Sunday, February 23, 2014

ज़लज़ले की रात



ज़लज़ले की रात 
दुनिया ने बांटा सामान,
मेरे हिस्से में आई एक किताब
जिसक आखिरी पन्ने पे लिखा था-
'ज़लज़ला अच्छा-बुरा देखकर नहीं आता,
कुत्तों की कोई जात नहीं होती,
लोग कभी अपने नहीं होते, मौत अपनी है!'

उस रात ज़लज़ले ने
मुझे कम, रिश्तों को ज्यादा ख़ाक किया. 




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