएँगे

Problems faced by women SHGs

SHGs have achieved remarkable success in empowering rural masses, especially women, socially and economically. In fact, the government has been encouraging the micro-finance based model of poverty eradication. E.g. National Rural Livelihood Mission. However, the prevailing model of SHG micro-finance in general and women SHGs, in particular continue to face a myriad of problems.
Problems faced by women SHGs:
(A) Women have little financial independence at home. Therefore, women SHGs often fail to augment their collateral corpus adequately. This makes banks reluctant to finance projects lead by such SHGs.
(B) Given the patriarchal notions of the Indian society, women SHGs are perceived with contempt and suspicion. 
(C) Low literacy levels in rural areas, especially so among women, proves to be a major barrier. Makes it difficult for them to not only gather information but also market their product effectively.
(D) Above-mentioned reasons force many women SHGs to middlemen, leading to their exploitation.
(E) Enormous workload on women, especially on account of their familial obligations, results in poor productivity of women SHGs.
Coming to the SHG micro-finance model for poverty alleviation, following concerns remains:
(A) Many a times, SHGs are dominated by the elite among the rural poor. This could lead to alienation of the real beneficiaries.
(B) SHGs don't often follow need-based loan disbursal for the money from the SHG account is usually equally distributed among all members => differential credit needs of the group ignored
(C) Model hardly focuses on investment potential and improvement of skill levels of the borrowers - making credit available is not a panacea to rural problems. 
(D) SHG model has not been used by members to push themselves up the economic ladder. Focus of this model remains on financial inclusion and fails to tap the entrepreneurial spirit of borrowers.
No doubt that the model has successfully inculcated financial training and discipline among rural poor, more needs to be done to make this model a true harbinger of prosperity at the grass-roots level.

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