Friday, July 31, 2015

तीस्ता हमारे खून की प्यासी नहीं | Apoorvanand

तीस्ता के जेल जाने के मायने हैं भारत की आत्मा को कैद करना.यह कोई काव्योक्ति नहीं है.आत्मा कोई भौतिक यथार्थ नहीं है.वह है सत्य को पहचानने और उसके अनुसार काम करने का साहस अर्जित करने की हमारी आकांक्षा का एक दूसरा नाम. वह हमें अपनी सांसारिक क्षुद्रताओं को पहचानने और उनसे सीमित हो जाने पर लज्जित हो पाने की क्षमता है.आत्मा क्या है,यह आपको तब मालूम होगा जब आप सी बी आई के अधिकारियों से अकेले में बात करें और तीस्ता के साथ इस संस्था के व्यवहार पर उनकी प्रतिक्रिया सुनें.वे जो कर रहे हैं,उसकी अनैतिकता का उन्हें पूरा अहसास है.वे जानते हैं कि वे अपनी आत्मा को कुचल कर ही तीस्ता के साथ वह कर सकते हैं,जो अभी वे कर रहे हैं.
कई बार अपनी आत्मा को सुनना भी कठिन होता है.जब वह क्षमता भी हमसे जाती रहे,तब सम्पूर्ण विनाश के अलावा और कुछ भी नहीं.क्या भारतीय समाज की आत्मा या उसका अन्तःकरण पूरी तरह निष्क्रिय हो चुका है? पहले भी कई बार जब ऐसा लगा, कोई न कोई संस्था उठ खड़ी हुई है और उसने भारत की आत्मा के जीवित होने का प्रमाण दिया है.गुजरात के जनसंहार की गंभीरता का अहसास जब संसद तक में न दिखाई दिया, जो भारत की जनता की प्रतिनिधि संस्था है, तब मानवाधिकार आयोग ने इसकी नोटिस ली. लेकिन ध्यान रहे कि मनावाधिकार आयोग खुद ब खुद सक्रिय नहीं हो गया था. अनेक व्यक्तियों के, जिनमें तीस्ता सीतलवाड़ शामिल थीं, 2002 में खूरेंजी के बीच गुजरात जाकर उस भयंकर अपराध की शहादतें और सबूत इकट्ठा करने और उनकी रिपोर्ट बनाने के चलते ही आयोग को आधार मिला कि वह गुजरात खुद जाए और देखे कि आज़ाद भारत में कैसे राज्य का तंत्र ही अपने नागरिकों के एक हिस्से की ह्त्या और विस्थापन में शामिल है.
हत्याएँ हुई थीं, बलात्कार हुए थे, लोग अपने घरों और इलाकों से विस्थापित किए गए थे.यह कोई कुदरती हादसा न था और न हिंदू  क्रोध का स्वतःस्फूर्त विस्फोट. इस अपराध में संगठन शामिल थे, सरकार के लोग शामिल थे,पुलिस और प्रशासन की खुली भागीदारी के बिना यह मुमकिन न था. अगर यह अपराध था तो क्या अपराधियों की शिनाख्त करना, उन्हें भारत के क़ानून के मुताबिक़ उनके किए की सजा देना ज़रूरी न था? क्या इसके बिना जनसंहार के शिकार लोगों को इन्साफ मुमकिन था? यह बहुत स्पष्ट था कि गुजरात की सरकार और वहां के राजकीय तंत्र  की इसमें कोई  रुचि न थी.वह इसे एक भूकंप,सुनामी, तूफ़ान की तरह का हादसा मान कर  गुजर जाने देने और भूल जाने की वकालत कर रहा था.
गुजरात सरकार की बेरुखी का अंदाज इससे लगाया जा सकता है कि उसने मानवाधिकार आयोग की 2002-03 की रिपोर्ट को विधान सभा के पटल पर रखने में दस साल लगाए और वह भी तभी किया जब गुजरात उच्च न्यायालय ने उसे ऐसा न करने के लिए फटकार लगाई. इस रिपोर्ट में आयोग ने खासकर साबरमती संहार, गुलबर्ग सोसाइटी संहार,नरोदा पाटिया, बेस्ट बेकरी और सरदारपुरा के संहारों की जाँच  सी बी आई से कराने की सिफारिश की थी. गुजरात सरकार ने ऐसा करने से इनकार कर दिया था. यह रिपोर्ट भी विधान सभा सत्र के आख़िरी दिन पेश की गई जिससे इस पर कोई बहस न हो सके. तब की गुजरात सरकार का मुखिया ही आज भारत सरकार का मुखिया है.
तीस्ता का जुर्म यह था कि उन्होंने कई अन्य मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर इन तमाम अपराधों का पीछा किया.तीस्ता ने न्यायतंत्र को सोने न दिया और इन्साफ के लिए ज़रूरी सबूत बचाए रखने और गवाहों को टिकाए रखने में अथक श्रम किया. कई मामले उनकी वजह से गुजरात से बाहर की अदालतों में गए. और अनेक मामलों में इन्साफ हुआ.मैं साहस की बात नहीं कर रहा क्योंकि जो गुजरात नहीं गए हैं,वे समझ ही नहीं सकते कि गुजरात में इस जनसंहार की बात करने भर के लिए किस दिलगुर्दे की ज़रूरत थी.
