Thursday, April 23, 2015

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रात वह धुंआ है जो तुम्हारे ज़िस्म से उतर पहाड़ों से होकर आकाश में नहीं खोने वाली, ठीक उस लड़की की तरह जिसके सपने में तुमने घर बसाया था और तुम्हारे ख्वाबों में उसने नया शहर. वो शहर मरा नहीं है, बस ऊंघता रहता है, जैसे मुग़लों के वक़्त से उसमें कोई रह ही न रहा हो. कैलेंडर तारीखें बदलता रहता है, याद हर दिन बूढी होती है, सोचता हूँ मरेगी एक रात. लेकिन इन तैरती यादों को किताबों से नहीं मारा जा सकता. सब बेमानी होता है इन रातों में आँखे पथरा जाती हैं और लड़के ने पहली दफे जाना की लड़की का ना होना किताबों से नही भरा जा सकता. फ्रेंज़ काफ्का से भी नहीं!
सोचता हूँ पूछ लूँ... तुम्हारे सपनों में बसे मेरे घर का क्या हाल है?


मर्दों ने कहा

मर्दों ने कहा
औरतों को आते हैं मासिक धर्म,
इसलिए हैं वे अपवित्र.
इसलिए उनके लिए बंद कर दो
तमाम पूजाघर, तमाम मठ-मंदिर.
घरों से दूर रखो इन्हें,
झोपड़ों में
और न छूने दो बर्तन, खाना.
मर्दों ने कहा
औरतें हैं अपवित्र,
इसलिए नहीं पाएंगी मोक्ष,
और न ही सुख से जी पाएंगी समाज में.
एक दिन मर्दों ने कहा
भगवान ने पवित्रता का ठीकरा मर्दों के हाथ
में रखा था.
इसलिए मार दी जाएँगी तमाम औरतें!
मर्दों ने कहा और किया
और मानव धरती से विलुप्त हो गया!

Wednesday, April 22, 2015

किसानों की मौत के आंकड़े तो सरकार के गुलाम हैं?


Farmer suicide cases in Maharashtra
मौसम ने बर्बाद की फसलें
मुंबई: नंबर चीज ही ऐसी है, जिसकी सरकार होती है, उसके हिसाब से बोलते हैं। आंकड़े सरकारों के गुलाम होते हैं, ये आपने सुना होगा, लेकिन समझना हो तो लोकसभा में केन्द्रीय कृषि मंत्री के भाषण को सुनिए। कह रहे थे कि महाराष्ट्र में सिर्फ तीन किसानों ने मौत को गले लगाया पिछले तीन महीनों में, यानी बेमौसम बारिश और ओले के बाद। सरकार इन तीन को भी इसलिए मान रही है, क्योंकि किसान लिखकर मरे थे कि वह क्यों खुदकुशी कर रहे हैं? बाकी के जो जनवरी से लेकर मार्च 2015 के बीच 558 किसान राज्य में मारे गए हैं, वह सरकार की नज़र में तकनीकी गलती कर गए हैं। मरने के पहले ये नहीं बता कर गए कि क्यों जा रहे हैं दुनिया से, इसलिए इनको हमारी सरकार देहात में फैले अवसाद का हिस्सा नहीं मान सकती। वह नहीं मानती कि बेमौसम बारिश और ओले ने इन किसानों को मरने के लिए मज़बूर किया। केन्द्रीय कृषि मंत्री गलत नहीं हैं कि मरे तो सिर्फ 3 किसान हैं। बाकी के सब तो सरकारी थ्योरी के शिकार हो गए।

आज अक्षय तृतीया है। किसान पूजन कर खरीफ की फसल बोते हैं, लेकिन अकोला के एक गांव में पूरे परिवार ने मौत को गले लगा लिया। पांच लोगों के शव खेत से मिले। सरकार ने कहानी बनाई किसान का ज़मीन को लेकर विवाद चल रहा था। विदर्भ, मराठवाड़ा के किसानों की कोई भी कहानी उठा कर देख लीजिये आपको हर सरकारी कहानी में दम नज़र आएगा। सबके पैटर्न लगभग एक सरीखे हैं। खुदकुशी के तुरंत बाद पुलिस मौके पर जाएगी। आला अफसरों को इत्तला मिलेगी। सबसे पहले पारिवारिक वज़ह खोजी जाएंगी। वह मिल गई तो सरकार का काम पूरा। मीडिया को बता दिया जाएगा कि किसान अपने कर्मों की वज़ह से मर गया है। और अगर पारिवारिक वज़ह न मिली तो समझिये बचा हुआ काम दारू की कहानी पूरी कर देगी। ज्यादा पीता था, कर्ज में था, इसलिये मर गया बेचारा।

अब तक मुझे ऐसा कोई आंकड़ा नहीं मिला है, जो बताए कि विदर्भ और मराठवाड़ा के किसान देश के दूसरे इलाकों की तुलना में ज्यादा पीते हैं।

ताज्जुब न करिये कि राज्य में वही सीएम हैं, जो मौत के आंकड़ों पर अब से कुछ महीने पहले चीखते थे। पूरी दुनिया को बताते थे कि कैसे विदर्भ और मराठवाड़ा के किसानों के साथ नाइंसाफी हुई है। सिंचाई के लिए पानी नहीं मिला है इसलिये किसान खुदकुशी कर रहा है। विदर्भ में जमकर प्रचार हुआ। खुद नरेन्द्र मोदी चाय पर चर्चा के लिए आए। यवतमाल में एक शाम किसानों के साथ बात की। मैं भी उस दिन वहां गया था। मोदी जी किसानों की विधवाओं से मुलाकात की थी। तब से अब तक बदला कुछ नहीं है। सिंचाई की योजनाएं अब रातोंरात तो बन नहीं सकती, इसलिये ये मानने में कोई हर्ज नहीं कि नाइंसाफी जारी है। बस शिकायत है तो इतनी-सी कि जब लोग मर रहे हैं तो हम मान क्यों नहीं रहे। सरकारी महकमे मीडिया को गलत साबित करने में मेहनत क्यों कर रहे हैं ?

