Monday, August 25, 2014

रतजगा और प्रेम

तुम्हारा रूप,
जैसे चांदनी में माता का रतजगा कर-कर निखारा हो.
रतजगे की दिव्य-ध्वनि जैसे
समा गयी हो तुममें.
अंग-रंग मंत्रित सा लगता है!
बचपन से लाल चुनरी में माता
सबसे सौम्य लगती थी,
अब तुम्हारा चेहरा भी.

उफ़! हटो नज़रों से,
ज़रा दुनिया भी दिखने दो-
फायदे-नुकसान, सौदे-रेजगारी.

दुनिया बनियों की है,
प्रेमियों की नहीं! 

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