Sunday, June 14, 2015

ये डिग्रियां कौन दिखाते हैं? | Priya Darshan

किस्सा मशहूर है कि जाने-माने शायर अकबर इलाहाबादी के घर एक सज्जन पहुंचे और उन्होंने अपना विज़िटिंग कार्ड भीतर भिजवाया जिस पर उनके छपे हुए नाम के नीचे कलम से ‘बीए पास’ लिखा हुआ था। अकबर इलाहाबादी ने बाहर एक रुक्का भिजवाया, जिस पर यह शेर लिखा था, ‘शेख़ जी घर से न निकले और ये फ़रमा दिया / आप बीए पास हैं तो बंदा बीवी पास है।‘ अकबर के लिहाज से इस शेर का एक संदर्भ यह भी था कि वे पश्चिमी आधुनिकता की पूरी परियोजना को ख़ारिज करते थे जिसमें उनके स्कूल-कॉलेजों वाली शिक्षा भी शामिल थी।
बहरहाल, अकबर के परहेज और गांधी की आलोचना के बावजूद वह पश्चिमी शिक्षा पद्धति हमारे जीवन पर कुछ इस तरह हावी है कि हम उसके बाहर देख और सोच नहीं सकते। इसका एक दिलचस्प पहलू यह है कि पढ़ाई-लिखाई में डिग्रियां जैसे-जैसे बेमानी हुई जा रही हैं, सार्वजनिक जीवन में उनकी अपरिहार्यता जैसे और बढ़ती जा रही है। अगर ऐसा न होता तो दिल्ली की दो सरकारों के दो मंत्री डिग्री विवाद से न घिरे होते। क्या इत्तिफाक है कि एक तरफ केंद्र की मोदी सरकार की मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी की डिग्री अलग-अलग चुनावों के दौरान दिए गए उनके अपने हलफ़नामों की वजह से सवालों में घिरी है तो दिल्ली की केजरीवाल सरकार के कानून मंत्री जितेंद्र तोमर की कानून की डिग्री ही फ़र्जी बताई जा रही है।
यह बात कुछ हैरान करती है कि इन दो मंत्रियों ने अपनी डिग्रियों को लेकर कुछ गलत या अंतर्विरोधी सूचनाएं क्यों दीं? अगर इन दोनों के पास ये दो डिग्रियां न होतीं तो भी ये मानव संसाधन मंत्री या कानून मंत्री होने की अर्हता रखते थे। यही नहीं, इनकी डिग्रियों से इनकी कार्यकुशलता का भी कोई वास्ता नहीं है। स्मृति ईरानी अगर बीए या एमए पास नहीं हैं और जितेंद्र तोमर के पास अगर कानून की डिग्री नहीं है तो इससे न उनका सामाजिक सम्मान घटता है न उनकी राजनीतिक हैसियत में कमी आती है। फिर वह कौन सी चीज़ है जो डिग्रियों को इनके लिए इतना ज़रूरी बनाती है? क्या अपने भीतर का कोई खोखलापन, क्या आत्मविश्वास की कोई कमी- जिसकी वजह से इन्हें लगता है कि डिग्रियों की ओट लेकर ये छुप जाएंगे या कुछ और मज़बूत दिखने लगेंगे?
ध्यान से देखें तो भारतीय समाज में डिग्रियों का यह आतंक आधी सदी से पुराना नहीं है। समाज में बहुत सारे लोग ऐसे थे जो परंपरा से या स्वाध्याय से इतना कुछ पढ़-लिख लेते थे कि वे कई पढ़े-लिखे लोगों को पढ़ाते थे। वैसे तब की डिग्रियां भी इतनी बेमानी नहीं थीं। उन दिनों के मैट्रिक पास लोग भी अपने ज्ञान के बुनियादी अनुशासन में बहुत ठोस हुआ करते थे।
लेकिन आज स्वाध्याय की वह परंपरा भी क्षतिग्रस्त है और डिग्रियां बांटने वाले संस्थानों की विश्वसनीयता भी। कहने को भारत सूचना क्रांति के केंद्र में है और आइआइटीज़ की संख्या बढ़ती जा रही है, लेकिन पचास बरस में हम सीवी रमन या सत्येंद्रनाथ बोस के पाये का एक भी वैज्ञानिक पैदा नहीं कर पाए। हम बस सूचना प्रौद्योगिकी के बाज़ार में, कवि वीरेन डंगवाल के शब्दों में ‘बिल गेट्स का दक्ष किंतु निर्जीव हाथ’ बन कर खुश हैं। दूसरे अनुशासनों की दशा और गंभीर है। हिंदी साहित्य में पीएचडी लगभग मज़ाक का विषय हो चुकी है।
इसके बावजूद जितेंद्र तोमर या स्मृति ईरानी के भीतर ख़ुद को विशेष डिग्रीवाला बताने की चाह क्यों है? क्योंकि क्षऱण डिग्रियों का ही नहीं, ज्ञान की पूरी परंपरा का हुआ है। शिक्षा अब ज्ञानवान या बेहतर इंसान बनने की कोशिश या प्रक्रिया का नाम नहीं है, वह बेहतर- यानी अच्छे पैसे वाली- नौकरियां दिलाने का जरिया है- इसके लिए विज्ञान भी रटा जा सकता है और इतिहास भी- और दोनों को नौकरी पाकर भूला जा सकता है। भले ही पढ़ाई आपने देश के सबसे भारी-भरकम संस्थानों से की हो।
पिछले दिनों बिहार के एक विद्यालय में दूसरी-तीसरी मंज़िल पर खिड़की के सहारे लटक कर अपनों को इम्तिहानों में नकल करा रहे लोगों की तस्वीर बिल्कुल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वायरल हो गई थी, लेकिन खिड़की के दूसरी तरफ की असलियत किसी ने देखने-जानने की जहमत नहीं मोल ली थी। हमारे यहां पैसेवाले अगर ट्यूशन के सहारे, कोचिंग के सहारे, गाइडबुक के रट्टामार तरीकों के सहारे इम्तिहान पास करते हैं तो गरीब लट्ठमार ढंग से- फर्क बस इतना है।
लेकिन जब आपके पास ज्ञान की ठोस परंपरा न हो, अपनी अर्जित शिक्षा का आत्मविश्वास न हो तो आपको डिग्रियां दिखाना जरूरी लगने लगता है। क्योंकि यह किसी और चीज़ से नहीं, सिर्फ़ आपकी डिग्री से साबित हो सकता है कि आप पढ़े-लिखे हैं। बुरा हो इस देश की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का कि लोगों का यह घपला भी पकड़ में आ जाता है।

Source: https://www.facebook.com/priya.darshan.58/posts/10206374305572332

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