सरकारें थोड़ी-सी दया दिखाएं, आंकड़े आपके गुलाम हैं, उनको हुक्म दें कि वो सच बताएं। बताएं कि हर वो किसान जो मर रहा है उसके मरने की फौरी वजह कुछ और हो सकती है लेकिन बड़े पैमाने पर उसके आसपास के हालात उसे जीने नहीं दे रहे।

-Abhishek Sharma for NDTV (Source: http://khabar.ndtv.com/news/blogs/farmer-suicide-cases-in-maharashtra-756906 )

Tuesday, April 21, 2015

और सरकार ने देश की तरक्की कर दी



उन्होंने कहा 
आबादी बढ़ रही है
इसलिए मार दिए जायेंगे बूढ़े,
हमारे धर्म में आस्था कम हो रही
इसलिए दफन किये जायेंगे अन्य धर्म.
पब तो छोडो, अब चौखटों से बाहर औरतें पांव नहीं रखेगीं,
क्यूंकि मर्द घूरते हैं उन्हें.
और भ्रष्टाचार ख़त्म करने
सरकारी महकमे, सरकारी तंत्र को ही किया जायेगा ठप्प,
शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय पे नहीं होगा सरकार का ख़र्च.
उन्होंने कहा
पश्चिमी संस्कृति ने घेर रखा है हमें,
इसलिए सब उत्तर की और मुंह कर सोयेंगे!
और किसान कर रहे हैं आत्महत्या
इसलिए उनकी ज़मीनें दे दी जाएँगी उद्योगपतियों को.
इस तरह सरकार ने
सारे देश की तरक्की कर दी!
--
अंत में उन्होंने कहा
मीडिया को खरीद लिया ही है
फिर भी लिखते हैं लोग ख़िलाफ़.
तो तोड़ दी जाएँगी सारी कलमें,
बिखेर दी जाएगी तमाम स्याही
और स्याह कर दिए जाएंगे तमाम कागज़.
इस तरह देश में
सब कुछ अच्छा-अच्छा दिखने लगा.

3 Films


Three Films. Just Three Films!? Its really a tough task and for me its toughest task. I feel, everyone puts their creativity and all efforts (except some commercial films) and we need to respect everyone's efforts. Every year we make 500+ movies in India and 3000+ in the world. So selecting just three from the beginning is a tough task. I watched films from Korea, Brazil, China, Thailand, France, Italy, Iran, UK, USA, Mexico and Australia and in Indian languages Tamil, Telugu, Kannada, Malayalam and Hindi. Subtitles help in understanding another language films but  I guess understanding original dialogues will make films more entertaining.

1. Juno: A 2007 release Hollywood film. 19 year old Ellen Page (that time) played a 16 yeas old pregnant high-schooler Juno Macguff. The acting skills of Ellen Page make you her fan. Being Indian I felt more attracted and emotionally attached to the issue. 



2. Tare Zameen Par: Lot of people said lot of things about film. I just say, I am hosteller since the age of 10.



3. Life Is Beautiful:  (ItalianLa vita è bella) is a 1997 Italian tragicomedy comedy-drama film directed by and starring Roberto Benigni. Benigni plays Guido Orefice, a Jewish Italian book shop owner, who must employ his fertile imagination to shield his son from the horrors of internment in a Nazi concentration camp. Part of the film came from Benigni's own family history; before Roberto's birth, his father had survived three years of internment at the Bergen-Belsen concentration camp.
The film was a critical and financial success, winning Benigni the Academy Award for Best Actor at the 71st Academy Awards as well as the Academy Award for Best Original Dramatic Score and the Academy Award for Best Foreign Language Film. (WikiPedia)




Bonus. Bangalore Days: 2014 release Malayalam movie. My recent favourite.



Sunday, April 19, 2015

4 Books



Books. I survived in Engineering on Books and Movies. Every book is a different world. Every story is lake of emotions. I read biographies, autobiographies, Premchand, Sarat chand Chattopaddhyay in school days. Some interesting books were part of school syllabus and now I am a student of Hindi Literature many are in my syllabus. NCERTs are more then just syllabus-books. Contain thoughts and knowledge of different scholars, they are my favourite; Especially Geography, Civics, Polity, History and Maths NCERTs. 

Here is my list of 'Four Books'

1. Maila Aanchal: 'Anchalik Upanyas' (regional novel) by Phanishwar Nath Renu reveals condition of Indian villages in 1940s, when politics was on peak, 'Bharat Chhodo Andolan' started and after that India got freedom. The politics, people, corruption and society; 'Maila Anchal' is account of each and everything. 

'Godan' by Premchand is another pioneer 'Anchalik Upanyas'. I loved that too.




2. Gulzar's Poetry Books: Instead of choosing one book, adding all here. Because we can't choose a single poem as 'Best Poem', neither particular book. Gulzar is my favourite, will always remain. 



3. Paulo Coelho's 'Veronica Decided to Die': A slow novel with few characters and story with philosophy. I guess people rarely put it in their favourite list as 'The Alchemist' and 'The Zaheer' are much famous and sold out. I liked both but 'Veronica...... ' is favourite.



4. India's Struggle for Independence by Bipin Chandra and Others: An account of Freedom Struggle, favourite of Civil Service Aspirants. I liked it coz of the way its written. Most realistic book I ever read.


Other books I loved includes Gandhi's Autobiography ( My experiments with truth ), Rediscovery of India by Meghnad Desai, Nehru's letters, Gunahon ke Devta by Dharmveer Bharti, Javed Akhtar's Gazal Collections (Lava, Tarkash), Munavvar Rana's poems, Vishnu Prabhakar's biography of Bhagat Singh, Ramchandra Guha's India after Gandhi, Karan Bajaj's novels, Aha! Zindagi Magazine and many more....


Thursday, April 16, 2015

5 Foods



I am not a foodie so choosing 'five foods' is more related to emotional attachment to food/place than just taste. A hosteller from age of 10, most of the time I eat in restaurants, messes, canteens, Dhabas or tiffins centers. Mostly similar tasteless food. 

Here is my list of five favourite foods.

1. Different type of Dosas: First time I tasted different types of Dosas at a Thelewala in Mysore, He had 45 varieties of Dosas, including pav-bhaji, chilli-chicken and many. 

Recently, here in Indore, we went to a restaurant called 'Idly House' has even more varieties of Dosa and Utpam. We ordered Chilli-Paneer Dosa and Cheese-Corn Dosa and both were delicious. Another thing Cheese-burst Utpam was tasting similar to a pizza in very own South Indian flavour.

Mysore Butter Masala Dosa is my another favourite.




