Friday, October 3, 2014

आज़ादी




               तुम्हें पता है, ख़ुदा बहुत प्यारा लिखता है. लेकिन बहुत हुनरमंद है वो, अपने लिखे हर अफ़साने को सच में बदल देता है. काश! मेरे में भी कोई ऐसा हुनर आ जाये तो मैं पहले ही अफ़साने में ख़ुदा का क़त्ल करा दूँ. ....और दुनिया को अपना नसीब खुद बुनने की आज़ादी दे दूँ. अफ़सोस मैं इतना अच्छा नहीं लिखता कि ये हुनर मुझे मिल पाये. सोचता हूँ कोई तो ऐसा लेखक पैदा होगा जो ख़ुदा से इंसान का नसीब लिखने का हक़ छीन पाये. लेकिन यकीनन उसे मुझसे अलग होना होगा. पाक-साफ़ होना होगा. ख़ुदा का हक़ छीन ख़ुदा को मारने वाले कभी ख़ुदा नहीं बन पाएंगे, कायनात इसकी इज़ाज़त नहीं देती. इंसान का हक़ छीन, इंसान को मारने वाले भी कभी इंसानियत कायम नहीं कर पाएंगे. न तो इंसानियत इसकी इज़ाज़त देती है न कायनात.
             अमन बस अहिंसा से आ सकता है. बारूद से बस ज़िंदगियाँ ली जा सकती हैं, इंतकाम लिया जा सकता है.... इंसानियत नहीं, अमन नहीं, चैन नहीं.... और आज़ादी तो बिलकुल नहीं.

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