Monday, May 18, 2015

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इन सड़कों पे चलके कभी आने-अकबरी लिखी गई होगी, तब ताज न होगा यहां और शायद न रहा हो लाल-किला. यमुना रही होगी दौड़ती भागती, लेकिन इतनी गन्दी न रही हो शायद.. और आगरा #आगरा न रहा हो. पेठा खा के तुम सा गोलू होना चाहता हूँ और अगली ट्रैन पकड़ गोल गुम्बद तुम्हारे संग देखना चाहता हूँ. ख्वाहिशें बहुत हैं, शहर कई... बस सेंटर में तुम हो हर जगह. मेरा फोकस है कि किसी भी शहर तुम्हें खोज लेता है. फिर वो शहर अपना बना लेता है, तुम्हारी तरह.

छोड़ो, तुम नहीं समझोगे... हर अक्स में इश्क़ का होना.

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