2. Continental Food: I Madhya Pradesh, its tough to get continental food but in Mysore/Bangalore you can easily find Continental-Restaurants. Continental foods have very different tastes but we with extra chilli and salt can Indianise it. :)




3. Home Made Food: I miss home made food. Karela by Mummy, Udad dal from Dadi... actually everything.




4. Maggi: I guess, Maggi is favourite food of hostellers. I can survive on Maggi for days. New flavours of Maggi are good. 




5. Dhabas Dal Tadka: The oily, masaledar food in Dhabas. I just love Dal-Tadka there. Generally when we travel by overnight buses, we eat Dal-Tadka and Tandoori Roti at 1 am. Its not hygienic, but tasteful. 




Bonus. Coffee: I know, I know, people will not put coffee in foods but Its my weakness. Some people need marijuana to focus, whisky to sleep or beer to survive and  I need coffee to open my eyes! 

Cappuccino (just confirmed spelling from Google! :P ) is good, Caffe Latte is better. 



Tuesday, April 14, 2015

नेट न्‍यूट्रैलिटी क्यों है जरुरी / रवीश कुमार

[ रवीश जी के 'क़स्बा' से ली गई पोस्ट है. मैं इसे एक बेहतरीन ज्ञानवर्धक आर्टिकल कहूँगा. आप भी पढ़िए. ]
धरती पर भले ही हम और आप बराबर न हो सकें मगर बताया जाता है कि इंटरनेट पर हम और आप बराबर हैं। एक ही क्लिक में हम अमेरिका और मुनिरका की वेबसाइट पर आवाजाही कर सकते हैं। व्हाट्सऐप पर ग्रुप चैट कर सकते हैं और स्काइप पर इंटरनेशनल कॉल।
नंबर वोडाफोन, टाटा या एयरटेल का लेकिन व्हाट्सऐप के ज़रिये बातचीत फ्री की। अगर यही बातचीत आप इन टेलिकॉम कंपनियों के ज़रिये करते तो उन्हें कमाई भी होती मगर एसएमएस का पैसा भले न दे रहे हों आप इंटरनेट कनेक्शन का पैसा तो दे ही रहे हैं। किस रफ्तार से और कितना डेटा आप इस्तमाल करेंगे इसका पैसा टेलिकॉम कंपनी आपसे वसूल लेती है।
मगर अब ये कंपनियां चाह रही हैं कि आप कौन सा वेबसाइट या ऐप इस्तमाल करते हैं इस आधार पर वे आपसे कम या ज्यादा पैसे लें या फिर इंटरनेट के स्पीड को तेज़ या धीमा अलग अलग वेबसाइटों के उपयोग के आधार पर करें। साथ ही वह कुछ वेबसाइटों से पैसा लेकर उन्हें मुफ्त करते हुए प्रोत्साहित करेंगी और जो उन्हें पैसा नहीं देगा उनको अपने सर्विस के अंदर नहीं खुलने देंगी।  मामला सिम्पल है बस ज़रा याद कीजिए कि आप इंटरनेट के ज़रिये क्या क्या करते हैं। और तब क्या करेंगे जब अलग अलग वेबसाइटों के उपयोग के आधार पर इंटरनेट कंपनी को पैसा देना पड़े।
गूगल, याहू जैसे सर्च इंजन के ज़रिये दुनिया भर में खोज कर डालते हैं। यू ट्यूब के ज़रिये अपना वीडियो अपलोड करते हैं और दूसरे का अपलोड किया हुआ देखते हैं। इसके लिए गूगल और यू ट्यूब के पास कमाई के अपने मॉडल भी हैं। स्काइप, वाइबर जैसे मुफ्त वार्तालाप माध्यमों से आप टेलिकॉम कंपनी को बात करने का एक पैसा दिये बिना बात कर लेते हैं।
फेसबुक, ट्वीटर, इंस्टाग्राम से लेकर आमेज़न, फ्लिपकार्ट पर आप हाल चाल से लेकर दाल भात की खरीदारी कर रहे हैं। इस गेम में सरकारें भी कूद गईं हैं। डिजिटल बराबरी के नारे के साथ रोज़ नए नए ऐप्स बनाए जा रहे हैं ताकि आप सरकार तक आसानी से पहुंच सकें। ओला से लेकर बड़बोला नाम के ऐप्स आ रहे हैं। टैक्सी से लेकर रेल टिकट तक के ऐप्स आ गए हैं।
इन सबको तकनीकी भाषा में ओवर द टॉप सर्विसेज़ कहते हैं। आप इन ऐप्स का इस्तेमाल फ्री में करते हैं। कुछ ऐप्स के लिए पैसे भी देते हैं। इसके लिए आप किसी टेलिकॉम कंपनी का 2जी 3जी कनेक्शन इस्तमाल करते हैं जिसके लिए आप उस कंपनी को पैसे देते हैं। टेलिकॉम कंपनियों का कहना है कि हाई स्पीड का ब्रॉडबैंड देने के लिए निवेश करना पड़ता है। इन ओवर द टॉप सर्विसेज से उनकी कमाई पर असर पड़ रहा है।
व्हाट्सऐप के कारण टेलिकॉम कंपनियों को चार हज़ार करोड़ का नुकसान हो रहा है लेकिन व्हाट्सऐप के कारण डेटा का इस्तमाल भी तो बढ़ा है जिससे टेलिकॉम कंपनियां पहले से ज्यादा कमा रही हैं और आने वाले दिनों में कमाएंगी। ये पूरा मामला आप पहले से समझते हैं। जैसे केबल वाला आपके घर आता है और आप शिकायत करते हैं कि भाई एनडीटीवी इंडिया क्यों नहीं आ रहा है। फलां चैनल इस नंबर पर क्यों आ रहा है, मेरी पसंद का चैनल पिछले नंबर पर क्यों आ रहा है। आप जानते हैं कि यह सब कैरेज फीस के आधार पर तय होता है। क्या यही कुछ अब इंटरनेट की दुनिया में होने जा रहा है।
टेलिकॉम कंपनियां चाहती हैं कि कोई ऐसा बिजनेस मॉडल निकले जिससे उन्हें भी इन नए क्षेत्रों से कमाई हो सके वर्ना एक दिन वो सिर्फ नेटवर्क बन कर रह जाएंगी। लोग फोन से लेकर मैसेज तक के लिए एप्लिकेशन का इस्तमाल करेंगे जबकि हमें जो लाइसेंस मिलता है उसमें इन सुविधाओं की फीस शामिल होती है।
इसी नए मॉडल की तलाश के लिए टेलिकॉम नियामक संस्था टीआरएआई ने 118 पेज का मशवरा पत्र जारी किया है। एक लाख से ज्यादा लोग ईमेल कर चुके हैं प्लीज ऐसा मत कीजिए। जो पहले से चल रहा है चलने दीजिए। सोशल मीडिया पर नेट न्यूट्रैलिटी ज़िंदाबाद के नारे लग रहे हैं। नेट न्यूट्रैलिटी मने आपने एक बार ब्रॉडबैंड की फीस दी, उसके बाद किसी भी साइट पर बिना अतिरिक्त पैसा खर्च किये चले गए। उसी रफ्तार से और उसी अधिकार से।
यह चुनौती पैदा हुई है स्मार्टफोन के स्मार्टनेस से। भारत में 20 प्रतिशत लोगों के पास ही स्मार्टफोन हैं मगर इसकी रफ्तार तेज़ी से बढ़ रही है। फोन की दुकान पर ज्यादातर फोन अब स्मार्टफोन ही बिकते हैं। स्मार्टफोन के कारण ही ऐप्स और ई बिजनेस सेवाओं का विस्तार संभव हो सका है। टेलिकॉम कंपनियों को लगता है कि उनके नेटवर्क पर दूसरे आकर धंधा कर रहे हैं, उन्हें कुछ नहीं मिल रहा है। वे भी इन ऐप्स और वेबसाइट से कुछ वसूलना चाहती हैं।
एक कंपनी ने कहा है कि जो वेबसाइट उनके यहां अतिरिक्त पैसे देकर रजिस्टर्ड होगी उसी को आप रफ्तार से सर्फ कर सकेंगे। अब अगर ऐसा होगा तो इंटरनेट की दुनिया में गैरबराबरी के मंच बनते चले जाएंगे। टेलिकॉम कंपनियां कहती हैं कि इंटरनेट बैंकिंग तेज़ रफ्तार से बढ़ रही है। जैसे एटीएम से पैसे निकालने पर बैंक सुविधा शुल्क की मांग करते हैं उसी तरह से टेलिकॉम कंपनियां इंटरनेट बैंकिंग के बदले किसी शुल्क की उम्मीद रखती हैं। अगर कोई कंपनी यह कहे कि हम टेलिकॉम कंपनी को पैसा दे रहे हैं ताकि जब हमारा उपभोक्ता हमारी साइट पर आए तो उससे इंटरनेट के इस्तमाल के पैसे न लिये जाएं और रफ्तार भी बढ़िया रहे तब ये आइडिया कैसा रहेगा।
क्या वाकई टेलिकॉम कंपनियों की कीमत पर यह विस्तार हो रहा है या टेलिकॉम कंपनियां इस बढ़ते हुए क्षेत्र में अपनी कमाई का ज़रिया ढूंढ रही हैं। एक दलील यह है कि टेलिकॉम कंपिनयां काफी पैसे देकर लाइसेंस हासिल करती हैं जबकि ऐप्स या ई कार्मस या सर्च इंजन वाले बिना किसी लाइसेंस के ये सब काम कर रहे हैं। क्या ओटीटी को लाइसेंस रीजिम के तहत लाना चाहिए। दुनिया भर की सरकारें चाहती हैं कि टेलिकॉम कंपनियां नेट न्यूट्रैलिटी से छेड़छाड़ न करें मगर खुद ही करती रहती हैं। नेट के कंटेंट पर निगरानी के लिए कानून से लेकर जासूस पैदा करती रहती हैं। क्या वाकई नेट न्यूट्रैलिटी की स्थिति‍ है। यह भी एक सवाल है।
ध्यान दे : आप ट्राई (Telecom Regulatory Authority of India) के इस ईमेल आई डी पर अपना पक्ष लिख सकते हैं : advqos@trai.gov.in 
साथ ही आपके क्षेत्र के सांसदों की सूची और उनका ईमेल आई डी निचे दिए लिंक पर मौजूद है। सौजन्य : www.savetheinternet.in उन्हें भी लिखिए।

