Wednesday, June 25, 2014

इश्क़ किनारे ताकें चाँद




यूँ रातभर क्यों जलता चाँद?
किस बेवफा को तड़पता चाँद?

फलक किनारे झुका हुआ
कितना बेनूर बेवस चाँद.
दिनभर ज्वर में तपता रहा
रातभर छत पे जलता चाँद.

महबूब निकाही धरती पे,
रात फलक पे ताके चाँद.
टुकुर -टुकुर टूटे दिल
रात फलक से ताके चाँद.

अजनबी  से कुछ हम,
अजनबी से कुछ तुम,
बीती यादें कुतरें बैठे
इश्क़ किनारे ताकें चाँद.

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