Wednesday, December 23, 2015

रमाशंकर यादव 'विद्रोही'




परिभाषा 

कविता क्या है
खेती है,
कवि के बेटा-बेटी है,
बाप का सूद है, मां की रोटी है।

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कविता और लाठी 

तुम मुझसे
हाले-दिल न पूछो ऐ दोस्त!
तुम मुझसे सीधे-सीधे तबियत की बात कहो।
और तबियत तो इस समय ये कह रही है कि
मौत के मुंह में लाठी ढकेल दूं,
या चींटी के मुह में आंटा गेर दूं।
और आप- आपका मुंह,
क्या चाहता है आली जनाब!
जाहिर है कि आप भूखे नहीं हैं,
आपको लाठी ही चाहिए,
तो क्या
आप मेरी कविता को सोंटा समझते है?
मेरी कविता वस्तुतः
लाठी ही है,
इसे लो और भांजो!
मगर ठहरो!
ये वो लाठी नहीं है जो
हर तरफ भंज जाती है,
ये सिर्फ उस तरफ भंजती है
जिधर मैं इसे प्रेरित करता हूं।
मसलन तुम इसे बड़ों के खिलाफ भांजोगे,
भंज जाएगी।
छोटों के खिलाफ भांजोगे,
न,
नहीं भंजेगी।
तुम इसे भगवान के खिलाफ भांजोगे,
भंज जाएगी।
लेकिन तुम इसे इंसान के खिलाफ भांजोगे,
न,
नहीं भंजेगी।
कविता और लाठी में यही अंतर है।

पुरखे :: रमाशंकर यादव 'विद्रोही'


नदी किनारे, सागर तीरे,
पर्वत-पर्वत घाटी-घाटी,
बना बावला सूंघ रहा हूं,
मैं अपने पुरखों की माटी।
सिंधु, जहां सैंधव टापों के,
गहरे बहुत निशान बने थे,
हाय खुरों से कौन कटा था,
बाबा मेरे किसान बने थे।
ग्रीक बसाया, मिस्र बसाया,
दिया मर्तबा इटली को,
मगध बसा था लौह के ऊपर,
मरे पुरनिया खानों में।
कहां हड़प्पा, कहां सवाना,
कहां वोल्गा, मिसीसिपी,
मरी टेम्स में डूब औरतें,
भूखी, प्यासी, लदी-फदी।
वहां कापुआ के महलों के,
नीचे खून गुलामों के,
बहती है एक धार लहू की,
अरबी तेल खदानों में।
कज्जाकों की बहुत लड़कियां,
भाग गयी मंगोलों पर,
डूबा चाइना यांगटिसी में,
लटका हुआ दिवालों से।
पत्थर ढोता रहा पीठ पर,
तिब्बत दलाई लामा का,
वियतनाम में रेड इंडियन,
बम बंधवाएं पेटों पे।
विश्वपयुद्ध आस्ट्रिया का कुत्ता,
जाकर मरा सर्बिया में,
याद है बसना उन सर्बों का
डेन्यूब नदी के तीरे पर,
रही रौंदती रोमन फौजें
सदियों जिनके सीनों को।
डूबी आबादी शहंशाह के एक
ताज के मोती में,
किस्से कहती रही पुरखिनें,
अनुपम राजकुमारी की।
धंसी लश्क रें, गाएं, भैंसें,
भेड़ बकरियां दलदल में,
कौन लिखेगा इब्नबतूता
या फिरदौसी गजलों में।
खून न सूखा कशाघात का,
घाव न पूजा कोरों का,
अरे वाह रे ब्यूसीफेलस,
चेतक बेदुल घोड़ो का।
जुल्म न होता, जलन न होती,
जोत न जगती, क्रांति न होती,
बिना क्रांति के खुले खजाना,
कहीं कभी भी शांति न होती।

Tuesday, October 20, 2015

किसान


तुम स्लीपर बोगी में
बीच की बर्थ हो
न ऊपर के हो, न नीचे के.
न सरकार तुम्हारे साथ, ना भगवान.


तुम

तुम-1
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तुम रात की ख़ब्त हो
दिन का सबेरा
मोहब्बत हो मेरी
या दिमाग का दही.

***

तुम-2
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मैं अँधेरे में पैदल चल सकता हूँ
आँख बंद कर
...रास्ता गर तुम तक जाता हो.




रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के बीच एक दुर्लभ संवाद

रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के बीच एक दुर्लभ संवाद

स्वामी विवेकानंद     :  मैं समय नहीं निकाल पाता. जीवन आप-धापी से भर गया है.

रामकृष्ण परमहंस   :  गतिविधियां तुम्हें घेरे रखती हैं. लेकिन उत्पादकता आजाद करती है.

स्वामी विवेकानंद     :  आज जीवन इतना जटिल क्यों हो गया है?    
      
रामकृष्ण परमहंस   :  जीवन का विश्लेषण करना बंद कर दो. यह इसे जटिल बना देता है. जीवन को सिर्फ जिओ.

स्वामी विवेकानंद     :  फिर हम हमेशा दुखी क्यों रहते हैं?    
    
रामकृष्ण परमहंस   :  परेशान होना तुम्हारी आदत बन गयी है. इसी वजह से तुम खुश नहीं रह पाते.

स्वामी विवेकानंद     :  अच्छे लोग हमेशा दुःख क्यों पाते हैं?

रामकृष्ण परमहंस   :  हीरा रगड़े जाने पर ही चमकता है. सोने को शुद्ध होने के लिए आग में तपना पड़ता है. अच्छे लोग दुःख नहीं पाते बल्कि परीक्षाओं से गुजरते हैं. इस अनुभव से उनका जीवन बेहतर होता हैबेकार नहीं होता.