https://docs.google.com/spreadsheets/d/1T6HBlFv78NCCsFGTln0eLa4SZj5x-LLft37Vtu4VwmU/edit#gid=0

6 Places



Travelling is my new hobby. We the "Travellers Club" people of Infosys explored South India. We travelled in group of 20-21 people and it was fun. I still remember those moments and people. Choosing just six places is really tough. So, I just grouped few places. 

1. North-East India: I explored south and now want to explore North-East. It was my college days plan to travel to origins of Teesta river and Gurudongmar lake (Sikkim), but some how it continues delaying and I am still waiting for the right moment.

Mizoram and Nagaland are another destinations. For "Indian Citizens" Inner Line Permit need to travel to these states. Rih Dil Lake (Situated in Myanmar, Holiest place for Mizo people) is another destination.

Exploring the Brahmaputra and its effect on the people; Majuli island and culture of people there is also in my list.


Cherrapunji


2. Leh: Bike Trip: I heard, for Manali to Pangong Tso road is trip possible. Although I m not comfortable with riding but once I will, I am going to explore it.


a bike of Leh road

3. Spain Trip: After release of 'Zindagi Na Milegi Dobara', similer trip was an idea of Yash and pending on August 2016, on dates of La Tomatina (festival). I am not sure, we will have enough money or not to visit Europe but Is Saal Nhin To Agle Saal Sahi for sure!




4. Muktagiri: Its a Jain pilgrimage in Baitul, Madhya Pradesh. Just 6 hour from Bhopal, I visited once and want to visit again.




5. Mussoorrie: The LBSNAA. [ Post a Photo after.... :) ]

6. Fact is, after leaving Infosys, I thought of living for a month in Ooty and exploring beauty of Nilgiris, reading, writing and practicing Vipasyana for whole month. Some how I was in hurry to return back to home, but now I am thinking for such break either in Ooty, or in Bohemia-area-of-Mussoorie or in the Ashram of Jaggi Vasudeva ( Isha Foundation ) Coimbatore.


