Saturday, March 30, 2013

एक शायर जो इंसान था : अदम गोंडवी





                       शायर इंसान नहीं होते....या होते हैं तो बस आदमी, इंसान नहीं. साहब, इनके पास मत तो होता है पर मति नहीं होती. लिखता तो है, लेकिन परझने नहीं जाता की उसका कोई सरोकार है भी या नहीं...या जो लिखा है, लितना कहने में कामयाब हुआ है....या कहने में कामयाब हुआ है तो उसका लिखा, कितना बदलाव लाया है.
           
                   अब तो मान गये होंगे कि शायर के पास बस मत होता है, मति नहीं. वैसे भी, मति होती तो वो शायर क्यों होता.

                   एक नाम है, जो शायर नहीं था, इंसान था....क्योंकि उसके पास मत भी था और मति भी- अदम गोंडवी. अदम गोंडवी जैसे लोग लिखते नहीं हैं.....उनका लिखा या तो उनका खून होता है या उनकी भूख. खून में कलम नहीं डुबोते एसे लोग....उनका खून आप ही अक्षर गढ़ देता है........

                  तुमने भूख देखी है? एक बार चार दिन देखिये, यकीन मानिये चांदनी और चाँद-तारे सारे भूल जायेंगे.

              'रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
             जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है.'

                ऎसा लिखना आसान नहीं होता....महसूस करना पाहता है एसा लिखने......जीना पड़ता है ऎसे.

               शायर बनना आसान है, अदम गोंडवी नहीं.


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