Saturday, January 26, 2013

नक्सली

                 

                       
                              एक गाँव जहां से न तो गुजरतें हैं ज़िन्दगी के काफिले, न आपकी चकाचौंध, न ही तरक्की, न ही बिजली के खम्भे....या हैं भी तो बस खम्भे, बिजली नहीं....जहां तक नहीं पहुँचते 'क', ख' 'ग'....और न ही पढ़ाने बाले.....जहां के स्कूल उजड़े हैं और जहां के लोग भूखे-नंगे. एक अदब से पेट पर हाथ फेर अम्मा बोलती है 'बेटा पेट भरा है मेरा, आज तू खाले पेट भर.' तो चीख निकलती है आत्मा से. इसी गाँव के बारे में दो शब्द लिख दूं मैं तो आप क्या कहेंगे मुझे? नक्सली?? चलिए मैं नक्सली सही ....हमें नक्सली बनाने के बाद, अगर आपकी खुद्दारी जाग जाये तो 'मैन स्ट्रीम' में पंहुचा दो इन्हें ....फिर किसी भी पैमाने से सजायाफ्ता ठहरा दो हमें, हम तैयार हैं. 

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