स्वामी विवेकानंद     :  आपका मतलब है कि ऐसा अनुभव उपयोगी होता है?

रामकृष्ण परमहंस   :  हां. हर लिहाज से अनुभव एक कठोर शिक्षक की तरह है. पहले वह परीक्षा लेता है और फिर सीख देता है.

स्वामी विवेकानंद     :  समस्याओं से घिरे रहने के कारणहम जान ही नहीं पाते कि किधर जा रहे हैं...

रामकृष्ण परमहंस   :  अगर तुम अपने बाहर झांकोगे तो जान नहीं पाओगे कि कहां जा रहे हो. अपने भीतर झांको. आखें दृष्टि देती हैं. हृदय राह दिखाता है.

स्वामी विवेकानंद     :  क्या असफलता सही राह पर चलने से ज्यादा कष्टकारी है?

रामकृष्ण परमहंस   :  सफलता वह पैमाना है जो दूसरे लोग तय करते हैं. संतुष्टि का पैमाना तुम खुद तय करते हो.

स्वामी विवेकानंद     :  कठिन समय में कोई अपना उत्साह कैसे बनाए रख सकता है?

रामकृष्ण परमहंस   :  हमेशा इस बात पर ध्यान दो कि तुम अब तक कितना चल पाएबजाय इसके कि अभी और कितना चलना बाकी है. जो कुछ पाया हैहमेशा उसे गिनोजो हासिल न हो सका उसे नहीं.

स्वामी विवेकानंद     :  लोगों की कौन सी बात आपको हैरान करती है?

रामकृष्ण परमहंस   :  जब भी वे कष्ट में होते हैं तो पूछते हैं, "मैं ही क्यों?" जब वे खुशियों में डूबे रहते हैं तो कभी नहीं सोचते, "मैं ही क्यों?"

स्वामी विवेकानंद     :  मैं अपने जीवन से सर्वोत्तम कैसे हासिल कर सकता हूँ?

रामकृष्ण परमहंस   :  बिना किसी अफ़सोस के अपने अतीत का सामना करो. पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने वर्तमान को संभालो. निडर होकर अपने भविष्य की तैयारी करो.

स्वामी विवेकानंद     :  एक आखिरी सवाल. कभी-कभी मुझे लगता है कि मेरी प्रार्थनाएं बेकार जा रही हैं.

रामकृष्ण परमहंस   :  कोई भी प्रार्थना बेकार नहीं जाती. अपनी आस्था बनाए रखो और डर को परे रखो. जीवन एक रहस्य है जिसे तुम्हें खोजना है. यह कोई समस्या नहीं जिसे तुम्हें सुलझाना है. मेरा विश्वास करो- अगर तुम यह जान जाओ कि जीना कैसे है तो जीवन सचमुच बेहद आश्चर्यजनक है.
(अनुवाद: आशुतोष उपाध्याय)

Thursday, October 15, 2015

बेरोज़गार कवितायेँ


कितनी बैचेनी,
साल भर की
मेहनत के बाद,
एग्जाम.

खोजा गया रोल नंबर.
लिस्ट में कहीं भी नहीं,
ऊपर से निचले सिरे तक.
दो बार फिर और दो बार चेक किया गया,
नहीं मिला.

तुम्हारा बॉयफ्रेंड
इस साल भी बेरोज़गार रह गया.
तुम्हारी शादी अब किससे होगी शोना?

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तुम्हारी आँखों में ऐसा क्या है जो मैं देखूं?
वही काली की काली हैं,
वही निचुड़े से ख्वाब हैं,
वही बेरोज़गारी है,
वही बेचारगी है.

लड़की ने ऑरेंज जूस के पैसे टेबल पे पटके
और चली गई.
लड़का फटी जेब और बेचारी आँखों से
जाते देख रहा था.

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तुम्हारा पिता
मेरे पिता के पिता का भी पिता था.
तो उनके बेटी के बेटे का बेटा
तुम्हारा क्या हुआ?

लड़का उलझा रहा ऐसे ही
सवालों में साल भर.
लड़की को डोली में उठा
ले गया कोई हमसफ़र.

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मेरे घर में
रहता हूँ मैं,
चंद किताबें
एक देश और एक विश्व का नक्शा
कुछ धूल
और चार कॉकरोच.

कभी कभी चार बातें भी रहती हैं
दीवारों में गूंजती.
जो गर्लफ्रेंड सुना के जाती.
दो पैसे भी रहते हैं,
जो गर्लफ्रेंड दे के जाती है.


Monday, October 12, 2015

नेचर फ्रेंडली पोएम्स


कवितायेँ लिखना एक बकवास काम है
प्रेमिकाओं पे लिखना उससे भी बकवास.
प्रेमिकाएं जाने के लिए पैदा हुई हैं,
और तुम लिखी कविताओं के पन्ने फाड़ने.
बेवकूफ!! पेपर बनाने को पेड़ खर्च होते हैं,
इको-सिस्टम की माँ-बहन एक मत करो,
रुको! प्रेमिकाओं पे कवितायेँ मत लिखो.

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मैंने एटीएम से पैसे निकाले
लेकिन पर्ची न निकाली,
कागज़ का एक टुकड़ा बचाया,
कोई पेड़ थोड़ा कम काटा गया होगा.
(कागज़ पेड़ से बनता है.)
इस इको-फ्रेंडली काम के बाद,
पैसों की सिगरेट खरीदी
बीच सड़क फूंकी
चे-ग्वेरा वाली टी-शर्ट से हाथ पोंछे.
आँखों में क्रांति की चमक आ गई.

 तुमने भी साहित्य अकादमी लौटाया क्या?

