Wednesday, December 3, 2014

सुभद्रा कुमारी की कवितायेँ

वीरों का हो कैसा वसन्त 

आ रही हिमालय से पुकार
है उदधि गरजता बार बार
प्राची पश्चिम भू नभ अपार;
सब पूछ रहें हैं दिग-दिगन्त
वीरों का हो कैसा वसन्त

फूली सरसों ने दिया रंग
मधु लेकर आ पहुंचा अनंग
वधु वसुधा पुलकित अंग अंग;
है वीर देश में किन्तु कंत
वीरों का हो कैसा वसन्त

भर रही कोकिला इधर तान
मारू बाजे पर उधर गान
है रंग और रण का विधान;
मिलने को आए आदि अंत
वीरों का हो कैसा वसन्त

गलबाहें हों या कृपाण
चलचितवन हो या धनुषबाण
हो रसविलास या दलितत्राण;
अब यही समस्या है दुरंत
वीरों का हो कैसा वसन्त

कह दे अतीत अब मौन त्याग
लंके तुझमें क्यों लगी आग
ऐ कुरुक्षेत्र अब जाग जाग;
बतला अपने अनुभव अनंत
वीरों का हो कैसा वसन्त

हल्दीघाटी के शिला खण्ड
ऐ दुर्ग सिंहगढ़ के प्रचंड
राणा ताना का कर घमंड;
दो जगा आज स्मृतियां ज्वलंत
वीरों का हो कैसा वसन्त

भूषण अथवा कवि चंद नहीं
बिजली भर दे वह छन्द नहीं
है कलम बंधी स्वच्छंद नहीं;
फिर हमें बताए कौन हन्त
वीरों का हो कैसा वसन्त


झाँसी की रानी की समाधि पर

इस समाधि में छिपी हुई है, एक राख की ढेरी |
जल कर जिसने स्वतंत्रता की, दिव्य आरती फेरी ||
यह समाधि यह लघु समाधि है, झाँसी की रानी की |
अंतिम लीलास्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की ||

यहीं कहीं पर बिखर गई वह, भग्न-विजय-माला-सी |
उसके फूल यहाँ संचित हैं, है यह स्मृति शाला-सी |
सहे वार पर वार अंत तक, लड़ी वीर बाला-सी |
आहुति-सी गिर चढ़ी चिता पर, चमक उठी ज्वाला-सी |

बढ़ जाता है मान वीर का, रण में बलि होने से |
मूल्यवती होती सोने की भस्म, यथा सोने से ||
रानी से भी अधिक हमे अब, यह समाधि है प्यारी |
यहाँ निहित है स्वतंत्रता की, आशा की चिनगारी ||

इससे भी सुन्दर समाधियाँ, हम जग में हैं पाते |
उनकी गाथा पर निशीथ में, क्षुद्र जंतु ही गाते ||
पर कवियों की अमर गिरा में, इसकी अमिट कहानी |
स्नेह और श्रद्धा से गाती, है वीरों की बानी ||


बुंदेले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी |
खूब लड़ी मरदानी वह थी, झाँसी वाली रानी ||
यह समाधि यह चिर समाधि है , झाँसी की रानी की |
अंतिम लीला स्थली यही है, लक्ष्मी मरदानी की ||

स्मृतियाँ

क्या कहते हो? किसी तरह भी 
भूलूँ और भुलाने दूँ?
गत जीवन को तरल मेघ-सा 
स्मृति-नभ में मिट जाने दूँ?

शान्ति और सुख से ये 
जीवन के दिन शेष बिताने दूँ?
कोई निश्चित मार्ग बनाकर 
चलूँ तुम्हें भी जाने दूँ?
कैसा निश्चित मार्ग? ह्रदय-धन 
समझ नहीं पाती हूँ मैं 
वही समझने एक बार फिर 
क्षमा करो आती हूँ मैं।

जहाँ तुम्हारे चरण, वहीँ पर 
पद-रज बनी पड़ी हूँ मैं 
मेरा निश्चित मार्ग यही है 
ध्रुव-सी अटल अड़ी हूँ मैं।

भूलो तो सर्वस्व ! भला वे 
दर्शन की प्यासी घड़ियाँ 
भूलो मधुर मिलन को, भूलो 
बातों की उलझी लड़ियाँ। 

भूलो प्रीति प्रतिज्ञाओं को 
आशाओं विश्वासों को 
भूलो अगर भूल सकते हो 
आंसू और उसासों को।

मुझे छोड़ कर तुम्हें प्राणधन 
सुख या शांति नहीं होगी 
यही बात तुम भी कहते थे 
सोचो, भ्रान्ति नहीं होगी।

सुख को मधुर बनाने वाले 
दुःख को भूल नहीं सकते 
सुख में कसक उठूँगी मैं प्रिय 
मुझको भूल नहीं सकते।

मुझको कैसे भूल सकोगे 
जीवन-पथ-दर्शक मैं थी 
प्राणों की थी प्राण ह्रदय की 
सोचो तो, हर्षक मैं थी।

मैं थी उज्ज्वल स्फूर्ति, पूर्ति 
थी प्यारी अभिलाषाओं की 
मैं ही तो थी मूर्ति तुम्हारी 
बड़ी-बड़ी आशाओं की।

आओ चलो, कहाँ जाओगे 
मुझे अकेली छोड़, सखे! 
बंधे हुए हो ह्रदय-पाश में 
नहीं सकोगे तोड़, सखे!

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