Ooty

Tuesday, April 7, 2015

निःशस्त्र सेनानी / माखनलाल चतुर्वेदी



‘सुजन, ये कौन खड़े है ?’ बन्धु ! नाम ही है इनका बेनाम ।
‘कौन करते है ये काम ?’ काम ही है बस इनका काम  ।
 
‘बहन-भाई’, हां कल ही सुना, अहिंसा आत्मिक बल का नाम,
‘पिता! सुनते है श्री विश्वेश, जननि?’ श्री प्रकॄति सुकॄति सुखधाम।
 
हिलोरें लेता भीषण सिन्धु पोत पर नाविक है तैयार
घूमती जाती है पतवार, काटती जाती पारावार ।
 
‘पुत्र-पुत्री है?’ जीवित जोश, और सब कुछ सहने की शक्ति;
‘सिद्धि’- पद-पद्मों मे स्वातन्त्र्य-सुधा-धारा बहने की शक्ति।
 
‘हानि?’ यह गिनो हानि या लाभ, नहीं भाती कहने की शक्ति,
‘प्राप्ति ?’- जगतीतल की अमरत्व, खड़े जीवित रहने की शक्ति।
 
विश्व चक्कर खाता है और सूर्य करने जाता विश्राम,
मचाता भावों का भू-कम्प, उठाता बांहें, करता काम ।
 
‘देह ?’- प्रिय यहाँ कहाँ परवाह टँगे शूली पर चर्मक्षेत्र,
‘गेह ?’- छोटा-सा हो तो कहूँ विश्व का प्यारा धर्मक्षेत्र !
 
‘शोक ?’- वह दुखियों की आवाज़ कँपा देती है मर्मक्षेत्र,
‘हर्ष भी पाते है ये कभी ?’ -तभी जब पाते  कर्मक्षेत्र।
 
फिसलते काल-करों से शस्त्र, कराली कर लेती मुँह बन्द;
पधारे ये प्यारे पद-पद्म, सलोनी वायु हुई स्वच्छंद ।
 
‘क्लेश ?’- वह निष्कर्मों का साथ कभी पहुँचा देता है क्लेश;
लेश भी कभी न की परवाह जानते इसे स्वयम सर्वेश।
 
‘देश ?’- यह प्रियतम भारत देश, सदा पशु-बल से जो बेहाल,
‘वेश ?’- यदि वॄन्दावन में रहे कहाँ जावे प्यारा गोपाल ।
 
द्रौपदी भारत माँ का चीर, बढ़ाने दौड़े यह महाराज,
मान लें, तो पहनाने लगूँ, मोर-पंखों का प्यारा ताज।
 
उधर वे दुःशासन के बन्धु, युद्ध-भिक्षा की झोली हाथ;
इधर ये धर्म-बन्धु, नय-बन्धु, शस्त्र लो,कहते है-‘दो साथ।’
 
लपकती है लाखों तलवार, मचा डालेंगी हाहाकार,
मारने-मरने की मनुहार, खड़े है बलि-पशु सब तैयार।
 
किन्तु क्या कहता है आकाश ? हॄदय ! हुलसो सुन यह गुंजार,
‘पलट जाये चाहे संसार, न लूंगा इन हाथों हथियार।’
 
‘जाति?’- वह मजदूरों की जाति, ‘मार्ग ?’ यह काँटों वाला सत्य;
‘रंग?’ -श्रम करते जो रह जाय, देख लो दुनिया भर के भॄत्य ।
 
‘कला?’- दुखिःयों की सुनकर तान, नॄत्य का रंग-स्थल हो धूल;
‘टेक ?’- अन्यायों का प्रतिकार, चढ़ाकर अपना जीवन-फ़ूल ।
 
‘क्रान्तिकर होंगे इनके भाव ?’ विश्व में इसे जानता कौन?
‘कौनसी कठिनाई है?’- यहीं, बोलते है ये भाषा मौन !
 
‘प्यार ?’-उन हथकड़ियों से और कॄष्ण के जन्म-स्थल से प्यार !
‘हार ?’- कन्धों पर चुभती हुई अनोखी जंजीरें है हार !
 
‘भार ?’- कुछ नहीं रहा अब शेष, अखिल जगतीतल का उद्धार !
‘द्वार ?’ उस बड़े भवन का द्वार, विश्व की परम मुक्ति का द्वार !
 
पूज्यतम कर्म-भूमि स्वच्छंद, मची है डट पड़ने की धूम;
दहलता नभ मंडल ब्रम्हाण्ड, मुक्ति के फट पड़ने की धूम !
 
( १९१३ , हिमतरंगिणी)
(महात्मा गाँधी के दक्षिण अफ़्रीका संग्राम पर)

नदी के द्वीप / अज्ञेय

हम नदी के द्वीप हैं।
हम नहीं कहते कि हमको छोड़कर स्रोतस्विनी बह जाए।
वह हमें आकार देती है।
हमारे कोण, गलियाँ, अंतरीप, उभार, सैकत-कूल
सब गोलाइयाँ उसकी गढ़ी हैं।
 
माँ है वह! है, इसी से हम बने हैं।
किंतु हम हैं द्वीप। हम धारा नहीं हैं।
स्थिर समर्पण है हमारा। हम सदा से द्वीप हैं स्रोतस्विनी के।
किंतु हम बहते नहीं हैं। क्योंकि बहना रेत होना है।
हम बहेंगे तो रहेंगे ही नहीं।
पैर उखड़ेंगे। प्लवन होगा। ढहेंगे। सहेंगे। बह जाएँगे।
 
और फिर हम चूर्ण होकर भी कभी क्या धार बन सकते?
रेत बनकर हम सलिल को तनिक गँदला ही करेंगे।
अनुपयोगी ही बनाएँगे।
 
द्वीप हैं हम! यह नहीं है शाप। यह अपनी नियती है।
हम नदी के पुत्र हैं। बैठे नदी की क्रोड में।
वह बृहत भूखंड से हम को मिलाती है।
और वह भूखंड अपना पितर है।
नदी तुम बहती चलो।
भूखंड से जो दाय हमको मिला है, मिलता रहा है,
माँजती, सस्कार देती चलो। यदि ऐसा कभी हो -
 
तुम्हारे आह्लाद से या दूसरों के,
किसी स्वैराचार से, अतिचार से,
तुम बढ़ो, प्लावन तुम्हारा घरघराता उठे -
यह स्रोतस्विनी ही कर्मनाशा कीर्तिनाशा घोर काल,
प्रावाहिनी बन जाए -
तो हमें स्वीकार है वह भी। उसी में रेत होकर।
फिर छनेंगे हम। जमेंगे हम। कहीं फिर पैर टेकेंगे।
कहीं फिर भी खड़ा होगा नए व्यक्तित्व का आकार।
मात:, उसे फिर संस्कार तुम देना।

