Thursday, April 4, 2013

कभी कभी.....




             कभी कभी बन के बूँदेंसुनाई देती होगी तुम्हें आवाज़ मेरी खनकते बर्तनों मेंआहटें दरवाजे पे ज़िक्र करती होगीं मेरा या लफ्ज़ नज़्म के रूप में पढ़ते होगे किसी मैगज़ीन में कभी तो ख्याल मेरे आते ही होंगेपलटती होगीं मोबाइल कई दफा, 'व्हाट्स एपमें कभी कोई शायद मैसेज छोडूं मैं..... जिक्र तुम्हें अक्सर आता ही होगा मेरा...... दुहराते ज़िन्दगी अपनी!

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आदमी बनना-
इश्क करना-
जीते जी मरना.

सच कहता हूँ खुदा,
इत्ता आसान भी नहीं!
तू भी एक बार बन देख ले.

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ये नादां दिल,
ख्याली पुलाव तेरे!

उफ़चुभते बहुत हैं,
जब भी मिलते हैंहकीक़त से.

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दफ़्न,हर नज़्म
करता रहा मैं.

हर सुबह तू,लिखती रही नज़्म.

ज़िन्दगी,तू बड़ी अजीब चीज़ है.

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तुम मेरे जिस्म में
रख अपने अल्स...

भूल गये हो सब.
ज़रा आओदुहराओ!

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sketch: by K. Mediani

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