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तुम्हारे कार्बन फुट-प्रिंट ,
करते तुम कुछ नहीं,
बोझ हो,
मर ही जाओ

रुको! रुको!
मरने पे ज्यादा कार्बन
उत्सर्जन करोगे.
चलो! बाद में मरना.

वैसे भी धरती आदमी के बोझ तले
कहाँ ज्यादा दिन ज़िंदा रहने वाली है.

Sunday, October 11, 2015

पांच कवितायें


मोबाइल फ़ोन पे तुम्हारी मासूम शक्ल 
बन जाती है.
और जब तुम बोलते हो
तो आँखों में तुम्हारा मासूम अक्स उभर आता है.

तुमसे बात करना जैसे
पागलों को मनाना है.

तुम पैदा नहीं हुई होगी,
तुम्हें तुम्हारे माता-पिता ने
बेवकूफ़लड़की.कॉम से डाउनलोड किया होगा.

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तुम्हारा लगाना किसी को गले,
तुम्हारे अंदर बवाल कर देता है,
तुम्हारी आँखें तुम्हें धिक्कारने लगती हैं.

बीसवीं सदी में जब
देविका रानी ने भी नहीं दिया होगा
बॉलीवुड का पहला चुम्बन.
उसके पहले शायद बूढी हो चुकी थी
तू, पच्चीस बरस की वालिग लड़की!

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वैसे कुछ खास नहीं लगता तुम्हें पढ़ना,
वही सब है
जो कहा गया पहले,
बेवकूफ पोएट्स ने लिखा पहले.

खास लगता है
तुम्हें पढ़ के सोचना
कि किस गधे को अपने दिमाग में रख
इमेजिन किया होगा सबकुछ.
उफ़! तुम्हारी फैंटेसीज़.

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तुमसे बात न कर के
बस उतना सा ही दुःखी हूँ
जितना सुबह की कॉफी न मिलने पे होता हूँ.

सुबह से शाम पढ़ने में मन नहीं लगता 
और अजीब सी बैचेनी होती है.
कोशिशें होती हैं कि 
किसी तरह मिल जाये बस, एक कॉफ़ी.

मरिजुआना से ज्यादा नशा होता है
कैफीन का.
विज्ञान की कोई किताब उठा के पढ़ लो.

तुम कैफीन हो शोना.

Saturday, October 10, 2015

बेरोज़गार की किताब से


रोटियों के पैसे किसने चुकाए तुम्हारे
कॉफ़ी की ये आदत
दिन में दो दफे चाहिए तुम्हें.
पांच रूपये की पड़ती है घर बनाओ तो,
पचास की बाहर.
शुक्र है सिगरेट नहीं पीते.

तुम्हारे कपडे हैं न, ठाठ वाले,
अठरह सौ की वो शर्ट
अच्छे घर में जन्मने का फल है.
साठ प्रतिशत आबादी नहीं तो
रोटी जुगाड़ रही है,
सुबह से शाम.


तुम्हें अपने बाप से शिकायतें हैं,
जिसकी नौकरी से
बिल भरे जाते हैं तुम्हारे.
टाटा तो वो भी पैदा नहीं हुआ था.
उसने मत्था फोड़ा, हाथ-पांव-दिमाग खपाये
तब तुम पढ़ पाये.

रोटियों की दूकान पे उधारी नहीं चलती,
दोस्त बस भरम हैं,
फ़ोन कर लें एक दफ़े महीने में,
बस बहुत है.

देह वाली भी कुछ कमाती तो है.

सड़क पे पड़े पत्थर तुम,
हटो!!!

भोंदू जी की सर्दियाँ / वीरेन डंगवाल

आ गई हरी सब्जियों की बहार 
पराठे मूली के, मिर्च, नीबू का अचार 

मुलायम आवाज में गाने लगे मुंह-अंधेरे 
कउए सुबह का राग शीतल कठोर 
धूल और ओस से लथपथ बेर के बूढ़े पेड़ में 
पक रहे चुपके से विचित्र सुगन्‍धवाले फल 
फेरे लगाने लगी गिलहरी चोर 

बहुत दिनों बाद कटा कोहरा खिला घाम 
कलियुग में ऐसे ही आते हैं सियाराम 

नया सूट पहन बाबू साहब ने 
नई घरवाली को दिखलाया बांका ठाठ 
अचार से परांठे खाये सर पर हेल्‍मेट पहना 
फिर दहेज की मोटर साइकिल पर इतराते 
ठिठुरते हुए दफ्तर को चले 

भोंदू की तरह 

आएँगे, उजले दिन ज़रूर आएँगे / वीरेन डंगवाल

आतंक सरीखी बिछी हुई हर ओर बर्फ़
है हवा कठिन, हड्डी-हड्डी को ठिठुराती
आकाश उगलता अन्धकार फिर एक बार
संशय विदीर्ण आत्मा राम की अकुलाती

होगा वह समर, अभी होगा कुछ और बार
तब कहीं मेघ ये छिन्न -भिन्न हो पाएँगे

तहखानों से निकले मोटे-मोटे चूहे
जो लाशों की बदबू फैलाते घूम रहे
हैं कुतर रहे पुरखों की सारी तस्वीरें
चीं-चीं, चिक-चिक की धूम मचाते घूम रहे

पर डरो नहीं, चूहे आखिर चूहे ही हैं
जीवन की महिमा नष्ट नहीं कर पाएँगे

यह रक्तपात यह मारकाट जो मची हुई
लोगों के दिल भरमा देने का ज़रिया है
जो अड़ा हुआ है हमें डराता रस्ते पर
लपटें लेता घनघोर आग का दरिया है

