Tuesday, July 8, 2014

डेमोक्रेसी




मैं कहता हूँ
डेमोक्रेसी किसी मचान पे बैठ मुर्गे खाना
फिर नशे में दो चार इंसानों के शिकार करना है.

चुपचाप से चले जाओ बारिश में
भीगकर कौन सा पिघलने वाले हो,
कौन सा पत्थरों पे चल एड़ियां घिस जाएँगी.
अस्तित्व के इशारे पे बकलोली मत करो अब,
कौन सा तुम मरे तो धरती कांपने लगेगी.

चार किताबों के पांच सिद्धांत और
नर्मदा बचाओ चिल्लाने से भी कहीं कुछ बचता है?
तुम्हारे शरीर से बस
आग जला रोटियां सेंकी जा सकती हैं.
तुम्हारी जमीन पे फैक्ट्रियां धुआं उगल सकती हैं,
उस धुएं में तुम्हारी लाशें भी न दिखेंगी किसी को.
तुम्हारी बेटियां बस मरने के लिए बनी हैं,
जिस्म लूट लेंगे, दहेज़ को जला देंगे,
बचीं तो गांव में नंगा घुमा देंगे.

पूजते रहो अनाप-शनाप 'ब्लडी गॉड्स',
इन्ही के नामों पे चढ़ तुम्हारे जिस्म नौंचे जायेंगे.
तुम नहीं समझोगे कि तुम्हारे आराध्य तुम्हें ही मारेंगे.
तुम्हारी शिक्षा को नशे में दे देंगे-
राष्ट्रहित, वक़्त और बदलाव, या थोड़ी अक्ल बची रही तो
अबकी बार, तबकी बार के चार नारे.
डेढ़-लाख करोड़ के ज़ीरो गिने हैं?
इतने में हमारे कुत्ते का पेट भी नही भरता!

'उन्हें डेमोक्रेसी किसी मचान पे बैठ मुर्गे खाना
फिर नशे में दो चार इंसानों के शिकार करना है.'
लपक के मेरे सीने से बारूद पार हो जाता है.
अगली आवाजें 'डेमोक्रेसी...', 'डेमोक्रेसी...' चिल्लाती हैं,
खद्दर को साफ़ कर वो कहते हैं...' ब्लडी फूल्स'.

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