Monday, September 7, 2015

3 Short Storiies | लप्रेक (लघु प्रेमकथायें)

जांना पत्थर की लकीरें हैं उम्र... मयस्सर ज़िन्दगी यूँ इत्तेफ़ाकन नहीं बढ़ती.... न रुक जाती है कुछ देर की चलो ये काम निपटा लो, फिर आगे बढ़ते हैं. दरिया है कोई बढ़ता है, बढ़ता है... या हिमालय है, लाख साल से बढ़ रहा है, धीरे धीरे. ये उम्र उफ़ एक दिन मंज़िल पा लेगी. जिस तरह कोई नज़्म किसी किताब में दर्ज़ होती है, वक़्त की किताब में हम भी दर्ज़ हो तारीख बस रह जायेंगे... शहंशाहे-अकबर की तरह या उसके किसी अनाम प्यादे से.

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वो लड़का लिखता रहा दर्द और थोड़ा थोड़ा खर्च होता रहा. उसका लिखना जैसे किसी गिलास का खाली होना था... कुछ लिखा, गिलास एक घूँट खाली हुआ. फिर लिखा, फिर गिलास कुछ खाली. और एक दिन सब कुछ खाली.
कहते हैं, लड़का मर गया. अपनी टेबल पे लिखते लिखते ख़त्म हो गया. मोमबत्ती सा.
अफ़साने रह गए. दर्द में फड़फड़ाते... दर्द से फड़फड़ाते.

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मेरे किरदार मेरा पीछा करते हैं. जैसे वो दुःखी हों की आज़ाद कर दिए गए वो मेरे ज़िस्म से. फिर से आना चाहते हों अंदर. जैसे कोई घर से निकल बच्चा हो और बाप की आँखों में अपनेपन का बुलावा देखने की आस लिए हो.
मेरे अंदर कई और नए किरदार जमा है जाते हैं... और 'नो रूम्स अवेलेबल' का बोर्ड टंग जाता है. कहानीकार हर किरदार के साथ, हर संतान को बेघर करता है. 
कहानियाँ बस कहानियाँ नहीं होतीं... 

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