Thursday, October 15, 2015

बेरोज़गार कवितायेँ


कितनी बैचेनी,
साल भर की
मेहनत के बाद,
एग्जाम.

खोजा गया रोल नंबर.
लिस्ट में कहीं भी नहीं,
ऊपर से निचले सिरे तक.
दो बार फिर और दो बार चेक किया गया,
नहीं मिला.

तुम्हारा बॉयफ्रेंड
इस साल भी बेरोज़गार रह गया.
तुम्हारी शादी अब किससे होगी शोना?

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तुम्हारी आँखों में ऐसा क्या है जो मैं देखूं?
वही काली की काली हैं,
वही निचुड़े से ख्वाब हैं,
वही बेरोज़गारी है,
वही बेचारगी है.

लड़की ने ऑरेंज जूस के पैसे टेबल पे पटके
और चली गई.
लड़का फटी जेब और बेचारी आँखों से
जाते देख रहा था.

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तुम्हारा पिता
मेरे पिता के पिता का भी पिता था.
तो उनके बेटी के बेटे का बेटा
तुम्हारा क्या हुआ?

लड़का उलझा रहा ऐसे ही
सवालों में साल भर.
लड़की को डोली में उठा
ले गया कोई हमसफ़र.

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मेरे घर में
रहता हूँ मैं,
चंद किताबें
एक देश और एक विश्व का नक्शा
कुछ धूल
और चार कॉकरोच.

कभी कभी चार बातें भी रहती हैं
दीवारों में गूंजती.
जो गर्लफ्रेंड सुना के जाती.
दो पैसे भी रहते हैं,
जो गर्लफ्रेंड दे के जाती है.


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