सूखे चेहरे बच्चों के उनकी तरल हँसी
हम याद रखेंगे, पार उसे कर जाएँगे

मैं नहीं तसल्ली झूठ-मूठ की देता हूँ
हर सपने के पीछे सच्चाई होती है
हर दौर कभी तो ख़त्म हुआ ही करता है
हर कठिनाई कुछ राह दिखा ही देती है

आए हैं जब चलकर इतने लाख बरस
इसके आगे भी चलते ही जाएँगे

आएँगे उजले दिन ज़रूर आएँगे

Problems faced by women SHGs

SHGs have achieved remarkable success in empowering rural masses, especially women, socially and economically. In fact, the government has been encouraging the micro-finance based model of poverty eradication. E.g. National Rural Livelihood Mission. However, the prevailing model of SHG micro-finance in general and women SHGs, in particular continue to face a myriad of problems.
Problems faced by women SHGs:
(A) Women have little financial independence at home. Therefore, women SHGs often fail to augment their collateral corpus adequately. This makes banks reluctant to finance projects lead by such SHGs.
(B) Given the patriarchal notions of the Indian society, women SHGs are perceived with contempt and suspicion. 
(C) Low literacy levels in rural areas, especially so among women, proves to be a major barrier. Makes it difficult for them to not only gather information but also market their product effectively.
(D) Above-mentioned reasons force many women SHGs to middlemen, leading to their exploitation.
(E) Enormous workload on women, especially on account of their familial obligations, results in poor productivity of women SHGs.
Coming to the SHG micro-finance model for poverty alleviation, following concerns remains:
(A) Many a times, SHGs are dominated by the elite among the rural poor. This could lead to alienation of the real beneficiaries.
(B) SHGs don't often follow need-based loan disbursal for the money from the SHG account is usually equally distributed among all members => differential credit needs of the group ignored
(C) Model hardly focuses on investment potential and improvement of skill levels of the borrowers - making credit available is not a panacea to rural problems. 
(D) SHG model has not been used by members to push themselves up the economic ladder. Focus of this model remains on financial inclusion and fails to tap the entrepreneurial spirit of borrowers.
No doubt that the model has successfully inculcated financial training and discipline among rural poor, more needs to be done to make this model a true harbinger of prosperity at the grass-roots level.

Thursday, October 8, 2015

प्रेम

एक रोज पत्थर पे
परीकथाएं रख में
छन्न से तोड़ दूंगा सारी.
बारूद रख दूंगा प्रेम की कविताओं में
और जबरदस्ती सोहनी-महिवाल, लैला-मजनूँ के ब्याह करा दूंगा.

फिर देखता हूँ
कैसे अमर होती है कोई प्रेम-कथा,
कैसे बचता है प्रेम.

मुझे 'हैप्पिली लिविंग आफ्टर...'
का सच भी कोई बताओ.
जिनमें सीताएं अग्नि परीक्षाएं देती हैं, राम शासक होते हैं,
जिनमें कृष्णा को रुक्मणी सौलह हज़ार औरतों के संग बांटती हैं.
जिनमें एक बड़ी सी गाड़ी का औरत छोटा पहिया होती है,
जिससे गाड़ी तो चलती है लेकिन औरत की मर्जी जाने बिना ही.

प्रेम एक ढकोलसे से ज्यादा कुछ भी नहीं.
प्रेम बिछोह से सास्वत होता है,
प्रेम साथ होता है तो
वहां प्रेम के अलावा सबकुछ होता है.

Nobel Prize | Medicine

Awarded Nobel Prize winners have contributed revolutionarily in developing drugs to fight malaria and other tropical diseases that are river blindness and Lymphatic filariasis. With the rising cases of death due to these diseases across the world these drugs is acting positively to contain them.
Significance of these discoveries:
1. Malaria:
it is a mosquito-borne disease that erupts mainly in developing countries which has affected specifically the poor. It is being estimated that malaria still kills around 500,000 people a year, mostly in Africa, despite efforts to control it. Newly created drug will be trying to provide early response and will also immunise person from further threats.
2. River blindness:
with the redesigned extraction process of drug it has huge potential to reduce cases of river blindness.
3. Lymphatic filariasis:
which lead to swelling of the limbs and genitals, called elephantiasis, and it’s primarily a threat in Africa and Asia. Since the newly developed drug is cheaper it will primarily reduce cases where huge cost on treatment is impossible for the people.
Hence these discoveries have provided powerful new means to combat these debilitating diseases that affect hundreds of millions of people annually.

Thursday, September 24, 2015

National Encryption policy

Draft National Encryption policy, that is published recently enables to create an environment of secure cyber space and to strengthened cyber laws of the country. The policy puts legal barriers over the netizens to produce communications, transactions and any other texts to the government if and when required. But with the concerns to protect the information from cyber-attacks the policy have various short comings:
1. Encryption key:
the service providers, e-commerce companies that uses encrypted keys to secure their websites is required to produce these codes when asked by the government.
2. Time boundary:
it has been mandated to keep all the plain text or encrypted codes of past 90 days to be saved by citizens for the security purposes, which implies that they are more prone to be leaked by the hackers.
3. Registration of service providers:
it is being mooted that the online services, be it shopping online or accessing email, has to register with the government which is
biggest impediment to the net neutrality and impede the growth of nascent companies.
4. Anti-privacy law:
since citizens are barred to delete information, it has perceived as a breach to Right to Privacy instituted by Article 21 of the constitution.
Although the policy is a way forward to create a safe environment, but some provisions may act adversely and may also obstruct the growth of Digital India.

