Saturday, February 23, 2013

सिवाए इन नासमझ नज्मों के!




 
          खिड़की पे बैठे चाँद देखता हूँ....अधूरा चाँद कुछ कहता ज़रूर है, जैसे उसे फलक से उतर सड़क दर सड़क आवारागर्दी के मज़े लेने की इच्छा हो....घटता-बढ़ता चाँद रिश्तों के घटने-बढ़ने के एहसास भी तो लिए है....फिर कैसे अधूरे चाँद में लोगो को अपना प्यार नज़र आता है? बेवजह ही सही, ख्याल मुक़र्रर तो है!

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चल चाँद,
साथ फिरते हैं
इन आवारा सड़कों पे.

मैं भी तन्हा हूँ आज.
....और फ़िक्र भी नही किसी को,
सिवाए इन नासमझ नज्मों के!

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क्यूँ ये नज़्म
घुल जाती है तुममें.

बिखर-बिखर
लाख कोशिशें करता हूँ मैं.

....और हमेशा तुम तक
ख़त्म होते हैं लफ्ज़.


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तुम्हें,
जितनी बार पढता हूँ...
नया पाता हूँ.

....और हर बार
फिर पढने की इच्छा तीव्रित होती है.

तुम मेरा सबसे प्यारा नोवेल हो.


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तुम्हारी नर्म उंगली पकड़
कई बसंत गुजार देता.

बसंत के ख्वाब,
छिटके न होते तो!

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