तीस्ता गुजरात जाने वाली अकेली शख्स न थीं.लेकिन वे इस मुस्लिम विरोधी संहार में कानूनी इंसाफ के लिए लड़ने वाले चंद लोगों में शामिल हैं.इन सारे लोगों को, जो भारत के अलग-अलग हिस्सों से गुजरात गए,गुजरात विरोधी घोषित किया गया और इनके खिलाफ घृणा-प्रचार चलाया गया. गुजरात के प्रबुद्ध  समाज के मुट्ठी भर लोग ही गुजराती राष्ट्रवाद से मुक्त होकर इनके साथ आने का साहस जुटा पाए और वे भी गुजरात के गद्दार घोषित किए गए.
क़ानून का शासन अपने आप नहीं स्थापित होता. यह जिम्मेदारी सिर्फ राजकीय निकायों की नहीं है.राज्य के मूल दमनकारी चरित्र से परिचित लोग जानते हैं कि  राज्य प्रायः वर्चस्वशाली समूहों का हितसाधन करता है. पूँजी के खिलाफ श्रम, ‘उच्च’ जातियों और ‘निम्न’ जातियों, बहुसंख्यक धार्मिक समूह और अल्पसंख्यक समूह के प्रसंग में उसके आचरण से यह साफ़ हो जाता है.इसलिए ऐसे लोगों की, समूहों की जनतन्त्र में भी ज़रूरत बनी रहती है जो राज्य को न्याय के लिए मजबूर करें. उन्नीस सौ चौरासी के शिकारों को क्यों न्याय नहीं मिला? क्यों रामशिला पूजन अभियान और रामजन्म भूमि अभियान के दौरान और उनके चलते हुए हुए खूनख़राबे के अपराधी न सिर्फ बच निकले बल्कि देश की सत्ता पर काबिज भी हुए? क्योंकि हमारे पास पर्याप्त संख्या में तीस्ता सीतलवाड़ नहीं.
गुजरात में कोई चार सौ मामलों में जुर्म तय हुआ और मुजरिमों को सजा हुई. दिलचस्प है कि इस संख्या को तमगे की तरह गुजरात राज्य दिखाता फिरता है, साबित करने को कि वह कितना न्यायप्रिय है. इस संख्या के पीछे तीस्ता सीतलवाड़. मुकुल सिन्हा और जाने कितने लोगों की दिनरात की मेहनत है और यह गुजरात राज्य के चलते नहीं, उसके बावजूद हुआ है
सी बी आई(?)कहती है कि तीस्ता राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है. इससे बड़ा मजाक नहीं सुना गया होगा. अगर संघ परिवार, भारतीय जनता पार्टी की विभाजनकारी राजनीति और अन्य दलों की भीरुता की बावजूद भारत में अल्पसंख्यकों का यकीन बना हुआ है और वह सुरक्षित रहा है तो तीस्ता जैसों की जमात की वजह से. अगर भारत के हिंदू खुद को मानवीय कह पा रहे हैं, तो तीस्ता जैसों के कारण.
तीस्ता अभिजात वर्ग की ही सदस्य हैं. वे अंग्रेज़ी फर्राटे से बोल-लिख सकती हैं, अभिजन-व्यवहार से परिचित हैं.शौक से पहनती-ओढ़ती हैं और उन्होंने कभी दीनता या गरीबी का अभिनय नहीं किया.क्या इस वजह से अभिजात वर्ग और मध्य वर्ग मन ही मन तीस्ता से घृणा करता है? क्या तीस्ता सीतलवाड़, शबनम हाशमी,कविता श्रीवास्तव,सी के जानु,माधुरी, दयामनी बारला, वृंदा ग्रोवर, इंदिरा जयसिंह शिक्षित समुदाय को लगातार याद दिलाती हैं कि शिक्षा जो उन्होंने अर्जित की है,वह आत्मोत्थान के लिए,उदर-शिश्न-सीमित जीवन के लिए नहीं थी.वह सिर्फ उनका अर्जन नहीं. उसपर इस देश के गरीबों का, जो उनके तरह सुसंस्कृत नहीं कहे जाते, हक है.यह शिक्षा दरअसल इंसाफ के लिए है.
क्या तीस्ता को हम सब अपनी नज़र से दूर कर देना चाहते हैं क्योंकि वे विजय देव नारायण साही की तरह ही हमें सोने नहीं देती: “मुझे दिख रहा है/दिमाग धीरे-धीरे पथराता जा रहा है/अब तो नसों की ऐंठन भी महसूस नहीं हो रही है/और तुम्हें सिर्फ एक ऐसी/मुलायम सहलाने वाली रागिनी चाहिए/जो तुम्हें इस भारीपन में आराम सके/और तुम्हें हल्की ज़हरीली नींद आ जाए.
लेकिन मेरे भाई मैं तुम्हें सोने नहीं दूँगा/क्योंकि अगर तुम सो गए /तो सांप का यह ज़हर/ तुम्हारे सारे शरीर में फैल जाएगा/फिर कुछ लहरें आएंगी और किस्सा खत्म हो जाएगा.”
आगे भी सुनें, “ नशा चढ़ रहा है/…..लकिन जहां-जहां मैंने तुम्हारी नसें चीर दी हैं/वहां से कितना काला/खून उमड़ रहा है/ इससे यह नहीं साबित होता/कि मैं तुम्हारे खून का प्यासा हूँ…”
तीस्ता हमारी दुश्मन नहीं.वह हमारी आत्मा की पहरेदार है. हम उसे ही  कैद में न डाल दें, यह सोचकर  कि उसकी पुकार हमारी नींद में खलल है. ऐसी नींद में चैन का भ्रम है,लेकिन है वह निश्चय ही हमारी अंतिम मृत्यु.
Source:  Kafila