Saturday, April 4, 2015

कबीर का प्रभाव

कबीर ने अपने जीवन के निजी अनुभवों से जो कुछ सीखा था, उसके आलोक में तत्कालीन सामाजिक, राजनैतिक, सांप्रदायिक तथा राष्ट्रीय व्यवस्था को देखकर हतप्रभ थे। वे इन स्थितियों में अमूल परिवर्तन लाना चाहते थे, लेकिन उनकी बातों को सुनने और मानने को कोई उत्सुक नहीं था। उनको सारा संसार बौराया हुआ लग रहा था।जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान,
मोल करो तलवार का, पड़ा रहने दो म्याना।
वे फरमाते हैं कि साधू जाति से नहीं, ज्ञान से पुज्यनीय बनता है।
कबीर बराबर प्रयत्नशील रहे कि दुखी, असहाय और पीड़ित जनता के बीच सुख- शांति का प्रसार हो एवं उनका जीवन सुरक्षित और आनंदमय हो। तत्कालीन परिस्थितियों को देखकर उन्होंने अनुभव किया कि भक्ति के मार्ग पर मोड़कर ही जनता को खुशी प्रदान की जा सकती है। उन्होंने इस अस्र का ही सहारा लिया :-
कहे कबीर सुनो हो साधो, अमृत वचन हमार,
जो भल चाहो आपनी, परखो करो विचार,
आप अपन पो चीन्हहू, नख सिखा सहित कबीर,
आनंद मंगल गाव हु, होहिं अपनपो थीर।
कबीर संतप्त जनजीवन के बीच शांत बना देते थे। वे सुखी जीवन की कला भक्ति को बताते थे। कबीर के पास यही ज्ञान था, इसी ज्ञान के सहारे वे जनजीवन में हरियाली लाने का प्रयास करते रहे। वे कहते हैं कि अगर तुम अपनी भलाई चाहते हो, तो मेरी बातों को ध्यान से सुनो और उन पर अमल भी करो। वे हम मानव को सर्वप्रथम स्वयं को स्थिर करने, शांत होने, अपने को पहचानने एवं आनंद में रहने को कहते हैं। उनके अनुसार जब मानव मन के सारे विकारों को दूर करके शांत स्थिर चित्त से बैठेगा, तो वह हर प्रकार की विषम परिस्थिति से बचा रहेगा। इस प्रकार कबीर मानवतावादी है। मानव के सच्चे शुभचिंतक हैं :-
ओ मन धीरज काहे न धरै,
पशु- पक्षी जीव कीट पतंगा, सबकी सुध करे,
गर्भवास में खबर सेतु है, बाहा ओं विसरै।
रे मन, धैर्य रखो। भगवान सब जीव की सुध लेते हैं, तुम्हारी भी लेंगे। जब तुम नौ मास गर्भ में थे, तब भगवान ही रक्षा कर रहे थे। फिर अब वह तुम्हें कैसे भूल सकते हैं ? कबीर इस बात को महसूस का चुके थे कि जनता को सद्भावना, सहानुभूति और प्यार की जरुरत है। किसी भी मूल्य पर वह गरीब जनता के जीवन से रस घोलना चाहते हैं।
पानी बिच मीन प्यासी, मोहि सुन- सुन आवें हांसी।
घर में वस्तु न नहीं आवत, वन- वन फिरत उदसी।
कबीर साहब कहते हैं, भला जल में मछली रहकर प्यासी रह सकती है ? प्रत्येक मानव के भीतर ईश का वास है, जहाँ निरंतर आनंद- ही- आनंद है। इसी की खोज करना चाहिए। अन्यंत्र बारह घूमने या परेशान होने की कतई जरुरत नहीं है।
कस्तुरी कुंडल वसै, मृग ढ़ूढे वन माहिं,
ऐसे घर- घर राम हैं, दुनियां देखे नाहिं।
कस्तूरी मृग की नाभि में रहता है, लेकिन मृग अज्ञान- वश इसे जंगल में खोजता- फिरता है। इसी तरह सर्वशक्तिमान भगवान और आनंद मनुष्य के अपने अंतर हृदय में ही अवस्थित है, लेकिन अज्ञानी मानव सुख शांति की तलाश में बाहर अंदर घूमता रहता है, जो कि व्यर्थ है। कबीर भक्ति को आकर्षण दिखाकर लोगों के हृदय में शांति का संचार करना चाहते हैं।
दुरलभ दरसन दूर है, नियरे सदा सुख वास,
कहे कबीर मोहि समापिया, मत दुख पावै दास।
कबीर साहब व्यावहारिकता पर बल देते हैं। उनका सब सुझाव सीधा और अनुकरणीय है। वे मानव को सांसारिक प्रपंच से हटाकर अंतर्मुखी होने का सुझाव देते हैं। वे कहते हैं कि दूर का सोचना व्यर्थ है। समीपता में ही सुख का वास है।
परमातम गुरु निकट विराजै,
जाग- जाग मन मेरे,
धाय के पीतम चरनन् लागे,
साई खड़ा सिर तेरे।
उनकी उक्तिनुसार परमात्मा का वास अपने निकट ही है, अतः घबराने की कोई जरुरत नहीं है। आवश्यकता सिर्फ मन को जगाकर परमात्मा में लगाने की है। मानव को दौड़कर भगवान का चरण पकड़ लेना चाहिए, क्योंकि वे सिर के पास ही खड़े हैं। कबीर कहते हैं, आस्था और विश्वास में बहुत बल है। निर्बल जनता के बीच इसी भक्ति का बीजारोपण करने का प्रयास महात्मा कबीर ने किया है।
देह धरे का दण्ड है, सब काहु को होय,
ज्ञानी भुगते ज्ञान से, मुरख भुगते रोय।
सब काहू को होय।
महात्मा कबीर साहब कहते हैं कि सभी शरीर धारियों को इस संसार में अपने कर्मानुसार दुख उठाना ही पड़ता है। दुख की इस घड़ी में कतई घबड़ाना नहीं चाहिए, बल्कि शांतिपूर्वक दुख का सहन करना चाहिए। ज्ञानी जन अपने ज्ञान के बल पर इस दुख की मार को स्थिर चित्त से शांति पूर्वक भोग लेते हैं, लेकिन अज्ञानीजन दुख की मार से तिलमिला जाते हैं और रुदन करने लगते हैं। तत्कालीन परिस्थितियों के परिवेश में जनता को वे समझाते हैं कि तुम जिस भी स्थिति में हो, उसी में रहकर शांतिपूर्वक भगवान का ध्यान लगाओ। तुम्हारा दुख- दर्द सब दूर हो जाएगा। अपने मन को शुद्ध करने की आवश्यकता पर बल दो। 
जब लग मनहि विकारा, तब लागि नहीं छूटे संसारा,
जब मन निर्मल भरि जाना, तब निर्मल माहि समाना।
जब तक मन में विकार है, तब तक सांसारिक प्रपंच से छुटकारा पाना संभव नहीं है। शुद्धि के पश्चात ही भक्ति रस में मन रमता है और सांसारिक प्रपंच से मन शनै: शनै: हटने लगता है। वे कहते हैं, मन निर्मल होने पर आचरण निर्मल होगा और आचरण निर्मल होने से ही आदर्श मनुष्य का निर्माण हो सकेगा।
सबसे हिलिया, सबसे मिलिया, सबसे लिजिए
नोहा जी सबसे कहिऐ, वसिये अपने भावा जी।
वे कहते हैं सबसे मिलो जुलो, वर्तालाप करो, सबसे प्रेम करो, लेकिन अपना वास स्थान प्रभु में रखो।
कर से कर्म करो विधि नाना,
मकन राखो जहाँ कृपा निधाना।
संत तुलसी दास भी कहते हैं, “”हाथ से कर्तव्य करो, अपना कर्तव्य पूरा करो, लेकिन मन सर्वदा भगवान में लगाए रखो। आदर्श जीवन जीने की यहीं कला है, जिसकी ओर प्रायः सभी संतों ने आगाह किया है।
सुख सागर में आये के , मत जा रे प्यारा,
अजहुं समझ नर बावरे, जम करत निरासा।
महात्मा कबीर चेतावनी देते हैं कि इस संसार में आकर अपना जीवन व्यर्थ मत करो, रामरस पीकर अपने को तृप्त कर लो। कबीर साहब थोड़ा आक्रोश में आकर कहते हैं, अब भी संभल जाओ, होश में आओ और भक्ति में लग जाओ। भक्ति ही कल्याण का मार्ग मात्र है।
दास कबीर यो कहै, जग नाहि न रहना,
संगति हमरे चले गये, हमहूँ को चलाना।
महात्मा कबीर अपनापन के साथ हमें बतलाते हैं :-
यह संसार हम सबों के लिए चिरस्थायी निवास स्थान नहीं है। यहाँ से प्रत्येक मानव को एक न एक दिन जाना ही पड़ता है। हमारे बहुत संगी चले गए। कबीर के अनुसार मनुष्य कितना भी यशस्वी हो, कितना ही विद्वान हो, कितना ही व्यक्तित्व मुक्त हो, कितना ही समुद्धशाली हो, कितना ही विद्वान हो, मगर जब तक वह अपने अंदर छिपे हुए उस सुक्ष्मातिसुक्ष्म तत्व का अन्वेषण नहीं करता, उसकी प्राप्ति का प्रयत्न नहीं करता, जब तक उसका जीवन व्यर्थ है :-
हरि बिन झूठे सब त्योहार, केते कोई करी गंगवार।
झूठा जप- तप झूठा गमान, राम नाम बिन झूठा ध्यान।
वे फरमाने हैं कि विवेक के निर्देशों का पालन करने वाले जीवन में असीम आनंद का प्रवाह होता है। विवेकी व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता, क्योंकि उसे अच्छी तरह ज्ञात है कि संसार की समस्त स्थितियाँ नश्वर एवं क्षणिक हैं। विवेक के संबंध में कबीर को स्पष्ट निर्देश है :-
मन सागर मनसा लहरि बूड़े बहे अनेक,
कह “”कबीर” तो बाचहि, जिनके हृदय विवेक।
वे कहते हैं कि आनंद दूसरों को दुख देकर नहीं, बल्कि इच्छापूर्वक स्वंय दुख झेलने से ही प्राप्त होता है :-
आप ठग्या सुख उपजै,
और ठगया दुख होय।
उनके अनुसार “”धर्म में अभी भी इतनी क्षमता है कि मानव जाति को ऐसी बहुमुखी संपूर्णता की ओर ले जा सकते हैं, जिसमें हिंदू धर्म की आध्यात्मिक ज्योति, यहुदी धर्म की आस्था और आज्ञाकारिता, युनानी देवार्चन की सुंदरता, बौद्ध धर्म की काव्य करुणा, इसाई धर्म की दिव्य प्रीति और इस्लाम धर्म की त्याग भावना सम्मिलित हो।”
आज हमारा देश जिस संकट में घिरा है, उसका मूल कारण धर्म से विमुखता हो, जिसकी वजह से लोगों का सदाचार भी समाप्त हो गया है।