Regulating the regulators

Relations between the finance ministry and the Reserve Bank of India (RBI) have, for the moment, settled down. Is this a durable equilibrium? A certain degree of tension is inherent and may indeed be desirable in the dynamics of economic management. Unseemly public controversy, however, detracts from cohesive economic management.
RBI is India’s oldest regulator and was set up under the Reserve Bank of India Act of 1934. Historically, it has always been an autonomous entity even though the governor and the deputies are appointed by the government. Following the economic liberalization of 1991, the autonomy has been progressively strengthened and sought to be benchmarked with the best prevalent international practices.
RBI’s mandate until recently was somewhat opaque. Apart from setting interest rates, it was only in a nebulous sense that it felt obligated to promote growth as well. The government has recently concluded an arrangement with RBI for managing inflation in the band of 2-6%. RBI would like to interpret this as its overriding mandate.
Relations between the finance ministry and RBI have recently been strained on account of two factors. First, the manner of determining interest rates. The Indian Financial Code (IFC) proposed a seven-member monetary policy committee (MPC) with representatives from the Union government and RBI. The issue of whether the governor should have a final veto has, for the present, been settled given the somewhat broad-based composition of the MPC.
The second relates to the constitution of an independent debt management office. This was in accordance with recommendations of the Narasimhan Advisory Group on Transparency in Monetary and Financial Policies, 2000, suggesting separating debt management from functions of monetary policy.
In a more generic sense, RBI’s functions may involve conflict of interest. Setting interest rates, managing foreign exchange reserves, acting as a banking regulator and the government’s debt manager—all these do not entail responses that are symmetric. Reforming RBI is an ongoing process. Inculcating domain knowledge and managing an orderly transition is a continuing challenge.
Continuing economic reforms necessitated the constitution of independent sector regulators. It was necessary to ensure a level playing field, promote a predictable regulatory environment, democratize decision-making and balance conflicting interests. Thus, the Telecom Regulatory Authority of India (Trai), electricity regulatory commissions (CERC/SERC), the Insurance Regulatory and Development Authority of India (Irda) and the Securities Exchange Board of India (Sebi), among others, were constituted. More regulators for real estate, transportation and railway tariff are in the offing. There is also the Competition Commission of India with a broader remit to promote fair practices.
The sector regulators have been constituted by acts of Parliament vesting powers earlier exercised by the executive. Invariably, there are provisions for the Union government to give directives on matters pertaining to public policy such as Section 25 of the Trai Act, Section 107 of the Electricity Act, Section 16 of the Sebi Act and Section 18 of the Irda Act. In fact, even in the case of RBI, the old Act under Section 7 empowers the Union government to give directions to the bank in overall public interest.
These are enabling provisions to be used in exceptional circumstances. In practice, they have scarcely been used. The broader issue is the balance between autonomy and accountability.
When these functions were part of the executive, legislative superintendence was exercised through parliamentary questions, special debates on issues pertaining to various departments, detailed consideration of the demand for grants in the respective standing committees and the audit reports of the Comptroller and Auditor General of India. These mechanisms are not ordinarily available in respect of independent regulators.
In other parliamentary democracies, special institution procedures have been created to fill the void. In the US, for instance, the house committee on financial services and the senate committee on banking, housing and urban affairs have jurisdiction over matters pertaining to the US Federal Reserve, banks and banking, federal monetary policy and price controls.
No doubt excessive parliamentary interference would undercut their functional autonomy and may destroy their basic rationale. Judicious decision-making, depoliticizing decisions for fixation of tariffs, user charges and interest rates improve productivity and growth.
What are some of the options we need to explore to strike a balance?
1. The existing departmental standing committees of Parliament do not per se examine the working of independent sector regulators. Explicitly extending the reach of these standing committees to include sector regulators and submit periodic reports to parliament would be beneficial.
2. The standing committee on finance and planning is overburdened by legislative scrutiny, including the Finance Bill and other important items of legislation. One option could be to create a special committee to be called the committee on financial and regulatory management that can periodically interact with the RBI governor and other regulators in the financial sphere such as Sebi and Irda. Their periodic reports to Parliament would provide better understanding and hopefully augur more informed debates in Parliament.
3. In the non-financial sphere, the concerned parliamentary departmental standing committees could constitute specialized sub-committees designed to interact with sector regulators on policy-related issues.
The issue of who should regulate the regulators is an unsettled one. As liberalization proceeds further, the need for structured institutional mechanisms becomes compelling. Balancing accountability with autonomy is a learning curve.
A former Rajya Sabha member and current member of the BJP, N.K. Singh has held key bureaucratic assignments and has been secretary to the Prime Minister and a member of the Planning Commission.
http://www.livemint.com/Opinion/zeVBlQKBAbF9BBx6dQNpWN/Regulating-the-regulators.html

