Sunday, November 23, 2014

ज़हर हो मीठा-मीठा, मद्धम-मद्धम...

तुम ऐसी जकड़न हो
जो छूटे तो परेशानी
न छूटे तो तेरे वजूद तले दबा रहूँ.

खुल भी जाऊँ गर
एक साहिल हूँ
जिसकी मंजिल नहीं
दरिया के दर बह जाऊँ.

तुम ऐसी जकड़न हो
जो ज़हर हो
मीठा-मीठा, मद्धम-मद्धम.

बस करो, मत जकड़ो
सूरज सा कल सुबह तेरे दर चला आऊंगा.
साँझ गया सुबह और कहाँ जाऊंगा?

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