Source: 
https://vimisahitya.wordpress.com/2007/11/02/kabir_prabhav/

वीरों का कैसा हो बसन्त / सुभद्रा कुमारी चौहान


आ रही हिमालय से पुकार
है उदधि गरजता बार बार
प्राची पश्चिम भू नभ अपार
सब पूछ रहे हैं दिग-दिगन्त-
वीरों का कैसा हो बसन्त।।

फूली सरसों ने दिया रंग
मधु लेकर आ पहुँचा अनंग
वधु वसुधा पुलकित अंग अंग
है वीर देश में किन्तु कन्त-
वीरों का कैसा हो बसन्त।।

भर रही कोकिला इधर तान
मारू बाजे पर उधर गान
है रंग और रण का विधान
मिलने को आए हैं आदि अन्त-
वीरों का कैसा हो बसन्त।।

गलबांहें हों या हो कृपाण
चलचितवन हो या धनुषबाण
हो रसविलास या दलितत्राण
अब यही समस्या है दुरन्त-
वीरों का कैसा हो बसन्त।।

कह दे अतीत अब मौन त्याग
लंके तुझमें क्यों लगी आग
ऐ कुरुक्षेत्र अब जाग जाग
बतला अपने अनुभव अनन्त-
वीरों का कैसा हो बसन्त।।

हल्दीघाटी के शिला खण्ड
ऐ दुर्ग सिंहगढ़ के प्रचण्ड
राणा ताना का कर घमण्ड
दो जगा आज स्मृतियाँ ज्वलन्त-
वीरों का कैसा हो बसन्त।।

भूषण अथवा कवि चन्द नहीं
बिजली भर दे वह छन्द नहीं
है कलम बंधी स्वच्छन्द नहीं
फिर हमें बताए कौन हन्त-
वीरों का कैसा हो बसन्त।

कैदी और कोकिला / माखनलाल चतुर्वेदी


क्या गाती हो?
क्यों रह-रह जाती हो?
कोकिल बोलो तो !
क्या लाती हो?
सन्देशा किसका है?
कोकिल बोलो तो !

