Friday, September 12, 2014

ग़दर



ये सरकारें
जिन्हे कहने-सुनने की
ज्यादा आदत नहीं है,
जिन्हें बस तोपों की भाषा आती है.
जिनके सामने
गांधी, नेल्सन और लूथर
चिल्लाते, दहाड़ते, सर पटकते रहे
और एक दिन मर गए.

इन सरकारों से
मैं कहता हूँ,
समाज जाग रहा है
सम्हल जा.
लोगों की आँखों में गुस्सा है,
हाथ में पत्थर
और दिल में मजबूत इरादे हैं.
सरकारो, तुम्हें बदलना होगा,
क्यूंकि मुल्क की गुलाम जनता
अपनी नियति अपने हाथ से
लिखने पे आमदा है,
आज मजबूत इरादा कर के आई है.

सरकार बिलबिलाती है,
थोड़ा शोर, फिर ठहर जाती है.
हा! हा! कर जोर से
अट्ठहास लगाती है
और मुझे विक्षिप्त कहती है.
मैं समझ नहीं पाता हूँ
क्यूंकि कवि सरकारें नहीं होते
सच होते हैं,
और सरकारें कवि नहीं होती
प्रपंच होती हैं.

मैं यानि कवि की कलम
किसी नाली में टूटी मिलती है
और मेरी लाश
किसी चौराहे पे लटकती.

वह समाज जो बदलने पे आमदा था,
उसका नेता फरार है,
शायद कभी लौट के न आ पाये.
समाज, जनता सब चुप हैं,
जैसे दही जमा हो होंटों पे
या सौ-सौ के कई नोटों को
मुंह में चिपका
उनकी बोलती बंद कर दी गयी हो.

हे! क्रान्तिकारियो,
ग़दर का चिराग जलाने से पहले
ज़रा बचना, सोचना
क्यूंकि ये सरकारें
तुम्हें भी खरीदना जानती हैं.

हे! युवको, युवतियों
कोई भी आंदोलन
समाज के उत्थान के लिए करना
अपने स्वार्थ के लिए नहीं,
अपने नैतिक पतन के लिए नहीं.

कवि तो जन्म से वैधव्य ओढ़ के आया है
उसके कहे का असर नहीं होता,
उसका मरना खबर नहीं होती.
पर तुम बचा लो,
अपनी नैतिकता, अपना कल,
अपनी क्रांति, अपना मुल्क.


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