Sunday, January 20, 2013

...On Kobad Ghandy


                         

                       लोगों ने छोड़ दिए रूरल मैनेजमेंट कॉलेज....उन्हें नहीं जाना गाँव वापिस, जहां की जमीन से वो निकले थे, धूल में खेले थे. उन्हें नहीं लौटना वहीं पर. उन्हें नहीं करनी समाज सेवा...उन्हें चाहिए है पैसा, ढेर सारा पैसा, जिससे गुजर कर सके वो एक शहजादे की तरह....रह सकें बंगलों में, वातानुकूलित घर, गाड़ी और ऑफिस में....नहीं चाहते वो कि कीचड़ और धूल उन्हें छू भी पाए....लेकिन कब तक भागोगे धूल से? एक न एक दिन मिलना ही है उसमें.
                         कोबाद घांदी, अक्सर सड़कों पे तन्हा जब में निकलता हूँ, तुम्हें याद करता हूँ. मुझे पता है मैं नहीं बन पाउँगा तुम्हारे जैसा, सिर्फ कुछ ही लोग पैदा होते हैं तुम्हारे जैसे....लेकिन कोशिशें जारी हैं...जब जीत जाऊंगा खुद से तो निकल पडूंगा तुम्हारी राह....राह जो धूल तक जाती है. मिट्टी में मिलने से पहले में मिट्टी तपाना चाहता हूँ....जिससे वो सोना बन सके.


Pic- A protest in New Zealand against Operation Green Hunt and the detention of Kobad Ghandy.

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