Sunday, May 31, 2015

बालिग


तुम न कहती थीं
बड़ा कब होऊंगा मैं
वही हरकतें बचपन से अब तक.
भूल जाता हूँ तुम्हें, फुटबॉल देख
और बारिश में भीगना चाहता हूँ तर-बतर,
गुनगुनाता हूँ अपना लिखा कुछ भी, बेसुरे.
और कपडे यूँ लपेटे
तुम्हारे संग किसी भी पार्टी में पहुँच जाता हूँ.

बेहद सलीका आ गया है,
हंसने की जगह मुस्कुरा के रह जाता हूँ
और रस्ते फुटबॉल नहीं देखता,
चुपचाप गुजर जाता हूँ,
गुजर जाती है बारिश.

तुम्हारे जाने के बाद लगता है
बालिग हो गया हूँ मैं,
समझ आ गई है.

डायरी - शहर - इश्क़ - ज़हर


कटे उलझे  से  लफ्ज़  डायरी  के
जैसे  कुछ  लिखना  भी  चाहते  हों
मिटाना  भी.

याद  है  कोई
जो  बरबस  आ  जाती  है
और  मैं उसे मिटाना भी चाहता हूँ.

--***--

तुम आके तिनके से मुझे निकाल लेना,
ये शहर कुआं है कोई
जिसमें गिर के मैं डूब गया हूँ.

--***--


बचपन से ख्वाहिश थी कोई
किसी परी से इश्क़ होगा.

तुमसे हुआ
और देखो, तुम्हारे पर उग आये,
सर पे मुकुट सज गया.

...और एक दिन तुम परी सा उड़ गए,
अपने सफ़ेद मुलायम पंखों से.

सपना था शायद कोई,
शब के जाते वो भी गया.

--***--

ज़हर था कोई जो खाया था
तुमने दुश्मनी निभाने जो दिया था.
चलते-फिरते कोमा में हूँ
बोलता हूँ, सुनता हूँ, समझता नहीं.

क्या नाम कहा बताया था
तुमने उस ज़हर का? - इश्क़.
बड़ा अजीब ज़हर है!

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