India's refugee law and policy

ON JUNE 20, the world was called upon to observe Refugee Day. It usually rolls by without notice. There are too many commemorative days on our annual calendar. All of them cannot be taken seriously. The 20th century left behind a massive legacy of refugees. The response to this legacy remains incomplete and inadequate. World War I, the Soviet Revolution and other events led to `crisis responses' for the Russian refugees, Armenians and German refugees. When the International Convention of Refugees was enacted in 1951, it was seen as Euro-centric and, essentially, anti-communist. Indeed, in 1953, India's Foreign Office (through R.K. Nehru) told the office of the United Nations Commissioner for Refugees (UNHCR) that the global refugee policy was essentially part of the Cold War. It took years for the Convention of 1951 to be amended by the Protocol of 1967.
With its open borders, South Asia — like Africa — is a refugee-prone region. India discovered this when absorbing the Tibetan Refugees in 1959, the Bangladeshi refugees in 1971, the Chakma influx in 1963, the Tamil efflux from Sri Lanka in 1983, 1989,and again in 1995, the Afghan refugees from the 1980s, the Myanmar refugees for a similar period and migration and refugee movements from Bangladesh over the years. India's ambivalence towards the UNHCR is characterised by its act of indirectly seeking its assistance through the Red Cross in the 1960s, and later allowing the UNHCR to determine the refugee status of those from beyond South Asia, asking the UNHCR to assist in verifying the voluntariness of the repatriation of the Tamils to Sri Lanka, and permitting an office in Delhi through the UNDP programme. In 1995, India, following Pakistan's example, joined the Executive of the UNHCR. Though welcome, this halfway house seems odd since India refuses to sign the 1951 Convention.
Meanwhile, a series of judgments by the Supreme Court and the Gujarat, Punjab, Gauhati and Tamil Nadu High Courts has reinforced the need for a humane due process for the Chakmas, Sri Lankan and other refugees. Some of the judgments expressly recognise the value and worth of the UNHCR and invite it to involve itself more in the refugee questions in India. Unfortunately, this pro-refugee jurisprudence sits uneasily with the normal law relating to foreigners, which grants the Government near-arbitrary powers of deportation. Following the Law Commission's 175th Report of 2000, the law was made stricter to treat `illegal entrants' harshly, irrespective of the cruel circumstances that may occasion their migration. India blows hot and cold when dealing with the UNHCR, making policy statements at its UNHCR meetings in Geneva and negating either joining the Convention or changing its law to provide reliable legal entitlements to refugees in India.
By contrast, Article 17 of the Additional Terrorism Protocol of the South Asian Association for Regional Cooperation of January 2004 permits SAARC nations not to extradite and, perforce, to protect those being prosecuted or punished on account of their race, religion, nationality, ethnic origin or political opinion. This stand is mystifying. Thus in South Asia, India agreed to the SAARC protocol in 2004. Globally, India steadfastly refuses to join the Convention of 1951 even though it is on the Executive Committee of the UNHCR without being a signatory to the Convention under which the Committee is constituted. Indeed, from 1997, its envoys to the UNHCR have been pleading for a more equitable global regime to participate in a discourse that India does not carry any further.
We need to examine what India's doubts about protecting refugees are all about. The `Cold War' reasons for not having a global refugee policy have gone cold. Refugees are a global problem. The latest UNHCR statistics show that in 2003, there were 20.55 million displaced persons of international concern, including 10.34 million refugees. Refugees are being created all the time — no less due to America's Afghanistan and Iraq wars. But even otherwise, this is a problem that permanently haunts Africa and South Asia. Europe and Australia want to tighten their immigration walls with all kinds of sophisticated arguments to deal with refugees on a regional, rather than a global, basis. India, instead of leading the debate, is being evasive.
Who are refugees? According to the humanitarian definition, a refugee is someone who has fled his country because he has a well-founded fear of persecution if he remains. The major obligation of refugee protection is the principle of non-refoulement, which ensures that a person is not returned to a life-threatening situation.
For India to evade such a principle appears subversive of its constitutional principles unless there are weighty reasons for doing so. New Delhi's reasons for resisting refugee protection are paradoxical. On the one hand, its track record in dealing with the Tibetan, the Sri Lankan and the Chakma crises has been exemplary. Its hesitation to provide an intelligible and comprehensive protection to refugees seems to stem from two major considerations, which are artificial ghosts in the machine.
The foremost reason for refusing to concretise a refugee protection policy is the threat of terrorism. There is no reason for sustaining such a fear. Justice P.N. Bhagwati's model law, which the National Human Rights Commission is examining, and the SAARC Anti-Terrorism Protocol of 2004 ensure that suspected `terrorists' are not treated as refugees. Under the proposed model law, India may exclude even other undesirable persons provided they are not sent back to the country of persecution. The second reason for resisting the model law is that such liberality would precipitate a flood of migrants — especially from Bangladesh. This reason is also fallacious. In fact, a proper `refugee' law would distinguish between refugees and migrants by a fair, fast and stringent procedure. We should not be misled by the Sangh Parivar's misdirected campaigns against Bangladeshi and other Muslims seeking their expulsion from India.
If India wants to play a role in global affairs and make SAARC a success, it must act as a global player entitled to its just seat in the Security Council of the United Nations. But it cannot do so as long it pursues narrow policies. The South Asia region deserves better treatment. For strategic reasons, India was surprisingly quiet when virtually one-sixth of Bhutan's population was forced to leave the country for camps in Nepal. In 2003, Nepal and Bhutan entered into a kind of agreement whereby Bhutan agreed to take back about 3-5 per cent of its citizens of Nepali origin whilst offering illusory promises to some of the rest. India can help resolve this crisis.
The Afghan crisis brought Hindu and Sikh refugees to India. There are some 8000 such persons in India who can never return to Afghanistan. India will not throw them out. They remain in limbo without citizenship in India. Yet because of the complicated procedures of some potential 2600 applicants, only four have reached the portals of India's home office for consideration. Myanmarese refugees have fled their country and are in exile. They languish without protection. The Bangladeshi problem — if, indeed, that is what it is — can only be resolved if India wants to resolve it. India wants a leadership profile but does not assume concomitant responsibilities. The new Government needs to re-examine this issue. External Affairs Minister Natwar Singh's experience combined with National Security Adviser J.N. Dixit's insight from Sri Lanka should support such an initiative.
There is also a need for a change in the law. The model law has not been sufficiently considered by the Union Government. For the last five years, the NHRC has been requesting the Government to provide refugee protection. Its present Chairman, A.S. Anand, has even set up a Committee to examine the law. The argument of terrorism and numbers having been met, there is no reason why the minimal protection against non-refoulement should not be enacted. This can probably be done even through rules. But the argument is not just over the Sri Lankan refugees, the Bangladeshis, the Afghans, the Bhutanese or the Myanmarese. It is whether India wants its voice on the world's most persecuted to be heard so as to mould future policy. If India is waiting for a cue from its neighbour, China has joined the convention and enacted refugee protection legislation. African countries have got together to devise both national and regional solutions.
India needs to review its ambivalent refugee law policy, evolve a regional approach and enact rules or legislation to protect persecuted refugees. This is one step towards supporting a humanitarian law for those who need it. As a refugee-prone area, South Asia requires India to take the lead to devise a regional policy consistent with the region's needs and the capacity to absorb refugees under conditions of global equity.

