Saturday, December 27, 2014

दिल को बासी रोटी के साथ गाय को खिला देना


जब अंदर से थक जाता है
सर के बल खड़ा हो जाता है
आदमी उलटबंसी है
अरमान तोड़ दिमाग के डिसीजन्स
उफ़! की ज़िंदा हो तुम अब भी?

चार आदमी मरे चालीस के पहले
गुरुदत्त के मुंह से खून निकला....देखा तुमने?
एक दिन बस मेरी बारी, अगली तुम्हारी!

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राख किनारे कितनी नदियां बही?
नदी में राख बही, आदमी बहे,
नदी ज़िंदा रही.

सदी ज़िंदा, साल ज़िंदा,
आँखें ज़िंदा, याद भी.

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कल सपने में रात को ख्वाब दिखाया था
आज शाम तक सोती रही रात
सूरज उगने का इंतज़ार करता रहा.
उफ़! की ये ख्वाब मेरे,
एक तो लम्बे चौड़े
ऊपर से नींद में दौड़ने की आदत!

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मत पढ़ो,
समझोगी नहीं.
दिमाग से ही काम लो
दिल को बासी रोटी के साथ
गाय को खिला देना,
जिसे तुम माँ कहती थीं!


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