Sunday, February 10, 2013

....क्यूंकि औरतें जिस्म में संस्कार लिए पैदा हुई हैं!




                 औरत नहीं होती पैदा अकेली....साथ ले के आती है अपने साथ इज्ज़त और पोटली भर के संस्कार......बाप की इज्ज़त के डर से प्रेमी से अलग होती लड़कियां देखी हैं न तुमने? कितनी रूह रोईं हैं इसकी गिनती तो खुद ख़ुदा ने भी नहीं की होगी....हर गली के दूसरे छोर पे एक इश्क दफ़न होते देखा है.....और कहीं कहीं तो इश्क आशिकों के साथ दफ़न होता है.
 
             यहाँ 'शानो' और 'अब्दुल' मार दिए जाते हैं....क्योंकि इश्क कबूल नहीं ख़ुदा को. 'राम' और 'किशोरी' को पैदा ईश्वर ने अलग जात में किया था....इश्क भी सल्ला एक जात में करते तो आज जिंदा होते. यहाँ ज़िन्दगी और ख्वाइशों से बड़ी 'इज्ज़त' होती है....साल्ली झूठी इज्ज़त, भूख लगने पे जिसकी आप रोटियाँ तक सेंक नहीं खा सकते.

             महीनों रेप की शिकार हुई ललिता का बाप रेपिस्ट की  दी 'मुआवजे' की रकम चुपचाप रख लेता है.....पुलिस स्टेशन के सामने हो रही इस करतूत में पुलिस भी शामिल है.....शायद बाहर से मामले सैटल कराने में हमारी पुलिस ज्यादा माहिर है, केस सॉल्व करने में नहीं....और ललिता के बाप को पैसे ज्यादा प्यारे हो गये हैं बेटी की रूह से और अब उसे इज्ज़त से भी फर्क नहीं पड़ता!......ये साल्ला समाज बीमार है, झूठा है और इसी विकृत समाज में लोग में जिए जा रहे हैं. झूठी आबरू लिए. 

             पति से मार खाती औरतों से समाज को सरोकार नहीं है लेकिन विजातिये से शादी की लड़कियों से उन्हें कुछ ज्यादा वास्ता रहता है. रिश्तेदारों के रिश्ते भी इसी वक़्त जागते हैं.....और पड़ोसियों की हमदर्दी भी इसी वक्त शुरू होगी.

             ये समाज जिसमे घर की इज्ज़त टॉपर बेटी के इश्क करने से जाती है लेकिन गधे और निकम्मे बेटे के घर बैठने से नहीं! अजीब समाज है ये.

            ये कौन से संस्कार हैं जो सिर्फ औरतों को दिए जाते हैं? ऎसे बेहूदा संस्कार जिसमें घर पे पिटती औरतों का मुंह खोलना मना है....ऎसे संस्कार जिसमे रेप की शिकार औरतों की इज्ज़त जाती है करने बाले की नहीं....ऎसे संस्कार जिनमें दम घुट घुट के सारी उम्र जी लेती हैं लडकियां.....क्यूंकि इश्क गुनाह है यहाँ....सारे घर की इज्ज़त भी तो वही ढो रहीं हैं फिर!

           जिस्म्फ़रोशी जारी है क्यूंकि कोठे पे आदमी का जाना जारी है....क्यूंकि संस्कारों का बीड़ा आदमी को नहीं उठाना. 

         ये विकृत समाज औरतों को घूँघट और बुर्के से ढँक सकता है.....बस.

         ये विकृत समाज ऑनर किलिंग कर सकता है......बस. क्यूंकि इश्क पाप है....सुबह राधा-कृष्णा पूजने  बाले को शाम को प्रेम से नफरत हो जाती है....अजीब लोग हैं यहाँ!

          ये समाज औरतों को घर की चारदीवारी चुपचाप पिटने दे सकता है....बस. क्यूंकि औरतें जिस्म में संस्कार लिए पैदा हुई हैं!

          ये आदमियों का समाज है साहब..... इक्वलिटी,  उफ़! दुखती रग़ है है इक्वलिटी........आदमी और औरत को एकसाथ लगना पड़ेगा इक्वलिटी लाने।


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