Wednesday, September 23, 2015

विचार के जवाब में गोली का जमाना | अनिल यादव

कर्नाटक में धर्मांधता, पाखंड विरोधी लेखक एम एम कलबुर्गी की हत्या के बाद कई धुंधली चीजों पर रोशनी गिरी है और वे फिर से चमक उठी हैं. अक्सर निराश लेखक बड़बड़ाते पाए जाते हैं कि हमें कौन पढ़ता है, लिखे का क्या असर होता है, समाज पर जिनका अवैध वर्चस्व है उनके कान पर जूं तक नहीं रेंगती! उन्हें जरा आंखें खोलकर देखना चाहिए कि दो साल के भीतर भारत और पड़ोसी देशों में कम से कम दस लेखक, ब्लॉगर, एक्टिविस्ट बंद दिमाग के लोगों के हाथों मौत के घाट उतारे जा चुके हैं. बहुतों का हमलों और धमकियों के कारण जीना मुहाल हो गया है, कईयों को देश छोड़ना पड़ा है. जवाब यह है कि अगर आप अपने हिस्से का सच लिखते हैं, उस पर अड़े रहते हैं तो जान से जा सकते हैं. विरोधी विचार का जवाब न तलाश पाने की बौखलाहट में धर्म की ओट लेकर गोली मारने की प्रवृत्ति बढ़ने के साथ ही लिखना, बोलना, जागरूक बनाना खतरनाक काम होता जा रहा है.
पहले समझा जाता था कि सरकारी साहित्यिक अकादमियां और सांस्कृतिक संस्थाएं क्लर्क चलाते हैं जो कि आदमी ही होते हैं. अब दिखाई दे रहा है कि वे तो रोबोट हैं जो कलबुर्गी को साहित्य अकादमी पुरस्कार दे सकते थे लेकिन उनकी हत्या पर एक शोक प्रस्ताव तक जारी नहीं कर सकते क्योंकि ऐसा करने की कमांड उन्हें अभी नहीं मिली है. जिस तथाकथित सर्वोच्च पुरस्कार के लिए हिन्दी (बाकी भाषाओं का पूर्ण अंदाजा नहीं है) में इतनी कनकव्वेबाजी और जूतमपैजार होती है उसे अंततः एक मंत्री अपनी जेब के सलाहकारों के जरिए तय करता है. संस्था की विश्वसनीयता का भ्रम बनाए रखने के लिए कभी-कभार कुछ अच्छे लेखकों के नाम भी छांट लिए जाते हैं. रोबोट वह पुरस्कार थमा देते हैं फिर लेखक से कोई सरोकार नहीं रखते. भले ही उसे उन्हीं विचारों पर टिके रहने के लिए मार डाला जाए जिनके लिए विरूदावली गान के साथ यह तमगा दिया गया था.
अगर लेखक कलबुर्गी हो जो मध्यवर्ग की सड़ियल प्रेम कहानियां नहीं लिखता, जिसने लिंगायत धार्मिक आंदोलन की अंधविश्वास, जातिप्रथा, मूर्तिपूजा, कर्मकांड का विरोध करने वाली वचन शास्त्र परंपरा (कबीरदास से काफी पुरानी) पर मौलिक शोध किया हो, जो धर्म को व्यक्तिगत मोक्ष और देवत्व के जाल से बाहर लाकर सामाजिक बदलाव का हथियार बनाना चाहता हो तो रोशनी की एक लंबी लकीर सत्ता का असली चेहरा भी दिखा देती है. जातीय-धार्मिक ध्रुवीकरण के नए फाॅर्मूले खोजने वाले, विफलता से डरे हुए ये राजनेता कौन-सा ‘आधुनिक भारत’ बनाने निकले हैं. ये राजनेता जिनकी उंगलियां अंगूठियों से लदी हुई हैं, जो हर चुनाव से पहले मठों, मजारों की परिक्रमा करते हैं, बलि देते हैं, गुप्त तांत्रिक अनुष्ठान कराते हैं. वोट बिदक जाने के डर से खाप पंचायतों समेत तमाम कुरीतियों और अपराधों के खिलाफ मुंह सिले रहते हैं. भला उन्हें कलबुर्गी, दाभोलकर, पानसारे जैसे मनुष्यों की हत्याओं से परेशानी क्यों होगी! ये उलटबांसी काफी हद तक उन्हीं की देन है कि समाज में पूंजी और तकनीक के प्रभाव के समानान्तर ही कर्मकांड, अंधविश्वास और पोंगापंथ फलते-फूलते दिखाई दे रहे हैं, विवेक बेहोश हुआ जा रहा है.अगर आप सच लिखते हैं, उस पर अड़े रहते हैं तो जान से जा सकते हैं. विरोधी विचार का जवाब न पाने की बौखलाहट में धर्म की ओट लेकर गोली मारने की प्रवृत्ति बढ़ने के साथ लिखना-बोलना खतरनाक होता जा रहा है
मौजूदा अच्छे दिनों का परिदृश्य तो और भी भयानक है जिसमें भारतीयता को उसके विचार वैविध्य से मिलने वाली ऊर्जा से वंचित कर कुंठित, हिंसक और मनमाने हिंदू रंग में रंगने की कोशिश की जा रही है, इस मूर्खतापूर्ण आत्मविश्वास के साथ जैसे चार्वाक, लोकायत, सांख्य, बौद्ध, जैन, कबीर, दलितों, आदिवासियों के दर्शन, आचार-विचार और धार्मिकताओं का कभी अस्तित्व ही नहीं रहा. पुराणों की टीकाओं, स्मृतियों के पैरोकारों को सत्ताधारी होने के गुमान के साथ अब काॅरपोरेट का पैसा भी मिल गया है. वे नासमझ और अपनी हीनता के कारण गुस्से से भरे लोगों को उकसाकर हिंसा का पाटा चलाकर मैदान बराबर कर देना चाहते हैं.
एक तरफ यह आलम है तो दूसरी ओर हिन्दी में कलबुर्गी की हत्या के विरोध में साहित्य अकादमी सम्मान लौटाने वाले लेखक उदय प्रकाश से हिसाब-किताब बराबर करने की भी पैंतरेबाजी चल रही है. जो इस क्षुद्रता में लगे हैं, उदय को सुधरने का मौका भी नहीं देना चाहते या फिर उन्हें व्यक्तिगत कुंठाओं को उलीचने की स्वतंत्रता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से भी अधिक प्यारी है. यही झंझावाती समय हिन्दी और दूसरी भाषाओं में सच्चे लेखकों के निर्माण का भी है. बहरहाल एक लेखक की जिंदगी तो कलबुर्गी जैसी ही होनी चाहिए, आसान पहुंच वाले चारागाहों में फैले भेड़ों की तरह झुंड में मैं-मैं करते हुए जीना भी कोई जीना है.
source: http://tehelkahindi.com/can-a-gun-stop-a-pen/

