Monday, June 1, 2015

धुंआ



रात धुंआ है
दिन कुहरा घना है
ये कुहरा नहीं, पोल्लुशन की कालिमा है
चिमनियों से निकल रहा धुंआ है
नीचे मजदूर जल रहा
कुपोषित जिसका बेटा, कल रात मर गया है.

एक औरत जो कल पकड़ी गई होटल में
उसका पति था चार दिन से कोमा में.
जिसने पी थी देसी शराब ऊँचे ठेके से
और बेटी नाबालिग चुराई गई धोखे से.

आदमी के अच्छे दिन का इश्तेहार अख़बार में
मर गया पत्रकार उसका सच ढूंढते बाज़ार में
कालिख पुती शहर में, कालिख पुती गांव में
आदमी के अच्छे दिन का इश्तेहार अख़बार में.

चार मजदूर जिनके घर का पता नहीं,
जांच में कोई आईडी मिला नहीं
मर गए मिल में दब के मशीनों से
कंपनसेशन उनको कभी मिला नहीं.

तू क्या पहनेगी बताऊंगा मैं
किस पब में कब जाएगी बतलाऊंगा मैं
तेरी कमर कितनी खुली रहे
इसका नाप मैं लूंगा
तेरे इश्क़ का सारा हिसाब मैं लूंगा.
मुझको ही चुन नहीं तो
तेरा लव 'लव जिहाद' है.
और इश्क़ करना ही पाप है.

जल गई मस्जिद, जल गया पादरी चर्च में, फिर
आदमी के अच्छे दिन का इश्तेहार अख़बार में.

आ गई ज़मीन डैम की चपेट में,
घर बार उजड़े एक ही रात में.
न कुछ पैसा मिला, न कहीं बसर हुई
आवाज़ उठाई तो लाश आई खाट में.

चुप कर तू, ये धुंआ ओस है
खुशनुमा सुबह और सब में जोश है
देख दिन को जैसे मैं देखता हूँ उसे
अच्छे दिन दिखेंगे आ ज़रा होश में.

नहीं तो, छोटा कॉलम होगा
तेरी लाश के बारे में कल के अख़बार में.
जिसके नीचे छपा होगा बड़ा सा
आदमी के अच्छे दिन का इश्तेहार अख़बार में.

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