MDG: Missing targets

In his keynote speech at the Jaipur Literary Festival held in January, Professor Amartya Sen highlighted the vast disparities of development in India. Whereas in some States such as Tamil Nadu and Kerala the human development indices are on a par with many European nations, many States have a score below the poorest sub-Saharan countries.
Such skewed development across the country marks India’s efforts to meet the Millennium Development Goals of 2015. According to “Millennium Development Goals: India Country Report 2014”, brought out by the Ministry of Statistics and Programme Implementation, India’s achievement in respect of the MDGs is a mixed bag. It says India is on track to attaining the targets of universal primary education and developing a global partnership for development. However, the results are either mixed or poor in terms of achieving other MDGs.
A mixed bag
The report says India is progressing towards halving, between 1990 and 2015, the percentage of population below the national poverty line. But this claim is disputed by critics who say much of the decline that is shown is a statistical mirage produced by tampering with the definition of poverty and the way poverty is measured.
In a new research report, the McKinsey Global Institute has estimated that 680 million Indians, or 56 per cent of the population, lack the means to meet their essential needs. This works out to nearly 1.5 times the government’s official poverty figures. From all indications it is clear that the country will fail to reach the target of poverty alleviation.
The country, says the government report, is on track to ensuring that by 2015 children everywhere, boys and girls alike, will be able to complete primary education. Critics have, however, questioned the quality of education that is on offer. The various Annual Status of Education Reports (ASERs) of Pratham and a recent UNESCO study indicate that India is a poor performer in imparting quality education to children.
Gender and health
On reaching parity in youth literacy by 2015, the government says it is on target. However, gender parity in higher education is yet to be achieved and the progress is really slow. The overall atmosphere of insecurity among women in the country indicates that gender parity in many walks of life is still far off.
On meeting the targets for under-five mortality rate, infant mortality rate and maternal mortality ratio, the country sees sharp swings across States. India also has the largest number of first-day deaths in the world.