Tuesday, September 22, 2015

Is the Rajya Sabha essential?

The Upper House of the Indian Parliament traces its direct history to the first bicameral legislature introduced in British India in 1919 as a consequence of the Montagu-Chelmsford reforms. The Council of State, as it was called then, was made up of 60 members, 34 of whom were Indian and elected by a narrow and elite group. There were no women in the council and the direct election was conducted under a framework of communal franchise that the Indian National Congress opposed vehemently.
Immediately before and after Independence, the bicameral question was raised in the Constituent Assembly debates. Professor Shibban Lal Saksena represented the position against a bicameral legislature thus: “In this motion, we have been asked to vote for two Houses, the Lower House and the Upper House. I wish to point out that our experience has been that the Upper House acts as a clog in the wheel of progress. I think that everywhere in the world the experience about Upper Houses has been the same. It has always acted as a sort of hindrance to quick progress.”
Many years later, Sarvepalli Radhakrishnan, speaking as the first chairman of the Rajya Sabha, said, “There is a general impression that this House cannot make or unmake governments and, therefore, it is a superfluous body. But there are functions, which a revising chamber can fulfil fruitfully. Parliament is not only a legislative but a deliberative body. So far as its deliberative functions are concerned, it will be open to us to make very valuable contributions, and it will depend on our work whether we justify this two chamber system, which is now an integral part of our Constitution.”
Even though some ancient civilizations had a bicameral legislature, the modern version can be traced to estates of the realm in medieval Europe: think of it as a European caste system with the clergy, nobility and commoners representing the three estates. During the French Revolution, many arguments for and against a bicameral system were made. Most modern democracies that have a bicameral legislature do so on the grounds of a federal polity. The role of the Upper House is to be a deliberative body that would balance what James Madison, the author of the Federalist Papers, called “fickleness and passion” of an elected Lower House. The relative size, scope and power of the two Houses are different in different countries. The US Senate has two senators from each state with the Senate holding equal power to the House of Representatives. A (very large) House of Lords in the UK has an advisory role to the House of Commons.
India’s Rajya Sabha has equal powers to the Lok Sabha except for money bills, where it has no jurisdiction. It is a 250-member body, 12 of whom are appointed from the field of art, literature, science and social services. Other members are elected by an electoral college made up of state legislators.
Is the Rajya Sabha necessary today?
The contemporary argument against it comes from two primary angles. The first one suggests that a Lok Sabha that has representation from several regional parties more than adequately represents a federal country. The recent reversal on the land acquisition ordinance is an example of this federal character of the Lok Sabha in practice. The second argument charges that the Rajya Sabha has become a haven for losers in elections, crony capitalists, compromised journalists and party fundraisers. Far from being deliberative, the Rajya Sabha appears to have descended into the same fickleness and passion as the Lok Sabha and has shown a disconcerting trend away from the decorum expected from it.
Now for the reality check. It is virtually impossible to abolish the Rajya Sabha without adopting a new Indian Constitution. The bicameral nature of the Indian Parliament is likely to be interpreted as a “basic structure” of the Indian Constitution, rendering it incapable of being amended. Even if this were to be tested, it would be ensnared in a judicial process for a very long time. It is much more practical to try and reform the Rajya Sabha than seeking to abolish it.
One useful reform step would be to have members of the Rajya Sabha be directly elected by the citizens of a state. This will reduce cronyism and patronage appointments. This step should be combined with equal representation for each state (say, five members) so that large states do not dominate the proceedings in the House. This streamlined Rajya Sabha should remain deliberative, but there should be deadlines set for responding to bills initiated in the Lok Sabha.
The Rajya Sabha is here to stay. It is our responsibility to make it an effective and time-bound contributor to India’s parliamentary system.
Only then will India be able to make (progress) haste, slowly.
P.S. “Men are mortal. So are ideas. An idea needs propagation as much as a plant needs watering. Otherwise both will wither and die,” said B.R. Ambedkar, the principal author of India’s constitution.
Narayan Ramachandran is chairman, InKlude Labs.

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