ऊँची काली दीवारों के घेरे में,
डाकू, चोरों, बटमारों के डेरे में,
जीने को देते नहीं पेट भर खाना,
मरने भी देते नहीं, तड़प रह जाना !
जीवन पर अब दिन-रात कड़ा पहरा है,
शासन है, या तम का प्रभाव गहरा है?
हिमकर निराश कर चला रात भी काली,
इस समय कालिमामयी जगी क्यूँ आली ?

क्यों हूक पड़ी?
वेदना-बोझ वाली-सी;
कोकिल बोलो तो !
बन्दी सोते हैं, है घर-घर श्वासों का
दिन के दुख का रोना है निश्वासों का,
अथवा स्वर है लोहे के दरवाजों का,
बूटों का, या सन्त्री की आवाजों का,
या गिनने वाले करते हाहाकार ।
सारी रातें है-एक, दो, तीन, चार-!
मेरे आँसू की भरीं उभय जब प्याली,
बेसुर! मधुर क्यों गाने आई आली?

क्या हुई बावली?
अर्द्ध रात्रि को चीखी,
कोकिल बोलो तो !
किस दावानल की
ज्वालाएँ हैं दीखीं?
कोकिल बोलो तो !

निज मधुराई को कारागृह पर छाने,
जी के घावों पर तरलामृत बरसाने,
या वायु-विटप-वल्लरी चीर, हठ ठाने
दीवार चीरकर अपना स्वर अजमाने,
या लेने आई इन आँखों का पानी?
नभ के ये दीप बुझाने की है ठानी !
खा अन्धकार करते वे जग रखवाली
क्या उनकी शोभा तुझे न भाई आली?

तुम रवि-किरणों से खेल,
जगत् को रोज जगाने वाली,
कोकिल बोलो तो !
क्यों अर्द्ध रात्रि में विश्व
जगाने आई हो? मतवाली
कोकिल बोलो तो !

दूबों के आँसू धोती रवि-किरनों पर,
मोती बिखराती विन्ध्या के झरनों पर,
ऊँचे उठने के व्रतधारी इस वन पर,
ब्रह्माण्ड कँपाती उस उद्दण्ड पवन पर,
तेरे मीठे गीतों का पूरा लेखा
मैंने प्रकाश में लिखा सजीला देखा।

तब सर्वनाश करती क्यों हो,
तुम, जाने या बेजाने?
कोकिल बोलो तो !
क्यों तमोपत्र पत्र विवश हुई
लिखने चमकीली तानें?
कोकिल बोलो तो !

क्या?-देख न सकती जंजीरों का गहना?
हथकड़ियाँ क्यों? यह ब्रिटिश-राज का गहना,
कोल्हू का चर्रक चूँ? -जीवन की तान,
मिट्टी पर अँगुलियों ने लिक्खे गान?
हूँ मोट खींचता लगा पेट पर जूआ,
खाली करता हूँ ब्रिटिश अकड़ का कूआ।
दिन में कस्र्णा क्यों जगे, स्र्लानेवाली,
इसलिए रात में गजब ढा रही आली?

इस शान्त समय में,
अन्धकार को बेध, रो रही क्यों हो?
कोकिल बोलो तो !
चुपचाप, मधुर विद्रोह-बीज
इस भाँति बो रही क्यों हो?
कोकिल बोलो तो !

काली तू, रजनी भी काली,
शासन की करनी भी काली
काली लहर कल्पना काली,
मेरी काल कोठरी काली,
टोपी काली कमली काली,
मेरी लोह-श्रृंखला काली,
पहरे की हुंकृति की व्याली,
तिस पर है गाली, ऐ आली !

इस काले संकट-सागर पर
मरने की, मदमाती !
कोकिल बोलो तो !
अपने चमकीले गीतों को
क्योंकर हो तैराती !
कोकिल बोलो तो !

तेरे `माँगे हुए’ न बैना,
री, तू नहीं बन्दिनी मैना,
न तू स्वर्ण-पिंजड़े की पाली,
तुझे न दाख खिलाये आली !
तोता नहीं; नहीं तू तूती,
तू स्वतन्त्र, बलि की गति कूती
तब तू रण का ही प्रसाद है,
तेरा स्वर बस शंखनाद है।

दीवारों के उस पार !
या कि इस पार दे रही गूँजें?
हृदय टटोलो तो !
त्याग शुक्लता,
तुझ काली को, आर्य-भारती पूजे,
कोकिल बोलो तो !

तुझे मिली हरियाली डाली,
मुझे नसीब कोठरी काली!
तेरा नभ भर में संचार
मेरा दस फुट का संसार!
तेरे गीत कहावें वाह,
रोना भी है मुझे गुनाह !
देख विषमता तेरी मेरी,
बजा रही तिस पर रण-भेरी !

इस हुंकृति पर,
अपनी कृति से और कहो क्या कर दूँ?
कोकिल बोलो तो!
मोहन के व्रत पर,
प्राणों का आसव किसमें भर दूँ!
कोकिल बोलो तो !

फिर कुहू !—अरे क्या बन्द न होगा गाना?
इस अंधकार में मधुराई दफनाना?
नभ सीख चुका है कमजोरों को खाना,
क्यों बना रही अपने को उसका दाना?
फिर भी कस्र्णा-गाहक बन्दी सोते हैं,
स्वप्नों में स्मृतियों की श्वासें धोते हैं!
इन लोह-सीखचों की कठोर पाशों में
क्या भर देगी? बोलो निद्रित लाशों में?

क्या? घुस जायेगा स्र्दन
तुम्हारा नि:श्वासों के द्वारा,
कोकिल बोलो तो!
और सवेरे हो जायेगा
उलट-पुलट जग सारा,
कोकिल बोलो तो !

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