The report says the country is on track to attaining the target to halt and begin to reverse by 2015 the spread of HIV/AIDS. But the targets cannot be met in the case of malaria and tuberculosis.
Environment and living
It says India has performed well in achieving the target of integrating the principles of sustainable development into country policies and programmes and reversing the loss of environmental resources. However, the ground reality makes this claim laughable.
Given the fact that the government itself has acknowledged that its recent survey has grossly underestimated the number of slums in the country, one should be suspicious of its data on providing access to safe drinking water, basic sanitation, etc.
Technology
The report says India is steadily moving towards achieving the target of making available the benefits of new technologies, especially in information technology and communications. 



In its obsession to reduce the country’s fiscal deficit at any cost, the government is increasingly cutting down budgetary allocations to health care and poverty alleviation. There is also an eagerness to privatise most of the essential services, which will make the poor even more vulnerable.

( Pulished in frontline in March 2014. )

MDG report: India on track in reducing poverty

India has halved its incidence of extreme poverty, from 49.4 per cent in 1994 to 24.7 per cent in 2011, ahead of the 2015 deadline set by the U.N,, shows the Millennium Development Goals (MDG) Report, 2015, released on Tuesday.
The report set the limit for extreme poverty as those living on $1.25 or less a day. The reduction in poverty is still less than that achieved by several of India’s poorer neighbours. Pakistan, Nepal and Bangladesh have each outstripped India in poverty reduction.
While the report says India is on track to achieving the hunger targets, the nation remains home to one-quarter of the world’s undernourished population, over a third of the world’s underweight children, and nearly a third of the world’s food-insecure people. The report is especially important because it marks the deadline by which the MDG should have been achieved. India has achieved 11 out of 22 parameters in the report — spanning education, poverty, health, education and so on — and is on track to achieve one more by 2015-end. Bibek Debroy, member of NITI Aayog, released the report.
‘Tardy pace on maternal mortality front’
Though India has halved its incidence of extreme poverty, the nation is categorised as making “slow” progress on the other 10 parameters, including maternal mortality and access to sanitation, says the MDG Report.
“India hasn’t done that badly on the poverty goals. It hasn’t even done that badly on the education MDGs. The gross enrolment rate in almost every State you can think of is more than one. You can point towards the quality of education and the high drop-out rates, but at least one is getting them to school,” Mr. Debroy said.
India’s pace of progress on the poverty-reduction goal seems relatively slower than its neighbours is in some part due to its significantly bigger size and greater diversity. “While there are pockets of good performance, there are also sections that fare very poorly, and this brings the national average down,” Nagesh Kumar, Head, South and South-West Asia, United Nations Economic and Social Commission for Asia and the Pacific, told The Hindu.
Fall in Co2 emission
On the environment front, India is one of the few countries that have reduced its carbon dioxide emissions in relation to its GDP. India emitted 0.65 kg of carbon dioxide per $1 of GDP in 1990, which fell to 0.53 kg in 2010.
Dr. Debroy said that India was still lagging on several health parameters such as maternal mortality, infant mortality and basic sanitation. Although the infant mortality rate fell drastically from 88.2 deaths per 1,000 live births in 1990 to 43.8 in 2012, the annual progress on this had been slow. The same could be said for the maternal mortality rate, which fell from 560 per lakh live births in 1990 to 190 in 2013. He also said that these health indicators must be looked at carefully since many were interconnected. “Suppose no infant dies, then you have many malnourished children that have survived. What does that do to the ‘underweight children’ parameter? One should not make quick conclusions on the basis of such parameters,” he said.

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